भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ७ ]

शारीरस्थानम्

३३३

मर्मों में प्रायः सोम (जल), वायु, अग्नि, रज, सत्व, तम, और मूत्रात्मा (आत्मा) ये रहते हैं। इसलिये मर्मों पर आघात लगने पर प्राणी जीवित नहीं रहते।

वि० मन्तव्य—इसको समझने के लिये देखिये—शा० अ० ४ का सू० ३ ॥३५॥

इन्द्रियार्थेष्वसंप्राप्तिर्मनोबुद्धिविपर्ययः ॥३६॥

रुजश्च विविधास्तीव्रा भवन्त्याशुहरे हते।

हते कालान्तरघ्ने तु ध्रुवं धातुक्षयो नृणाम् ॥३७॥

ततो धातुक्षयाज्जन्तुर्वदनाभिश्च नश्यति।

हते वैकल्पजनने केवलं वैद्यैर्नपुणात् ॥३८॥

शरीरं क्रियया युक्तं विकलत्वमवाप्नुयात्।

विशल्यघ्ने तु विज्ञेयं पूर्वोक्तं यच्च कारणम् ॥३९॥

रुजाकराणि मर्माणि क्षतानि विविधा रुजः।

कुर्वन्त्यन्ते च वैकल्प्यं कुर्वेद्यवशगो यदि ॥४०॥

सद्यः प्राणहर मर्मों पर आघात लगने से रूप रस आदि ह्रस्वों के विषयों का ज्ञान नहीं होता। मनस् एव बुद्धि में वैपरीत्य हो जाता है और नाना प्रकार की तीव्र वेदनायें होती हैं। कालान्तरघ्न मर्मों पर आघात होने पर धातुक्षय निश्चित रूप में होता है। इसलिये धातुओं के क्षय से और वेदनाओं के कारण रोगी की मृत्यु होती है। वैकल्प्य कारक मर्मों पर आघात होने पर केवल वैद्य की बुद्धिमानों से शरीर क्रिया युक्त रहने पर भी विकलता को प्राप्त होता है। विशल्यघ्न मर्मों का विघात होने पर जब तक शल्य रहता है, तब तक जीता है, पूर्वोक्त कारणों के अनुसार मृत्यु समझनी चाहिये। रुजाकर मर्मों पर आघात पहुँचने पर नाना प्रकार की पीड़ायें होती हैं। और यदि किसी अनाड़ी वैद्य के चंगुल में फस गया तो रोगी विकलांग हो जाता है ॥३६-४०॥

छेदभेदाभिघातेभ्यो दहनाहारणादपि।

उपघातं विजानीयान्मर्मणां तुल्यलक्षणम् ॥४१॥

मर्मों के समीप मर्म पर छेदन, भेदन, चीट लगने, जलने, फटने, से भी मर्मों के ऊपर लगे सीधे आघात के समान लक्षण होते हैं।

वि० मन्तव्य—मर्मस्थल पर छेदन भेदन आदि से भी उपघात के ही समान लक्षण होते हैं अर्थात् उसके ऊपर चाहे चिकित्सा के दृष्टिकोण से किये छेदन आदि कर्म हो जायें अथवा अन्य प्रकार से दण्ड एवं तल्लव बन्धों आदि से आघात हो जायें, परन्तु लक्षण समान ही होते हैं। अतएव श्लो० ३३ में मर्मज्ञान को शल्यतन्त्र-शल्यचिकित्सा का आधा भाग होना है और समझने के लिये देखिये श्लो० ३०, ३१, ३२, ३३ तथा ३४ और ४२ तथा ४३ ॥ ४१ ॥

मर्माभिघातस्तु न कश्चिदस्ति

योऽरुपात्ययो वापि निरत्ययो वा।

प्रायेण मर्मस्वभिताडितास्तु

वैकल्प्यमूच्छन्त्यथवा श्रियन्ते ॥४२॥

मर्मों पर चीट पहुँचने से थोड़ा उपद्रव या विलकुल हानि न हो, यह बात असम्भव है। मर्मों पर आघात पहुँचने पर प्रायः विकलता अथवा मृत्यु अवश्य होती है ॥४२॥

मर्माण्यविघ्नाय हि ये विकारां

मूच्छन्ति काये विविधा नराणाम्।

प्रायेण ते कूच्छतमा भवन्ति

नरस्य यत्नैरपि साध्यमानाः ॥४३॥

शरीर के जो भी विकार मर्म स्थानों में होते हैं, वे प्रयत्नपूर्वक चिकित्सा करने पर भी प्रायः कष्टसाध्य रहते हैं ॥४३॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने प्रत्येकमर्म-निर्देशशरीरं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

सप्तमोऽध्यायः

अध्यातः सिरावर्णविभक्तिशारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे सिरा वर्ण विभक्ति शारीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में सिराओं का तथा उनके वर्णों का वर्णन है ॥१,२॥

सप्त सिराशतानि भवन्ति, यामिरिदं शरीरमाराम इव जलहारीणीभिः केदार इव च कुल्याभिरुपस्तिष्ठते-ऽनुगृह्यते चाकुञ्चनप्रसारणादिभिर्विशेषैः, दुमपत्रसेवनो-नामिव तासां प्रतानाः, तासां नाभिमूलं, ततश्च प्रसरन्त्युर्ध्वमधस्तिर्यक् च ॥३॥

सात सी शिरायें हैं। जिस प्रकार जल को ले जानेवाली नाली द्वारा उपवन अथवा कुल्या (कुलहरे) के द्वारा जिस प्रकार खेत का उपस्तेहन और पोषण होता है, उसी प्रकार इन सिराओं के सिकुड़ने फैलने आदि से इस शरीर का स्नेहन और पोषण होता है। ये सिरायें शरीर में वृक्ष के पत्ते की सेवनियों के समान फैली हुई हैं। इन सिराओं का मूल नाभि है, वहाँ से ये सिरायें ऊपर, नीचे और तिरछी जाती हैं।

वक्तव्य—तीन उपमाओं से सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम सिराओं को बताया है। जिस प्रकार नाली में चलता हुआ पानी आस-पास की भूमि को भी गीला करके पोषण देता है, उसी प्रकार सिराओं से पास के तन्तुओं का भी पोषण होता है, इसी का नाम 'उपस्तेहन' है ॥३॥