भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ७ ]

भवतश्चात्र श्लोकौ—

यावत्यस्तु सिराः काये संभवन्ति शरीरिणाम् ।

नाभ्यां सर्वा निवद्वस्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ॥४॥

इसमें दो श्लोक हैं— मनुष्यों के शरीर में जितनी भी सिराएँ हैं, वे सब नाभि से सम्बद्ध हैं । वहाँ से (नाभि से) ये चारों ओर फैलती हैं ॥४॥

नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः प्राणाश्चाभिर्न्युपाश्रिता ।

सिराभिरावृता नाभिक्षक्रनाभिरिवारकैः ॥५॥

प्राणियों के प्राण नाभि में आश्रित हैं, और प्राणों से नाभि आश्रित है । नाभि सिराओं से घिरी है, जिस प्रकार चक्र (पहिये की धुरी)-आरों से घिरी रहती है ।

वक्तव्य—सम्भवतः यह कल्पना गर्भावस्था में गर्भ की स्थिति के आधार पर की गई है । गर्भावस्था में गर्भ का जीवन इसी नाभि के आधार से रहता है, यहीं से उसे पोषण मिलता है ।

वि० मन्तव्य—गर्भ का जीवन उस बाह्य नाभि (घुन्नी-तुच्छ) के आधार में रहता ही है, परन्तु जन्म के पश्चात् उसके जीवन का आधार नाभि नामक मर्म है वहाँ से इसके साथ साथ प्राण का सञ्चार भी होता है । इसको समझने के लिये श्री शाङ्ख-धराचार्य का सुभाषित स्मरणीय एवं मननीय है, यथा—

नाभिस्यः प्राणपवनः स्पृष्ट्वा हृत्कमलान्तरम् ।

कण्ठादुर्बहिर्विनिर्णोति पातुं विष्णुपदामृतम् ॥

पीत्वा चाऽम्बरपीयूषं पुनरायाति वेगतः ।

प्रीणयन् देहमखिलं दीपयन् जठरानलम् ॥

अर्थात्—नाभि में स्थित प्राणवायु सिराओं द्वारा हृदय कमल के अन्तर (भीतरी भाग) को स्पर्श करके (भीतर से होकर) कण्ठ (श्वास मार्ग) से बाहर निकल जाती है, केवल विष्णुपद (आकाश) के अमृत (अमृत तत्त्व मय आप—न्यास जल) को पीने के लिये और आकाश के पीयूष (अमृत) को पीकर तत्काल पुनः भीतर चली जाती है । जाते ही समस्त शरीर का प्रीणन तर्पण करती है और जठराग्नि का दीपन करती है । यह क्रिया जन्म के पश्चात् जीवन भर चलती रहती है । सिराएँ नाभि से प्राणमय रस को लेकर हृदय में आती हैं और हृदय से फुफ्फुसों में ले जाती हैं और और रस तो फुफ्फुसों में ही रह जाता है, परन्तु प्राण वायु उदान के साथ मिलकर कण्ठ से बाहर चला जाता है, परन्तु तत्काल लौट आता है । हृदय भी सिरामय मर्म है (दे० शा० अ० ६ सू० ७) । सिराओं ने ही हृदय का रूप बना लिया है या सिराओं का ही आगे चलकर “हृदय” बन गया है, हृदय से यद्यपि रक्त चालू होता है, परन्तु वह रस मय होता है और रस ही लाल हो जाने पर रक्त कहलाता है ।

यह रस या रसमय रक्त प्राणमय होता है, फलतः समस्त शरीर को अनुप्राणित करता है । हृदय से शरीर की ओर जानेवाली भी सिरा ही हैं, उनमें ध्यान होता है, अतः धमनी कही जाती है, जहाँ आगे चलकर अत्यन्त सूक्ष्म (द्रुमपत्र सेवनीवत्) रूप में परिणत हो जाती है वहाँ “क्षोतस” कही जाती है और वहाँ से लौटकर पुनः हृदय की ओर आनेवाली सिरा ही सिरा कही जाती है, चरक के शब्द में धमानात् धमन्यः, खवणात् क्षोतासि, सरणात् सिराः च० सू० अ० ३ । यह क्षोतस शब्द सुश्रुत के योगवाही क्षोतों तथा मुख नासा आदि बहिर्गामी क्षोतों (छिद्रों) से भिन्न है ॥५॥

तासां मूलसिराश्चस्वारिंशत् ; तासां वातवाहिन्यो दश, पित्तवाहिन्यो दश, कफवाहिन्यो दश, दश रक्तवाहिन्यः । तासां तु वातवाहिनीनां वातस्थानगतानां पञ्चसप्ततिशतं भवति, तावत्य एव पित्तवाहिन्यः पित्तस्थाने, कफवाहिन्यश्च कफस्थाने, रक्तवाहिन्यश्च यकृतप्लीहोः, एवमेतानि सप्त सिराशतानि ॥६॥

इनमें मूल सिराएँ चालीस हैं । इनमें दस सिराएँ वातवहा, दस पित्तवहा, दस कफवहा और दस रक्तवहा हैं । वायु को ले जानेवाली और वायु के स्थानों में पहुँची सिराएँ एक सौ पच्चीस (१७५) हैं । इतनी ही पित्त स्थान में रहनेवाली, पित्त को ले जानेवाली, इतनी ही कफ स्थान गत और कफ को ले जानेवाली, इतनी ही रक्त को ले जानेवाली—रक्त के स्थान यकृत, प्लीहा में रहनेवाली सिराएँ हैं । इस प्रकार से सात सौ सिराएँ हैं ।

वि० मन्तव्य—मूल अर्थात् मुख्य या वर्णन करने योग्य सिरा ४० हैं । वायु के स्थान हैं—नाभि (प्राण का) ‘उदानवायोः’ आधारः फुफ्फुस प्रोध्यते बुधैः । आमपक्वाशयमध्यवरः समानः, मलाशयचरः अपानः । सर्वशरीरचरो व्यानः’ दे० नि० अ० १ । वैसे तो वायु एक ही है, परन्तु स्थान नाम आदि भेद से प्रकार का माना जाता है । पित्त के स्थान—अग्न्याशय, यकृत एवं प्लीहा, हृदय नेत्र तथा त्वचा । कफ के स्थान—आमशय, हृदय, कण्ठ, शिरस् तथा सन्धियाँ । अथवा—वातस्थान—वाताशय, पित्तस्थान—पित्ताशय, कफस्थान—श्लेष्माशय (दे० शा० अ० ५ सू० ७) । इन अवयवों का उपस्नेहन—सिक्शन—सन्तर्पण करनेवाली है । उक्त सिराओं में १०—१० एवं १० × ४ = ४० ॥६॥

तत्र वातवाहिन्यः सिरा एकस्मिन् सकृन् पञ्चविंशतिः, एतेनैतरसकथ बाहू च व्याख्याती, विशिष्यतस्तु कोष्ठे चतुर्बिंशत्, तासां गुदमेदाश्रिताः श्रेण्यामष्टौ, द्वे पार्श्वयोः, षट् पृष्ठे, तावत्य एवोदरे, दश वक्षसि ।