सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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गारीरस्थानम्
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एकचत्वारिंशच्चतुष्ण ऊर्ध्वं, तासां चतुर्दश श्रीवायां, कर्ण- योश्चतस्रः, नव जिह्वायां, षण् नासिकायां, अष्टौ नेत्रयोः, एवमेतत् पञ्चसप्ततिसप्तं वातवाहिनीनां सिराणां न्या- ख्यातं भवति । एष एव विभागः शेषाणामपि । विशेष- तस्तु पित्तवाहिन्यो नेत्रयोर्दश, कर्णयोर्द्वे, एवं रक्तवहाः कफवहाश्च । एवमेतानि सप्त शिरागतानि सविभागानि न्याख्यातानि ॥७॥
एक दृग्ग में वातवाही सिरायाँ पञ्चौस हैं । इतनी ही दूसरी दृग्ग और बाहुओं में समझना । विशेष भेदकोष्ठ में चौतीस सिरायाँ हैं, इनमें आठ सिरायाँ गुदा और मेहन का आश्रय करके श्रोणी में रहती हैं । पाश्वों में दो-दो, पीठ में छै, उदर में भी छै वक्षस्थल में दश । ज्वर से ऊपर इकतालीस सिरायाँ हैं । इनमें से श्रीवा में चौदह, कान में चार, जिह्वा में नौ, नासिका में छै, नेत्रों में आठ । इस तरह वातवाही एक सौ पचहत्तर सिरायाँ कह दीं । इसी प्रकार से शेष सिराओं का विभाग है । केवल भेद इतना है, कि—नेत्रों में पित्तवाहिनी दस हैं, कानों में दो हैं । इसी प्रकार रक्तवहा और कफवहा हैं । इस प्रकार से ये सात सौ सिरायाँ विभाग के साथ कह दीं हैं ।
वि० मन्तव्य—नेत्र तेजस् विशिष्ट स्थान है, अतः उसके वर्द्धनार्थ पित्तवाहिनी दो सिरा अधिक हैं, रक्त-धातु-पित्तमय होता है, अतः रक्तवाहिनी सिरा दो अधिक हैं और पित्त एवं रक्त के शमनार्थ कफवाहिनी सिरा भी दो अधिक हैं । और पित्तवाहिनी, रक्तवाहिनी तथा कफवाहिनी सिरा दो दो ही हैं जब कि कर्ण में वात वाहिनी सिरा चार हैं, क्योंकि— कर्ण शब्दवह स्रोत है और वायु शब्दवह है ॥७॥
भवन्ति चात्र—
क्रियाणामप्रतीघातसमोहं बुद्धिकर्मणाम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि स्वाः सिराः पवनश्चरन् ॥८॥ यदा तु कुपितो वायुः स्वाः सिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते वातसंभवाः ॥९॥ आजिष्णुतामन्नरुचिमग्निदीप्तिमरोगताम् । ससर्पन् स्वाः सिराः पित्तं कुर्पोच्चान्यान् गुणानपि । यदा प्रकुपितं पित्तं सेवते स्ववहाः सिराः । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते पित्तसंभवाः ॥११॥ स्नेहमन्नेषु सन्धीनां स्थैर्यं वलमुर्द्धणताम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि वृत्तासः स्वाः सिराश्चरन् ॥ यदा तु कुपितः श्लेष्मा स्वाः सिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते श्लेष्मसंभवाः ॥१३॥ धातूनां पूर्णं वर्णं स्पश्रंज्ञानमसंशयम् । स्वाः सिराः संचरद्भक्तं कुर्पोच्चान्यान् गुणानपि ॥१४॥ यदा तु कुपितं रक्तं सेवते स्ववहाः सिराः । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते रक्तसंभवाः ॥१५॥
इसमें श्लोक भी हैं—अपनी सिराओं में गति करता हुआ वायु क्रियाओं में किसी प्रकार को रुकावट को उत्पन्न नहीं करता बुद्धि के कर्मों में मोह ( अज्ञान ) उत्पन्न नहीं करता, अन्य गुणों ( प्रसर्दन, उद्वहन, पूरण आदि ) भी करता है । कुपित हुआ वायु जब अपनी सिराओं में गति करता है, तब वातजन्य नाना प्रकार के रोग मनुष्य को होते हैं । पित्त अपनी सिराओं में गति करता हुआ आजिष्णुता ( कान्ति ), अन्न में रुचि, अग्नि की प्रदीप्ति, नीरोगता उत्पन्न करता है । कुपित हुआ पित्त जब अपनी सिराओं में जाता है, तब पित्तजन्य नाना प्रकार के रोग मनुष्य को होते हैं । अपनी सिराओं में गति करता हुआ कफ अंगों में स्निग्धता, सन्धियों में स्थिरता, प्रबल बल और दूसरे भी गुणों को उत्पन्न करता है । जब कुपित कफ अपनी सिराओं में गति करता है तब कफजन्य नाना रोग मनुष्य को होते हैं । अपनी सिराओं में चलता हुआ रक्त धातुओं को भरना, वर्ण ( कान्ति ), संशय रहित स्पश्रंज्ञान और अन्य गुणों को उत्पन्न करता है । और जब कुपित रक्त अपनी सिराओं में फिरता है, तब रक्तजन्य नाना रोग उत्पन्न होते हैं ।
वक्तव्य—वायु के कार्य आदि के लिये चरक सूत्रस्थान अध्याय बारह, सुश्रुत० सूत्रस्थान अ० १५ देखें ।
वि० मन्तव्य—जब वायु अपनी सिराओं में ही घूमता है तब वह प्रकृतिस्थ होता है अथवा यों कहिये कि प्रकृतिस्थ वायु अपनी सिराओं में घूमता है—विकृत नहीं । तब तो उसका उन्मार्ग गमन-मार्ग का उल्लंघन करके गमन ध्रुव- निश्चित है, इसी प्रकार पित्त, कफ एवं रक्त को भी समझिये । तात्पर्य यह है कि वायु, पित्त, कफ एवं रक्त जब तक प्रकृतिस्थ रहते हैं तब तक अपनी सिराओं में गति करते हैं । फलतः प्राणी प्रकृतिस्थ स्वस्थ रहता है और जब वे अपनी सिराओं का उन्मार्गगमन करते हैं तब प्राणी अस्वस्थ हो जाता है और उन्मार्गगमन तभी करते हैं जब विकृत हो जाते हैं ॥८-१५॥
न हि वातं सिराः काश्चिन्न पित्तं केवलं तथा ।
श्लेष्माणं वा वहन्त्येता अतः सर्ववहाः स्मृता ॥१६॥
कोई भी सिरा अकेली न तो वायु का, न पित्त का, न कफ का अकेला वाहन करती है, अपितु सब सिराओं का वहन करती हैं । इसलिये इनको सर्ववहा कहते हैं ।
वि० मन्तव्य— वास्तव में सब सिरा सर्ववहा हैं अर्थात् प्रत्येक सिरा वात, पित्त, कफ एवं रक्त की वहा होती है । आहार पांचभौतिक होता है । उसका रस भी पाञ्चभौतिक होता है वही रस रक्त में मिलता है और रक्त पित्त द्वारा रंगा जाने पर रक्त कहलाता है और रक्त वहन उक्त सिरा करती हैं, तात्पर्य है कि—वात-पित्त-कफमय रक्त होता है,