सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
तथापि वातस्थानों में वात, पित्तस्थानों में पित्त, कफस्थानों में कफ तथा रक्तस्थानों में रक्त का वहन विशेष रूप से होता है, अतः वातवहा आदि कहना उचित ही है । अर्थात् सर्ववहा होने पर भी उक्त नामकरण किया जाता है ॥१६॥
प्रदुष्टानां हि दोषाणां मूच्छितानां प्रधावताम् ।
ध्रुवमुन्मार्गगमनमतः सर्ववहाः स्मृताः ॥१७॥
दुषित होकर दौड़नेवाले दोष परस्पर मिलकर अपने स्थान या मार्ग को छोड़कर गलत मार्ग में जरूर जाते हैं । इसलिये सब सिरायें सर्ववहा कही जाती हैं ।
वि० मन्तव्य—प्रदुष्ट दोषों का उन्मार्ग गमन होने से ही रोग उत्पन्न हो जाते हैं, प्रदुष्ट होकर वे परस्पर मिल भी जाते हैं और वे लगाम बोड़ा के समान प्रधावतां—दौड़ने लगते हैं और वायु पीड़ा आदि, पित्त—दाह आदि तथा कफ कण्डू आदि और रक्त-कुष्ठ आदि रक्तज रोगों को उत्पन्न कर देता है और सिरावेध (देखिये अ० ८) द्वारा तथा जलोत्का आदि (दे० सू० अ० १३) द्वारा रक्त अर्थात् वात पित्त कफ मय रक्त निकाल देने से उक्त रोग शान्त हो जाते हैं । अतएव “सिराव्यधः चिकित्सायै” (शा० अ० ८-२३) कहकर सिरावेध अर्थात् रक्तस्त्रावण का महत्त्व बतलाया गया है सब है कि रक्तस्त्रावण को दृष्टि में रखकर यह सब कथा कही गई है ॥१७॥
तत्रारुणा वातवहाः पूर्णन्ते वायुना सिराः ।
पित्तादुष्णाश्च नीलाश्च, जीता गौर्यः स्थिराः कफात् ।
अस्मृगृह्णातु रोहिण्यः सिरा नात्युष्णजीतलाः ॥१८॥
इनमें वातवहा सिरायें अरुण वर्ण की, और वायु से भरी रहती हैं । पित्त से सिरायें नीली और उष्ण होती हैं, कफ से शीतल, स्थिर और श्वेत वर्ण की होती है । रक्त को वहन करनेवाली रोहिणी (गहरे लाल रंग की) रंग की तथा न बहुत उष्ण और न बहुत शीतल होती है ।
वक्तव्य—रक्त अनुष्णशीत है, यथा—“अनुष्णशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तं च वर्णतः । शोणितं गुरुं विषं स्याद् विदाहश्चास्य पित्तवत् ॥” सुश्रुत० ।
वि० मन्तव्य—इन लक्षणों द्वारा चतुर चिकित्सक सिराओं को देखकर वायु आदि की अधिकता का अनुभव कर सकता है और जब वे वातपूर्ण हो जाती हैं तब अरुण कालापन लिये (लाल) पित्त से नीली तथा कफ से श्वेत हो जाती हैं । फलतः शरीर का वर्ण भी अरुण, पीत या नील तथा श्वेत हो जाता है ॥१८॥
अत ऊर्ध्वं प्रपद्यामि न विधेय्याः सिरा भिषक् ।
वैकल्प्यं मरणं चापि न्यधात्तासां ध्रुवं भवेत् ॥१९॥
गिराशतानि चत्वारि विधाच्छाखासु बुद्धिमान् ।
षट्त्रिंशच्च शतं कोष्ठे चतुःषष्ठं च मूर्धनि ॥२०॥
शाखासु षोडश सिरा कोष्ठे द्वात्रिंशदेव तु ।
पञ्चाशजत्रजत्रुणश्चोर्ध्वमव्यध्याः परिकीर्तिताः ॥२१॥
इसके आगे उन सिराओं को कहूँगा—जिनका कि वेधन वैध को नहीं करना चाहिये । क्योंकि उन अवैध सिराओं का वेधन करने से विकृतता या मृत्यु निश्चित है । शाखाओं में चारसौ, कोष्ठ में एक सौ छत्तीस, शिर में एक सौ चौसठ (१६४) सिरायें हैं । इनमें से शाखाओं में सोलह, कोष्ठ में बत्तीस और शिर में पचास सिरायें अवैध कही हैं ।
वि० मन्तव्य—जिन सिराओं के वेधन का निषेध किया गया है, वे सब मर्म स्थान गत हैं अथवा उनके समीपगत हैं देखिये शा० अ० ६ में प्रत्येक मर्म का निर्दिष्ट स्थल और उनके नाम । सिरावेध अवश्य करना चाहिये, उससे मानव की व्याधियों की लगभग आधी चिकित्सा हो जाती है, परन्तु वेध करते समय उक्त स्थानों की सिराओं का वेध नहीं करना चाहिये अर्थात् उनको बचाकर अन्यत्र वेध करना चाहिये यही उसका तात्पर्य है । वेध निषेध के हेतु १—धमन होने के कारण क्षत का सन्धान होने में कठिनाई होती है, २—रक्त का स्त्रावण बहुत वेग के साथ होता है, ३—उक्त स्थान मर्मस्थल है अथवा मर्म के समीपस्थ हैं । इन १६, ३२, ५०×६८ सिराओं का रक्तस्त्रावण के लिये वेध नहीं करना चाहिये और उक्त स्थानों पर छेदन भेदन आदि शस्त्रकर्म करते समय उन सिराओं को कटने से बचाना चाहिये । वहाँ पर अभिनकर्म तथा शस्त्रकर्म का प्रयोग भी नहीं करना चाहिये (देखिये अ० ६ का श्लोक ४१) ॥२१॥
तत्र सिराशतमेकस्मिन् सविधन भवति, तासां जलधरा स्वेका, तिस्रश्चाभ्यन्तराः—तत्रोर्वीमंजो द्वे, लोहिताक्षसंज्ञा चैका, तास्त्वव्यध्याः, एतेनैतरसकिय बाहू च व्याख्याती, एवमशस्त्रकृत्याः षोडश शाखासु । द्वात्रिंशच्चोण्यां, तासामष्टावज्रशकृत्याः—द्वे द्वे विटपयोः, कटीकतरुणयोश्च, अष्टावष्टावैकैकस्मिन् पार्श्वं, तासामैकैकामूर्ध्वगां परिहरेत्, पार्श्वसन्धिगते च द्वे, चतस्रो विजतिश्च पृष्ठं षष्ठवज्रमुभयतः, तासामूर्ध्वगामिन्यौ द्वे द्वे परिहरेद्द्वतीसिरे, तावत्य एवोदरे तासां मेदोपरि रोमराजोमुभयतो द्वे द्वे परिहरेत् ; चत्वारिशद्दक्षिं तासां चतुर्दशाश्वकृत्याः—हृदये द्वे, द्वे द्वे स्तनमूले, स्तनरोहितापलापस्तम्भेषुभयतोऽष्टौ, एवं द्वात्रिंशद्दशाश्वकृत्याः पृष्ठोदरोऽसु भवन्ति । चतुःषष्ठं सिराशतं जत्रण ऊर्ध्वं भवति, तत्र षट्पञ्चाशच्चिरोधरायां, तासामष्टौ चतस्रश्च मर्मसंज्ञाः परिहरेत्, द्वे कुक्राटिकयोः, द्वे विधुरयोः, एवं त्रीवायां षोडशाव्यध्याः, हन्वोरुभयतोऽष्टावष्टौ, तासां सन्धिधमन्यौ द्वे द्वे परिहरेत्, षट्त्रिंशच्चिद्वायां, तु सन्धिधमन्यौ द्वे द्वे परिहरेत्, वामवहे च द्वे, तासामधः षोडशाश्वकृत्याः, रसवहे द्वे, वामवहे च द्वे, द्विद्वीदश नासायां, तासामोपनासिक्यश्चतस्रः परिहरेत् ।