सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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तासमेव च तालुयेकां श्रुवातुहेशे, अष्टत्रिशदुभयोनेत्रयोः, तासमेकैकैकामपाङ्कयोः परिहरेत, कर्णयोर्दण्ड, तासां श्रुद्वा-वाहिनीमेकैकां परिहरेत, तासानेत्रगतस्तत् ललाटे षष्टिः, तासां केगान्तातुगताश्चतस्रः, आवर्त्योरेकैका, स्थपन्यां चैकां परिहर्तव्या, शंखयोर्दण्ड, तासां शंखसन्धिगतामेकैकां परिहरेत, द्वादश मूर्धनि, तासामुत्क्षेपयोर्द्वि परिहरेत, कृत्याः पञ्चागजज्युग ऊर्ध्वमिति ॥२२॥
प्रत्येक टांग में एक सौ सिरायेँ हैं, उनमें से जालधरा सिरा और अन्दर की ओर तीन सिरायेँ (दो-उर्वी और लोहितस्र) वे अवैध हैं। इसी तरह दूसरे पैर और बाहुओं की सिरायेँ समझना। इस तरह सब शाखाओं में सोलह सिरायेँ अवैध हैं। (जालधरा सिरातल हृदय मर्म में रहती है)।
श्रोणि में बत्तीस सिरायेँ हैं। इनमें आठ सिरायेँ अवैध हैं, विट्पमर्मी में दो-दो। एक एक पार्श्व में आठ सिरायेँ रहती हैं। उनमें ऊपर जानेवाली एक एक सिरा को बचाना चाहिये। पार्श्व सन्धगत दो सिराओं को भी बचाना चाहिये। पृष्ठ में पृष्ठवंश के दोनों ओर २४ सिरायेँ हैं। उनमें ऊपर जानेवाली बूढ़ी नामक दो सिरायेँ बचानी चाहिये। उदर में भी चौबीस सिरायेँ हैं। इनमें से मूत्रेन्द्रिय के ऊपर, रोमराजी के दोनों आर दो दो सिराओं को बचाना चाहिये। वक्षस्थल में चालिस सिरायेँ हैं, उनमें से चौदह सिरायेँ शस्त्र कर्म में अयोग्य हैं। यथा—हृदय तथा स्तनमूल में दो-दो, स्तन रोहित में दो-दो अपलाप और अपस्तम्भ दोनों ओर एक एक, इस प्रकार आठ सिरायेँ अवैध हैं। इस तरह पीठ, पेट, छाती में बत्तीस सिरा अवैध हैं।
जन्तु के ऊपर के भाग में एक सौ चौसठ सिरायेँ हैं, श्रीवा में ५६ सिरायेँ हैं। उनमें से १२ मर्म संज्ञक सिरायेँ, दो कुक्का-दिका, दो विधुर, इस प्रकार श्रीवा में सोलह सिरायेँ बचानी चाहिये। हनुके दोनों ओर आठ आठ सिरायेँ हैं, उनमें सन्धि में रहनेवाली दो-दो धूमनियाँ छोड़नी चाहिये। जिह्वा में ३६ सिरायेँ हैं। इनमें से सोलह जिह्वा के नीचे होती हैं, इनमें दो रसवहा और दो वागवहा सिरायेँ शस्त्रकर्म में बचानी चाहिये। नासिका में २४ सिरायेँ हैं, इनमें से नाक के पास की चार सिरायेँ बचानी चाहिये। तालु के मुहु देश में की एक सिरा को भी बचाना चाहिये। दोनों नेत्रों में अङ्गुलीस सिरायेँ हैं। इसमें से अपांओं की एक एक सिरा को बचाना चाहिये। कानों में दस सिरायेँ हैं—इनमें से एक एक शब्दवाहिनी सिरा को बचाना चाहिये। नासिका और नेत्र गत ललाट में साठ सिरायेँ हैं, इनमें से केशान्तों में जानेवाली चार, आवर्चमर्मा
में एक एक, स्थपनी में एक, कुल सात सिरायेँ बचानी चाहिये। शंखों में दस सिरायेँ हैं, उनमें से शंख सन्धि की एक एक सिरा को बचाना चाहिये। शिर में बारह सिरायेँ हैं—इनमें से उत्क्षेप मर्म में दो, सीमन्तो की पांच, अधिपति में से एक सिरा को बचाना चाहिये। इस प्रकार से पचास सिरायेँ जन्तु के ऊपर अवैध हैं ॥२२॥
भवति चात्र—
व्याप्नुवन्त्यभिने देहं नाभितः प्रमृताः सिराः।
प्रतानाः पद्मिनोक्न्ददाद् विसादीनां तथा जलम् ॥२३॥
इसमें श्लोक भी है—जिस प्रकार पद्मिनी कन्द से निकले विष आदि के प्रतान जल में फैले रहते हैं, उसी प्रकार नाभि से निकली सिराओं के प्रतान इस सारे शरीर में फैले हुए हैं ॥
इति शुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने सिरावणविभक्तिशारीरं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अष्टमोऽध्यायः
अथातः सिरान्यधविधि शारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे 'सिरान्यध' विधि शारीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—सिराका व्यध या वेधन सिरान्यध कहलाता है। रोग शान्ति के लिये सिरावेध किया जाता है, जब रुक्—रुजा—रोग का हेतु वातादि से दूषित रक्त होता है तब सिरा वेध आवश्यक है। यूनानी चिकित्सा करने वाले भारतीय चिकित्सक प्रायः सिरा वेध करते हैं। पञ्जाब-जहाँ रक्तसार मानव अधिक हैं—में सिरावेध किया जाता है। च० सू० अ० २४ में लिखा है कि—शीतोष्णस्निग्धरूक्षधैः उपक्रान्ताश्च ये गंदाः। सम्यक्साध्या न सिध्यन्ति रक्तजान् तान् विमावयेत् ॥ अर्थात् जो रोग—शीत, उष्ण, स्निग्ध एवं रूक्ष आदि द्रव्यों द्वारा चिकित्सा करने पर सुखसाध्य रोग भी शान्त नहीं होते उनको रक्तज रोग समझना चाहिये। देखा गया है कि जीर्ण ज्वर आदि में अनेक चिकित्साओं के असफल होने पर सिरा वेध से आरोग्य लाभ हुआ। वातादि द्वारा रक्त दूषित होने पर शारीरिक ही नहीं मानसिक रोग भी हो जाते हैं, अतः उन्माद, अपस्मार, मद, मोह, मूर्च्छा, उद्वेग, महागद, अभिन्यास, हृदयद्रव (जडकन) आदि अनेक रोग हो जाते हैं। उनकी शान्ति के लिये भी सिरावेध का स्मरण कर लेना अच्छा है। जलौका, सिंगी एवं पन्क्ष से एकदेशीय रोग की शान्ति होती है, परन्तु बिना सर्वाङ्ग शोधिनी है। कुष्ठ के प्रारम्भ में यदि