सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुमुक्षुसंहिता
[ अ० ८ ]
बार २ सिरा बेध किया जाय तो बहुत लाभ हो। परन्तु खेद है कि कोई चिकित्सक इधर ध्यान ही नहीं देता। सु० सू० अ० १४ के श्लो० ३३ तथा ३४ में कहा गया है कि—रक्त का समीचीन विद्यावण हो जाने पर शरीर में लघुता, वेदना की शान्ति, व्याधि के वेग का परिक्ष्य तथा मन्स का प्रसाद (प्रसन्नता-निर्दोषता) हो जाता है और कुछ आदि स्वर्गदोष, मन्त्रियार्थ, व्रणशोथ तथा अन्य सब रक्तविकार कभी नहीं होते ॥
बालस्थविररुक्षक्षतक्षीणभीरूपरिश्रान्तमद्यपाध्वस्त्रीक-शितवमित्रविरिक्तास्थापितानुवासितजागरितकलोबकुगग-भिणोनां कासश्वासजोषप्रवृद्धश्चराक्षपक्षपाघातोपवासपि-पासामूर्च्छाप्रपीडिनां च सिरां न विध्येत, यश्चाव्यध्याः, न्यध्याश्चाष्टाः, ष्टाश्चायन्त्रिताः, यन्त्रितश्चानुस्थिता इति ॥३॥
निम्न अवस्थाओं में सिराबेध न करे—बालक, बृद्ध, रूक्ष, उग्रक्षतः से क्षीण, डरपोक, थका हुआ, मद्य पीनेवाला, यात्री; एवं स्त्री के सेवन से कुश, वमन, विरेचन आस्थापन-अनुवासन दिये, रात में जागरण किया, नपुंसक, कुश, गर्भवती, कास, श्वास, शोष, तीव्रस्वर, आन्धेपक, पक्षाघात, उपवास, प्यास, मूर्च्छा से पीड़ित अवस्थाओं में वैद्य सिरा का वेधन न करे। अवेध्य शिराओं में भी वेधन न करे। वेधन योग्य सिरा यदि दिखाई न दें, तो उसमें भी वेधन न करे। देखने पर भी यदि सिरा को बाँधा नहीं गया, तो भी वेधन न करे। बाँधने पर भी यदि सिरा ऊपर को न उभरें, तो भी वेधन न करे।
वक्तव्य—सिरा में इजैक्षण देने के लिए जो विधि बरती जाती है, वही विधि सिरा बेध की है। प्रायः करके कोहनी के जरा नीचे सिरा (त्रैक्रियल वेन) का वेधन करते हैं। इसमें सिरा का वेधन करने के लिये पहले सिरा को ऊँचा उभारना आवश्यक है। इसके लिये बाहुपर कसकर पट्टी, रवड़ की नली, या दूसरी तरह से दबाव देते हैं। जिससे रक्त का ऊपर जाना जरा देर के लिये रुक जाये। रक्त न जाने से सिरा में रक्त रुकने से सिरा फूल आती है। फूलने पर उभर आती है। अब इसका वेधन किया जाता है ॥३॥
शोणितावसेकसाध्याश्च ये विकाराः प्रागभिहित्वा स्तेषु चापक्वेध्वन्येषु चानुक्तेषु यथाभ्यासं यथान्यायं च सिरां विध्येत् ॥४॥
रक्त मोक्षण से अच्छे होनेवाले रोग पहले सूत्रस्थान अध्याय चौदह में कह दिये हैं, उन रोगों में तथा रक्त मोक्षण से ठीक होनेवाले जो रोग वहाँ नहीं कहे (जैसे गुरुत्व, प्लीहा आदि), उनमें एवं रोगों की अपकावस्था में (रक्त मोक्षण साध्य
रोगों की), अभ्यास के अनुसार (जिस शिरा का वैद्य वेधन करते हैं) जैसा न्याय (उचित) हो, वैद्य उस प्रकार सिरा का वेधन करे। (यथाभ्यासमिति यथासमीपमिति—डल्हणः) ॥४॥
प्रतिषिद्धानामपि च विषोपसर्गं आत्ययिके च सिरा-न्यधनमप्रतिषिद्धम् ॥५॥
जिन लोगों के लिये सिराबेध का निषेध किया है, उनमें भी विष के उपद्रव होने पर तथा आत्ययिक रोग (विनाशक रोग-विद्रधि, अन्तः विद्रधि आदि) होने पर सिरा वेधन करना चाहिये ॥५॥
तत्र सिन्धस्विन्नमातुरं यथादोषप्रत्यतीकं द्रवप्राय-मन्तं भुक्तवन्तं यवाम् पातवन्तं वा यथाकालमुपस्थाप्या-सीनं स्थितं वा प्राणान्बाधमानो वस्त्रपट्टचमोन्तवर्त्तकल-लतानामन्यतमेन यन्त्रयित्वा नातिगाढं नातिश्रिथिलं शरीरप्रदेगमासाद्य प्राप्ते शास्त्रमादाय सिरां विध्येत् ॥६॥
रोगी को स्नेहन देकर दोष के विपरीत पतला सा अन्न पिलाकर अथवा यवाम् पिलाकर योग्य काल में अपने समीप बिठाकर या खड़ा करके, जीवन में जिससे हानि न हो, ऐसे वस्त्र पट्ट, चर्म, अन्तवर्त्तकल, लतादि किसी वस्तु से बाँधकर बहुत कड़ा या बहुत ढीला न हो, ऐसे ढंग से शरीर के उस भाग में यथोक्त शस्त्र से शिरा का बेध करे ॥६॥
नैवातिशीते नात्युष्णे न प्रवाते न चाग्निरे ।
सिराणां न्यधनं कार्यमरोगे वा कदाचन ॥ ७ ॥
बहुत शीतकाल में या अधिक गरमी में, जोर से चलती वायु में, आकाश के मेघान्छन्न होने पर, तथा बिना किसी रोग के सिरा का वेधन न करे।
वि० मन्तव्य—रक्तक्षायण भी वमन विरेचन के समान शोधन कर्म है, अतः वमन विरेचन के समान देश काल आदि का विचार कर लेना चाहिये। एतदर्थ—सूत्रस्थान का अध्याय १२ तथा अध्याय १६ और चिकित्सा स्थान का अ० ३३ आदि अवश्य देख लेना चाहिये। अरोगे वा कदाचन—का तात्पर्य है कि अरोग-आरोग्य म भी कभी २ रक्तक्षाय कराना चाहिये, यथा वमन विरेचनात्मक संशोधन किया जाता है—शीतोद्भव दोषचय वसन्ते विशोधयन् ग्रीष्मजमभ्रकाले। घनोत्पत्ये वाषिक् माशु सम्यक् प्राप्नोति रोगान् क्लुप्तान् न जातु ॥ इन्हीं समयों में सिराबेध भी किया जाता है और आत्ययिक दशा में जब भी आवश्यक हो तभी रक्त क्षायण कर देना चाहिये, परन्तु तदनु-कूल व्यवस्था करके। जैसा कि १० वें श्लोक में कहा गया है—सिराबेध करते समय सु० सू० अ० १४ के पाठ-२१ से ४५ अवश्य देखिये और आवश्यकतानुसार तदनुसार कार्य-कौजिये ॥