भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ८]

शारीरस्थानम्

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तत्र व्यध्यसिरं पुरुषं प्रत्यादित्यमुखमरतिमात्रोच्छित्ते उपवेश्यासने सकथनोराकुञ्चितयोनिवेश्य कूपरे सन्निवृत्तस्योपरि हस्तावन्तर्गुढाकुष्ठकृतमुष्ठी मन्ययोः स्थापयित्वा यन्त्रणशाटकं श्रीवामुष्ट्योरुपरि परिक्षिप्यान्येन पुरुषेण पश्चात् स्थितेन वामहस्तेनोत्तानेन शाटकान्तर्यं प्राहयित्वा ततो वृयात्—दाक्षिणहस्तेन सिरोस्थापनाथं नात्यायतजिथिलं यन्त्रमावेष्टयेति, अस्फुरावाणार्थं च यन्त्रं पृष्ठमध्ये पीडयेति, कर्मपुरुषं च वायुभूणमुखं स्थापयेत्, एष उत्तमाङ्गगतानामन्तमुखवर्जानां सिराणां न्यधने यन्त्रगविधिः। पादव्यध्यसिरस्य पादं समे स्थाने मुस्थितं स्थापयित्वाऽन्यं पादमीषत्तमं कुचितमुन्मैः कृत्वा व्यध्यसिरं पादं जानुसन्धेयः शाटकेनावेष्ट्य हस्ताभ्यां प्रपीड्य गुल्फं व्यध्यप्रदेगस्योपरि चतुरङ्कुले प्लोतादीनामन्यतमेन वद्ध्वा वा पादसिरां विध्येत्। अथोपरिष्टाङ्गस्तौ गुढाकुष्ठकृतमुष्ठी सम्यगासने स्थापयित्वा। मुखोपविष्टस्य पूर्ववचनत्रं वद्ध्वा हस्तसिरां विध्येत्। गुधसोविश्वान्धोः सङ्क्षिप्तजानुकूपरस्य श्रोणीपृष्ठकन्धेपूत्राभितपृष्ठस्यात्राकजिरस्कस्योपविष्टस्य विस्फूजितपृष्ठस्य विध्येत्। उद्वरोरसोः प्रसारितोरस्कस्योत्राभितजिरस्कस्य विस्फूजितदेहस्य। बाहुभ्यामवलम्बमानदेहस्य पार्श्वयोः। अवनामितमेदस्य मेदं। उत्तमितविदृष्टजिह्वाप्रस्याधो जिह्वायाम्। अतिन्यात्ताननस्य तालुनि दन्तमूलेषु च। एवं यन्त्रोपायान्त्यांश्च सिरोस्थापनहेतून् बुद्ध्याऽवेदय शरीरवशेन व्याधिबशेन च विदध्यन्त ॥१॥

जिस पुरुष का सिरा वेध करना हो, उसको बालिशतर ऊँची चौकी पर सूर्य की ओर मुख रखकर बिठाये। टांगों को घुटनों पर मोड़कर घुटने पर दोनों कोहिनियों को रखवाकर, अंगुठा अन्दर की रखते हुए मुट्ठियाँ बन्द करावे। इन मुट्ठियों का श्रीवा में मन्त्रा पर रखवाये। फिर गर्दन और मुट्ठियों को यंत्रण-शाटक ( बांधने के कपड़े ) से लपेट कर-धुमाकर पीछे की ओर खड़े दूसरे व्यक्ति के बायें हाथ में यंत्रण-शाटक के दोनों छोर पकड़ाकर, वैद्य उस व्यक्ति से कहै कि दहिने हाथ से शिराओं का उत्थान करने के लिये न बहुत जोर से न बहुत धीमे, यंत्रशाटक को कसने लगे। रक्त का निर्हरण होने के लिये यंत्र को पीठ के मध्य में ऐंटन दो। रोगी मुख में हवा भर कर बैठे। यह यन्त्रणविधि अन्तर्गत सिराओं को छोड़कर शिरोगत शेष शिराओं के वेधन के लिये है।

जिस पुरुष के पैर की सिरा का वेधन करना हो, उसका पैर समान स्थान पर अच्छी प्रकार रखकर दूसरे पैर को थोड़ा सा ऊँचा करके, जिस पैर में सिरावेध करना हो, उस पैर को घुटने के नीचे यन्त्रण शाटक से लपेटकर, गुल्फ पर्यन्त दोनों हाथों से दबाकर अथवा वेध्य स्थान के ऊपर चार अङ्गुल प्लोत

(कगड़ा) या चमड़ा किसी से बाँधकर पैर की शिरा का वेधन करे।

हाथों की शिराओं के वेधन के लिये अंगुठे को मुट्ठी के अन्दर की ओर दबाकर अच्छी तरह आसन पर मुख पूर्वक बिठाकर, पुरुष के हाथ को पूर्वोक्त विधि से बाँधकर हाथ की सिरा का वेधन करे।

ग्रन्थी और विश्वाची में घुटने और कोहनी को संकुचित कराकर फिर यन्त्रण करे। श्रोणी, पीठ, कन्धे में सिरावेध करना हो तो पीठ को ऊँचा करके और सिर को झुकाकर बैठे हुए व्यक्ति को सीधी तनी हुई पीठ होने पर सिरा वेध करे। पेट और छाती में सिरा वेध करना हो तो, शिर को ऊँचा उठाकर, छाती तथा मध्य शरीर को फैलाकर शरीर में दश-मान सिरा का वेधन करे। पार्श्वों में शिरावेध करना हो तो बाहूओं से शरीर को थमाकर सिरा का वेध करे। मेहन पर सिरावेध करना हो तो मेहन को बिना झुकाये सिरा वेध करे। जिह्वा के सिरावेध में जिह्वा को ऊपर उठाकर, जिह्वाग्र को दबाकर जिह्वा के नीचे की सिराओं का वेधन करे। तालु और दन्तमूलों के सिरावेध में मुख को खोलकर तालु और दन्तमूलों में सिरावेध करे।

इसी प्रकार अनुक्त स्थानों में सिराओं को यंत्रों से अथवा अन्य उपायों से बांधकर-सिराओं को उभारनेवाले साधनों से काम लेकर, शरीर रोग के अनुसार सिरा का वेधन करे ॥१॥

मांसलेखवकाशेषु यवमात्रं शस्त्रं निदध्यात्, अतोऽन्यथाऽर्धयवमात्रं ब्रीहिमात्रं वा ब्रीहिमुखेन, अस्थनामुपरि कुठारिकया विध्येदर्थयवमात्रम् ॥२॥

मांसल प्रदेशों में जो मात्र शस्त्र से वेधन करे। मांसल स्थानों से भिन्न-स्थानों में आवे जो के बराबर या ब्रीहिमुख शस्त्र से जो भर वेधन करे। अस्थियों के ऊपर कुठारिका नामक शस्त्र से आधा जो के बराबर गहरा सिरावेध करे।

वि० मन्तव्य—मांसल-अधिक मांसवाले अवयवों में वेधन करते समय सिरा शस्त्र के दबाव से मांस में धँस जाती है—धँस सकती है, अतः ब्रीहिमुख—नेहरेने जैसे पर दोनों ओर धारवाले शस्त्र से वेध किया जाता है और जहाँ सिरा के नीचे अस्थि रहती है वहाँ कुठारिका कुल्हाड़ी के आकार का छोटा अस्थि उपयुक्त होता है। इस शस्त्र के उपयोग की विधि—कुठारिकां वामहस्तन्यस्तां इतरहस्तमध्येमांसगुल्फगुष्ठविष्टभ्या अभिहन्त्यात् सु० सू० अ० ८-५। अर्थात्-कुठारिका को बायें हाथ से वेधस्थल पर रखकर-दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली को अंगुठा से बलपूर्वक स्तम्भ करके कुठारिका की पीठ पर आधात करे-मारे। इस प्रकार वह सिरा का वेधन कर देती है; परन्तु आधात-चोट उतनी ही हो जिससे सिरा का आधा भाग करे, समस्त सिरा न कट जाय अथवा उससे भी आगे कुठारिका की धार न धँस जाय ॥२॥