सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ६ ]
व्यधे वर्षासु विधेयत् प्रोष्ठकाले तु भीतले ।
हेमन्तकाले मध्यहि गुरुकालाह्वयः स्मृताः ॥१०॥
वर्षाभ्युतु में जब बादल न हो, प्रोष्ठभ्युतु में ठण्ड के समय, हेमन्तभ्युतु में मध्याह्न में शस्त्र कर्म करना चाहिये ॥
वक्तव्य—आत्म्यिके पुनः कर्मणि काममृतु विकल्प्य कृत्रिमगुणोपधानेन यथतु गुणविपरीतेन भेषजं संयोगप्रमाण-विकल्पेनोपपाद्य प्रमाणवीर्यसमं कृत्वा ततः प्रयोजयेत्-उत्तमेन यत्नेनावहितः ॥ चरक ॥
वि० मन्तव्य—सिरावेधन एवं छेदन मेदन आदि सभी प्रकार के शस्त्रकर्म के लिये उत्काल उपयुक्त होते हैं ॥१०॥
सम्यक्गुरुहनिपातेन धारया या सवेदसूक्त ।
सुहृतं रुद्धा तिष्ठेच्च सुविद्धां तां विनिदिशन् ॥११॥
अच्छे प्रकार शस्त्र चलाने से धारा के रूप में कुछ काला-काला खून बहे, पीछे रुक जाये, उसे सुविद्ध जानना ॥११॥
यथा कुसुम्भपुष्पेभ्यः पूर्वं स्रवांत पोतिका ।
तथा सिरासु विद्धासु दुष्टमग्ने प्रवर्तते ॥१२॥
जिस प्रकार कुसुम्भ के फूलों से पहले पोला रंग आता है, उसी प्रकार सिराओं का वेध करने पर पहले दूषित रक्त निकलता है ।
वि० मन्तव्य—यह दुष्ट रक्त दोषानुसार वर्णवाला होता है, यथा-वायु से दूषित रक्त-अदृग-कालापन लिये लाल, कफ से दूषित रक्त-नीलापन लिये अथवा नीलापन लिये लाल, कफ से दूषित रक्त-सफेदी लिये लाल और त्रिदोष दूषित रक्त क्वाथ अथवा गोमूत्र के सहस्र वर्णवाला होता है । यह भी स्मरणीय है कि कुछ रक्त उत्क प्रकार का निकलकर शुद्ध रक्त आने लगता है और तब उसे रोंकने का उपाय करना चाहिये । रोंकने के उपाय देखिये सु० सू० अ० १४ पाठ ३६ । और यदि सिरावेध करने पर रक्त की उचित रूप से प्रवृत्ति न हो तो उत्क अ० १४ के पाठ ३५ के अनुसार उपाय करो । दूषित रक्त भी ६५ तों० से अधिक नहीं निकालना चाहिये एक बार में, आवश्यकता हो तो पुनः १०-२० दिन के पश्चात् सिरावेध कर देना चाहिये । इस प्रकार ३-४ अथवा १०-२० बार सिरा-वेध किया जाता है । आरोग्य लाभ या रोगशान्ति पर्यन्त अनेक बार ॥१२॥
मूर्च्छतस्तथातिभीतस्य श्रान्तस्य तृषितस्य च ।
न वहान्त सिरा विद्धास्तथाऽनुत्थितेत्यन्त्रिताः ॥१३॥
मूर्च्छित, बहुत डरे, थक हुए, प्यासे, एवं न उभरी, न बांधी हुई, सिराओं में वेधन करने पर रक्त भली प्रकार नहीं बहता ।
वि० मन्तव्य—सिरावेध होते ही, रक्त की गन्ध आते ही कोई २ रोगी मूर्च्छित हो जाता है तब रक्तछाव नहीं होता । अतिभीत, श्रान्त तथा तृषित का रक्त शाद्धा रहता है, अतः
भीत को आश्वासित करके, श्रान्त एवं तृषित का जल पिठाकर सिरावेध करना चाहिये ॥१३॥
क्षीणस्य बहुदोषस्य मूर्च्छयाऽभिहतस्य च ।
भूयोऽपराह्नि विस्त्राण्य साऽपरेद्युश्च्यहेऽपि वा ॥१४॥
क्षीण, बहुत दोषवाले, मूर्च्छा से पीड़ित व्यक्ति में सिरावेध अपराह्न में दूसरे या तीसरे दिन करना चाहिये ॥१४॥
रक्तं सशेषदोषं तु कुर््यादपि विचक्ष्णः ।
न चातिनिःसृतं कुर््याच्छेषं संशमनैर्जयेत् ॥१५॥
दूषित रक्त को भी सम्पूर्ण रूप से बाहर नहीं करना चाहिये । उस दोष से युक्त शेष रक्त की चिकित्सा संशमन विधि से करे ।
वि० मन्तव्य—इस श्लोक को भली भाँति समझने के लिये देखिये सू० अ० १४ का श्लोक ४३ । तथा ४४ । संशमन विधि है—रक्त शोधन क्वाथ आदि का पान ॥१५॥
बलिनो बहुदोषस्य वयःस्थस्य शरीरिणः ।
परं प्रमाणामच्छन्ति प्रस्थं शोणितमोक्षणे ॥१६॥
बलवान्, मजबूत, दोषवाले और तरुण व्यक्ति का रक्त अधिक से अधिक एक प्रस्थ ( १३३ पल ) निकालना चाहिये । कहा भी है—
“वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे ।
सार्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहूर्मनीषिणः” ॥१६॥
तत्र पाददाहपादहर्षचिप्पविसर्पवातशोणितवातकण्टकविचिचिकापादद्वारोप्रभृतिषु क्षिप्रसमर्पण उपरिष्टाद् द्रव्यकुले व्रीहिमुखेन सिरां विधेयत्, इक्षोपदे तत्तिक्रितिते यथा वक्ष्यते, क्रोष्टुकुशिरः खञ्जपकुलत्रातवेऽनासु जह्न्यायां गुल्फस्योपरि चतुरङ्कुले, अपच्यामिन्द्ररस्ते रथस्ताद् द्रव्यकुले, जानुसन्धेरुपथयो वा चतुरङ्कुले गुधस्यां, ऊरूमूलसन्नितां गलगण्डे, एतेनेतरसकथि वाहू च व्याख्यातौ, विरोतस्तु वामबाहौ कूर्परसन्धेरभ्यन्तरतो बाहुमध्ये प्लीहि कनिष्ठिकातामिकयोमध्ये वा, एवं दक्षिणबाहौ यक्ष्महाल्ये ( कफादरे च ) एतामेव च कासश्वासयोरप्यादिशन्ति, गुधस्यामिव विरवाच्यां, श्राणि प्रति समन्ताद् द्रव्यकुले प्रवाहिकायां शूलिन्यां, परिवर्ति कोपदंगशुक्रदाषशुक्रव्यापस्तु मेदमध्ये, (वृषणयोः पार्श्वमूत्रवृद्ध्यां, नाभेरधश्चतुरङ्कुले सेवन्त्या वामपार्श्वे दकोदरे), वामपार्श्वे कक्ष्मास्तनयोरन्तरेऽविद्रधौ पार्श्वशुले च बाहुशोषावबाहुकथोरप्येके वदन्यंसंयोरन्तरे, त्रिकसन्धिमध्येगतां तृतीयके, अधः स्कन्धसन्धिगतामन्यतरपार्श्वसंस्थितां चतुथके, हतुसन्धिमध्येगतामपस्मारे, शंखकेशान्तसन्धिगतामुरोऽपाङ्गल्ललाटेषु चोन्मादे, जिह्वारोगेष्वधोजिह्वायां दन्तठ्याधिषु च, तालुर्न तालुल्लेष, कर्णयोर्कुरि समन्तात् कर्णशुले तद्द्वोगेषु च, मन्त्रा-