भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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शारीरस्थानम्

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प्रहणे नासारोगेषु च नासाग्रे, तिमिराक्षिपाकप्रशुतिष्व- ह्यामयेषूपनासिके ललाट-यामपाङ्ग्या वा, एता एव शिरोरोगाधिगम्यप्रशुतिषु रोगेविवति ॥१७॥

पाददाह, पादहर्ष, चिप्प, विसर्प, वातरक्त, वातकण्टक, विचर्चिका, पाददारी इत्यादि रोगों में क्षिप्र सर्ग के दो अंगुल ऊपर ब्रीहिमुख शस्त्र से सिरा वेध करे। श्लीपद में सिरा वेध इस रोग की चिकित्सा में कहेंगे। क्रोष्ठ शीर्ष, खड्ग, पंगुल तथा वातवेदना में—जंघा में—गुरुफ के ४ अंगुल ऊपर सिरावेध करे। अपची में इन्द्र वस्ति सर्ग के दो अंगुल नीचे सिरावेध करे। ग्रन्थरी में जानुसन्धि के चार अंगुल ऊपर या नीचे सिरावेध करे गलगण्ड में ऊरूमूल की सिरा का वेधन करे। इसी तरह दूसरी टाँग और दोनों बाहुओं के सिरावेध को सम- झना। विशेष भेद प्लीहा-रोग में वाम बाहु के मध्य में भीतर की ओर कूर्प सन्धि के समीप अथवा कनिष्ठिका और अनामिका के मध्य देश में सिरा वेध करे। इसी तरह यकृत दाल्युदर रोग में कास-श्वास में दक्षिण बाहु में सिरावेध करे। विश्वाची रोग में ग्रन्थरी के समान सिरावेध करे। शूलयुक्त प्रवाहिका में शोणी के चारों ओर दो अंगुल की दूरी पर सिरावेध करे। परिवर्त्तिका उपदेश शूक रोग और शुक्र रोगों में मेहन के मध्य में, मूत्रवृद्धि में वृषाणों के पाश्वों में उदकोदर में नाभि के नीचे, सीवनी के बाईं तरफ अंगुल पर सिरावेध करे अतः विद्रधि और पाश्वशूल में वाम कक्षा में, कक्षा और स्तन के बीच सिरावेध करना बाहुशोथ और अवबाहुक रोग में कन्धे के मध्य में सिरा वेध करे, ऐसा कई आचार्य कहते हैं। तृतीयकञ्चर में त्रिकसन्धि के मध्य की सिरा का वेधन करे। चतुर्थकञ्चर में किसी भी एक पाश्व में स्कन्ध सन्धि के नीचे सिरावेध करे। अपस्मार में हनुसन्धि के बीच में रहनेवाली सिरा का, अपस्मार और उन्माद में शंख तथा केशान्त सन्धिगत, वक्षस्थल, अपांग और ललाट में रहनेवाली सिराओं का वेध करे। जिह्वा रोग और वृन्त रोगों में जीभ के नीचे रहनेवाली सिराओं का वेध करे। तालु के रोगों में तालु में सिरा वेध करे। कर्ण पीड़ा और कर्ण रोगों में कानों के ऊपर चारों ओर सिरावेध करना चाहिये। गन्ध का ग्रहण न होने पर और नाक की बीमारियों में नाक के अग्र भाग में सिरा वेध करे। तिमिररोग, अक्षि- पाक आदि रोगों में नाक के समीप ललाट की या अपांग की सिराओं का वेधन करे। शिशोरोग, अधिमन्थ आदि रोगों में इन्हीं सिराओं में वेध करना चाहिये।

वि० मन्तव्य—यद्यपि सिरा सर्वाङ्गशोथिनी होती है, क्योंकि सिरा में सर्व शरीरगामी रक्त का वहन होता है, (यदि उससे रक्त का वहन न होका जाय तो सारा रक्त निकल जाता है)।

तथापि रग्ग स्थान पर जैसे जलौका एवं सिनी आदि का प्रयोग किया जाता है, करने का विधान है और ठाम भी देखा जाता है, परन्तु यह एक विलक्षणता है कि अन्य स्थित रोग की शान्ति के लिये अन्यत्र सिरावेध किया जाता है और विभिन्न रोगों के लिये भिन्न भिन्न स्थानों में भी। यथा अपची रोग में इन्द्रवस्ति के नीचे, गलगण्ड में ऊरूमूल में। अस्तु, होगा कोई परस्पर सम्बन्ध ॥१७॥

दुष्टव्यधा विशतिः—दुर्विद्वाऽतिविद्वा कुञ्चित्वा पिच्छिता कुट्टिताऽप्रसृताऽत्युदीर्णाऽन्ते विद्वा परिशुष्का कृणिता वेपिताऽनुस्थितविद्वा शस्त्रहता तिर्यविद्वाऽप- विद्वाऽव्यधा विद्रता वेतुका पुनः पुनर्विद्वा सिरास्त्ना- यवस्थिसन्धिमर्म्मसु चेति ॥१८॥

दूषित रूप में वेधन हुई सिराई बीस हैं, यथा—दुर्विद्वा, अतिविद्वा, कुञ्चित्वा, पिच्छिता, कुट्टिता, अप्रसृता, अत्युदीर्ण, अन्ते- विद्वा, परिशुष्का, कृणिता, वेपिता, अनुस्थित विद्वा, शस्त्रहता, तिर्यग विद्वा, अपविद्वा, अव्यधा, विद्रता, वेतुका, पुनः पुनः विद्वा, मांस सिरा-स्त्नायु अस्थि और सन्धि मर्मों में विद्वा, इस प्रकार से दूषित वेधन बीस प्रकार का है।

वि० मन्तव्य—सिरा वेध की अकुशलता के कारण उक्त प्रकार के २० दुष्ट व्यध (वेध) हो सकते हैं और उनसे निम्न सू- १६ में लिखी व्यापद हो सकती हैं ॥१८॥

तत्र या सूक्ष्मशस्त्रविद्वाऽव्यक्तमस्तु क्लवति रुजाशो- फवती च सा दुर्विद्वा, प्रमाणतिरिक्तविद्वायामन्तः प्रविशति शोणितं शोणितातिप्रवृत्तिर्वा साऽतिविद्वा, कुञ्चित्वायामप्येवं, कुण्टगच्छप्रमथिता पृथुलोभावमापन्ना पिच्छिता, अनासादिता पुनरन्तयोश्च बहुशः शस्त्रभि- हता, कुट्टिता, जीतभयमूर्च्छाभिरप्रवृत्तशोणिता, अप्रसृता, तीक्ष्णमहामुखशस्त्रविद्वाऽत्युदीर्णा, अल्परक्तसाविष्यन्ते- विद्वा, क्षीणशोणितस्यानिलपूर्ण परिशुष्का, चतुर्भुगासा- दिता किंचित्प्रवृत्तशोणिता कृणिता, दुःस्थानवन्धनाद्वपमा- नायःशोणितसंसोहो भवति सा वेपिता, अनुस्थितविद्वा- यामप्येवं, छिन्नाऽतिप्रवृत्तशोणिता क्रियासङ्करी गन्त्रहता तिर्यक्प्रणिहितगन्धा किञ्चच्छेषा तिर्यग्विद्वा, बहुगः क्षता हीनगन्धप्रणिधानेनापविद्वा, अगन्त्रकृत्या अव्यधा, अन्- वस्थितविद्वा विद्रता, प्रदेशस्थ बहुशोऽवच्छटनादोद्द- व्यधा मुहूर्मुहुः शोणितस्त्वावा वेतुका सूक्ष्मशस्त्रव्यधा- द्विद्वा रुजा शोफैः क्लवैः मरणं चापादयति ॥१९॥

सूक्ष्मशस्त्र से वेधन करने पर थोड़ा रक्त आता हो, वेदना और घृजन हों, उसे दुर्विद्वा समझना। प्रमाण से अधिक वेधन