सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
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होने पर रक्त शरीर के अन्दर हो, उसे अतिविद्धा जानना। कुक्षिता में भी अतिविद्धा के लक्षण होते हैं। कुण्डित शस्त्र से कुचली जाने के कारण चौड़ी हुई सिरा पिच्छिता कहाती है। सिरा के न मिलने पर पास की सिराओं में बार-बार वेषन करने पर कुक्षिता कहलाती हैं। शीत, भय, या मूर्च्छा से रक्त न निकलने पर अमसुता कहलाती हैं। तीक्ष्ण और बड़े मुखवाले शस्त्र से वेषन होने पर अत्युद्गीर्णा कहलाती हैं। शिरा के अन्तिम छोर पर वेषन करने पर थोड़ा सा रक्त निकलने पर अन्ते विद्धा कहलाती हैं। जिसका रक्त क्षीण होकर वायु भर गई हो उसे परिशुष्का कहते हैं। शस्त्र जब सिराके चौथाई भाग में ही प्रवेश करे, थोड़ा-सा रक्त निकले, उसे कृणिता कहते हैं। स्थान को छोड़कर सिरा को बाँधने से कर्पनेवालो सिरा का रक्त बाहर नहीं आता, इसे वेपिता कहते हैं। शिरा के न उठने पर भी वेषन करने पर वेपिता के लक्षण होते हैं उसे अनुस्थितविद्धा कहते हैं। शस्त्र से कटने के कारण बहुत मात्रा में रक्त निकले, सिरायें अपना कार्य न करें, उसको शस्त्रहा कहते हैं। तिरछा शस्त्र चलाने के कारण जो शिरा कटने से थोड़ी बच गई हो उसे तिर्यगविद्धा कहते हैं। हीन शस्त्र प्रयोग के कारण बहुत स्थानों पर चोट लगने पर अपविद्धा होती है। शस्त्र कर्म के अयोग्य सिराओं को अव्यध्या कहते हैं। चंचल सिराओं का वेषन होने से विदुता कहते हैं। शिरा प्रदेश के जोर से दबने पर जब शस्त्र से ऊपर ही ऊपर विद्ध हो जाते हैं और इन क्षता से रक्त बार-बार बहता हो, तो इसे वेनुका कहते हैं। सूक्ष्म शस्त्र के कारण बार-बार वेषन करने पर कटी सिराओं को पुनः पुनः विद्धा कहते हैं। मांस-सिरा-स्नायु सन्धि और अस्थि मर्म पर वेषन करने से पीड़ा, सूजन विकलता और मृत्यु होती है ॥१९॥
भवति चान्न—
सिरासु शिखितो नास्ति चला होता स्वभावतः।
मत्स्यवत् परिवर्तन्ते तस्माद्यन्तेन ताडयेत् ॥२०॥
इसमें श्लोक भी हैं—शिराओं में चंचलता (अस्थिरता)
स्वभाव से ही है। ये सिरायें मछली की तरह परिवर्तन करती हैं (मछली हाथ में आकर जैसे फिसल जाती है)। इसलिये सिराओं के विषय में उनकी जानकारी किसी को भी नहीं है। अतः इनका भेदन प्रयत्न पूर्वक करे ॥२०॥
अज्ञानता गृहीते तु अस्त्रे कायनिपातिते।
भवन्ति व्यापदश्चैता वहवृश्चाप्युपद्रवाः ॥२१॥
शस्त्र कर्म में अज्ञ व्यक्ति यदि शरीर पर शस्त्र चलाये तो पूर्वोक्त बहुत से रोग उत्पन्न होते हैं, और बहुत उपद्रव भी होते हैं ॥२१॥
स्नेहादिभिः क्रियायोगैर्न तथा लेपनैरपि।
यान्त्यासु व्याधयः शान्तिं यथा सम्यक् सिराव्यधात् ॥
स्नेहन, स्वेदन, अथवा लेपों से रोग उतनी अच्छी तरह जल्दी शान्त नहीं होते हैं, जितना सिरा वेष से जल्दी और अच्छी तरह शान्त होते हैं ॥२२॥
सिराव्यधश्चिकित्साधं शल्यतन्त्रे प्रकीर्तितः।
यथा प्रणिहितः सम्यग्बस्तिः कायचिकित्सिते ॥२३॥
शल्य तंत्र में सिरावेष चिकित्सा का आधा भाग है, जिस प्रकार कि काय चिकित्सा का बस्ति आधा भाग है। (यथा-तस्माच्चिकित्साधं सस्मिति ब्रुवन्ति, सर्वा चिकित्सामपि बस्तिमेकं चरकः)।
वि० मन्तव्य—सिरावेष का महत्त्व—शल्यशास्त्रिक रोग शान्ति के सब उपाय एक ओर और अकेला सिरावेष एक ओर अर्थात् यह अकेला ही सबके समान है, जैसे कायचिकित्सा में सभी संशमन उपाय एक ओर अकेला बस्ति प्रयोग एक ओर माना जाता है भगवान् पुनर्वसु ने तो कहा है कि बस्ति को कायचिकित्सा का आधा भाग है तो सभी आचार्य कहते हैं, परन्तु कुछ आचार्य उसे समस्त चिकित्सा मानते हैं अर्थात् बस्ति प्रयोग से सभी रोगों को पूर्ण चिकित्सा हो सकती है ॥२३॥
तत्र स्निग्धस्विन्नवान्तरिक्षास्थपितातुवासितसिराविद्धैः परिवर्त्यानि—क्रोधयासमैश्वेतद्विवास्वप्नवाग्वायामयानाध्ययनस्थानासनचन्द्रकमणशीतवातातपविरुद्धसात्त्याजोर्णान्यावल्लभात्, मासमेके मन्यन्ते। एतेषां विस्तरमुपरिष्टाद्धव्यामः ॥२४॥
स्नेहन, स्वेदन, वसन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन और सिरावेष करने पर क्रोध, परिश्रम, मेथुन, दिन में सोना, बहुत बोलना, व्यायाम, सवारी करना, पढ़ना, बैठना, खड़े रहना, घूमना, शीतल वस्तुयें, वायु, धूप विरुद्ध असाध्य-अजीर्ण भोजन, इनसे शरीर में बल आने तक बचा रहे। कोई आचार्य कहते हैं कि एक मास तक बचे। इनका विस्तर आतुरोपद्रव चिकित्सा में कहेंगे ॥२४॥
सिराविषाणतुम्बैस्तु जलौकामिः पदैस्तथा।
अवगाढं यथापूर्वं निर्हरेद् दुष्टशोणितम् ॥२५॥
दूषित रक्त को सिरामोक्षण, तुम्बी, जौक या पाछना से निकाले। पूर्व-पूर्व प्रकार गंभीर देश के लिये बरतना चाहिये। अतिशय गम्भीर होने पर सिरावेष करे, सबसे गहराई होने पर पाछे।
वि० मन्तव्य—इसके लिये देखिये सु० सू० अ० १३ ॥२५॥
अवगाढे जलौका स्यात् प्रच्छन्नं पिण्डिते हितम्।
सिराव्यध्यापके रक्ते शृङ्गलावृ त्वचि स्थिते ॥२६॥