सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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खूब गहरे भाग में दूषित हो (एक-स्थान पर हो) तो जाँक लगाये, रक्त स्थान पर पिण्डित रूप में हो तो पाछना चाहिये। दूषित रक्त अङ्ग में फेला हो तो खिरा बेध करे। स्वचा में दूषित रक्त हो तो सींग या अलावु से निकाले।
चरक में—'भिषग्वातान्वितं रक्तं विषाणेन विनिर्हरेत् । पितान्वितं जलौकोभिः कफान्वितमलावुभिः ॥ यथासन्नं विकारस्य व्यधयेदाशु वा शिराम् ॥ चरक० चि० अ० २१।६८ ॥
वि० मन्तव्य—खुनना या गोदना भी "प्रच्छन" ही है, इसे "पच्छ लगाना" कहते हैं। स्थानिक वेदना शान्ति के लिये यह अच्छा उपाय है ॥२६॥
इति सुश्रुतसंहितायां शरीरस्थाने खिराव्यधविधिश्चारीरं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
अथातो धमनीव्याकरणं आरीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे धमनी व्याकरण शारीर की व्याख्या करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—धमनी का व्याकरण—विशेष आकार या विवरण इस अध्याय में किया गया है ॥१, २॥
चतुर्विंशतिधर्मन्यो नाभिप्रभवामभिहिताः तत्र केचिन्वाहः सिराधमनीक्षोतसामविभागः, सिरा विकारा एवं हि धमन्यः क्षोतांसि चेति । तत् न सम्यक्, अन्यथा एवं हि धमन्यः क्षोतांसि च सिराभ्यः, कस्मात् ? व्यञ्जना-न्यत्वात्, मूलसन्निभ्यमात्, कमवैशेष्यात्, आगमाच्छ-केवलं तु परस्परसन्निष्कषात् सृष्टशागमकर्मत्वात् सौक्ष्म्या-च्च विभक्तकर्मणामप्यविभाग इव कर्मसु भवति ॥ ३ ॥
नाभि से उत्पन्न होनेवाली धमनियाँ चौबीस कहीं हैं। इस में कई कहते हैं कि सिरा, धमनी, क्षोत, इनका परस्पर कोई भेद नहीं है, धमनियाँ और क्षोत सिराओं के ही रूपान्तर हैं। यह बात ठीक नहीं है, धमनियाँ और क्षोत सिराओं से अलग ही हैं, क्योंकि—इनके लक्षण (आकृति, विह्व) भिन्न हैं, इनके मूल भी भिन्न हैं, कर्म भी अलग हैं, शास्त्र में भी इनको पृथक् २ माना है। तथापि परस्पर में सम्बन्ध रहने से, शास्त्र में समान वचन मिलने से, साधारण कर्म के कारण, सूक्ष्मता के कारण, शिरा, क्षोत और धमनी के कार्य भिन्न होने पर भी ये सब एक से ही मालूम होते हैं।
वक्तव्य—"क्षोतांसि, खिरा धमन्यो रसवाहिन्यो नाड्यः पथानो, मार्गाः शरीरच्छिद्राणि संवाता संवृतानि स्थानानि आशयाः क्षया निकेताश्चेति शरीरं धात्ववकाशानां लक्ष्याणां नामानि भवन्ति ॥
(२) धमनाद् धमन्यः, सरणात् खिराः, खवणात् क्षोतांसि ॥ चरक, (३) आकाश से दो-खिरा-धमनी-क्षोत (इनकी सुधिरता) बनते हैं। यथा—आकाशीयवकाशानां देहे नामानि देहिनाम्। खिराः क्षोतांसि मार्गाः खं धमन्यो नाड्य आशयाः" ॥३॥
वि० मन्तव्य—धमनी के सम्बन्ध में जैसा विवाद श्रोण-नाथ सेन (दे० प्रत्यक्षशारीरं), श्री हरिप्रपन्नजी (दे० रस-योगसागर का उपोद्घात), श्रीगङ्गाधर शास्त्री, तथा श्रीवाणकर आदि सुप्रसिद्ध मनीषियों में आज चल रहा है वैशा ही श्री सुश्रुत के समय में भी चल रहा था, हम इस विवाद को विविध वाद मानते हैं, विरुद्ध वाद नहीं, परन्तु श्री गणनाथ सेन एवं गङ्गाधर शास्त्री आदि ने कुछ बहुत आगे बढ़कर लिख डाला है, उसका प्रतिवाद भी अनेक मनीषियों ने किया है। अस्तु, किसी शब्द या वाक्य आदि का अर्थ करने-लगाने—समझने की विधि भगवान् पुनर्वसु ने इस प्रकार बतलाई है कि—तन्त्र-कर्त्ता (शास्त्रकर्त्ता) के अभिप्राय को तथा तन्त्र युक्तियों को समझकर "अर्थ" प्रकृत अर्थ कहना चाहिये, अतः "धमनी" का अर्थ करने में शास्त्रकर्त्ता का अभिप्राय देखना बहुत आवश्यक है, तन्त्राध्येता को तन्त्रकर्त्ता की ही बुद्धि से अवगम करना (समझना) चाहिये। तभी सत्य अर्थ किया जा सकता है, दूसरे तन्त्र कर्त्ताओं की दृष्टि से देखना उचित नहीं और उससे अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है। देखें च० सू० अ० २६ श्लोक ३७। अर्थ भी दो प्रकार का होता है १—तात्त्विक या वास्तविक अर्थ और २—व्यावहारिक बोलचाल लेनदेन आदि विषयक अर्थ। यह दोनों ही अर्थ ठीक—बहुत ठीक या समीचीन होते हैं, यथा—पाश्चमोतिक होने के नाते हरड एवं बहेड़ा में कोई भेद नहीं, परन्तु हरड हरड है और बहेड़ा बहेड़ा। तत्त्वतः—केचित् आहुः—के कथनानुसार खिरा, धमनी एवं क्षोतसु में कोई भेद नहीं है, कारण १—अनेक आचार्य ऐसा कहते हैं, यथा-धमानात् धमन्यः, खवणात् क्षोतांसि, सरणात् खिराः, ओजोवहाः शरीरेऽस्मिन् विषम्यन्ते समन्ततः। चरक सू० अ० ३०। खिरा भी नाभिप्रभवा हैं और धमनी भी, सु० शा० अ० ६ सू० २ तथा सु० शा० अ० ७ श्लोक ४-५, धमन्यो रसवाहिन्यो धमन्ति पवनं तनो। शा० सं० आदि अनेक शास्त्र