भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

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वाक्यों के अनुसार रसवहन कर्म की समाप्ता से सिरा धमनी एक ही वस्तु है। रहा ध्यान का भेद या प्रश्न—ध्यान वस्तुतः सिरा एवं स्तोतों में भी होता है, यद्यपि वह अस्फुट या अत्युक्त होता है। अन्यथा रस आदि का सञ्चार ही नहीं हो सकता, यदि वायु भी रस आदि को धकेलता है तो वह ध्यान हुए बिना आगे नहीं सरक सकता है। इसी सूत्र में स्वीकार किया गया है कि सिरा का विकार (कार्य-रूपान्तर में परिवर्तन) ही धमनी है, क्योंकि हृदय सिरामर्म है और उसी में नाभि से आनेवाली तथा शरीर से आनेवाली सिरा आती हैं और यहाँ से आगे चलनेवाली सिराओं में धमन अधिक स्फुट या व्यक्त हो जाता है। परन्तु वह भी रस का या रसमय रक्त का ही वहन करती हैं और वही आगे चलकर “वहुधा फलन्ति” (च० सू० अ०) बहुत प्रतानों के रूप में फलित हो जाती है—फैल जाती है, अतः स्तोत्र कही जाती है, रस का वहन यहाँ भी होता है। धमन भलेही अस्फुट हो जाता है। अतः वस्तुतः रस वहन की दृष्टि से इनमें कोई भेद नहीं है। यह है तात्त्विक या वास्तविक अर्थ। आगे व्यावहारिक अर्थ सुनिये—इस प्रकार पूर्व पक्ष या अनेक महर्षियों के मत का प्रतिपादन करके भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं ‘तत् तु न सम्यक्’—अर्थात् वह उल्लिखित मत ठीक तो है, परन्तु बहुत ठीक नहीं, कारण—जिनको हम इस अध्याय में धमनी एवं स्तोतस् नाम से लिखेंगे, वे धमनी एवं स्तोतस् सिराओं से भिन्न हैं, क्योंकि उनका जो लक्षण लिखेंगे वह भी सिराओं से भिन्न है, मूलतः भी भिन्न है, अर्थात् मूलतः सिरा ४० कही हैं, परन्तु धमनियाँ २४ मानी हैं, कर्म भी भिन्न हैं अर्थात् हम शब्द, स्पर्श, रूप रस एवं गंध का वहन तथा लेपाऽम्यङ्ग आदि के वीर्य का वहन आदि कर्म धमनियाँ का मानेंगे। कहेंगे सिराओं का नहीं कहेंगे और हम आगम अर्थात् आसवचन का भी उदाहरण—प्रमाण उपस्थित कर सकते हैं, यथा—आगम में अनेकत्र—ऐसे वचन मिलते हैं जहाँ एक ही वाक्य में—सिरा धमनी तथा स्तोतस् का नामोल्लेख किया गया है, यथा—मर्मसिरास्नायुधमनीः परिहरन् शब्दकर्म कुर्यात् तथा—सू० अ० ११ के पाठ २६ में स्वार कर्म का त्रिषेध करते हुए—एक ही पाठ में सिरा और धमनी पढ़ा गया है। इन सब कारणों से हम सिरा से धमनी को पृथक् मानते हैं। यह सब व्यावहारिक अर्थ है, अतएव इसी सूत्र में “सदृशप्रमकर्मवात्” कहकर धन्वन्तरि भी स्वीकार करते हैं कि सिरा एवं धमनी को एक मानना कोई अनुचित नहीं है, क्योंकि आगम में अनेकत्र—सिरा एवं धमनी को पर्याय माना

है और दोनों का कर्म (रस वहन) भी एक ही है। यथा—आकाशीय (खोलले सुषिर) अवकाशानां देहे नामानि देहिनां। सिरा स्तोतांसि, मार्गाः खं धमन्यः (डल्हन) और स्तोतांसि, सिरा, धमन्यो, रसायिन्यः, रसवाहिन्यो नाङ्ग्यः—आदि शब्द पर्यायवाचक हैं। च० वि० अ० ५। और आगे इसी अध्याय में स्तोतों का नाम निर्देश करते समय लिखा है ‘एषु अधिकारः’ (सू० १२) अर्थात् हम इन्हीं को स्तोत्र कहेंगे। यह शास्त्रसमय है। स्तोतस् का विचार उक्त सू० १२ में किया जायगा। किमधिकम्।

इस समस्त कथानक का तत्पर्य यह है कि—सिरा कहिये अथवा धमनी दोनों का उद्भव नाभि (गर्भ की नाभि अर्थात् धृच्छी और जात प्राणी की नाभि नामक मर्म अर्थात् अन्त्र) से हुआ है—आरम्भ वहाँ से हुआ है और आगे चलकर सिरा ही हृदय रूप में परिणत हो गई हैं और हृदय से आगे सिरा ही धमनी रूप में परिणत हो गई हैं। अब उनमें केवल धमन स्फुट हो गया है, कर्म वही रसवाहन ही है। आगे चलकर सिरा ही अथवा धमन के भेद से धमनी ही स्तोतस् रूप में परिणत हो गई है, केवल स्तोतस् रूप में परिणत होने पर धमन अस्फुट हो गया है और आगे चलकर स्तोतस् ही सिरा रूप में परिणत हो गया है और जिस रस को लेकर सिरा—नाभि से चली थी, उसका समस्त शरीर में वितरण करके उसके द्वारा प्रत्येक सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवयव का तर्पण करके बचे-खुचे रस को लेकर हृदय में आ पहुँचती है और इधर नाभि से रस को लानेवाली सिरा भी रस लेकर आ पहुँचती है और जितना रस-शरीर तर्पण में व्यय होता है उसकी पूर्ति हो जाती है, फिर पूर्ववत् हृदय से धमनी द्वारा रस चल पड़ता है। यह क्रम जीवन भर चलता रहता है। यही सब कुछ—तत्र “रस गतो” वातुः—अहः रहः गच्छति इत्यतो रसः, तथा तत्र एतेषां वातूनां अन्तर्धानरसः प्रीणयिता (सू० सू० अ० १४ सू० १३-११) आदि वाक्यों का तत्पर्य है। कोई कुछ भी कहे, परन्तु अग्निवेष का सदा ध्यायी भेद-सिराओं के घूम फिरकर पुनः हृदय में पहुँचने को कथा को जानता था—यथा—हृदो रसो निःसरति तत एव च सर्वतः। सिरामिः हृदयं च एति तस्मात् हृत्प्रभवाः सिराः ॥ (भेद संहिता) अर्थात्—हृदय से रस निकलता है और सब और घूम फिर कर सिराओं द्वारा हृदय में आ जाता है, इसलिये—केवल इस कर्म को देखकर सिरा को “हृदय-प्रभवा”—हृदय से—उद्भूत होनेवाली कहा जाता है। ऐसे तो मूलतः सिरा नाभिप्रभवा ही हैं। पाठों से