भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ६ ] ४४

शारीरस्थानम्

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निवेदन है कि इस सन्दर्भ को समझने के लिये—सू० ५० अ० १४ का अध्ययन अवश्य करें। संक्षेपतः—सिरा में जहाँ धमन होता है वहाँ उसका नाम धमनी हो जाता है। ४० एवं २४ का विचार—स्यात्—नाभि से उद्भूत ४० सिराओं में १६ सिरा रसायनी हैं, जो रस को लेकर शरीर का तर्पण करती हैं और २४ वे हैं जो हृदय की ओर आकर रक्त को लेकर शरीर का तर्पण करती हैं ॥३॥

तासां तु खलु नाभिप्रभवार्णा धमनीनामूर्ध्वंगा दश, दश चाधोगामिन्यः चतस्रस्रित्यर्गगाः ॥४॥

नाभि से उत्पन्न होनेवाली इन दस धमनियों में दस ऊपर को दस नीचे को, और चार तिरछी जाती हैं ॥४॥

ऊर्ध्वंगाः शब्दरूपरसगन्धप्रश्वासोच्छ्वासजुम्भिततुद्धसितकथितरुदित्तादीन् विशोषानभिग्रहन्त्यः शरीरं धारयन्ति । तान्मु हृदयमभिप्रपन्नास्त्रिधा जायन्ते, ताभिः शत । तासां तु वातपित्तकफजोणितरसान् द्वे द्वे वहतस्ता दश, शब्दरूपरसगन्धान्प्राभिगृह्णीते, द्वाभ्यां भाषते, द्वाभ्यां घोषं करोति, द्वाभ्यां स्वपिति, द्वाभ्यां प्रतिबुध्यते, द्वे वाश्रुवाहिन्यो, द्वे स्तन्यं स्त्रिया वहतः स्तनसंश्रिते, ते एव शुक्लं नरस्य स्तनाभ्यामभवहतः, तास्त्वेताभिः शत सविभागा व्याख्याताः । एताभिर्लुब्धं नामेन्द्ररूपाश्वं प्रोष्टोः स्कन्धप्रोवाबाहुवो धार्यन्ते याप्यन्ते च ॥५॥

ऊपर को जानेवाली धमनियाँ—शब्द, रूप, रस, गन्ध, प्रश्वास, उच्छ्वास, जम्भाई, होंक, हंसना, बोलना, रोना इत्यादि को वहन करतीं हुई शरीर को धारण करती हैं। ये धमनियाँ हृदय में पहुँचकर तीन भागों में विभक्त होकर तीस बन जाती हैं। इनमें से वात, पित्त, कफ, रक्त आदि रस को दो दो वहन करती हैं, इस प्रकार ये दस होती हैं। आठ धमनियाँ शब्द, रूप, रस और गन्ध का वहन करती हैं। दो धमनियों से बोला जाता है। दो धमनियों से घोष (अव्यक्त शब्द) होता है। दो से सोया जाता है। दो से जागा जाता है। दो से आंसुओं का वहन करती हैं। दो स्त्री के स्तनों में रहती हुई दूध का वहन करती हैं। वे ही दो धमनियाँ पुरुषों के स्तन में से शुक्र का वहन करती हैं। इस प्रकार से तीस धमनियों का व्याख्यान कर दिया। इन्हीं से नाभि के ऊपर उदर, पार्श्व, पीठ, उर, स्कन्ध, प्रोवा और बाहु का धारण और पोषण होता है।

वि० मन्तव्य—ऊर्ध्वंगा धमनियाँ—शब्द, रूप, रस एवं गन्ध नामक चार ही विषयों का अभिवहन करती हैं और स्पर्श का अभिवहन तिर्यग्गा धमनियाँ करती हैं (दे० सू० ६)। भाषते और घोषते—भाष व्यक्त्यायां वाचि (श्वादिगण) अर्थात् व्यक्त-हकारादि व्यंजन युक्त वाणी का उच्चारण करता है और घोषते—

घुषि शब्दे (चुरादिगण) अर्थात् शब्द-अकारादि स्वरों का उच्चारण करता है। पाठक स्वयं अनुभव करें कि बोलने और चिल्लाने में नाभि पर बल-जोर पड़ता है कि नहीं। यदि पड़ता है तो समझिये कि धमनी नाभिप्रपन्ना है कि नहीं। जिन दो धमनियों के द्वारा भाषते-बोलता है वे वातिन्द्रिय का और जिन दो धमनियों द्वारा घोषते-पोषण करता है वे कण्ठ-गत स्वरवह अवयव का धारण एवं यापन करती हैं। यह वे हैं जिनका वर्णन अ० ६ सूत्र २७ में किया गया है। जिनके आघात से मूकता एवं स्वर वैकृत हो जाता है और अ० ७ में—“वाग्वहे च द्वे” कहकर जिनको अवैध्य माना है। इसी प्रकार शब्द आदि का वहन करनेवाली धमनियों को अ० ६ तथा अ० ७ में देखकर समझने का प्रयत्न किया जाय। सोना जागना भी धमनियों के द्वारा होता है, जब मनस एवं इन्द्रियाँ कलंकृत हो जाती हैं—यक जाती हैं, फलतः विषय ग्रहण से निवृत्त होती हैं तब मानव सोता है (च० सू० अ० ३१)। शब्द आदि विषयों का वहन धमनियाँ करती हैं, यक जाने पर वहन करना छोड़ देती हैं, फलतः निद्रा आ जाती है। धार्यन्ते और याप्यन्ते—इनके द्वारा धारण होता है—जीवन की स्थिति बनी रहती है, और रस का भी वहन करती है, अतः भरण्या-पोषण भी होता है और यापन अवयवों का सञ्चालन भी होता है। अतएव पक्षाघात में—“अधोगामा, तिर्यग्गामा तथा उर्ध्वदेहगा धमनी” का उल्लेख किया है (दे० नि० अ० १ श्लो० ६०)। धमनियों की विकृति से अवयवों का सञ्चालन घट जाता है—रुक् जाता है ॥५॥

भवति चात्र—

ऊर्ध्वगमास्तु कुर्वन्ति कर्माण्येतानि सर्वशः ।

इसमें श्लोक भी है—ऊपर को जानेवाली धमनियाँ इस प्रकार से इन सब कार्यों को करती हैं।

अधोगमास्तु वद्यामि कर्म चासां यथायथम् ॥६॥

अधोगमास्तु वातमूत्रपुरीषशुक्रातैवादीन्यधो वहन्ति । तान्मु पित्ताग्नयमभिप्रपन्नास्तत्रस्थमेवात्रापानरसं विप्रक्वमौषय्याद्विवेचयन्त्योऽभिग्रहन्त्यः शरीरं तर्पयन्ति, अर्पयन्ति चोर्ध्वगानां तिर्यग्गाणां च रसस्थानं चाभिपूरयन्ति मूत्रपुरीषस्वेदाश्च विवेचयन्ति, आमपक्वाशयान्तरे च डाधा जायन्ते, ताभिः शत, तासां तु वातपित्तकफजोणितरसान् द्वे द्वे वहतस्ता दश, द्वे अन्नवाहिन्यावन्नाश्रिते, तोयवहे द्वे, मूत्रबस्तिमभिप्रपन्ने मूत्रवहे द्वे, शुक्लवहे द्वे शुक्लप्रादुर्भावय द्वे विसर्गाय, ते एव रक्तमभिग्रहतो विमजतरश्च नारीणामार्तवसंज्ञं, द्वे वचोऽनिरसन्यो स्थूला-न्त्रप्रतिबद्धे अष्टावन्त्रास्तिर्यग्गामिनीनां धमनीनां स्वेदमर्पयन्ति, तास्त्वेताभिः शत सविभागा व्याख्याताः । एताभि-