सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
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रघोनाभेः पक्वाशयकटीमूत्रपुरोषगुदबस्तिमेदस्कथोनि धार्यन्ते याप्यन्ते च ॥७॥
नीचे की तरफ जानेवाली धमनियों के कार्यों को ठीक प्रकार से कहता हूँ। अघोगामी धमनियाँ वायु (अपना वायु), मूत्र, मल, शुक्र, आर्त्तव, को नीचे की ओर वहन करती हैं। ये पिताशय में पहुँचकर अग्नि की उष्णिमा से भली प्रकार परिगक हुए अन्नरस और जलीय रसों का विवेचन और वहन करती हुई शरीर का पोषण करती हैं। ऊर्ध्वगत और तिर्यग्गत धमनियों को रस पहुँचाती हैं और रस स्थान (हृदय) को रस से भरती हैं। मूत्र, मल, स्वेद का अलग-अलग विभाग करती हैं। इन धमनियों के आमाशय और पक्वाशय के बीच में तीन विभाग होते हैं। इस प्रकार से ये तीस हो जाती हैं। इनमें से वात, पित्त, कफ, रस और रक्त को दो-दो धमनियाँ वहन करती हैं। इस प्रकार दस धमनियाँ हुईं। अंत्रों का आश्रय करके अन्न को ले जानेवाली दो, जल का वहन करनेवाली दो, मूत्राशय में मूत्र को ले जानेवाली दो, शुक्र की उत्पत्तिकरने के लिये शुक्र को ले जानेवाली दो, शुक्र को बाहर निकालने के लिये दो। ये ही दो धमनियाँ स्त्रियों में आर्त्तव का वहन करती हैं और विसर्ग करती हैं। स्थुलांत्र से सम्बद्ध दो धमनियाँ मल को निकालती हैं। शेष आठ धमनियाँ तिर्यक् जानेवाली धमनियों को स्वेद पहुँचाती हैं। इस प्रकार से तीस धमनियों का न्याख्यान कर दिया। अघोगामी धमनियाँ उपर्युक्त इन सब कार्यों को करती हैं।
वि० मन्तव्य—अघोगामा धमनियों के सम्बन्ध में—आपाततः यह नहीं समझना चाहिये कि मूत्र एवं पुरीष आदि धमनियों में से होकर निकलते हैं, अपितु यह समझना चाहिये कि ये धमनियाँ उन अवयवों का धारण एवं यापन करती हैं, जिनके द्वारा उक्त कार्य होते हैं। पिताशय—पित्त-पाचक पित्त का आशय अर्थात् कार्य करने का आशय अर्थात् अन्न। अन्न से अन्नपान के विपक्व रस को विवेचयत्यः अर्थात् अन्नपान में से पृथक् करके उसका वहन करती हुई शरीर का तर्पण करती हैं। मूत्रपुरीषस्वेदांश्च विवेचयन्ति—अर्थात् मलाशय में पहुँचे रसहीन अन्नपान = मलद्रव में से मूत्र एवं स्वेद अर्थात् मलद्रव के जलीयांश को पृथक् करती हैं। आगे चलकर यह जलीयांश उक्त रस में ही मिश्रित हो जाता है और रस, रक्त में और वृद्धों में जाकर रक्त से पृथक् होकर मूत्र रूप में परिणत हो जाता है और तिर्यग्गा धमनियों में पहुँच जाता है वह स्वेद रूप में परिणत हो जाता है। यह स्मरण रखना चाहिये कि अन्नपान का लक्षण-अधिकांश इसी जलीयांश के साथ शरीर में पहुँचता है। अतः एवं च मूत्र स्वेद में समान रूप से लक्षण रस पाया जाता है। द्वे अन्नवाहिन्या अन्नाश्रिते—ये वे धम-
नियाँ हैं, जिनके द्वारा अन्न में गति होती है और जिनको विकृति से अन्न की गति में रुकावट होने लगती है अथवा अवरोध हो जाता है रुकावट होने से अन्नपान विलम्ब से सरकता है, परन्तु पाचन में कोई न्यूनता नहीं आती है, अवरोध होने से आनाह नामक रोग हो जाता है, जिसमें अन्नपान वहीँ का वहीँ पड़ा रहता है—सरकता ही नहीं, इन दोनों दशाओं में भी रस का विवेचन करनेवाली धमनियाँ क्रियाशील रहती हैं। योगवहे द्वे—ये वे धमनियाँ हैं, जिनकी विकृति से तृषा उत्पन्न होती है—तृषा रोग संज्ञेयतः—दो प्रकार का देखा जाता है १—वह जिसमें जितना जल दिया जाता है वह विलीन होता रहता है और २—वह जिसमें आमाशय में जल भरा रहता है—पर शोष है, मुख शोष आदि होते रहते हैं। इसे सु० उ० अ० ४८ के श्लो० ८ में “क्षोतीनिरोधो” कहकर सूचित किया गया है। मूत्रवहे द्वे—ये मूत्रवह क्षोतों का धारण एवं यापन करती हैं। शुक्रवहे द्वे—जो अण्डकोश का और द्वे विसर्गाय—शुक्रवाही क्षोतों का धारण एवं यापन करती हैं। और ये शुक्र के साथ २ नारियों के आर्त्तव का उत्पादन एवं विसर्जन करती हैं अर्थात् उन अवयवों का जहाँ शुक्र एवं आत्तव का निर्माण होता है और जिनके द्वारा विसर्जन होता है धारण एवं यापन करती हैं। स्थुलान्न (मलाशय) में सम्बद्ध वे दो धमनियाँ—जिनके धमन से पुरीष का निरसन-बहिर्निर्गम होता है, यदि ये निष्क्रिय हो जाती हैं तो पुरीष निकलता ही नहीं, बसित द्वारा दो गयी औषध भी लौटकर नहीं आती। स्थुलान्न में आठ धमनियाँ और हैं जो तिर्यग्गामा धमनियों को स्वेद-नलद्रव में से जलीयांश का समर्पण प्रदान करती हैं। उक्त कार्यों के अतिरिक्त वे—पक्वाशय आदि का धारण एवं यापन करती हैं, तत्स्थानपि-गर्भाशय का भी धारण यापन करती हैं। पाठक एक सचाई पर ध्यान दें—ऊर्ध्वगा धमनियाँ हृदय में जाकर २० हो जाती हैं। उनमें से १०—वात, पित्त, कफ, शोणित तथा रस का वहन करती हैं और अघोगामा धमनियाँ आमाशय एवं पक्वाशय के मध्य (अन्न या नाभिमर्म) में उपन्य होती हैं और उनमें से १० धमनियाँ—वात, पित्त, कफ, शोणित एवं रस का वहन करती हैं। पिताशय—(पित्त के कार्य का स्थान—अन्न-नाभि नामक मर्म ग्रहणी) से अन्नपान रस को लेकर समस्त शरीर का तर्पण करती हैं और रसस्थान—हृदय का अभिपूर्णण करती हैं। तात्पर्य यह है कि नाभि से उत्पन्न (नाभिप्रभवा) धमनी है, वे ही हृदय में रस पहुँचाती हैं। हृदय से उत्तम ध्यान स्फुट हो जाता है यही एकमात्र कारण है जो सिरा को ही धमनी कहने-कहलाने के लिये प्राचीन तथा अर्वाचीन लेखकों को बाध्य करता है ॥६॥७॥