सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शरीरस्थानम्
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भवति चात्र—
अधोगामास्तु कुर्वन्ति कर्माण्येतानि सर्वैशः । तर्जंगाः संप्रवद्व्यामि कर्म चासां यथायथम् ॥८॥ तिर्जंगाणां तु चतसृणां धमनीनामेकैका शतधा सह- स्रधा चोत्तरोत्तरं विभज्यन्ते, तास्त्वसङ्ख्येयाः, ताभिर्द- शरीरं गवाक्षितं विवद्वमाततं च, तासां मुखानि रोम- कूपप्रतिबद्धानि, यैः स्वेदमभिवहन्ति रसं चाभितर्पयन्त्य- न्तर्बहिश्च, तैरेव चाभ्यङ्गपिपेकावगाह्यलेपनवीर्याण्यन्तः- शरीरमभिप्रतिपद्यन्ते त्वच्च विपक्वानि, तैरेव च स्पर्श- मुखमुखुं वा गृह्णाति, तास्त्वेताश्चतस्त्रो धमन्यः सर्वाङ्ग- गताः सविभागा व्याख्याताः ॥९॥
तिर्जगत् धमनियों को और इनके कार्यों को कहता हूँ— चार तिर्जगत् धमनियों में प्रत्येक धमनी उत्तरोत्तर सैकड़ों और हजारों विभागों में विभक्त होती है। इस प्रकार से इनके विभाग असंख्य हो जाते हैं। इन धमनियों से यह शरीर गवाक्षित (झरोखों के रूप में माल के समान) के रूप में बंधा हुआ एवं फैला रहता है। इन धमनियों के मुख रोमकूपों से मिले रहते हैं। इनके मुखों के द्वारा पसीने का वहन होता है, ये रस द्वारा, अन्दर और बाहर तर्पण करती हैं। इनके मुखों से त्वचा पर क्रिया अभ्यंग, परिपेक, अवगाहन, आलेपन, आदिकावीर्य शरीर के अन्दर पहुँचता है। इन्हीं के द्वारा मुख- कर और असुखकर स्पर्श ग्रहण क्रिया जाता है। इस प्रकार शरीर शरीर में फैले ये चार धमनियों विभाग के साथ कह दी हैं।
यथा स्वभावतः खानि मृणालेषु बिसेषु च ।
धमनीनां तथा खानि रसो यैरुपचीयते ॥१०॥
जिस प्रकार कमलनाल और विस में स्वभाव से स्रोत रहते हैं, उसी प्रकार धमनियों में छिद्र होते हैं, जिनसे रस का ग्रहण ये करती हैं। (मृणाल जिस प्रकार छेदों से रस खींचते हैं, उसी प्रकार धमनियाँ रस को ग्रहण करती हैं) ॥१०॥
पञ्चाभिभूतास्त्वथ पञ्चकृत्वः
पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयन्ति ।
पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयित्वा
पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले ॥११॥
पंचाभिभूताः (पंचमहाभूतों से उत्पन्न हुई धमनियों) पञ्च- न्द्रिय (पींच इन्द्रियोंवाले कर्म पुरुष को) पंचसु (कान, नाक, जिह्वा, त्वचा, नेत्र इनके अधिष्ठानों में), पंचकृत्वः (पर्याय- कम से पांचवार) भावयन्ति (नियुक्त करती हैं)। पंचेन्द्रियं (सदृशरूप इन्द्रिय पंचक को) पञ्चसु (आकशादि पंच महाभूतों में), भावयित्वा (नियुक्त करके) विनाशकाले (नाश होने के समय में) पञ्चत्वं (नाश को), आयान्ति (प्राप्त होती हैं)।
वक्तव्य—इस प्रकार से ये धमनियाँ पृथ्वी आदि पंच महाभूतों से उत्पन्न होकर प्राणियों को कान नेत्र आदि में पींच बार लगाती हैं। प्राणियों के नाश होते समय ये धमनियाँ सूक्ष्म शरीर को पंचमहाभूतों में समाप्त करती हुई स्वयं नष्ट ही जाती हैं। ज्ञान अलग-अलग होता है, इसलिये पंचवारात् शब्द कहा है। क्योंकि ज्ञान में मन का संयोग इन्द्रियों के साथ अवश्य है। मन एक है—अणुत्वमथ एकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ—एक समय में मन एकही इन्द्रिय के साथ संयुक्त हो सकता है, इसलिये पंचवारात् कहा है।
वि० मन्तव्य—पञ्चत्वं आयान्ति विनाशकाले—विनाश काल-मृत्यु काल में पञ्चत्व-पञ्चमहावशेषत्व को प्राप्त हो जाती हैं अर्थात् धमनियों का स्वरूप केवल पञ्चमहाभूतमय रह जाता है और उनका ध्यान ही जीवन है जिस क्षण में गर्भाधान होता है उसी क्षण में—स्फुरणं च योनेः (सु० शा० अ० ३-३३) गर्भाशय में जो स्फुरण होता है वही आगे चलकर ध्यान कह- लाता है और वह जीवन भर सदा सर्वदा होता रहता है और जब वह ध्यान रुक जाता है तब मृत्यु हो जाती है, जीवन की यही कहानी है ॥११॥
अत ऊर्ध्वं स्रोतसां मूलविद्वलक्षणमुपदेक्ष्यामः। तानि तु प्राणाञ्चोदकरसरक्तमासमेदामूत्रपुरीषशुक्रातैवहानि, येष्वधिकारः एकेषां बहूनि, एतेषां विशेषा बहुवः। तत्र प्राणवहे द्वे; तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्वत्स्याक्रोशन्विनमनमोहनभ्रमणवेपनानि मरणं वा भ- वति; अन्नवहे द्वे, तयोर्मूलमांसाशयोऽन्तवाहिन्यश्च धम- न्यः, तत्र विद्वत्स्याधमानं शूलोऽन्तद्वेषरक्षिः पिपासाऽऽन्धं मरणं च, उदकवहे द्वे, तयामूलं तालु क्लोम च, तत्र विद्वत्स्य पिपासा सद्योमरणं च, रसवह द्वे, तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्वत्स्य गाषः प्राणवहावद्वत्त्व मरणं, तर्ल्लङ्गानि च, रक्तवहे द्वे, तयोर्मूलं यकृतःप्लाहानो रक्तवाहिन्यश्च धमन्यः यत्र विद्वत्स्य श्यावाङ्गता ज्वरो दाहः पाण्डुता शोणितागमनं रक्तनेत्रता च, मांसवहे द्वे, तयोर्मूलं स्नायुत्वचं रक्तवहाश्च धमन्यः, तत्र विद्वत्स्य क्षयशुर्मांसशोषः सिरप्रन्थयो मरणं च, मेदोवहे द्वे, तयो- र्मूलं कटी बुक्की च, तत्र विद्वत्स्य स्वेदागमनं स्निग्धाङ्गता तालुशोषः स्थूलशोफता पिपासा च, मूत्रवहे द्वे, वस्तिमहं च, तत्र विद्वत्स्यान्तद्ववस्तिता मूत्रनिरोधः स्तब्धमेदता च, पुरीषवहे द्वे, तयोर्मूलं पक्षाशयो गुदं च तत्र विद्व- स्यानाहो दुर्गन्धता प्रथितान्व्रता च, शुक्रवहे द्वे, तयोर्मूलं स्तनो वृषणो च, तत्र विद्वत्स्य क्लीवता चिरात् प्रसेको रक्तशुक्रता च, आतैववहे द्वे, तयोर्मूलं गर्भाशय आतैव-