भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[वि०]

वाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्राया वन्ध्यात्वं मैथुनासहि- ण्यत्वमार्तवनाशश्च, सेवनोच्छेदाद्रुजाप्रादुर्भावः, वस्ति- गुदविद्रलक्षणं प्रागुक्तमिति। स्तोतविद्रं तु प्रत्याख्यायो पचरेत्, उद्भूतजल्यं तु क्षतविधानेनोपचरेत् ॥१२॥

इसके आगे स्तोतों के मूल में विद्र होने से उत्पन्न लक्षणों को कहेंगे-ये स्तोत प्राणवह, अन्नवह, उदकवह, रसवह, मलवह शुक्रवह, आर्त्तवह हैं, इन्हीं स्तोतों का (योगवाही) शल्य तंत्र में वर्णन है। एक स्तोत के बहुत से भेद हैं, इनके फिर बहुत से भेद होते हैं। इनमें प्राणवह स्तोत दो हैं:—इनका मूल हृदय और रसवाहिनी धमनियाँ हैं। इनके विद्र होने से चिह्नाना, झुकना, मूर्च्छा, चक्कर आना, कम्पन अथवा मृत्यु भी हो जाती है। अन्नवह स्तोत दो हैं। उनका मूल आमा- शय और अन्नवाहिनी हैं। इनका वेधन होने पर आधमान, शल्ल, अन्न में द्वेष, वमन, प्यास, अन्धापन और मृत्यु होती है। उदक वह स्तोत दो हैं, इनका मूल तालु और क्लोम है। इनका वेधन होने पर प्यास, और तुरन्त मृत्यु होती है। रसवह दो स्तोत हैं, इनका मूल हृदय और रसवाहिनियाँ हैं। इनका वेधन होने पर शोष, प्रणवहा स्तोतों के विद्र होने पर होनेवाले लक्षण और मृत्यु होती है। रक्तवह स्तोत दो हैं, इनका मूल यकृत, प्लीहा और रक्तवाहिनी धमनियाँ हैं। इनका वेध होने पर अंगों में श्यावता, ज्वर, दाह, पाण्डुता, रक्त का आना और आँखों में सुखी होती है। मांसवह स्तोत दो हैं— इनका मूल स्नायु-त्वचा और रक्तवहा धमनियाँ हैं। इनका वेधन होने पर शाय, मांस शोष, शिराओं में गाँठें और मृत्यु होती है। मेदोवह स्तोत दो हैं—इनका मूल कटी और दो वृक्क हैं। इनमें वेधन होने से पसीने का आना, अंगों में स्तम्भता, तालु शोष, मांटी (गहरी) सूजन और प्यास होती है। मूत्रवह स्तोत दो हैं, इनका मूल वस्ति और मेहन है, इनके विद्र होने से वस्ति में फूलाव, मूत्र का अवरोध और मेहन में स्तम्भता होती है। पुरीषवह स्तोत दो हैं, इनका मूल पक्वाशय और गुदा है। इनमें वेधन होने से आनाह, दुर्गन्धता, आँतों में गाँठ पड़ना होता है। शुक्रवह स्तोत दो हैं, इनका मूल स्तन और दोनों वृषण हैं, इनके विद्र होने पर नपुंसकता, शुक्र का देर में क्षरण, और शुक्र के साथ रक्त आना होता है। आर्त्तवह स्तोत दो हैं—इनका मूल आर्त्तव- हा धमनियाँ और गर्भाशय है। इनका वेधन होने पर वन्ध्यापन, मैथुन की असहिष्णुता, आर्त्तव नाश होता है। सेवनी के कटने से वेदना उत्पन्न होती है। वस्ति, गुदा के विद्र होने पर होनेवाले लक्षण पहले कह दिये हैं। स्तोतों के

विद्र होने पर असाध्य कहकर चिकित्सा करे। स्तोतों में से शल्य निकालकर क्षतविधि से चिकित्सा करनी चाहिये।

वक्तव्य—सुश्रुत ने ये ग्यारह (दो के योग से बाईस) योग- वाही स्तोत कहे हैं। चरक में—स्तोतांसि दीर्घायाङ्कृत्या प्रतान- सहशानि। स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यण्नि च। तथा प्राणोदकान्नरसधिरमांसमेदोऽस्थिमजाशुक्रमूत्रपुरीषस्वेदवहा- नीति, वातपित्तश्लेष्मणाः पुनः सर्वशरीरचराणां स्तोतांख्यम- भूतानि ॥

अतिप्रवृत्तिः संगो वा सिराणां प्रन्थयोरपि। विमार्गो नाम वाऽपि स्तोतसां दुष्टि लक्षणम् ॥ आहारश्च विहारश्च यः स्यादो- षगुणेः समः। धातुभिर्विगुणश्चापि स्तोतसां स प्रवृध्कः ॥ चरक विमा० अ० ५३-३१-३२॥

वि० मन्तव्य—स्तोतस्—सु गतौ धातु (भ्वादि गणीय) से स्तोतस् शब्द निष्पन्न है, अर्थ है जिसमें से गति हो। प्राण अन्न एवं उदक आदि की गति जिनमें से होती है उनका ही नाम 'स्तोतस्' है। यह अर्थ इसी प्रकरण को ध्यान में रखकर किया गया है, क्योंकि इस प्रकरण में यही ११ स्तोतस् माने जाते हैं। भले ही अनेक आचार्य-बहुत असंख्य स्तोतस् मानते हैं—यथा-पुरुष में (नर नारी के शरीर में) जितने भी मूर्तिमान् भाव विशेष हैं उतने ही इसमें स्तोतों के प्रकार विशेष हैं, क्योंकि सभी भाव स्तोतों के बिना न उत्पन्न होते हैं और न क्षय को प्राप्त होते हैं, सब यह है कि—स्तोतस्— परिणाम-परिपाक (कारण से कार्य रूप में परिणत होने के लिये क्रियाशील धातुओं का अभिवहन करनेवाले) हैं, केवल मार्ग के अर्थ में अर्थात् जब रस रक्त रूप में परिणत होना चाहता है, तब स्तोतस् नामक मार्ग से वहाँ पहुँचता है जहाँ वह रक्त रूप में परिणत हो सकता है। कुछ आचार्य तो स्तोतों के समुदाय को ही पुरुष मानते हैं, क्योंकि स्तोतस् सर्व शरीर- व्यापी हैं और दोनों को प्रकृपित तथा प्रशान्त करनेवाले भाव- शरीर में सर्वत्र गति शील देखे जाते हैं, परन्तु उनका यह कहना सम्यक् नहीं है, क्योंकि—ये स्तोतस् जिसके (जिसे शरीर के) हैं और जिसका वहन (ले जाना) तथा आवहन (लेआना) करते हैं, वह सब उन स्तोतों से भिन्न है। पाठक इस सन्दर्भ को एक उदाहरण से समझें—किसी ने कहा कि नगर गलियों का ही समुदाय है। यद्यपि यह कहना भूत नहीं है,

१ क्लोम से फेरिक्स (pharynx) लेना चाहिये। गर्भविस्था में मुख के स्थान पर एक गद्दार रहता है जिसे कोईलम (coe- lom) और स्टोमोडेयम (stomodeum) कहते हैं। ये दोनों पीछे एक छिक्कली से अलग हो जाते हैं। क्लोम और कोईलम आपस में प्रायः मिलते हैं।