सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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तथापि सम्यक् भी नहीं है, क्योंकि जिन भवनों के कारण गलियाँ बनी हैं और, गलियों के मार्ग से जो वस्तुओं का ले जाना और ले आना होता है वह सब गलियों से भिन्न है। दोनों और भवन बन जाने से गली कही जाती है। वस्तुतः भवनों के समुदाय का नाम नगर है। इस सबका तात्पर्य यह है कि उन मार्गों का नाम खोतस है जिनके द्वारा शरीर गत द्रव्यों का एक स्थान से दूसरे स्थानों से आना-जाना होता है। मूल-विद्ध—शस्त्र तन्त्र की दृष्टि से यहाँ विद्ध अर्थात्—वेध होने से उत्पन्न लक्षण कहने की प्रतिष्ठा की गई है, परन्तु वेध के अतिरिक्त वातादि दोषों द्वारा प्रदुष्ट होने से भी विकार उत्पन्न हो जाते हैं। तदर्थं च० वि० अ० ५ देखिये ॥ १२ ॥
भवति चात्र— मूलात् खादन्तरं देहे प्रस्तुं त्वभिवाहि यत् । स्रोतस्तदिति विज्ञेयं सिराधमनिर्वर्जितम् ॥ १३ ॥ इसमें श्लोक भी है—शरीर में मूल छेद से आरम्भ हुए, रसको ले जानेवाले अन्तर ( छिद्र या अवकाश को स्रोत जानना चाहिये ॥ १३ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने धमनीव्याकरणशारीरं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
दशमोऽध्यायः
अथातो गभिणीव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके आगे गभिणी व्याकरण शारीर की व्याख्या करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १,२ ॥
गभिणी प्रथमदिवसान् प्रभृति नित्यं प्रहृष्टा शुच्य- लङ्कृता शुक्लवसना शान्तिमङ्गलदेवताब्राह्मणगुरुपरा च भवेत्, मलिनविकृतहोनागत्राणं न स्पृशत्, दुर्गन्धदुर्दुर्श- नानि परिहरेत्, उद्रेजनीयाश्च कथाः, शुष्कं पशुषत् क्षुधितं किलञ्च चात्रं नापमुञ्जोत, बहिर्निष्क्रमणं शून्या- गारचैत्यशमशान्तुष्माश्रयान् क्राधमयशस्करांश्च भावानु- च्छर्भाध्यादिकं च परिहरेद्यानि च गर्भं नापादयन्ति, न चामिर्णं तेलाम्भ्यङ्गोस्तादनादीनि सेवेत्, न चायासये- च्छरीरं, पूर्वोक्तानि च परिहरेत् शयनासनं मृद्वास्तरणं नायुरुचमपाश्रयोपेतमसंबाधं च विदध्यात् हृव्यं द्रवमधुर- प्रायं स्निग्धं दीपनीयसंस्कृतं च भोजनं भोजयेत्। सामा- न्यमेतदाप्रसवात् ॥ ३ ॥
गर्भवती स्त्री प्रथम दिन से ही लेकर सभी दिनों में नित्य सब मनवाली, पवित्र, अलंकारों को धारण किये, रवेत वस्त्र
धारण करनेवाली, शान्तिपरायण, मंगलकारी, ( स्वस्ति वाचन पढ़नेवाली ), देवता, ब्राह्मण, गुरु की सेवा ( पूजा ) करनेवाली हो। मलिन, विकृत या हीनांगों का स्पर्श न करे। दुर्गन्ध एवं बुरे दृश्यों का त्याग करे। बेचैनी उत्पन्न करनेवाली कथायें न सुने। शुष्क, बारी, सड़े गले अन्न को न खाये। घर से बाहर निकलना, सूते घर में जाना, चैत्य, शमशान, वृक्ष के नीचे रहना छोड़ दे। क्रोध एवं भय तथा निन्दित पदार्थों को, ऊँचे से बोलना आदि को और जिन कारणों से गर्भ को नुकसान पहुँचाता है, उनको छोड़ देवे। बार २ तैल का अभ्यङ्ग और उत्सादन ( उबटन ) लगाना छोड़ देवे। शरीर से मेहनत न करे और गर्भावक्रान्ति में कहे अपथ्यों को छोड़ देवे। शय्या, एवं आसन कोमल, बिछे हुये, बहुत ऊँचे नहीं होने चाहिये। इनमें सहारा-आश्रय रहना चाहिये, ये पीड़ा कारक यातङ्ग छोटे न हों। मन के लिये प्रिय, द्रव, मधुर रस की अधिकतावाले, स्निग्ध, अग्निवर्धक दीपनीय द्रव्यों से संस्कृत भोजन को खाये। प्रसूति होने तक के लिये यह साधारण नियम है।
वक्तव्य—सौमनस्यं गर्भाधारकाणां श्रेष्ठतमः। चरक। अपाश्रयोपेतम्—चैदोषा लगाया ( जयदेव )। अपाश्रयवन्द्वात-पश्चेति पर्यायो-हारणचन्द्रः। अपाश्रयोपेतं—प्रतिवाहकसहित-मिति ढल्हणः।
वि० मन्तव्य—यानि च गर्भं व्यापादयन्ति—जो आहार-विहार तथा औषध गर्भ का व्यापादन ( विकृत करना ) तथा व्यवय, व्यायाम आदि ( दे० शा० अ० ३-१६ ) और च० शा० अ० ८ सू० ३१ और ३२। चैत्य—देवताधिष्ठित वृक्ष—ग्रामवासियों के विश्वासानुसार जिस देवता का निवास माना जाता है, अथवा बौद्धविहार या संन्यासियों का आश्रय। अयशस्कर भाव-जिन कार्यो से अपयश हो। अपाश्रयोपेत-शयन-शय्या तथा आसन-पीड़ा-गद्दी आदि पर सिरहाना-तक्रिया आदि आश्रय-पीठ की ओर सहारा देनेवाला हो। असम्बाध-जिस पर कर्षट-पार्श्वपरिवर्तन, पाद प्रसारण आदि में बाधा न हो ॥ ३ ॥
विशेषतस्तु गभिणी प्रथमद्वितीयतृतीयमासेषु मधुर- शोतद्रवप्रायमाहारमुपसेवेत्; विशेषतस्तु तृतीये षष्ठिकौ- दनं पयसा भोजयेत्, चतुर्थं दध्ना, पञ्चमे पयसा, षष्ठे सर्पियेत्के; चतुर्थं पयोन्नवनीतसंसष्टमाहारयेउजाङ्गल- मांससहितं हृयमन्नं च भोजयेत्, पञ्चमे स्त्रीरसपिःसंसृष्टं, षष्ठे श्वदृष्टसिद्धस्य सर्पिषो मात्रां पाययेद् यवागू वा, सप्तमे सर्पः प्रथकपुण्यादिसिद्धम्, एवमाप्यायते गर्भः, अष्टमे बदरोदकेन बलातिबलाजतपुष्पापल्लपयोदधि- मस्तुतैलवणमदनफलमधुघृतमिश्रणास्थापयेत् पुराणपु- रीषशुद्धयर्थमनुलोमनार्थं च वायोः ततः पयोमधुरकषाय-