सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
सिद्धेन तैलेनानुवासयेत्, अनुलोमे हि वायोः सुखं प्रसूयते निरुपद्रवा च भवति, अत ऊर्ध्वं स्निग्धाभिर्यवागृभिर्जी- ङ्गलरसैश्चोपक्रमेदाप्रसवकालात् ; एवमुपक्रान्ता स्निग्धा बलवती सुखमनुपद्रवा प्रसूयते ॥ ४ ॥
विशेष करके गर्भवती प्रथम द्वितीय तृतीय महीनों में मधुर शीत-द्रव बहुल आहार का सेवन करे। विशेष करके तीसरे महीने में साठी के मात को दूध से खाये। चौथे महीने में दही से, पाँचवें में दूध से और छठे में घी से खाये ऐसा कई कहते हैं। चौथे महीने में दूध और मक्खन मिला भोजन करे, और जांगल मांस के साथ मन के लिये प्रिय अन्न खाये। पाँचवें में दूध से निकाले घी से मिलाकर (या दूध और घी से) खाये। छठे महीने में गोखरू से सिद्ध किया घी मात्रा से पिलाये। सातवें में विदारिगन्धादि से सिद्ध किया घी मात्रा से पिलाये। इस प्रकार करने से गर्भ पुष्ट होता है। आठवें में बैरों के पत्तों के पानी में बला, अतिबला, रॉफ, तिलकल्क, दूध, दही, मस्तु, तैल, लवण, मेनफल, मधु, घी मिलाकर आस्थापन वस्ति देवे। जिससे पुरातन मल का शोथन हो जाये और वायु का अनु- लोमन हो। फिर दूध और वायु का कोल्त्यादि मधुर गण से सिद्ध तैल से अनुवासन दे। वायु का अनुलोमन होने पर सुख पूर्वक प्रसव होता है और कोई उपद्रव नहीं होता। इसके आगे स्निग्ध यवागृ से एवं जांगल मांस रस से प्रसव काल आने तक भोजन देता रहे। इस प्रकार परिचर्या करनेपर स्निग्ध, बलवान्, उपद्रव रहित रहते हुए सुख पूर्वक प्रसव करती है।
वक्तव्य—छठे या सातवें मास में प्रायः मूल में एल्लुमिन आता है। इस बात का यह चिह्न है शरीर में विष की अधि- कता है, इससे पैरों पर तथा मुख में सूजन आ जाती है। इसीलिये इस समय मूत्रल और विषनाशक उपचार बताया है। गोखरू मूत्रल है। और घृत विप्रनाशक है, यथा—‘वातपित्त- विघोषन्मादशोषाच्छमीञ्चरापहम्’ चरक। विषकी अवस्था में घृत पान कराते हैं—‘दातव्यं सर्वरोगेषु (विषेषु) घृताशिनी हिताशिनी।’
चरक में—‘अतश्चैवास्याः तैलपिन्धु योनी प्रणयेत् गर्भ- स्थापनमार्गस्तेहनाथम् ॥’ इस विधि को बरतने पर प्रसव के समय होनेवाला योनिदारण नहीं होता ॥ ४ ॥
नवमे मासि सूतिकागारमेनां प्रवेशयेत् प्रगस्ते तिथ्यादौ। तत्रारिष्टं ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राणां श्वेत- रक्तपीतकृष्णेषु भूमिप्रदेशेषु विल्वन्यम्रोधतिन्दुकभलातक- निर्मितं सर्वागारं यथासङ्ख्यं तन्मयपर्यङ्कं समुपलिप्त- मिति सुविभक्तपरिच्छदं प्राग्द्धारं दक्षिणद्वारं वाऽष्टहस्ता- यतं चतुर्हस्तविस्तृतं रक्षामङ्गलसंपन्नं विधेयम् ॥ ५ ॥
नवम मास लगने पर गर्भवती को सूतिका घर में प्रवस्त तिथि आदि का विचारकर ले जाये। सूतिका घर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिये क्रमशः श्वेत, लाल, पीली एवं काली भूमि पर-बेल, बरगद, तिन्दुक और भिलावे का लकड़ी से बने घर में तथा इन्हीं की लकड़ियों से बने पलंग से युक्त, अच्छी प्रकार लिपी पोती दिवारोंवाले, सब साधन अलग र स्थान पर भले प्रकार से जहाँ रखे हों, पूर्वकी ओर या दक्षिण की ओर द्वारवाले, आठ हाथ लम्बे और चार हाथ चौड़े, रक्षा- कारक वस्तुओं से (सरसों, अजवायन आदि युक्त) तथा मङ्गलकारी वस्तुओं (मधु-लाजा आदि) से युक्त घर में ले जाये।
वक्तव्य—ततः प्रवृत्ते नवमे मासे पुण्येऽहनि प्रशस्तनक्षत्र- योगमुपगते भगवति शशिन, कल्याणकरे मैत्रे मुहुर्मुहूर्तं शान्ति कृत्वा गोब्राह्मणमनिमुदकं चादौ प्रवेश्य गोभ्यः तृणादकं मधु लाजांश्च प्रदाय ब्राह्मणभ्योऽक्षतान् सुमनसो नान्दीमुखानि च फलानि दृष्टानि दत्त्वोदकपूर्वमासनस्थेभ्योऽभिवाध स्वस्ति वाच- येत्। पुण्याहशब्देन गोब्राह्मणमनुवर्त्तमाना प्रदक्षिणं प्रविशेत् सूतिकाऽऽगारम्। तत्रस्था च प्रसवकालं परीक्षेत् ॥ चरक शा० अ० ८-३७ ॥ ५ ॥
जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्त हृदयवन्धने। सशूलै जघने नारो ज्ञेया सा तु प्रजायिनी ॥ ६ ॥ कुक्षि के शिथिल होने पर, हृदयवन्धन के छूट जाते पर, जघन में दर्द होने पर समझना चाहिये कि क्क्षी प्रसव करने वाली है।
वि० मन्तव्य—यह प्रसव का लक्षण है, इसके पूर्व सू० ४ के अनुसार आस्थापन एवं अनुवासन का प्रयोग करके कोष्ठ शुद्धि अवश्य कर देनी चाहिये ॥ ६ ॥
तत्रोपस्थितप्रसवायाः कटोपृष्ठं प्रति समन्ताद्देहना भवत्य- भीर्दणं पुरीषप्रद्युत्तिमूर्त्रं प्रसिच्यते योनिमुखाच्छ्लेष्मा च ॥ प्रसव के उपस्थित होने पर कटि एवं पीठ भाग के चारों ओर दर्द होता है, मल आता है, और मूत्र बार-बार प्रवाहित होता है, योनिमुख से श्लेष्मा आती है। (भवति, मूत्रमभीर्दणं प्रसिच्यते, यह पाठ ठीक है)।
वक्तव्य—‘तस्य स्तु खल्विमानि लिंगानि प्रजन्तकाल- मभितो भवन्ति। तथाया-कलमो गात्राणां ग्लानिरानन्त्याः शेथिल्यं विमुक्तवन्धनत्वमिव वक्षसः कुदोरेवच्छसनमधोमुखं, वंक्षणवस्तिकटिकुक्षिपाश्चर्यगुठनिस्तोदो, यानेः प्रसवणमनन्ताभि- लापश्च ॥’ चरक शा० अ० ८-३८ ॥ ये लक्षण आवश्यक प्रसवा के हैं।
प्रसव की तीन अवस्थाएँ हैं, प्रथमावस्था—ततोऽनन्तर- मावीनां प्रादुर्भावः, प्रसेकश्च गर्भोदकस्य। द्वितीयावस्था