सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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गर्भनाडीप्रबन्धमुक्तिः (२) श्रोणिवंक्षणवस्तिशिरःसु शूलं, स यदा विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्वाविशति । वस्तिशिरोऽवगच्छति । आवीनां त्वरणम् । गर्भस्थ परिवर्तनम् । योनिमुख-प्रपत्तिः विलश्याभावश्च । इति तृतीयावस्था । यदा च प्रजाता स्यात्तदैवैनामवेक्षेत कदाचिदस्याः अपरा प्रपन्नाऽप्रपन्ना चेति ॥ चरक० शा० अ० ८ ॥
वि० मन्त्रव्य—प्रसव वेदना का नाम 'आवी' है, यह प्रवादिका की वेदना के समान वैगवती वेदना होती है। कहा जाता है कि यह गर्भाशय की ऐंटन या पीड़न से उत्पन्न होती है या उसकी सूत्रक है और इसके साथ ही गर्भोदक का बड़े वेग के साथ प्रसेचन—निःसरण होता है—चरक के शब्दों में—ततोऽन्तरम् आवीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य (च० शा० अ० ८ ३८) । गर्भवती का जितना बड़ा उदर होता है उतना ही बड़ा गर्भ नहीं होता, अपितु गर्भाशय में गर्भोदक भरा रहता है, जिसमें गर्भ तैरता रहता है। इसका प्रसेचन हो जाने पर भी आवियों चालू रहती हैं। प्रथम द्वितीय-आवियों के प्रभाव से गर्भोदक तो निकल ही जाता है। अब आवी का प्रभाव गर्भ पर पड़ता है—जैसे पके आम को दबाने से (पीड़न से) प्रथम रस निकलता है और फिर दबाने से गुठली पर दबाव पड़ता है, वैसे ही गर्भ पर दबाव पड़ने से गर्भ—आम की गुठली के समान बाहर निकलने के लिये बाध्य होता है। अभीक्षणं.....च—गर्भ का दबाव मलाशय पर पड़ने से पुरीय की ओर वस्ति पर पड़ने से मूत्र की बार २ प्रवृत्ति होती है और प्रकृति की विलक्षण महिमा है कि गर्भाशय के मुख से रलेष्मा—लसीला द्रव पसीजने लगता है, जिससे गर्भ फिसलकर अपत्यरथ में से मुखपूर्वक बाहर आ जाय। आवी के दबाव से गर्भाशय का मुख खुल जाता है ॥७॥
प्रजनयिष्यमाणं कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनां कुमार-परिवृतां पुत्रामफलहस्तां स्वभ्यक्तामुष्णोदकपरिषक्ता-सूयेनां सम्भूतां यवागृभाकण्ठात् पाययेत्, ततः कृतोपधाने मृदुनि विस्तीर्णं शयने स्थितामाभुनसकथीमुत्तानामशङ्कनीयाश्रतस्तः स्त्रियः परिणतवयसः प्रजननकुण्डला कर्तितनखाः परिचरेयुरिति ॥८॥
प्रसव काल समीप आया जानकर शरीर पर अभ्यंग करके, गरम जल से स्नान करे। फिर शान्ति पाठ और स्वस्ति वाचन पढ़कर बालक और बालिकाओं से वेष्टित होकर पुन्नासफल हाथ में लेवे। फिर घी के साथ यवागृ को पेट भर के पिलाये; फिर विस्तीर्ण और कोमल शय्या पर तकिया लगाकर पीठ के भार चित्त लेट करके पैरों को तानकर बैठे, और जिनसे किसी प्रकार का संकोच न हो, वृद्धा एवं प्रसूति करने में कुशल, नख को कटाई हुई चार स्त्रियाँ इसकी सेवा में रहें ॥
वक्तव्य—आवीप्रादुर्भावे तु भूमौ शयनं विदध्यात् मृद्वा-स्तरणोपपन्नम् । तदध्यासीत साततस्तां ताः समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रियः पृथुपाशीरनारदासयन्ती वाग्मिप्राहिणीभिः सान्त्वनीयाभिः । च० शा० अ० ८-३६ ।
स्त्रियों के गुण—स्त्रियश्च बहुशः प्रजाता सौहार्दयुक्ताः रक्षिणाचाराः प्रतिपत्ति हुशलाः प्रकृतिवत्सलाः त्यक्तविषादाः क्लेशसहिष्णुबोधिमताः ॥ चरक० ॥
वि० मन्त्रव्य—प्रसव एक बहुत बड़ा काण्ड है। इस समय भगवान् ही रक्षा करता है, आवी एक प्रकार की दुःसह वेदना होती है। अनेक सुकुमारियाँ मूर्छित हो जाती हैं और अनेक मृत भी। अतः माङ्गलिक—कल्याण कारक कर्म और स्वस्ति वाचन (मुख हो मला हो कहलाना) और छोटे २ बच्चों का और उनका खेलना कूदना आदि और गर्भिणी के हाथ में फल आदि देना आवश्यक होता है। अतः एव अभ्यङ्ग तथा उष्णोदक से स्नान एवं प्राण रक्षार्थ यवागृगान भी आवश्यक होता है। ततः.....रिति - आवी के प्रारम्भिक वेगों के समय जब तक पुरीष, मूत्र एवं गर्भोदक की प्रवृत्ति होती रहे तब तक भूमि पर ही लेटना उचित होता है। इसके पश्चात् कोमल एवं विस्तीर्ण शय्या पर लेटाना और प्रसवोपचार करना चाहिये। कर्त्तितनखाः—अपत्यरथ के भीतर हाथ डालने की आवश्यकता पड़ सकती है, अतः प्रसव करानेवाली के पहिले ही नख काट देना अच्छा है। इस अवस्था में प्रायः प्रसव हो ही जाता है, परन्तु यदि न हो तो—॥९॥
अथास्या विशिखान्तरमनुलोममनुमुखमभ्यज्यानुभू-याच्छैतामेका—सुभगे प्रवाहस्वेति, नचाप्राप्तावी प्रवाहश्च, ततो विमुक्तं गर्भनाडीप्रबन्धे सशुलेषु श्रोणिवंक्षणवस्तिशिरःसु च प्रवाहेथाः शनैः, शनैः, ततो गर्भनिर्गमं प्रगाढं, ततो गर्भ योनिमुखं प्रपन्ने गाढतरमाविशन्त्यभावात्; अकालप्रवाहणाद्गृधिरं मूकं कुञ्जं व्यस्तहनुमूर्ध्वोभिघातिनं कासश्चासजोषोपदुतं विकटं वा जनयति ॥१०॥
जब स्त्री लेट जाये, तब विशिखान्तर (अपत्यमार्ग) को अन्दर से बाहर की ओर मालिश करती हुई परिचारिका उससे कहे, हे सुभगे! प्रवाहण करो, किन्तु आवी (प्रसव-वेदना) न होने पर प्रवाहण न करो। गर्भ नाड़ी का वन्धन छूटने पर श्रोणी, वंक्षण, वस्तिशिर में पीड़ा होने पर धीरे धीरे प्रवाहण करो गर्भ के बाहर आने पर जोर से प्रवाहण करो। गर्भ के योनिमुख में आ जाने पर और भी अधिक जोर करो। जब तक गर्भ बाहर न आ जाये। वेदना होने से पूर्व यदि प्रवाहण किया जायेगा तो पुत्र बहरा, गूँगा, कुबड़ा, टेढ़ी