सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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गर्भनाडीप्रबन्धमुक्तिः (२) श्रोणिवंक्षणवस्तिशिरःसु शूलं, स यदा विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्वाविशति । वस्तिशिरोऽवगच्छति । आवीनां त्वरणम् । गर्भस्थ परिवर्तनम् । योनिमुख-प्रपत्तिः विलश्याभावश्च । इति तृतीयावस्था । यदा च प्रजाता स्यात्तदैवैनामवेक्षेत कदाचिदस्याः अपरा प्रपन्नाऽप्रपन्ना चेति ॥ चरक० शा० अ० ८ ॥
वि० मन्त्रव्य—प्रसव वेदना का नाम 'आवी' है, यह प्रवादिका की वेदना के समान वैगवती वेदना होती है। कहा जाता है कि यह गर्भाशय की ऐंटन या पीड़न से उत्पन्न होती है या उसकी सूत्रक है और इसके साथ ही गर्भोदक का बड़े वेग के साथ प्रसेचन—निःसरण होता है—चरक के शब्दों में—ततोऽन्तरम् आवीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य (च० शा० अ० ८ ३८) । गर्भवती का जितना बड़ा उदर होता है उतना ही बड़ा गर्भ नहीं होता, अपितु गर्भाशय में गर्भोदक भरा रहता है, जिसमें गर्भ तैरता रहता है। इसका प्रसेचन हो जाने पर भी आवियों चालू रहती हैं। प्रथम द्वितीय-आवियों के प्रभाव से गर्भोदक तो निकल ही जाता है। अब आवी का प्रभाव गर्भ पर पड़ता है—जैसे पके आम को दबाने से (पीड़न से) प्रथम रस निकलता है और फिर दबाने से गुठली पर दबाव पड़ता है, वैसे ही गर्भ पर दबाव पड़ने से गर्भ—आम की गुठली के समान बाहर निकलने के लिये बाध्य होता है। अभीक्षणं.....च—गर्भ का दबाव मलाशय पर पड़ने से पुरीय की ओर वस्ति पर पड़ने से मूत्र की बार २ प्रवृत्ति होती है और प्रकृति की विलक्षण महिमा है कि गर्भाशय के मुख से रलेष्मा—लसीला द्रव पसीजने लगता है, जिससे गर्भ फिसलकर अपत्यरथ में से मुखपूर्वक बाहर आ जाय। आवी के दबाव से गर्भाशय का मुख खुल जाता है ॥७॥
प्रजनयिष्यमाणं कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनां कुमार-परिवृतां पुत्रामफलहस्तां स्वभ्यक्तामुष्णोदकपरिषक्ता-सूयेनां सम्भूतां यवागृभाकण्ठात् पाययेत्, ततः कृतोपधाने मृदुनि विस्तीर्णं शयने स्थितामाभुनसकथीमुत्तानामशङ्कनीयाश्रतस्तः स्त्रियः परिणतवयसः प्रजननकुण्डला कर्तितनखाः परिचरेयुरिति ॥८॥
प्रसव काल समीप आया जानकर शरीर पर अभ्यंग करके, गरम जल से स्नान करे। फिर शान्ति पाठ और स्वस्ति वाचन पढ़कर बालक और बालिकाओं से वेष्टित होकर पुन्नासफल हाथ में लेवे। फिर घी के साथ यवागृ को पेट भर के पिलाये; फिर विस्तीर्ण और कोमल शय्या पर तकिया लगाकर पीठ के भार चित्त लेट करके पैरों को तानकर बैठे, और जिनसे किसी प्रकार का संकोच न हो, वृद्धा एवं प्रसूति करने में कुशल, नख को कटाई हुई चार स्त्रियाँ इसकी सेवा में रहें ॥
वक्तव्य—आवीप्रादुर्भावे तु भूमौ शयनं विदध्यात् मृद्वा-स्तरणोपपन्नम् । तदध्यासीत साततस्तां ताः समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रियः पृथुपाशीरनारदासयन्ती वाग्मिप्राहिणीभिः सान्त्वनीयाभिः । च० शा० अ० ८-३६ ।
स्त्रियों के गुण—स्त्रियश्च बहुशः प्रजाता सौहार्दयुक्ताः रक्षिणाचाराः प्रतिपत्ति हुशलाः प्रकृतिवत्सलाः त्यक्तविषादाः क्लेशसहिष्णुबोधिमताः ॥ चरक० ॥
वि० मन्त्रव्य—प्रसव एक बहुत बड़ा काण्ड है। इस समय भगवान् ही रक्षा करता है, आवी एक प्रकार की दुःसह वेदना होती है। अनेक सुकुमारियाँ मूर्छित हो जाती हैं और अनेक मृत भी। अतः माङ्गलिक—कल्याण कारक कर्म और स्वस्ति वाचन (मुख हो मला हो कहलाना) और छोटे २ बच्चों का और उनका खेलना कूदना आदि और गर्भिणी के हाथ में फल आदि देना आवश्यक होता है। अतः एव अभ्यङ्ग तथा उष्णोदक से स्नान एवं प्राण रक्षार्थ यवागृगान भी आवश्यक होता है। ततः.....रिति - आवी के प्रारम्भिक वेगों के समय जब तक पुरीष, मूत्र एवं गर्भोदक की प्रवृत्ति होती रहे तब तक भूमि पर ही लेटना उचित होता है। इसके पश्चात् कोमल एवं विस्तीर्ण शय्या पर लेटाना और प्रसवोपचार करना चाहिये। कर्त्तितनखाः—अपत्यरथ के भीतर हाथ डालने की आवश्यकता पड़ सकती है, अतः प्रसव करानेवाली के पहिले ही नख काट देना अच्छा है। इस अवस्था में प्रायः प्रसव हो ही जाता है, परन्तु यदि न हो तो—॥९॥
अथास्या विशिखान्तरमनुलोममनुमुखमभ्यज्यानुभू-याच्छैतामेका—सुभगे प्रवाहस्वेति, नचाप्राप्तावी प्रवाहश्च, ततो विमुक्तं गर्भनाडीप्रबन्धे सशुलेषु श्रोणिवंक्षणवस्तिशिरःसु च प्रवाहेथाः शनैः, शनैः, ततो गर्भनिर्गमं प्रगाढं, ततो गर्भ योनिमुखं प्रपन्ने गाढतरमाविशन्त्यभावात्; अकालप्रवाहणाद्गृधिरं मूकं कुञ्जं व्यस्तहनुमूर्ध्वोभिघातिनं कासश्चासजोषोपदुतं विकटं वा जनयति ॥१०॥
जब स्त्री लेट जाये, तब विशिखान्तर (अपत्यमार्ग) को अन्दर से बाहर की ओर मालिश करती हुई परिचारिका उससे कहे, हे सुभगे! प्रवाहण करो, किन्तु आवी (प्रसव-वेदना) न होने पर प्रवाहण न करो। गर्भ नाड़ी का वन्धन छूटने पर श्रोणी, वंक्षण, वस्तिशिर में पीड़ा होने पर धीरे धीरे प्रवाहण करो गर्भ के बाहर आने पर जोर से प्रवाहण करो। गर्भ के योनिमुख में आ जाने पर और भी अधिक जोर करो। जब तक गर्भ बाहर न आ जाये। वेदना होने से पूर्व यदि प्रवाहण किया जायेगा तो पुत्र बहरा, गूँगा, कुबड़ा, टेढ़ी
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ठोड़ीवाला, शिर में चोट लगा, कास, श्वास, शोष से पीड़ित तथा विलक्षण आकार का उत्पन्न होगा।
वक्तव्य—ताश्चैनां यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युरनागताऽऽवीर्यां प्रवाहिष्ठाः। या ह्यनागताऽऽवीर्याः प्रवाहते, व्यर्थमेवास्यास्तत् कर्म भवति। प्रजा चास्या विकृता, विकृतिमापन्ना वा श्वासकासशोषप्लीहाप्रसक्ता वा भवति। (२) तथा च कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहते। ततोऽनन्तरं बलवत्सरम्। च० शा० ८४४।
वि० मन्तव्य—अपत्यपथ के भीतर बला तेल आदि किसी स्नेह का अभ्यङ्ग करे। इससे वायु का अनुलोमन हो जाता है, और प्रसव हो जाता है। तथापि यदि न हो तो—गर्भिणी से कहे कि—जब आवी का रेंग हो तब प्रवाहण कर आदि २। यदि इतना करने पर भी प्रसव न हो तो—॥६॥
तत्र प्रतिलोममनुलोमयेत्, प्राञ्जलमार्कयेत् ॥१०॥ यदि गर्भ उलटा हो ( नितम्ब नीचे, शिर ऊपर ) तो उसे सीधा करें। सीधा हो ( शिर नीचे हो तो ) तो उसे बाहर खींचे। ( प्रतिलोम कई प्रकार का है )—इसे मूढगर्भ चिकित्सा में कहेंगे।
वि० मन्तव्य—समक्षो कि मूढ गर्भ-गर्भमूढ—टेढ़ा-मेढ़ा हो गया है, तब उक्त चार स्त्री-परिचारिकाओं में जो सबसे निपुण हो गर्भ को सीधा करके—अपत्यपथ में हाथ डालकर सीधा करके निकाल लेवे यदि तथापि न निकले तो—॥१०॥
गर्भसङ्के तु योनिं धूपयेत् कृष्णसर्पनिर्मोकेण पिण्डीतकेन वा, वधनीयाद्विरण्यपुष्पोमूलं हस्तपादयोः, धारयेत् सुवर्चर्द्धा विशलयां वा ॥११॥
गर्भ के योनि में रुक जाने पर ( बाहर न आने पर—बेदनायें बन्द हो जाने पर ) काले साँर की कँचुली, अथवा सैनफल से योनि में धूपन करे। कलिहारी की जड़ को हाथ पैर में बाँधे। हुलहुल या विशलया ( कलिहारी ) को धारण करे।
वि० मन्तव्य—यह धूपन आदि उपचार करे। यदि तथापि प्रसव न हो तो—अथर्व वेद के शांता ब्रह्मण द्वारा मन्त्र यन्त्र आदि का प्रयोग करे यथा—एक सिद्ध मन्त्र—
हृहामृतं च सोमश्च चित्रमानुश्च भामिनी।
उच्चैःश्रवाश्च तुरगो मन्दिरं निवसन्तु ते ॥
यह मन्त्र गर्भवती के कान में कहना चाहिये और वह इसे ध्यान देकर सुने। अथवा निम्न मन्त्र से अभिमन्त्रित जल पीने को देवे यथा—
हृदममृतमर्पामुदुतं वै तव लघुगर्भमिमं प्रमुञ्चतु स्त्रि।
तदनलपनाकंवासवास्ते सहलवणाम्बुचैर्दिशान्तु शान्तिम् ॥
एक सिद्ध यन्त्र—चक्रम्यूह का आकार कांस्य की थाली में हरिद्राद्रव से लिखकर दिखावे तथा शुद्ध जल से धोकर गिलावे। इतने पर भी यदि प्रसव न हो तो मूढगर्भ चिकित्सा अ० १५ के अनुसार उपचार करे ॥११॥
अथ जातस्योलंबं मुखं च सैन्यवसर्पिषा विशोध्य घृताक्तं मूर्ध्नि पिचुं दद्यात्, ततो नाभिनाडीमष्टाकुलमायम्यम्य सूत्रेण बद्ध्वा छेदयेत्, तत्सूत्रैकदेशं च कुमारस्य प्रीवायां सम्यग् वधनीयात् ॥१२॥
बालक के पैदा होने पर प्रथम जरायु को हटाकर, घी और सैन्यव से मुख का शोधन करे। घी से स्निग्ध पिचु को शिर पर रखे। फिर नाभि नाड़ी को नाभि से आठ अंगुल नाप कर धागे से बाँधकर काट देवें। धागे के एक भाग को बच्चे के गले में बाँध देवें।
वक्तव्य—नाड़ी को दो स्थानों से बाँधते हैं। जिससे रक्त प्रवृत्ति बच्चे की तरफ से भी न हो, और माता की तरफ से भी न हो। जब तक नाड़ी में स्नन्दन प्रतीत होता रहे, तब तक नाड़ी को नहीं काटना चाहिये। स्नन्दन बन्द होना इस बात का चिह्न है कि माता से रक्त आना बन्द हो गया। इसको नाभि से दो इञ्च बाँधते हैं। गले में लटकाने से नाल मिट्टी आदि में खराब नहीं होती। मल मूत्र से बची रहती है। नाड़ी के ठीक प्रकार न काटने से—“असम्यक् करुने हि नाञ्चा आयामव्यायामोत्पिण्डकापिण्डकालिकाविनाभिकाविजुभिकावाधेभ्यो भयम् ॥” गले में ढीला लटकाये। काटने के लिये—नाभिबन्धनात् प्रभृत्यर्घांगुलमभिज्ञानं कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्य हीत्वा तीक्ष्णेन रौक्षमराजतायसनां छेदना-नामन्यतमेनाद्धारेण छेदयेत्ताम् ॥ चरक० शा० अ० ८॥
वि० मन्तव्य—यदि जात शिशु स्वस्थ है, तो ईश्वर का धन्यवाद करो। यदि गर्भनाल शिशु के साथ ही बाहर आ गई हो तो नाभि से आठ अंगुल पर सूत्र से बाँध कर—कसकर बाँधकर एक अंगुल आगे से काट देवे और यदि प्रसूता के गर्भाशय से सम्बद्ध हो तो नाल पर दो बन्धन लगाकर बीचसे काट देना चाहिए, बन्धन लगा देने से शिशु तथा प्रसूता के शरीर से नाल द्वारा रक्त ख़ाव नहीं होता। प्रीवा में बाँधने से क्षतका लगने का भय नहीं रहता। अन्यथा समय से उलझ जाने पर अनेकानेक हानियाँ हो सकती हैं। और जब तक शिशु पूर्णरूप से प्रकृतिस्थ न हो तब तक नाल छेदन नहीं करना चाहिए। सच यह है, कि माता के शरीर से जन्म हो जाने पर भी शिशु को पोषण मिलता रहता है, जब तक नाल गर्भाशय से सम्बद्ध रहे तब तक
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नालन्डेवन किया ही न जाय । अतएव भगवान् पुनर्वसु ने—अपरागत के पश्चात् नालन्डेवन का विधान बतलाया है, (३० शा० अ० ८-४७-४८) ॥१२॥
अथ कुमारं शोताभिरिन्द्रिराश्वत्स्य जातकर्मणि कृते मधुसपिरनन्तचूर्णमङ्कुल्याऽनामिकया लेहयेत्, ततो बलातैलेनाभ्यञ्ज्य, क्षीरवृक्षकषायेण सर्वगन्धोद्भवेन वा लघुहंसप्रतपेन वा वारिणा स्नापयेदेन कपित्थपत्रकषायेण वा कोण्णेन यथाहालं यथादोषं यथाविभवं च ॥१३॥
फिर उण्डे जल से बालक को आश्वसित करके जातकर्म करने के पश्चात् धी और मधु से मिश्रित थोड़ी सुवर्णभस्म अनामिका अंगुलि से चटाये । फिर बलातैल का अभ्यंज करके बरगद आदि क्षीर वृक्षों की खन्चा से बनाये क्वाथ से अथवा एलादि गण के जल से या चाँदी अथवा सुवर्ण को तपाकर बुझाये जल से या कैथ के पत्तों के गरम कषाय से समय, दोष और वैषम का ध्यान रखकर स्नान कराये ।
वक्तव्य—यह समझ लेना चाहिये कि मधु श्लेष्मा की निकालता है। बच्चे के मुख में रूकी श्लेष्मा इससे निकल जाती है। धी और स्वर्ण विषनाशक है। इसी से कहा है—'न सज्जति हेमपाङ्कं पद्मपत्रं उन्मृदु विषम् ।' स्वर्ण खानेवाले के शरीर में विष प्रभाव नहीं करता। बच्चे पर विष जल्दी प्रभाव करता है, इसी से उसकी रक्षा की है। सर्वगन्ध से अभिप्राय-एलादि गण से है।
वि० मन्तव्य—सू० १२ के अनुसार शिशु के मुख नासा का परिमार्जन-शोधन कर देने पर भी यदि श्वास की गति न हो तो शीतल जल के छोटे मारने चाहिये, इससे शिशु हुलमसी लेता है और रो पड़ता है, श्वास की गति चालू हो जाती है—गर्भाशय में तो श्वास चलता ही नहीं (दे० सु० शा० अ० २ श्लो० ५०) । यदि चेतना हीन या मूर्च्छित हो तो—कानों के पास पाषाणों की अथवा कांसा के खड्गताल आदि की ध्वनि तथा सूर्य-पंखा आदि से वायु तब तक करे जब तक श्वास-प्रश्वास चालू हो जाय और हाथ-पांव हिलाना प्रारम्भ हो जाय, अर्थात् सचेतन हो जाय। यदि हतने पर भी कोई फल न हो तो सैन्धव लवण मिश्रित घृत वक्षस पर मले, इससे वमन हो जाता है और जीवन लाभ हो जाता है। तथापि लाभ न हो तो नाक को अग्नि से तपावे, सम्भव है प्राण आ जायें तत्पश्चात्-अभ्यङ्ग आदि उपचार करे ॥१३॥
धमनोत्ता हृदिस्थानां विद्युत्त्वादनन्तरम् । चतुरात्रात् त्रिरात्राद्वा क्षोणां स्तन्यं प्रवर्तते ॥१४॥ हृदय में स्थित धमनियों के खुलने के पीछे—तीन या चार दिन के अनन्तर स्त्रियों में दूध आता है ।
वक्तव्य—पहले पीयूष (कोलोस्ट्रम) आता है । जिसे बोल-चाल की भाषा में खीस कहते हैं । इसके देने न देने में भेद है, इसके देने से मृदु विरेचक गुण के कारण यह मल को बाहर करता है । न देनेवाले भारी होने से इसको नहीं देते । वे इसके लिये मधु देते हैं ।
वि० मन्तव्य—यहाँ स्तन्य का अर्थ उस स्तन्य-दूध से है जो शिशु के पीने योग्य होता है। वैसे तो श्वेत द्रव की प्रवृत्ति गर्भवती को ही होने लगती है, यथा—शा० अ० ३-२४ में कहा है तत्र यस्या दक्षिणे स्तने प्राक् पयोदर्शनं भवति । जैसे गो भैंस आदि का दूध भी ३-४ दिन पीने योग्य-शिशु के पीने योग्य नहीं होता वैसे ही मानुषी का भी नहीं होता। तीन चार दिन पर दूध की प्रवृत्ति होती है और 'स्तन्यावतरणे नारीणां ज्वरो दोषैः प्रवर्तते' अर्थात् दूध उतरने में प्रसूता को ज्वर हो जाता, है फलतः उस समय भी दूध नहीं पिलाया जाता, परन्तु यह ज्वर एक दो दिन में शान्त भी हो जाता है जो छठी का दूध कहलाता है ॥१४॥
तस्मात् प्रथमेऽह्नि मधुसपिरनन्तमिश्रं मन्त्रपूर्वतं त्रिकालं पाययेत्, द्वितीये लक्ष्मणासिद्धं सपिः, तृतीये च; ततः प्राङ्निवारितस्तन्यं मधुसपिः स्वपाणितलसमितं द्विकालं पाययेत् ॥१५॥
इसलिये पहले दिन धी और मधु के साथ थोड़ा सा स्वर्ण मन्त्र से पवित्र करके तीन बार पिलाये । दूसरे दिन लक्ष्मणा से सिद्ध किया घृत देवे । तीसरे दिन भी यही देवे, फिर धी और शहद को (विषममात्रा में) बच्चे की हथेली की मात्रा में दो समय देकर स्तन रिलाना आरम्भ करे ।
वक्तव्य—अनन्त बराबर सुवर्ण, इसकी मात्रा आधी रती या चौथाई रती दे । 'अनन्ता' पाठ मानकर हाराणचन्द्र जी 'सारिवाली' कहते हैं अष्टांगसंग्रह में दूवाँ ली है । यथा 'अनन्तामिश्रं मधुसपिषी-अनन्ता दूवाँ' ।
“ऐन्द्री ब्राह्मी शंखपुष्पी वचेन्द्रीकल्कं मधुघृतोपेतं हरेणु-मार्गं कुद्याभिर्मंत्रितं सौवर्णं नाश्वत्थपत्रेण वा मेघायुर्वलजननं प्राशयेद्, ब्राह्मीवचानन्ता शतावरी अन्यतमचूर्णं वा ॥संग्रह ।
चरक में पहले दिन स्तनपान करना कहा है । यथा—ततोऽनन्तरं जातकर्म कुमारस्य कार्यम् । तद्यथा मधुसपिषी मनोपमन्त्रिते यथाम्नायं प्रथमं प्राथितुं दद्यात् । स्तनमत ऊर्ध्वमेतेनैव विधिना दक्षिणं पातुं पुरस्तात् प्रयच्छेत् ।
वि० मन्तव्य—अतः तब तक मधुसपि आदि चटाकर जीवन यापन करे । अथवा वे द्रव देवे जिनकी व्यवस्था बुढ़ा स्त्रियाँ करें ॥१५॥
अथ सूतिकां बलातैलाभ्यक्तां वातहरोषघनिष्कवायेनोपचरेत् । सरोषदोषां तु तदहः पिप्पलीपिप्पलामूलहस्ति-
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सुश्रुतसंहिता
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पिप्पलीचित्रकश्मृगवेरचूर्ण गुडोदकेनोष्णेन पाययेत्, एवं द्विरात्रं त्रिरात्रं वा कुर्यादादृष्टशोणितात्। विमुद्धे ततो विदारिगन्धादिसिद्धां स्नेहयवाग् क्षीरयवाग् वा पाययेत्-स्विरात्रम्। ततो यवकोलकुलस्थसिद्धेन जाङ्गलरसेन शाल्योदनं भोजयेद्बलमग्निबलं चावेदय। अनेन विधिनाऽध्वधमासमुपसंस्कृता विमुक्ताहाराचारा विगतसूतिकामिधाना स्यात्, पुनरात्तवदर्शनादित्येके ॥१६॥
इसके पश्चात् सूतिका के शरीर पर बलतैल का अभ्यंग कराकर एरण्ड-मद्वदाव आदि वातहर औषधियों के क्वाथ से स्नान कराये। यदि दोष पूरी तरह न निकलता हो तो (रक्त बन्द हो गया हो तो) उसी दिन पिप्पली, पिप्पलीमूल, गज-पिप्पली, चित्रक, सोंठ के चूर्ण को गुड़ के गरम पानी के साथ पिलाये। इसी प्रकार दो दिन, तीन दिन या जब तक दूषित रक्त न निकल जाये तब तक करे। रक्त का शोधन हो जाने पर विदारीगन्धादि गण से सिद्ध किये घी से युक्त यवागू को या सिद्ध किये दूध में बनाई यवागू को तीन दिन पीने के लिये देवे। फिर जी, बेर, कुलस्थी सिद्ध या जांगल मांस रस के साथ शाली धान्यों का भात अग्निबल के अनुसार खाने को देवे। इस प्रकार डेढ़ (१२) महीने तक नियम पालन करने पर आहार-और आचार (विहार) परहेज को छोड़ने से 'विगतसूतिका' शब्द से कही जाती है (अर्थात् डेढ़ मास के पीछे उसके लिये सूतिका का परहेज नहीं रहता)। कई आचार्यों का मत है कि प्रसव के पीछे प्रथम बार आर्तव दर्शन तक वह सूतिका रहती है, उसे सूतिका का आहार विहार तब तक पालन करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—उशेषदोषां—यदि गर्भाशय से निकल जाने योग्य रक्त आदि न निकल गये हों। विगतसूतिकाऽभिधाना—अब उसका नाम 'सूतिका' या 'प्रसूता' नहीं रह जाता। अतः सूतिका के लिये विहित उपचारों की भी आवश्यकता नहीं रह जाती। पुनरात्तव दर्शनात्—प्रसव से ४०-४५ दिन पर थोड़ा बहुत आर्तव दिखाई दे जाता है स्वस्थ स्त्री को। इसके पश्चात् किसी २ को प्रतिमास आर्तव होने लगता है और किसी २ को जब तक बालक को दूध पिलाती है तब तक नहीं होता। आर्तव दिखाई देने पर पुनः गर्भाधान की सम्भावना हो जाती है, परन्तु अधिकांश स्त्रियों को नियमितरूप से-प्रसव से-४०-४५ दिन पर अथवा १-२-३-४-५ वर्ष पर गर्भाधान हुआ करता है ॥१६॥
धन्वभूमिजातां तु सूतिकां घृन्तैल्योरन्यतरस्य मात्रां पाययेत् पिप्पल्यादिकपायानुपानां स्नेहनित्या च स्यात् त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा बलवती; अवलां यवागू पाययेत् त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा। अत ऊर्ध्वं स्निग्धेनात्रसंसर्गेणोपचरेत् ॥१७॥
धन्वभूमि (मरुप्रदेश) में उत्पन्न प्रसूता को घी या तैल इनमें से किसी एक की मात्रा को पिप्पल्यादि कपाय के अनुगुणन से पिलाये। बलवान् स्त्री को पाँच दिन स्नेह का पान, अर्थात् आदि देवै। निर्वल प्रसूता को तीन या पाँच दिन यवागू देनी चाहिये। इसके बाद स्निग्ध अन्नसंसर्ग (पेया, विजेनी अन्न) विधि बरते।
वक्तव्य—“अथ सूतिकां बलातैलेनाभ्यज्यात्, बुभुक्षितां च पंचकोलचूर्णेन यवान्युपकुञ्चिकाचव्यचित्रकव्योपसेन्यवचूर्णेन वा युक्तामहःपरिणामिनीं यथासात्त्व्यं स्नेहमात्रां पाययेत् स्नेहयोग्यां तातहरीषधन्वार्थं हस्तपंचमूली क्वाथं पीतवत्थाश्रमयकेनाभ्यज्य वेष्टयेदुदरं वस्त्रेण। तथा न वायुरुदरे विकृतिमुत्सादयति अन्वकाशत्वात्। जीर्णं तु स्नेहै पूर्वैषधिभिरेव सिद्धां विदार्थादि-गणकवायेन वा क्षीरेण यवागू सुस्विन्नां द्रवां मात्रया पाययेत्” ॥ (अ० सं० शा० अ० ३)।
वि० मन्तव्य—धन्वभूमिजातां तु सूतिकां—धन्व भूमि-मरुभूमि आरोग्यद भूमि होती है, वहाँ की निवासिनी प्रायः अधिक स्वस्थ होती है, अतः उसे स्नेह की मात्रा का विधान किया गया है, अर्थात् उसे अधिक से अधिक घृत आदि का प्रयोग किया जा सकता है और वह उसे पच भी जाता है। वह ५-७ दिन में ही पुनः पूर्ववत् स्वस्थ-बलवती हो जाती है। अवलां—अनूभूमि अन्तः देश की निवासिनी प्रसूता प्रायः अवला-दुर्बला होती है। अतः उसे यवागू दलिवा अथवा खिचड़ी आदि में मिलाकर स्नेह देना चाहिये। ११ दिन के पश्चात् उचित-स्वामाविक भोजन की व्यवस्था करे, परन्तु वह स्निग्ध हो। इस प्रकार ११-१२ मास में प्रसूता पूर्ववत् पूर्ण स्वस्थ हो जाती है ॥१७॥
प्रायशश्चनेनां प्रभूतेनोष्णोदकेन परिषिञ्चेत् क्रोध-यासमैथुनादींश्च परिहरेत् ॥१८॥
प्रायः करके बहुत गरम जल से प्रसूता को स्नान करावे। क्रोध, यकान, मैथुन आदि से बचे।
वि० मन्तव्य—पुनरात्तव दर्शन पर्यन्त उष्णोदक से स्नान होना चाहिये और क्रोध आदिका पूर्णरूप से परित्याग भी ॥१८॥
मिथ्याचारात् सूतिकाया यो व्याधिरुपजायते।
सोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यो वा भवेदत्यपतपणात् ॥१९॥
तस्मात्तां देशकालो च व्याधिसात्त्व्येन कर्मणा।
प्रतीदयोपचरेन्नित्यमेवं नात्ययमाप्नुयात् ॥२०॥
प्रसूता के मिथ्या आचार से या अपतप्य के कारण प्रसूता को जो रोग उत्पन्न हो जाता है, वह कष्टसाध्य होता है, या असाध्य हो जाता है। इसलिये देश, काल और रोग सात्त्व्य को देखकर चिकित्सा करे। सब्दा परीक्षा करके इस प्रकार करे, जिससे कोई विपद या हानि न हो।
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वि० मन्तव्य—प्रसूता अत्यन्त दुर्बल एवं क्रुश होती है, अतः थोड़े भी मिथ्या आहार-विहार से भीषण आपत्ति आ सकती है। प्रसूता को अगतर्पण—(भूखे प्यासे रहना) नहीं करना चाहिये। भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में—स्तिका को जो भी रोग हो जाता है, वह कष्टसाध्य अथवा असाध्य होता है, क्योंकि-गर्भ की वृद्धि के लिये उसके सब रस-रक्त आदि धातुओं का क्षय-व्यय हो चुका है और प्रसववेदना तथा रक्त-क्षय से शरीर शून्य-निःशार हुआ होता है। अतः उसका उपचार-विधिपूर्वक-सावधान होकर करे और भौतिक (मासी आदि मृत नाशक), जीवनीय, वृंहणीय, मधुर तथा वातनाशक औषधों से सिद्ध-अभ्यङ्ग, उबटन, परिषेचन, अवगाहन, अन्न तथा पान की व्यवस्था करे। क्योंकि प्रजाता-प्रसूता नारियों का शरीर प्रायः खोलला होता है ॥१६, २०॥
अथापराऽपतन्त्यानाहाधमानो कुरुते, तस्मात् कण्ठ मस्याः केगवेष्टितयाऽङ्गुल्या प्रभुजेत्, कटुकालावृकृतवे- धनसर्पसर्पनिर्मोकेवो कटुतैलविभिन्नेर्योनिमुखं धूपयेत्, लाङ्गलीमूलकलकेन वाऽस्याः पाणिपादतलमालिम्पेत्, मूर्धनं वाऽस्या महावृक्षक्षीरमनुसेचयेत्, कृष्टलाङ्गलीमूल कलकं वा मद्यमूत्रयोः रन्ध्रतरेण पाययेत्, मालमूलकलकं वा पिप्पल्यादिं वा मध्येन सिद्धार्थकंकुष्ठलाङ्गलीमहावृक्ष- क्षीरमिश्रेण सुरामण्डेन वाऽस्यापायेत्, एतैरेव सिद्धेन सिद्धार्थकतैलेनोत्तरवस्ति दद्यात्, स्तिग्धेन वा कृतनखेन हस्तेनापहरेत् ॥२१॥
बाहर न आई अपरा (कमल) आधमान और आनाह करती है। इसलिये बाल लिपटी हुई अंगुली से इस प्रसूता के गले को अन्दर से खुरखुराए। कड़ई तुम्बी, अमलताम, सरसों, साप की कँचुली, इनको सरसों के तेल में मिलाकर योनिमुख में धूप देवे। कलिहारी की मूल के कलक को इसके हाथ-पैरों पर लेप करे। इसके सिर पर थोर का दूध डाले। कूठ और कलिहारी के मूल कलक को मद्य या मूत्र किसी एक के साथ पिलाये। शालिमूल के कलक को या पिप्पल्यादि गण के कलक को मद्य से पिलाये। सरसों, कूठ, कलिहारी, इनको थोर के दूध या सुरामण्डक में मिलाकर आस्थापन वस्ति देवे। इन्हीं से सिद्ध सरसों के तैल से वस्ति देवे। अथवा नख कटाये हुए हाथ को भी या तैल से चिकना करके इससे बाहर निकाल ले।
चरक में—“यस्याश्वदपरा न प्रपन्ना स्यादधेनामन्यतमा स्त्री दक्षिणेन पाणिना नामेऽरिष्टात् बलवन्निपीड्य सध्येन पाणिना पृष्ठ उपसंग्रह्य सुनिर्धृतं निर्धृतुयात् । अथास्याः पादपाण्यां श्रोणिमाकोटयेत् । तस्याः स्फिच्छावृपसंग्रह्य सुपीडितं पीडयेत् । अथास्या बालवेण्याकण्ठताखु परिस्पृशेत् ॥ चरक० १० ॥ ४५ ॥
वि० मन्तव्य—प्रसव के कुछ समय पश्चात् अपरा स्वतः गिर जाती है। यदि विलम्ब हो रहा हो तो उक्त उपचार करे। यथासम्भव उसका शीघ्र गिर जाना ही अच्छा होता है। अच्छा तो यह है कि—ज्यों ही प्रसव हो ल्यों ही ध्यान दिया जाय कि गिरी अथवा नहीं, यदि नहीं गिरी तो उन परिचा- रिकाओं में से एक स्त्री दाहिने हाथ से-नाभि से चार अंगुल ऊपर से बलपूर्वक दबाकर और बाएँ हाथ से पीठ की ओर से दबाकर नीचे की ओर को निचोड़ देवें, जिससे “अपरा” बाहर आ जाय। यदि इससे भी न निकले तो उदर को तो दबाए रहे और अन्य स्त्रियाँ उक्त उपाय करें और तब तक निरन्तर करें जब तक अपरा गिर न जाय। अतिम उपाय यह है कि अपत्य पथ में हाथ डालकर अपरा को निकाल देवें। अपरा निकल आने पर नाड़ीच्छेदन करे और इसके पश्चात् भूख लगने पर स्नेहमात्रा अथवा स्नेह यवगु आदि यथोचित पथ्य देकर-उदर पर स्नेहाम्यङ्ग करके-यक्ष से और स्वच्छ वस्त्र से उदर का आवेष्टन करकर कर देवें। इससे अवकाश न मिलने के कारण वायु उदर में कोई विकृति उत्पन्न नहीं कर सकता और गर्भाशय अपने स्वरूप में आ जाता है। अन्यथा कईयों का उदर बड़ा रह जाता है। एतदर्थं कश्यप संहिता का वाक्य स्मरणीय है, यथा—
प्रजातमात्रमाश्रय सृतां शक्ता प्रवाविका । न्युञ्जां शयानां संवाह्य पृष्ठे संशिल्य कुक्षिणा । पीडयेद् दृढपुदरं गर्भदोषप्रवृत्तये । महताऽदुष्टपट्टेन कुक्षिपार्थं च वेधयेत् । तेनादरं स्वस्थंस्थानं याति वायुश्च शाम्यति ॥
का० सं० सतिकोपक्रमणीय । ४०-४५ दिन में गर्भाशय अपनी पूर्ववत् स्थिति को प्राप्त हो जाता है। यदि उदर बड़ा ही रह जाय तो दशमूल, पिप्पलामूल तथा सोया का काय पिलाते रहना चाहिये ॥२१॥
प्रजातायाश्च नार्यां रूक्षगरीरायास्तीक्ष्णैरविशोधितं रक्तं वायुना तहेशगतेनातिसंरुद्धं नामरेषः पार्श्वयोवस्तौ वस्तिशिरसि वा ग्रन्थि करोति, ततश्च नामिवस्युदरशू- लानि भवन्ति, सूचामिरिव निस्तुवते भिद्यते दीयत इव च पकाग्रयः, समन्ताद्वाधमानसुदरं मूत्रसङ्गश्च भवतीति मक्कल्लक्षणम् । तत्र वीरतवादिस्िद्धं जलमूषकादिप्र- तांवापं पाययत्, यवश्चार्चूर्णं वा मुखादकेन पिप्पल्यादि- काथेन वा, पिप्पल्यादिचूर्णं वा सुरामण्डेन, वरुणादि- काथं वा पञ्चकोल्लेलाप्रतीवापं, पृथक्पुण्यादिकवाथं वा भद्रदारुमरिचसंसृष्टं, पुराणगुडं वा त्रिकटुकचतुर्जातक- कुस्तुम्बुरुमिश्रं खादेत्, अच्छं वा पिबेदरिष्टमिति ॥२२॥
३५६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
रक्त शरीरवाली प्रवृत्ता स्त्री के तीक्ष्ण औषधियों से अविशोधित रक्त में, उस स्थान की वायु नाभि के नीचे, पाश्वों में, वस्ति में, अथवा वस्ति शीर्ष में गॉठ उत्पन्न करती है। इससे नाभि, वस्ति और उदर में शूल होता है। पक्वाशय में सई चुमने के समान पीड़ा होती है। यह फटता हुआ सा प्रतीत होता है। पेट चारों ओर फैलता है, मुख रुकता है, यह मक्कल के (After pains) के लक्षण हैं।
वक्तव्य—“प्रजातायाः प्रजननशोणितसंजनितशूलमक्कलः, अवरुदरकपाकजनितो विद्रधिपरि मक्कलः। उल्लूणः—“विशेषतो हि शून्यशरीराः स्त्रियः प्रजाता भवन्ति ॥” चरक० ।
चिकित्सा—इस मक्कल में वीरतर्वादि गण के सिद्ध जल में ऊषकादिगण का प्रत्येप देकर पिलाये यवक्षार के चूर्ण को गरम पानी से या पिप्पल्यादि क्वाथ से दे। पिप्पल्यादि चूर्ण को सुरामण्ड से दें। वरुणादि क्वाथ में पंचकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ) और इलायची का प्रत्येप देकर पिलाये। शालिपर्णी आदि के क्वाथ में देवदारु और मरिच मिलाकर दें। या पुराने गुड को सोंठ, मरिच, पीपल, दालचीनी, इलाइची, तेजपात, नागकेसर, घनिया मिलाकर खाये। या केवल अरिष्ट (अभयारिष्ट-उल्लूण) पीवे।
वि० मन्तव्य—गर्भाशय के शोषन का पूर्ण ध्यान रखना चाहिये। तदर्थ—मक्कल नाशक उपायों का अवलंबन करे तथा अपरा पातन के उपायों का और आस्थापन तथा अनुवासन वस्ति का प्रयोग करे, इससे वायु का अनुलोमन हो जाता है, और वायु के अनुलोमन से गर्भाशय में रहे अपद्रव्य-अपरा एवं दुष्ट रक्त आदि सब बाहर निकल जाते हैं ॥१२॥
अथ बालं क्षोमपरिवृतं क्षोमवस्त्रास्तृतायां शय्यायां शाययेत् पीलुबद्रं रीतम्बरपुरुषकगाखाभिश्चैतं परिवीजयेत्, मूर्ध्नि चास्याहरहस्तेलपिचुमवचारयेत्, धूपयेच्छैतं रक्षा-न्तेधूपैः रक्षाणानि चास्य पाणिपादशिरोग्रोवास्ववसजेत्, तिलातसौसषपकर्णाश्चात्र प्रकिरेत्, अधिष्ठाने चार्नि प्रज्वालयेत्, त्रणितोपासनीयं चावेक्षेत् ॥१३॥
इसके पीछे बालक को रेगमी वस्त्र ओढ़ाकर रेगमी वस्त्र से बिछाई शय्या पर सुला देवे। पीलु, बेर, नीम, फालसा, इनकी शाखा से इसको हवा करे। प्रतिदिन इसके खिरर तैल का फोया रखे। रक्षोन्न धूप (सरसों, अजवायन, नीम के पत्ते नमक) से इसको धूप देवे। रक्षोन्न द्रव्यों को इसके हाथ, पैर, शिर, मीया में बांध देवे। तिल, अलसी, सरसों को इसके चारों ओर बिखेर देवे। घर में अग्नि जलती रखे। त्रणितोपासनीय अध्याय में कहे विधान को बरते।
वि० मन्तव्य—शिर पर—ब्रह्मरन्ध्र पर गर्भियों के दिनों में नवनीत का पिचु भी उपयोगी होता है। बालक के घर में, शय्या में, कपड़ों में धूप देना चाहिये। धूपन द्रव्य हैं—जो, सरसों, अलसी, हींग, गूगल, बचा, चौरपुष्पी, हरड या ब्राह्मी, दूब, जटामांसी, लोबान, वॉप की केंचुली सबको दरदरा कूटकर घृत में मसलकर रख लेवे। बालक के शयन, आसन, ओढ़ना एवं बिलावन सब—कोमल, लघु, स्वच्छ एवं सुगन्धित हो। स्वेद, मल, जूए आदि से रहित तथा मल मूत्र में उपसुष्ट न हो, अर्थात् नये अथवा घुले मली भाँति सूखे हों। खिलेने-विविच, छनकनेवाले, सुन्दर, लघु जिन का अग्रभाग तीक्ष्ण न हो, जो मुख में प्रविष्ट न हो सकें, जो घातक न हों और डरा-वने न हों। च० शा० अ० ८ ॥१३॥
ततो दशमेऽहनि मातापितरौ कृतमङ्गलकौतुको स्वस्तिवाचनं कृत्वा नाम कुर्यातां यदभिप्रतं नक्षत्र-नाम वा ॥१४॥
फिर दसवें दिन माता-पिता, मंगल, कौतुक, स्वस्तिवाचन करके, मन के अनुकूल या नक्षत्र के अनुसार इस बच्चे का नामकरण करें।
चरक में—“द्वे नामनी कारयेत्, नाक्षत्रिकं नामाभिप्रायिकं च। तत्राभिप्रायिकं घोषवदाद्यन्तस्यान्तम् ऊष्मान्तं वाऽहं त्रिपुरुषानूकमनवप्रतिष्ठितम्। नाक्षत्रिकं तु नक्षत्रदेवतासमानात्वं दृश्यत् चतुरशरं वा” ॥ चरक शा० ८-४५ ।
वि० मन्तव्य—नाम करण संस्कार—देश, जाति एवं कुल परम्परा के अनुसार किया जाता है। नाम—अभिप्रेत अर्थात् जो नाम रखना अभीष्ट हो। नक्षत्र नाम—ज्योतिः शास्त्रानुसार नक्षत्र का—अक्षर—जिस नाम में प्रथम हो। जिस नक्षत्र में जन्म होता है उस नक्षत्र के अक्षरों को ध्यान में रखकर नाम चुन लिया जाता है ॥१४॥
ततो यथावर्णा धात्रीमुपेयान्मध्यमप्रमाणं मध्यम-वयस्का(सा)मरोगां जीलवतीमचपलामलोलुपामङ्गा-मस्थूलां प्रसन्नश्रीरामलम्बाष्टीमलम्बोर्ध्वस्तनामव्यङ्गम-व्यसनिनीं जीवद्वत्सां दोग्ध्रीं वत्सलामलुदकमिणीं कुले जातामतो भूमिष्टंश्च गुणेरन्वितां श्यामाराग्यवबलबुद्धये बालस्य। तत्रार्ध्वस्तनीं कराळं कुर्यात्, लम्बस्तनीं नासि-कामुखं छादयित्वा मरणमापादयेत्। ततः प्रशस्तायां तिथौ शिरःस्तनातमहतवाससमुदङ्मुखं शिशुमुपवेश्य धात्रीं प्राङ्मुखो चापवेश्य दक्षिणं स्तनं धोतमोक्षपरिघृतमभि-मन्त्र्य मन्त्रेणानेन पाययेत् ॥१५॥
फिर वर्ण के अनुसार—(ब्राह्मण के लिये ब्राह्मणी
२०१०]
शरीरस्थानम्
३१७
इत्थादि) धात्रीको बुलाये। धात्री मध्यम आकार की (न बहुत लम्बी, न छोटी), बहुत उमर की न हो (मध्यम वय की प्रौढ़ा), नीरोगी, उत्तम स्वभाव की, चंचलता रहित, निर्लोभी, न मोटी, निर्मल दूधवाली, जिसके ओठ लम्बे न हों, जिसके स्तन लम्बे या ऊपर को न हों, अर्धग्री, ग्यसनों से रहित, जीवित बालकवाली, मधुर दूधवाली, प्रेम करनेवाली, नीच कर्म न करनेवाली, उत्तम कुल में उत्पन्न होने के कारण बहुत से गुणों से युक्त, श्यामा इस प्रकार की धात्री बालक के आरोग्य, बल और बुद्धि के लिये होती है। इनमें ऊर्ध्वस्तनवाली बालक को कराल (आगे निकले हुए दांतोंवाला) बना देती है। लम्बे स्तनोंवाली नासिका के मुख को बन्द करके मृत्यु का कारण बनती है। फिर प्रशस्त तिथि में शिर समेत बच्चे को स्नान कराके नये वस्त्र पहनाकर उत्तर की ओर मुख करके बिठाये। धात्री को पूर्व की ओर मुख करके बिठाये। पहले दक्षिण स्तन को धोकर थोड़ा-सा दूध बाहर निकालकर निम्न मंत्र से आमन्त्रित करके पिलाये।
वि० मन्तव्य—यदि किसी कारण से जननी दूध पिलाने योग्य न हो अथवा न रहे तो धात्री का चुनाव करे। यदि प्रमादवंश जननी दूध न पिलाना चाहे तो उसे समझा-बुझाकर दूध पिलाने के लिये तैयार करे क्योंकि—मातुरेव पिबेत् स्तन्यं तत् परं देहवृद्धये—अर्थात् जननी का दूध ही बालक के शरीर की पुष्टिबुद्धि के लिये परमात्तम होता है। श्यामा-श्यामवर्णा स्त्री प्रायः स्वस्थ गौरी की अपेक्षा अधिक स्वस्थ होती है, (पुरुष भी) और अतएव उसको दूध भी अधिक होता है—श्यामा हि प्रायशः प्रचुरस्त्रीरा भवति (डरलन) दूध पिलाने की उक्त विधि जननी एवं धात्री दोनों के लिये समान है, और यह एक दिन के लिये ही नहीं प्रतिदिन या प्रतिबार इसी प्रकार स्तन्यपान कराना चाहिये। दूध पिलाने के पूर्व पिठानेवाली अपने स्तनों को हाथ से मसल लिया करे, जिससे दूध तरल हो जाय और स्तन चूचकों की कठोरता दूर हो जाय और अधिक दूध हो तो पर्याप्त, अन्यथा थोड़ा सा दूध चुआ दिया करे, इस प्रकार सू० २६ में कथित काम आदि विकार नहीं होते और शिशु को चूषण में सरलता हो जाती है। जीवद्-वत्सा-जिसका अपना शिशु जीवित एवं स्वस्थ हो—यह दूध की उत्तमता का सूचक है। दोग्ध्री-धात्री को दो शिशुओं को पालना होता है, अतः दो के योग्य दूध होना आवश्यक है। धात्री के जो गुण लिखे हैं उनसे भी अधिक गुणोंवाली हो। वत्सला—इस शिशु के साथ अपने शिशु के समान स्नेह करनेवाली हो। कोई २ शिशु स्तन्य चूषण नहीं करते, परन्तु कुछ दिनों में अभ्यास हो जाने पर करने लगते
हैं। तब तक सीपी या चम्मच में दहकर दूध पिलाते रहना चाहिये ॥२५॥
चरवारः सागरास्तुभ्यं स्तनयोः क्षीरवाहितनः।
भवन्तु सुभगे नित्यं बालस्य वलवृद्धये ॥२६॥
पयोऽमृतसं पीत्वा कुमारास्ते शुभानने।
दीर्घमायुरवाप्नोतु देवाः प्राश्यामृतं यथा ॥२७॥
मंत्र—हे सुभगे ! तुम्हारे स्तनों में दूध को वहन करनेवाले चारों समुद्र बालक की बुद्धि के लिये हों। हे शुभानने ! जिस प्रकार देवता अमृत का पान करके दीर्घायु हुए, उसी प्रकार तुम्हारा अमृत रूपी दूध पीकर बालक दीर्घायु हो ॥
वक्तव्य—श्यामा “शीतकाले भवेदुष्णा, ग्रीष्मकाले च शीतला। तसकांचनवर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते”। विस्तार के लिये मेरी पुस्तक “हमारे भोजन की समस्या” पढ़ें ॥२६, २७॥
अतोऽन्यथा नानास्तन्योपयोगस्यासत्क्याद् व्याधि-जन्म भवति ॥२८॥
इससे विपरीत नाना (भिन्न-भिन्न) दूध के उपयोग करने से—असत्क्य-होने के कारण रोग उत्पन्न होते हैं।
वक्तव्य—बार-बार दूध बदलते रहने से दूध अनुकूल नहीं होता। दूध के अनुकूल न पड़ने से रोग होते हैं। इसलिये एकही धात्री को रखें। इसी प्रकार गाय या बकरी एक का ही दूध बच्चे को देना चाहिये। बार-बार दूध बदलना नहीं चाहिये। माता के दूध के अभाव में धात्री का दूध, धात्री के अभाव में बकरी या गाय का दूध देवे “स्तन्याभावे पयश्छागां गन्यं वा तद्गुणं हितम् ॥” वाग्भट में कहा है—मातुरेव पिबे-स्तन्यं तत्परं देहवृद्धये। स्तन्यधान्याद्युभे कार्यं तदसम्पदि वत्सले ॥२८॥
अपरिस्पृतेऽप्यतिस्वस्थस्तन्यपूर्णस्तनपानादुत्सुहित-स्नोतसः शिशोः कासश्वासवमीप्रादुर्भावः। तस्मादेवंविधानां स्तन्यं न पाययेत् ॥२९॥
स्तनों में से दूध न निकलने के कारण दूध के रुके रहने से, स्तनों के कठोर एवं भरे होने पर—स्तनपान करने से, स्नोतों के भराव होने पर बच्चे को कास, श्वास, वमन होता है। इसलिए इस प्रकार का दूध न पिलावे।
वक्तव्य—स्तनों में दूध रुकने से स्तन भारी और कठोर होते हैं। बच्चा दबा नहीं सकता। या जोर से दबाने पर स्नोतों में दूध का जोर होने से दूध जोर से आकर बच्चे के मुख में भर जाता है, इससे कास श्वास होता है। अतः पहले स्तनों में से दूध निकालकर फिर पीने को देना चाहिये ॥२९॥
१४८
मुमुक्षुसंहिता
[ अ० १० ]
क्रोधशोकावात्सल्यादिभिश्च छिप्याः स्तन्यनागो भवति । अथास्याः क्षौरजननार्थं सौमनस्यमुत्पाद्य यवगो- धूमशालिषष्टिकमांसरससुरासौवोकरपिण्याकळमुनमरस्य- कशेरुकशृङ्गाटकविसविद्वारिकन्दमधुकगतावरोनालिका- लायूकालशाकप्रभृतीनि विदध्यात् ॥३०॥
क्रोध, शोक, अममत्व आदि से दूध सूख जाता है । इस अवस्था में दूध को बढ़ाने के लिए मन को प्रसन्नता उत्पन्न करके जो, गेहूँ, शालि, साठी, मांसरस, सुरा, काञ्ची, तिल- खली, लहसुन, मछली, कसेरू, पिंपाड़ा, बिस, विदारीकन्द, मुलेहटी, शतावरी, नालिका, अलायू, काल शाक आदि देवे ।
वि० मन्तव्य—स्तनप्रवृत्ति के लिए देखिए—नि० स्था० अ० १० श्लो० १५ से २७ । निरन्तर-सच्चा स्नेह ही स्तन्य की प्रवृत्ति का हेतु है तथापि यदि क्रोध शोक आदि के कारण स्तन्य प्रवृत्ति न हो तो उचित उपाय करे लाभ अवश्य होता है । स्तन्य का क्षय होने पर—स्तन ढीले हो जाते हैं । अथवा घट जाते हैं । इस दशा में कफबर्द्धक द्रव्यों का प्रयोग करे । (मु० सू० अ० १५ सू० १२) ॥३०॥
अथास्याः स्तन्यमप्यु परीक्षेत तच्चेच्छीतलममलं तनु शङ्खावभासमप्यु न्यस्तमेकीभावं गच्छत्यफेनिलम- तन्तुमन्तोत्प्लवतेऽवसीदति वा तच्छुद्धमिति विद्यात्, तेन कुमारस्यारोग्यं शरीरोपचयो बलवृद्धिश्च भवति । न च वृषितशोकातशान्तप्रदुष्टधातुगभिणीवज्ररितानिखीणा- तिस्थूलविदग्धभक्तविरुद्धाहारतर्पितायाः, स्तन्यं पाययेत्, नाजांणौषधं च बालं, दोषोषधमलां नीत्रवेगोत्पत्ति- भयात् ॥३१॥
इसके पीछे दूध की परीक्षा जल में करे । यदि वह दूध- शीतल, निर्मल, पतला, शङ्ख के समान कान्ति का, जल में ढाला हुआ मिश्रित हो जाता है, क्षाग रहित, तन्तु की भांति नहीं, पानी में न बैठता है और न ऊपर तैरता है, तो इस दूध को शुद्ध समझे । इससे बच्चे में आरोग्य शरीर की पुष्टि, बल की वृद्धि होती है । मूली होने पर, शोक से दुःखी, थकी, वृषित थात, गमवती, ज्वर आए हुए, अतिक्षीण, अतिस्थूल, विदग्ध भोजन या विरुद्ध भोजन किए, उपवास किए—इन अवस्थाओं में दूध न पिलावे । बालक को यदि औषध न पची हो तो उसे दूध न देवे । क्योंकि दोष औषध और मल से तीव्र वेगोत्पात्ति का मथ रहता है ।
वि० मन्तव्य—दूध पिलानेवाली के दूध की परीक्षा अवश्य कर ले । कदाचित् दूध अशुद्ध हो तो शिशु अस्वस्थ हो जाता है । एतदर्थं देखिए नि० स्थान अ० १० और
शुद्ध दूध भी पिलानेवाली की क्षुधित आदि दशाओं में नहीं नहीं पिलाना चाहिये । यदि शिशु को कोई औषध दी गई हो जब तक वह पच न जाय तब तक दूध न पिलाया जाय । यदि बालक—मुखपाक आदि किसी कारण से स्तन चूचुक का आचूषण न कर सकता हो तो सीपी या चम्मच अथवा कोमल कपड़ा की बत्ती द्वारा दूध पिलाना चाहिये । शिशु दूध पीता रहे तब तक इस सूत्र को ध्यान में रखना चाहिए ॥३१॥
भवन्ति चान्न—
धाड्यास्तु गुरुभिर्भोज्यैर्विषमैर्दोषलैस्तथा । दोषा देहे प्रकृष्यन्ति ततः स्तन्यं प्रदुष्यति ॥३२॥ मिथ्याहारांबहारिण्या दुष्टा वातादयः छिप्याः । दूषयन्ति पयस्तेन शारीरा व्याधयः शिशोः । भवन्ति कुशलतांश्च भिषक् सम्यग्निर्भावयेत् ॥३३॥
इसमें श्लोक भी हैं—धात्री के गुरु, विषम और दोषकारक भोजनों के करने से दोष शरीर में वृषित होते हैं, इससे दूध वृषित हो जाता है मिथ्या आहार विहार करनेवाली धात्री के वृषित हुए वातादि दोष दूध को भी वृषित कर देते हैं, इससे बच्चे में रोग उत्पन्न होते हैं । इन रोगों को कुशल वैद्य भली प्रकार पहचाने ।
वि० मन्तव्य—यह सच है कि क्षौरपायी शिशु कोई अन्य पदार्थ तो खाता नहीं है, उसे यदि कोई विकार हो तो उसका कारण दूध ही हो सकता है । अतः दूध पिलानेवाली के आहार- विहार पर पूर्णरूप से ध्यान और नियन्त्रण रखना आवश्यक है । आहार रस से दुग्ध का निर्माण होता है, यथा—रसप्रदाय- मधुरः पक्वाहारनिमित्तजः । कृत्स्नदेहात् स्तनो प्राप्तः स्तन्यमिल- भिषीयते ॥ तथा—आहाररसयोनित्वात् एवं स्तन्यमपि छिप्याः । अतः धात्री के आहार-विहार से दूध में विकृति आती है और विकृत दूध पीने से शिशु में विकृति आती है । दुग्धशोधनार्थं धात्री को दुग्ध शोधक क्वाथ आदि पिलाना चाहिए ॥३२,३३॥
अङ्गप्रत्यङ्गदेशे तु रुजा यत्रास्य जायते । सुहृदुः स्पर्शति तं स्पर्शयमाने च रोदिति ॥३४॥ निमलितानक्षो मूर्धस्थे शिरोरोगे न धारयेत् । वस्तिस्थे मूत्रसङ्घातां रुजा वृष्यति मूच्छति ॥३५॥ विषमूत्रसङ्घवेण्यच्छर्वाधमानात्रकूजनेः । कोष्ठे दोषान् विज्ञानायात् सर्वत्रस्थान्श्व रोदनैः ॥३६॥ बच्चे के जिस अंग-प्रत्यङ्ग में वेदना होती है, वह उस स्थान को बार-बार स्वयं छूता है, परन्तु दूसरा कोई छूए तो वह रोता है । शिर में रोग होने पर आँखें बन्द कर लेता है, शिर को सीधा नहीं रखता । मूत्राशय में रोग होने पर मूत्र का रक्ता, पीड़ा, प्यास और मूर्च्छा होती है । कोष्ठ में स्थित दोषों
अ० १० ]
शारीरस्थानम्
३५६
को मल-मूत्र के रूकने से, विवर्णता से, वमन से, आध्मन से, आंतों की गड़गड़ाहट से पहचाने । सारे शरीर में उत्पन्न विकार को रोगे से समझे ।
वि० मन्तव्य—शिशु स्वतः बोलकर अपना कष्ट बतला नहीं सकता, अतः इन लक्षणों से और अपनी प्रतिभा से उसे जानने का प्रयत्न करना चाहिये ॥३४-३६॥
तेषु यथाभिहितं भृदुच्छेदनीयमौषधं मात्रया क्षीर-पत्य क्षीरसर्पिषा संयुक्तं विदध्यान्, धाड्याश्च केवलं, क्षीरात्राऽस्यात्मनि धाड्याश्च पूर्ववत्, अत्रादस्य कषाया-दीनात्मन्येव न धाड्याः ॥३७॥
इन रोगों में इन रोगों के अनुसार कोमल कफ-मेद का लेवन करनेवाली, औषध को मात्रा से दूध पीनेवाले बच्चे को दूध और घी के साथ मिलाकर देवे । और धात्री को अकेली औषध पिलाये । दूध और अन्न खानेवाले बालक को पूर्व की भांति बच्चे और धात्री दोनों को औषध देवे । अन्न खानेवाले बच्चे में केवल बच्चे को ही कषाय आदि औषध देवे, धात्री को औषध न दे ।
वि० मन्तव्य—शिशु तीन प्रकार के होते हैं १—क्षीरप अर्थात् केवल दूध पीनेवाले । २—क्षीराद् अर्थात् दूध के साथ २ अन्न खानेवाले । ३—अत्राद् अर्थात् धात्री का दूध छोड़कर केवल अन्न पर निर्वाह करनेवाले । बालक को चाटने का भी अभ्यास नहीं होता, अतः दुग्ध एवं घृत में बालक औषध पिलानी चाहिये । औषध तीक्ष्ण या उग्र नहीं हो, क्योंकि शिशु स्वभावतः कोमल एवं सुकुमार होते हैं । चरक के शब्दों में—और यदि कुमार को कोई व्याधि आ जाय तो प्रकृति, निमित्त, पूर्वरूप, रूप एवं उपशय के द्वारा भली भाँति समझ-कर तथा रोगी, देश, काल, रागाश्रय आदि का विचारकर मधुर, मृदु, लघु, सुगन्धित, शीत एवं कल्पाण कारक औषध एवं उपचारों का प्रयोग करते हुए चिकित्सा करे, क्योंकि कुमारों को इसी प्रकार के औषध एवं उपचार अनुकूल होते हैं, और इस प्रकार वे सुख का सदा के लिये लाभ करते हैं । जब वे स्वस्थ रहें तब स्वस्थवृत्त का अनुष्ठान व्यवस्था करे । इस प्रकार वह—बल, वर्ण, शरीर एवं आयुः की सम्पत्ति को प्राप्त कर लेते हैं । (च० शा० अ० ८६) ॥३७॥
तत्र मासादूर्ध्वं क्षीरपायाङ्कुलिषर्वद्वयग्रहणसंमिता-मौषधमात्रां विदध्यान्, कोलास्थिसंमितां कल्पमात्रां क्षीरात्रादाय, कोलसंमितामत्रादायेति ॥३८॥
एक मास से ऊपर की आयुवाले दूध पीनेवाले बच्चे को दूध-घी में मिलाई औषध को अंगुली के प्रथम दो पंखों तक मात्रा में देवे । दूध और अन्न खानेवाले को औषध कल्क की,
बेर की गुठली के बराबर मात्रा देवे । अन्न खानेवाले को बेर बराबर मात्रा देवे ।
वक्तव्य—प्रथमे मासि जातस्य शिशोर्भोजरुक्तिः । अव-लेक्षा तु कर्तव्या मधुक्षीरसितायुतैः ॥ एकैको वर्षयेतावत् याव-त्सर्वस्वरो भवेत् । तदूर्ध्वं माषद्विद्विः स्याद् यावत् स्युः षोडशा-ब्दकाः ॥३८॥
येषां गदानां ये योगाः प्रवदयन्तेऽगदङ्कराः । तेषु तत्कल्कसंलिप्तौ पाययेत शिशुं स्तनौ ॥३९॥
जिन जिन रोगों को नष्ट करनेवाले योग आगे कहे जायेंगे उन उन रोगों में उन उन योगों के कल्क से स्तनों पर लेप करके बच्चे को स्तन पिलाये ।
वि० मन्तव्य—जो ज्वर आदि नाशक औषध बड़ी आयु-वालों को दिये जाते हैं, वे ही बालक को देवे, परन्तु उनकी मात्रा न्यून हो, अथच यथासम्भव उनके लिये मृदु, मधुर, लघु एवं शीत औषधों का चुनाव करे ॥३९॥
एकं द्वे त्रणि चाहानि वातपित्तकफज्वरे । स्तन्यपायाहितं सर्पिरितराभ्यां यथार्थतः ॥४०॥
न च तृष्णाभयाद्भ्रत पाययेत शिशुं स्तनौ । विरेकवस्तिवमनान्युते कुर्याच्च नात्ययात् ॥४१॥
स्तनपायी शिशु को ज्वर में क्रमशः वातज्वर में एक दिन, पित्तज्वर में दो दिन और कफज्वर में तीन दिन घृत न देवे । क्षीरान्नभोजी को और अन्नभोजी को जैसा उचित समझे, वैसा करे । बच्चे को प्यास लगी है, इस थोड़े में बार-बार स्तन न देवे । बिना जलरत के बच्चे को वमन, विरेचन या वस्ति न देवे ।
वक्तव्य—घी बच्चे को सदा देना चाहिये, योग्य मात्रा में ऐसा पता लगाता है । इससे यह नियम ज्वर के लिये अपवाद रूप दिया है । बच्चे को रोता देवकर चुग कराने के लिये बार बार स्तन सुख में देना हानिकारक है । एरण्ड तेल का विरे-चन के लिये उपयोग प्रायः करते रहना ठीक नहीं है । इन साधारण बातों का यहाँ निर्देश है ।
वि० मन्तव्य—आवश्यकतानुसार लंघन आदि को व्यवस्था भी करे । यथा आमाशय विकारों में लंघन और हृस्वडस्वा (श्वास) में वमन एवं विरेचन आवश्यक होता है ॥४०,४१॥
मस्तुलुङ्गभ्याद्यस्य वायुस्तात्वस्थि नामयेत् । तस्य तुद्वैऋयुक्तस्य सर्पिमधुरकैः श्रुतम् ॥४२॥
पानाभ्यञ्जनयोग्येभ्यं शोताम्बूद्देजनं तथा । मस्तुलुंग के क्षय के कारण वायु तात्वस्थि को मुका देती है । तब बच्चे को प्यास लगती है, और चेहरा गरीब दीखता है । इसमें काकोल्यादि गण से विद्व घृत का पान
३६०
मुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
और अभयंग में उपयोग करे । शीतल पानी के सेवन से बच्चे को उद्देजित करे ।
वि० मन्तव्य—शिशु के शिर की कपालस्थियाँ अधूरी होने के कारण ब्रह्मरन्ध्र पर केवल त्वचा का ही आवरण होता है और वहाँ स्पर्श करने पर धमन प्रतीत होता है तथा वह स्थल पिलपिला रहता है । यदि किसी कारण से मेजा या मस्तु-लुङ्ग का क्षय हो जाता है तो वहाँ वह स्थल निम्न-दबा हुआ हो जाता है । इसी को ताजुपात कहते हैं, इस पर सर्वदा नवनीत का पिचु धरा जाता है, और धरना चाहिये । शीतल जल के छोटे मारने से शिशु ज्योंही “हूलभसी” लेता है, त्योंही निम्नता दूर हो जाती है, परन्तु तब जब कि मस्तुलुङ्ग पिण्ड खिसकने से ताजु पात होता है । यदि क्षय से होता है तब नवनीत का पिचु धरने से लाभ होता है ॥४२॥
वातेनाध्मापितां नाभि सरुजां तुण्डिसंज्ञिताम् ॥४३॥
माहृतघ्नैः प्रशमयेत् स्नेहस्वेदोपनाह्नैः ।
गुदापाके तु बालानां पिस्तघ्नीं कारयेत् क्रियाम् ।
रसाञ्जनं विशेषेण पानलेपनयोर्हितम् ॥४४॥
वायु से नाभि फूल जाये और उसमें वेदना हो तो इसको तुण्डिनाभि कहते हैं । इसमें वात नाशक स्नेहन स्वेदन, उपनाह बांधकर चिकित्सा करे । बच्चों के गुदा पाक में पिस्तनाशक चिकित्सा करे । विशेष करके रसौत का पान, और लेप में व्यवहार करे ।
वि० मन्तव्य—नालच्छेदन के समय खिच जाने से अथवा उसके पश्चात् नालखण्ड खिचकर समय के पूर्व दूर जाने से “तुण्ड” नामक व्याधि हो जाती है, इसमें नाभि की गम्भीरता नहीं रहती है । पितातिसार आदि में अथवा पिप्तप्रकोप से—मुखपाक के समान भी हो जाता है और कभी कभी गुदभ्रंश भी । इससे गुदवलियाँ हो जाती हैं, गुद में गिनामा हो जाता है ॥
क्षीरहाराय सर्पिः पाययेत् सिद्धार्थकवचामांसीपय- स्यापामार्गश्रुतावरीसारिवाब्राह्मोपिप्पळीहरिद्राकुष्ठसैन्ध- वसिद्धं, क्षीरान्नादाय मधुकवचपिप्पळीचित्रकत्रिफला- सिद्धम्, अन्नादाय द्विपञ्चमूलोक्षीरतगरभद्रारुमरिचमधु- कबिडङ्गद्राक्षद्रिद्राक्षोसिद्धं, तेनारोग्यवल्लमेधायुषि शिशो- भंवनति ॥४५॥
स्तनपायी शिशु को—सरसों, बच, जटामांसी, बिदारी, चिरचिटा, शतावरी, सारिवा, ब्राह्मी, पिप्पळी, हल्दी कूठ और सैन्धव से सिद्ध घृत पिलाये । दूध और अन्नभोजी शिशु को—मुलेहटी, बच, चिवक, पिप्पळी, त्रिफला से सिद्ध किया घृत देवे । अन्नभोजी शिशुको—दशमूल, दूध, तगर, देवदारु, मरिच, मुलेहटी, वायविङ्ग, द्राक्षा, दोनों ब्राह्मी से सिद्ध घी देवे । इनसे बच्चे में नीरोगता, बळ, मेधा और आयु बढ़वे है ॥४५॥
बालं पुनर्गार्त्रमुखं गृह्णीयात्, न चैनं तर्जयेत्, सहसा न प्रतिबोधयेद्वित्रासभयात् सहसा नापहरेदुत्क्षिपेद्वा वातादिविघातभयात्, नोपवेगयेत्, कौड्यभयात्, नित्यं चैनमनुवर्तत प्रियअतैरजिघासुः, एवमविहतमना ह्यभि- वर्धते नित्यमुदप्रसन्त्वसंपन्ना नीरोगः सुप्रसन्नमनाश्च भवति । वातातपविघ्नप्रभापादपल्लताशून्यागारनिम्नस्था- नग्रहच्छायादिभ्यो दुर्ग्रहोपसर्गतश्च बालं रत्नेन ॥४६॥
नाशुचौ विस्मृजेद्बालं नाकाशे विषमे न च ।
नोष्ममाहृतवर्षेषु रजोधूमोदकेषु च ॥४७॥
बालक को इस प्रकार उठाये, जिससे उसके अंगों में तक- लोक न हो (अस्थि आदि न उतरे) । इसको कभी धमकायेँ नहीं । कभी भी एक दम से न जगायेँ क्योंकि बच्चा डर जाता है । बालक को एक दम दूसरों से खींच कर न लें, न इसको ऊपर उछालें, इससे वात आदि दोषों के कोप का भय रहता है । जल्दी विठाना आरम्भ न करे, कुबड़ा होने के डर से । हानि न करनेवाली प्रिय बातों से सदा इसका मन प्रसन्न रखे इस प्रकार करने से बालक सदा प्रसन्न रहकर बढ़ता है, बलिष्ठ नीरोग और सुप्रसन्न रहता है । इसे उत्तम सत्त्व प्राप्त होता है । वायु, धूप, त्रिजली, प्रभा (चमक), वृक्ष, लता, खाली घर, गड़दे आदि नीचे स्थान, ग्रहों की छाया तथा डूरे ग्रहों के उप- द्रवों से बालक की रक्षा करे । गन्दे स्थान में आकाश में, ऊँची नीची जगह पर, गरमी, वायु, वर्षा में, धूल, धूम पानी में बच्चे को न छोड़े ।
न ह्यस्य वित्रासनं साधु । तस्मात्तस्मिन् रुदत्यमुञ्जाने वाडन्यत्र वा विषेयतामार्गच्छति, राक्षसपिशाचपूतनाथानां नामानि चाहयता कुमारस्य वित्रासनार्थं नामग्रहणं न कार्यं स्यात् ॥ चरक शा० अ० ८-६८ ॥४६,४८॥
क्षीरसात्न्यतया क्षीरमाजं गन्धमथापि वा ।
दद्यादास्तन्यपर्याप्तैर्बालानां वीक्ष्य मात्रया ॥४८॥
बालक को दूध सात्न्य जानकर उसे बकरी या गाय का दूध, माता का दूध पर्याप्त न होने पर योग्य मात्रा में देना चाहिये ।
वि० मन्तव्य—यदि धात्री का दूध पर्याप्त न हो तो बकरी का, वह न मिले तो गो का दूध देना चाहिये । परन्तु ये दूध उष्ण करके पिलाए जायें, आवश्यकता हो तो कुछ जल मिलाकर, उष्ण करके दिये जायें । एक ही गो अथवा बकरी का दूध देना चाहिये ॥४८॥
षण्मासं चैनमननं प्रागयेच्छु द्वितं च ॥४९॥
छठे महीने में (जब दांत निकलते हैं) इस बालक को लघु और द्वितकर अन्न देवे ।
अ० १० ] ४६
शारीरस्थानम्
३६१
वि० मन्तव्य—अन्न प्राशन का विधान छठे मास में अवश्य है, परन्तु यदि १-२ या ३-४ मास टाल दिया जाय तो और उत्तम है, और उचित तो यह है, कि जब तक दन्तोद्भव न हो या पूर्णरूप से दन्त न आएँ तब तक अन्न का प्राशन न किया जाय अथवा अत्यन्त थोड़ा किया जाय, शीघ्र अन्न देने से—शिशु का उदर बढ़ जाता है और अनेक वाधाएँ भी होने लगती हैं। और जब अन्न खाने लग जाता है, तब उसे रोकना अथवा थोड़ा खाने के लिए बाध्य करना बहुत ही कठिन है, अथवा असम्भव है। बड़ी बुद्धियों का विचार है कि जब तक जननी पुनः गर्भवती न हो तब तक अन्न देना ही न चाहिये, जितना ही अधिक दिनों में माता का दूध अथवा अपर्याप्त होने के कारण बकरी अथवा गौ का दूध दिया जाता है बालक उतना ही पुष्ट एवं स्वस्थ होता है और जीवन भर स्वस्थ रहता है। माता के गर्भवती होने पर भी माता का दूध बुझाकर बकरी का दूध यथासम्भव ३-५ वर्ष तक दिया जाय तो अत्युत्तम है। देखा जाता है कि जिन अभागों को थोड़े दिन दूध मिलता है अथवा शीघ्र अन्न देना प्रारम्भ कर दिया जाता है वे जीवन भर दुबले-पतले तथा अस्वस्थ रहते हैं ॥ ४६ ॥
नित्यमवरोधरतश्च स्यात् कृतरक्ष उपसर्गभ्यात्; प्रयत्नतश्च प्रहोपसर्गभ्यो रक्ष्या बाला भवन्ति ॥५०॥
बालक को सदा अवरोध में (अन्तःपुर में) रखले, उपसर्ग (गिरता आदि) भय से उसको बचाये। ग्रहों के उपद्रवों से बालक की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये।
वि० मन्तव्य—बालक के संरक्षण में सर्वदा सावधान रहना परमावश्यक है, वे संसार रूपी वाटिका के कोमल, सुगन्धित एवं मनोहर पुष्प हैं ॥ ५० ॥
अथ कुमार उद्भिजते त्रस्यति रोदिति नष्टसंज्ञो भवति नखदशनैर्धात्रीमात्मानं च परिणदति दन्तान् खादति कूजति जूम्भते भुवौ विक्षिपत्यूर्ध्वं निरीक्षते फेनमुद्भवति सन्दृष्टोऽक्रूरं भिन्नवर्चा दीनार्तस्वरो निशि जागर्ति दुर्बलो स्नानाङ्गो मत्स्यच्छुच्छुन्दरिमत्कुणगन्धो यथा पुरा पाञ्चाः स्तन्यमभिलषति तथा नाभिलषतीति सामान्येन प्रहोपसृष्टलक्षणमुक्तं, विस्तरेणोत्तरे वक्ष्यामः ॥५१॥
बालक उद्भिन हो जाता है, डरता है, रोता है, बेहोश हो जाता है। नख दांतों से घात्री को और अपने को नोचता, काटता है। दांतों को कटकाटा है कराहता है, जम्भाई लेता है, भुवों को ऊपर चढ़ाता है, ऊपर को देखता है, मुख से क्षाग फेंकता है। ओठों को काटता है। देखने में भयानक पतला-आम सल आता है, स्वर-दीन और पीड़ित होता है, रात को
सोता नहीं, दुर्बल, मलिन अंगों का, शरीर से मलली, छुल्लुन्दर, खटमल की गन्ध आती है, पहले जिस प्रकार घात्री के दूध को चाहता था, वैसा अब नहीं चाहता, ग्रहों से आक्रान्त शिशु के ये सामान्य लक्षण हैं, विशेष लक्षणों को उत्तर तंत्र में कहेंगे ॥
अक्तिमन्तं चैनं ज्ञात्वा यथावर्णं विद्यां प्राहयेत् ॥५२॥ बालक के शक्तिमान् होने पर वर्ण के अनुसार उसको विद्या पढ़ाये ॥५२॥
अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय षोडशदशवर्षा पत्नीमा-वहेत् पित्र्यधर्मार्थकामप्रजाः प्राप्स्यतीति ॥५३॥
विद्याध्ययन करने पर जब आयु पन्चीस वर्ष की हो जाये तब सोलह साल की कन्या से इसका विवाह करवा दे। जिससे कि यह पितृभ्रूण, धर्म, अर्थ काम और प्रजा को प्राप्त करे।
वक्तव्य—क्योंकि कहा है कि बिना संतान के स्वर्ग नहीं मिलता।
वि० मन्तव्य—पन्चीस वर्ष का पुरुष और १६ वर्ष की स्त्री पूर्णरूप से बलवीर्य युक्त हो जाते हैं तभी उनका विवाह होना चाहिये। इस प्रकार वे दोनों—पित्र्य-माता पिता-सास स्वसुर आदि बड़ों की सेवा कर सकते हैं, और उनके और्ध्व-दैहिक-श्राद्धादि कृत्य कर सकते हैं, धर्म-यज्ञ दान आदि एवं अपने धारण पोषण में समर्थ हो सकते हैं, अर्थ—धन कमाने के उपाय कर सकते हैं, काम-शारीरिक एवं मानसिक सुखों का लाभ और उपभोग कर सकते हैं और उत्तम सन्तान का उत्पादन कर सकते हैं और इसके विपरीत छोटी आयु में विवाह करने से उक्त सुखों का पूर्ण लाभ भी नहीं होता और भी वे दुःखी अथवा रोगी बने रहते हैं। आयु के उक्त २५ तथा १६ वर्षों का निर्देश उपलक्षण मात्र है, अतः—कोई पुरुष २० वर्ष की आयु में पूर्ण यौवन प्राप्त कर लेता है, और कोई ३० वर्ष में प्राप्त करता है, अत एवं-अद्याङ्गसंग्रह में-२१ वर्ष, शाङ्गधर में २० वर्ष और मनुस्मृति में ३० वर्ष की आयु में विवाह का विधान किया गया है। परन्तु नारी का सोलह १६ वर्ष के पूर्व विवाह होना ही नहीं चाहिये, भलेही कोई कुछ कहें। वाग्भट के शब्दों में—पूर्णाषोडशवर्षा स्त्री पूर्णविशेष संयुता। शुद्ध गर्भाशये मार्गं रक्ते शुक्रेऽनिले हृदि। वीर्यवन्तं सुतं सृते, ततो न्यूनान्दयोः पुनः। रोगी अल्पायुः अधन्यो वा गर्भो भवति नेव वा। अ० ह० अ० १ ॥५३॥
ऊनषोडशवर्षीयामप्राप्तः पञ्चविंशतिम्। यथाधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥५४॥ जातो वा न चिरं जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः। तस्माद्व्यन्तबालार्थां गर्भाधानं न कारयेत् ॥५५॥ पन्चीस वर्ष की आयु से कम आयु का पुरुष सोलह साल से कम आयु की कन्या में यदि गर्भाधान करता है, तो गर्भ
३६२
मुभुतसंहिता
[ ४०-१० ]
उदर में ही मर जाता है। यदि किसी प्रकार उत्पन्न हो जाये तो वह देर तक नहीं जीता। यदि किसी प्रकार जीवित रह जाये तो निर्बल इन्द्रियोवाला होता है। इसलिये अत्यन्त छोटी आयु की कन्या में गर्भाधान न करे।
इसीसे संग्रह में कहा है—पुमानेकविशतिवर्षः कन्यां द्वादशवर्षदेशीयाम्...उद्वहेत्। तस्यां षोडशवर्षीयायां पञ्चविशतिवर्षः पुरुषः पुत्रार्थं यतेत, तदा तो प्रातवीर्यो वीर्योन्निवर्त अवश्यं जनयतः॥
वि० सन्तव्य—१६ वर्ष से नीचे नारी को गर्भाधान हो जाने से सन्तान की हानि तो होती ही है, नारी को भी अनेक कष्ट फेलने पड़ते हैं, और जीवन भर के लिये रोगिणी बनकर जीना पड़ता है। उसके साथ २ पति देवता भी पत्नी एवं सन्तान के कष्टों से व्याकुल बने रहते हैं ॥५४, ५५॥
अतिबुद्धायां दीर्घरोगिण्यासन्येन वा विकारोणोपसृष्टायां गर्भाधानं नैव कुर्वीत। पुरुषस्याप्येवंविधस्थं त एव दोषाः संभवन्ति ॥५६॥
अति बूढ़ी, चिरकालीन रुग्ण, अथवा किसी अन्य रोग से पीड़ित स्त्री में गर्भाधान न करे। इसी प्रकार के व रुग्ण पुमान् में भी यही दोष होते हैं। ( अर्थात् गर्भ उदर में मर जाता है )।
वि० सन्तव्य—अतिबुद्धा-५० वर्ष के पश्चात् भी कभी २ गर्भाधान हो जाता है, परन्तु वह गर्भ उत्तम गुण सम्पन्न नहीं होता। दीर्घरोगिणी—कुछ अर्थ आदि लम्बे रोगोंवाली स्त्री की सन्तान भी अर्थ आदि से उपद्रुत होती है, अथवा जीर्ण ज्वर-यक्ष्मा, श्वास आदि रोगों से पीड़िता को प्रसव काल में मृत्यु आदि का भय हो सकता है और सन्तान भी रोगयुक्त, अपृष्ठ तथा निर्गुण होती है। अन्येन वा विकारोण-उपदंश आदि योनि रोगों से उपद्रुत नारी में भी गर्भाधान करने से लाभ के स्थान में हानि ही होती है। इसी प्रकार के पुमान् भी इस योग्य नहीं होते कि वे गर्भाधान करें अन्यथा वेही हानियाँ होती हैं, जो नारी के लिये कही गई हैं ॥५६॥
तत्र पूर्वोक्तैः कारणैः पतिष्यति गर्भं गर्भोऽशयकटीवं-क्षणवस्तिशुलानि रक्तदुर्जनं च। तत्र औतैः परिषेका-वगाहप्रदेहादिभिरुपचरेउजीवनीयश्रुतस्त्रीरपानेन्द्र। गर्भ-स्फुरणे मुहुर्मुहुस्तस्मन्धारणार्थं स्त्रीरमुत्पलादिसिद्धं पाय-येत्। प्रसंसमाने सदाहपाश्चैर्पृष्ठशुलास्तुरदानाहमूत्रसङ्घाः, स्थानात् स्थानं च प्रकासति गर्भं कोष्ठे संरम्भः, तत्र स्निग्धशीताः क्रियाः। वेदनायां महासहाह्नुदसहासमुधु-कश्चद्वृत्पाकण्टकारिकासिद्धं पयः शर्कराश्रोदसिन्धुं पाययेत्, मूत्रसङ्घं दुर्भादिसिद्धम्, आनाहे हिङ्गुसौवर्चल्लजुनव-र्चासिद्धम्। अत्यर्थं स्रवति रक्तं कोष्ठागारिकागारमृत्पि-ण्डसमङ्गाघातकीकुपुमनवमालिकागैरिकसज्जरसरसाञ्जन-
चूर्णं मधुनाऽवल्लिहात्, यथालार्भं न्यग्रोधादिवस्वक्प्रवाह-कलकं वा पयसा पाययेत्, उत्पलादिकलकं वा कश्चैरुद्गाटकशालूककलकं वा श्रुतेन पयसा, उदुम्बर-फलौदककन्दकवाथेन वा शर्करामधुमधुरेण गालिपिष्टं, न्यग्रोधादिवस्वरसपरिपीतं वा वस्त्रावयवं योन्यां धारयेत्। अथाष्टशोणितवेदनायां मधुकरैवदारु-मञ्जिष्ठापयस्यासिद्धं पयः पाययेत्। तदेवाश्रमन्तकशता-वरीपयस्यासिद्धं विदारिगन्धादिसिद्धं वा वृहतीद्वयोरुप-ल्लक्षतावरीसारिवापयस्यामधुकसिद्धं वा, एवमुपक्रान्तया उपावर्तन्ते, सजो गर्भश्चाप्यायते। व्यवस्थिते च गर्भे गन्धेनोदुम्बरजलादुसिद्धेन पयसा भोजयेत्।
अतीते लक्षणस्तेहवध्यांभिर्यवाग्भिरुद्गलकादीनां पाचनीयोपसंस्कृताभिरुपक्रमेत् यावन्तो मासा गर्भस्य तावन्त्यहानि। वस्त्युदरशुल्लेषु पुराणगुद्दे दीपनीय-संयुक्तं पाययेदरिष्टं वा। वातोपद्रवगृहीतत्वात् क्षोतसां द्योयते गर्भः, सोऽतिकालमवतिष्ठमानो व्यापद्यते, तां मृदुना स्नेहादिकमेणेपचरेत्, उक्तो-शरससंसिद्धान्नलपस्नेहां यवाग् पाययेत्, माषतिल-बिल्वशलादुसिद्धान्नं वा कुल्माषान् भक्षयेन्मधुमाध्वीकं-चानुपिषेत् सप्तरात्रम्। कालातीतस्थायिनि गर्भे विशेषतः सधान्यमुदूखलं मुसलेनाभिहन्त्याद्विषमे वा यानासने सेवेत्। वाताभिपन्न एव जुष्यति गर्भः, स मातुः कृषि न पूरयति मन्दं स्पन्दते च, तं वृद्धीण्यैः पयोभिर्मांसरसैरुपचरेत्। शुक्रशोणितं वायुनाऽभिप-पन्नमवक्रान्तजीवमाध्मापयत्युदरं, तं कदाचिवाह्नछ्योप-शान्तं नैगमेवापहृतमिति भाषन्ते, तमेव कदाचित् प्रळीयमानं नागोदरमित्याहुः, तत्रापि लीनवत् प्रतीकारः ॥५७॥
गर्भावकति अध्यायं में कहे तथा मूद्रगर्भ निदान में कहे कारणों से गर्भ के गिरते समय गर्भाशय-कटिबंध-गर्भ में शूल होता है। रक्त दिखाई देता है। इसमें शीतस्पर्श, शीतवीर्य औषधियों से परिषेक, अवगाहन, प्रदेह आदि करते। जीवनीय गुण से सिद्ध किया दूध पीने को देवे। गर्भ के स्फुरण होने में उसको रोकने के लिए उत्पलादि गुण से सिद्ध किया दूध बार-बार पीने को देवे। गर्भ के बढ़ने के समय जलन, पाश्चैर्शूल, पृष्ठशूल, रक्त प्रदर, आनाह, मूत्र का अवरोध होता है। गर्भ के एक स्थान से दूसरे स्थान पर खिसका आने पर कोष्ठ में शोथ होती है, इसमें स्निग्ध शीतल उपचार करें। वेदना होने पर मुद्रागर्णी, मुलेहटी, गोखरू, कटरी से सिद्ध किये दूध में शर्करा और मधु मिलाकर पिलाये। मूत्र के अवरोध में पंचतृणमूल से सिद्ध दूध देवे। आनाह में हींग, संवल, कडुन
न० १० ]
गारीरस्थानम्
३६३
और बचा से सिद्ध दूध देवे । रक्त के बहुत अधिक बहने पर कोष्ठगारिका ( दिवारों में जो कीड़ा मिट्टी का घर बनाता है ) नामक जन्तु के घर की मिट्टी, मजीठ, धाय के फूल, वनमालिका, गेरु, राळ, रसोत इनका चूर्ण मधु से चढ़ाये । बरगद आदि क्षीर वृक्षों की छाल या कोमल पत्ते जो मिल सकें उनको पीसकर दूध से पिठाये । उत्प्लादि गण के कल्क को पीसकर दूध के साथ देवे । कसेरू, विषाड़ा, कमलकन्द, इनके कल्क को गरम किये दूध से देवे । गुलूर के फल, पानी के कन्द इनके क्वाथ में शर्करा और मधु मिलाकर इससे चावलों को पीसकर देवे । बरगद आदि के क्वाथ में मिंगोये वृक्ष के टुकड़े को योनि में रखे । यदि न दिखाई देने पर वेदना हो मुलहठी, देवदारू, मजीठ, विदारी से सिद्ध दूध पिलाये । अथवा अश्मन्तक, शतावरी, विदारी से या शालपर्णी आदिगण से सिद्ध दूध पिलाये । कटेरी, बड़ी कटेरी, कमल, शतावरी, सारिवा, विदारी और मुलहठी से सिद्ध दूध देवे । इस प्रकार करने से वेदनार्थ शान्त होती हैं, और गर्भ पुष्ट होता है । गर्भ के स्थिर हो जाने पर गुलूर के कच्चे फलों से सिद्धकिये गाय के दूध से भोजन देवे । गर्भपात हो जाने पर लवण और स्नेहों से रक्षित उद्हाल्क ( कोदो ) से बनाई यवागू को पाचनीय (पञ्चकोल आदि) द्रव्यों से मिलाकर, जितने मास का गर्भ पात हुआ हो, उतने दिनों तक पिलाये । वस्ति में शूल होने पर दीपनीय द्रव्यों से युक्त पुराना गुड या अरिष्ट देवे । वायु के उपद्रवों के कारण गर्भ छोतों में छिपा रहता है, फिर वहाँ बहुत दिन रहने पर मर जाता है, इसमें मृदु स्नेहन आदि विधि से चिकित्सा करे ।
उत्कोश—( कुरर ) के मांस रस में बनाई यवागू में प्रचुर पी डालकर पिलाये । उड्डद, तिल, कच्चे बिल्वफल से सिद्ध किये कुलमाषों ( अर्ध स्वित्तु गेहूँ या जौ ) को खाये । मधु मद्य माध्वीक मद्य पीछे से पीये । इस प्रकार सात दिन करे । समय ( प्रसव समय तथा ६ या १० मास ) के बीत जाने पर भी स्थिर रहे । गर्भ में—ऊखल में धान्य डालकर मुसल से कूटे । विषम सवारी या आसन ( स्थिता ) को बरते । वायु से पीड़ित गर्भ सूख जाता है; यह गर्भ माता की कोख को पूरा नहीं भरता और धीमे से गति करता है । इस गर्भ की बृंहणीय द्रव्यों से सिद्ध दूध से और मांस रस से चिकित्सा करे । शुक्र और आर्तव के वायु से आक्रान्त होने पर जीवात्मा का अवतरण हो जाने पर उदर फूलता है, यह गर्भ जब कभी बिना किसी कारण के हो शान्त हो जाता है ( बैठ जाता है या मर जाता है ), तब इसको नेगमेघ ने ले लिया है, ऐसा कहते हैं । यही गर्भ जब भी छिपा रहता है, तब इसको नागोदर कहते हैं, इसमें भी लीनगर्भ की भाँति चिकित्सा करे ।
वक्तव्य—“पुष्पदर्शनादेवेनां मृयात्—शयनं तावन्मृदु-सुखशिशिरास्तरणसंस्तीर्णमोषदवनतशिरस्कं प्रतिपश्यतेति । ततो यथीमधुकरसर्पिभ्यां परमशिशिरेवारिंसंस्थिताभ्यां पितृमाच्छान्यो-पश्यसमोपे स्थापयेत् । तथा शतवौतसहस्रवौताभ्यां सर्पिभ्यांमधो नामेः सर्वतः प्रदिद्यात् ॥ ( २ ) यस्याः पुनरुष्णतीर्णोपयोगाद् गर्भिण्या महति गर्भे जातसारे पुष्पदर्शनं स्यात् अन्यो वा योनि-खाद्यः तस्याः गर्भो बृद्धिं न प्राप्नोति, निःसृतत्वात् । सकालमव-तिष्ठतेऽतिमात्रम् । तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित् । उपवासव्रत-कर्मपरायाः, पुनः कदाहारायाः स्नेहद्वेषिण्या वातप्रकोपणोक्ता-न्यासेवमानाया गर्भो न बृद्धिं प्राप्नोति, परिशुष्कत्वात् । स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रम् । तन्नागोदरमित्याचक्षते” ॥ चरक० ॥
जैसे गान्धारी का गर्भ समय के बहुत पीछे तक प्रसव नहीं हुआ था—फिर उसने गुस्से में उसे निकाल दिया था । जिस को महर्षि व्यास ने फिर बाहर रखकर पाठा था । ( ३ ) गर्भ नष्ट होना—
असृङ्ग निरुद्धं पवनेन नायाः
गर्भं व्यवस्यन्त्यबुधाः कदाचित् ।
तदनिनसूर्यश्रमशोकोर्गैः
उष्णान्नपानैरथवा प्रवृत्तम् ॥
दृष्ट्वासूगेवं न च गर्भसंज्ञं
केचिन्नरा भूतद्वतं वदन्ति ॥ चरक ॥
दूध पाक का नियम—
द्रव्यादष्टगुणं क्षीरं क्षीराचोथं चतुर्गुणम् ।
क्षीरावशेषः कर्तव्यः क्षीरपाके स्वयं विधिः ॥ ५७ ॥
अत ऊर्ध्वं मासानुमासिकं वक्ष्यामः—॥ ५८ ॥
मधुर्कं शाकबीजं च पयस्या सुरदारु च ।
अश्मन्तकस्तिलाः कृष्णास्ताम्रवज्रौ शतावरी ॥ ५९ ॥
वृक्षादनी पयस्या च लता सौपलसारिवा ।
अनन्ता सारिवा रास्ता पद्मा मधुकमेव च ॥ ६० ॥
बृहत्स्यो कारमरी चापि क्षीरयुक्तास्त्वच्चो घृतम् ।
पृथिनपर्णी बला शिम्भः श्वदृष्टा मधुपर्णिका ॥ ६१ ॥
शृंगाटकं बिसं द्राक्षा कशेरु मधुर्कं सिता ।
वत्सैते सम योगाः स्युरधरंश्लोकसमापनाः ॥
यथासंख्यं प्रयोक्तव्या गर्भच्छावे पयोयुताः ॥ ६२ ॥
इसके पश्चात् प्रत्येक मास में देने योग्य औषधियाँ कहते हैं । मुलहठी, सागोन के बीज, विदारी और देवदारू, पहले महीने में; अश्मन्तक, तिल, पिप्ली, मजीठ और शतावर, दूसरे मास में; वोदा, विदारी, प्रियंगु, कमलगट्टा, और अनन्त-मूल, तीसरे महीने में; अनन्ता (डुवों या डुरालभा), सारिवा, रास्ता, भागी, और मुलहठी, चौथे मास में । कटेरी, बड़ीकटेरी,
३६४
शारीरस्थानम्
[ अ० १० ]
गम्भारी, बरगद आदि क्षीर वृक्षों के कोमले पत्ते और छाल, घृत, इनको पाँचवें मास में । पृश्निपर्णी, बला, सहजन, गोखरु और गिलोय छठे मास में । सिंधाड़ा, विस, द्राक्षा, कसेरु, मुल्हठी और मिश्री सातवें मास में, प्रत्येक मास में दूध के साथ इनको देवे । ये सात योग आधे श्लोक में कहे गये हैं । गर्भ खाव में क्रमशः दूध के साथ इनको बरतना चाहिये ॥
कपित्थवृहतीबिल्वपटोलेलुनिदिग्धिकाः ।
मूलानि क्षीरसिद्धानि पाययेद्विषगृहमे ॥ ६३ ॥
नवमे मधुकानन्तापयस्यासारिवाः पिवेत ।
क्षीरं शुण्टीपयस्याभ्यां सिद्धं स्यादशमे हितम् ॥ ६४ ॥
सखीरा वा हिता शुण्टी मधुकं सुरदारु च ।
एवमाप्यायते गर्भस्तीव्रा रुक् चोपशाम्यति ॥ ६५ ॥
आठवें मास में—कैय, बड़ी कटेरी, बेल, परवर, ईख, छोटी कटेरी, की जड़ से सिद्ध किया दूध देवे । नवम मास में—मुल्हठी, दूवा, क्षीर विदारी और अतन्त मूल से सिद्ध दूध पीये । दसवें मास में—सोठ और क्षीरकाकोली से सिद्ध किया दूध देना चाहिये । अथवा सोठ, मुल्हठी, देवदारु से सिद्ध किया दूध देवे । इस प्रकार से गर्भ पृष्ठ होता है, और तीव्र वेदना शान्त होती है ॥ ६३-६५ ॥
निवृत्तप्रसवायास्तु पुनः षड्भ्यो वर्षभ्य ऊर्ध्वं प्रसव-मानायां नार्याः कुमारोऽल्पयुर्भवति ॥ ६६ ॥
प्रसव निवृत्ति के पीछे यदि छः साल के ऊपर प्रसूति हो तो बालक अल्पायु होता है ।
वक्तव्य—गर्भाशय या योनि दोष के कारण ही प्रसव-या गर्भाधान होना रुकता है । इनकी चिकित्सा न करने पर यदि आहार-विहार के कारण अचानक गर्भ रहकर प्रसव होता है, तो वह अल्पायु होता है ।
वि० मन्तव्य—किसी २ को १५-२० वर्ष पश्चात् सन्तान होती है या होनी प्रारम्भ हो जाती है ॥ ६६ ॥
अथ गर्भिणी व्याध्युत्पत्तावत्यये छद्वेयेन्मधुरास्लेनात्रो-पहितेनानुलोमयेच्छ, संक्रमनीयं च मृदु विदध्यादनपानयोः, अन्नीयाच्च मृदुवोयं मधुरप्रायं गर्भाविरुद्धं च, गर्भाविरुद्धाच्च क्रिया यथायोगं विदधीत मृदुप्रायाः ॥ ६७ ॥
गर्भवती स्त्री को यदि कोई महान् भयानक रोग उत्पन्न हो जाय तो मधुर-अम्ल अन्न के साथ वमन करे और मधुर-अम्ल अन्न से उसे अनुलोमन कराये । संशमनीय चिकित्सा करे । खान पान में नरम वस्तु देवे । मृदुवीर्य, प्रायः करके मधुर, गर्भ के लिये अविरोधि भोजन करे । गर्भ के अपतिकूल एवं कोमल जो योग्य क्रियायें—उपचार हों, उनको बरते ।
वि० मन्तव्य—सामान्यतः गर्भिणी को वमन विरेचन का निषेध है, तथापि अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर करना चाहिये, यथा—अलसक विलम्बिका आदि विषविकारों में तथा कफजनित विकारों में—वमन तथा पित्तज विकारों में एवं पुरीषरोध आदि में विरेचन आवश्यक होता है ॥ ६७ ॥
सौवर्णं सुकृतं चूर्णं कुष्ठं मधु घृतं वचा ।
मत्स्याक्षकः शंखपुष्पी मधु सर्पिः सकाच्छनम् ॥ ६८ ॥
अर्कपुष्पी मधु घृतं चूर्णितं कनकं वचा ।
हेमचूर्णाणि कैडर्यः श्वेता दूर्वा घृतं मधु ॥ ६९ ॥
चत्वारोऽभिहिताः प्राशाः श्लोकाधृषु चतुष्वर्षि ।
कुमारार्णां वपुर्मधाबलवृद्धिविवर्धनाः ॥ ७० ॥
इति भगवता श्रीधन्वन्तरिगोपदिष्टायां तच्छिष्येण
महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां
तृतीयं शारीरस्थानं समाप्तम् ॥ ३ ॥
( १ ) सुवर्णं भरम, कूठ, मधु घृत और वच इनका उत्तम चूर्ण, ( २ ) ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मधु, घी और सुवर्णभरम, ( ३ ) अर्कपुष्पी, मधु, घी, सुवर्ण भरम और वच, ( ४ ) स्वर्ण भरम, वकायन, श्वेता ( अपराजिता ), दूर्वा, घी और मधु, ये चार प्राश आधे श्लोकों से बताये गये हैं । ये योग बालकों के शरीर-मेधा, बल और बुद्धि को बढ़ाते हैं ।
वक्तव्य—कैडर्य का अर्थ गम्भारी उत्तम है । क्योंकि कहा भी है—
गर्भे शुष्के तु वातेन बालानां चापि शुष्यताम् ।
शिताकाश्मर्यमधुकैः, हितमुत्थापने पयः ॥ ६८ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भिणीव्याकरणं
शारीरं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
शारीरकोषुकानि
पंचविशतितत्वानि
२५ पुरुषः
१ अन्यकाम
२ महान्
३ अहंकार
वैकारिकः
( तेजससहायः )
१४ एकादशेन्द्रियाणि
तेजसः
भूतादिः
( तेजससहायः )
१६ पंचतन्मात्राणि
( पञ्चदुर्दोन्द्रियाणि उभयार्थकं मतः )
पञ्चकर्मैन्द्रियाणि
१. शब्दतन्मात्रम् २. स्पर्शतन्मात्रम् ३. रूपतन्मात्रम् ४. रसतन्मात्रम् ५. गन्धतन्मात्रम्
१. श्रोत्रम् २. त्वक् ३. चक्षुः
४. जिह्वा ५. प्राणम्
२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी
२५. उर्वी
विषयाः—शब्दः स्पर्शः
रसः, गन्धः
२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी
२५. उर्वी
रूपम्,
रसः, गन्धः
२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी
२५. उर्वी
विषयाः—वचनम् - आदानम्, आनन्दम्, विषयीः, विहरणम्
१. वाक् २. हस्तः ३. उपस्थम् ४. पायुः ५. पादः
२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी
२५. उर्वी
३६६
सुश्रुतसंहिता
त्वचां विभागाः
तस्य स्वरवेवंप्रवृत्तस्य ( भूतात्माधिष्ठितस्य ) त्वचः मु० शा० शुक्रशोणितस्याभिपच्यमानस्य वीरस्येव सन्तानिकाः सप्त त्वचो भवन्ति
| संख्या | नाम | कार्यक्रमम् | प्रमाणम् | अधिष्ठानम् |
|---|---|---|---|---|
| प्रथमा | अवभासिनी | सर्ववर्णानवभासयति | ||
| पंचविधां छायां | ||||
| च प्रकाशयति | ब्रीहेरष्टादशभागप्रमाणा | सिध्मपञ्चकटकौ | ||
| द्वितीया | लोहित्वा | ब्रीहिषोडशभागप्रमाणा | तिलकालकन्यच्छव्यंगानि | |
| तृतीया | श्वेता | ब्रीहिद्रादशभागप्रमाणा | चर्मदलम् अजगल्ली मशकः | |
| चतुर्थी | ताम्बा | ब्रीहेरष्टभागप्रमाणा | विविधकिलासकुष्ठानि | |
| पञ्चमी | वेदिनी | ब्रीहिर्पञ्चभागप्रमाणा | कुष्ठविसर्पौ | |
| षष्ठी | रोहिणी | ब्रीहिप्रमाणा | ग्रन्थिः, अपची, अर्मुदम्, रुली | |
| पदम्, गलगण्डम् | ||||
| सप्तमी | मांसधरा | ब्रीहिद्रयप्रमाणा | भगन्दरः, विद्रधिः अर्शः |
कलाः ( सप्त ) ( मु० शा० अ० ४.५. २३ )
धातवाशयान्तरमर्यादाः
| संख्या | नाम | अधिष्ठानम् | कार्यम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मांसधरा | मांसम् | यस्यां सिरास्त्राद्युधमनीक्षोतसां प्रताना भवन्ति । |
| द्वितीया | रक्तधरा | मांसस्य अभ्यन्तरतः | तस्यां शोणितं विशेषतश्च सिरासु यकृतस्त्रीहानश्च भवन्ति । |
| तृतीया | मेदोधरा | उदरस्थमण्वस्थिषु | |
| चतुर्थी | श्लेष्मधरा | सर्वसन्धिषु | स्नेहाभ्यक्तं यथा हृक्षचक्रं साधु प्रवर्तते संघयः साधु वर्तन्ते संरिलघाः श्लेष्माणः तथा । |
| पञ्चमी | पुरीषधरा | पक्वाशयस्था | या अन्तःकोष्ठे मलमभिभिभजत् यकृतसमन्तात् कोष्ठं च, तथाऽन्नाणि समाश्रिता (सा) उपद्रुकस्थं विभजते मलम् । |
| षष्ठी | पित्तधरा | पक्वामाशयमध्यस्था | या चतुर्विधमन्नपानमुपसुक्तमाशयात् प्रच्युतं पक्वाशयोः पस्थितं धारयति (पाकार्यम्) । |
| सप्तमी | शुक्रधरा | सर्वधारीरन्यापिनी | यथा पयसां सपिस्तु गृहं चेक्षी रसो यथा शरीरेषु तथा शुक्रं विद्यात् । |
शारीरस्थानम्
३६७
अस्थिसंख्याविवरणम्—१
| अस्थिनामानि | संप्रहे | चरके | सुश्रुते | प्रत्यक्षशारीरे |
|---|---|---|---|---|
| नखानि | २० | २० | न गणितानि | न गणितानि |
| अंगुल्यस्थीनि | ६० | ६० | ६० | ५६ |
| अंगुलिशलाकाः | २० | २० | { तलास्थीनि २० | |
| कूर्च-२० | ||||
| गुल्फयोः २० | २० | |||
| अंगुलिशलाकावन्धने | ४ | ४ | पादकूर्चेषु १४ | |
| अंगुलिशलाकाकूर्चास्थीनि | ८ | — | हस्तकूर्चेषु १६ = ३० | |
| गुल्फास्थीनि | ४ | ४ | २ | |
| मणिवन्धवास्थीनि | ४ | २ | २ | |
| पाण्यस्थीनि | २ | २ | — | |
| मणिवन्धौ | २ | — | ||
| — | — | जानुकपालिके २ | ४ | — |
| जंघास्थीनि | ४ | ४ | ४ | ४ |
| प्रकोष्ठास्थीनि | ४ | ४ | ४ | ४ |
| जान्वस्थीनि | २ | २ | २ | २ |
| कूर्चरी | २ | — | २ | — |
| ज्वरस्थीनि | २ | २ | २ | २ |
| प्रगण्डास्थीनि | २ | २ | २ | २ |
| पवम् शाखास्थीनि | ||||
| पश्चाः | १४० | १२८ | १२० | १२० |
| पशुकास्थालकानि | २४ | २४ | २४ | २४ |
| पशुकास्थालकावृदानि | २४ | २४ | २४ | — |
| पुष्टे | २४ | २४ | २४ | — |
| उरसि | ३० | ४५ | ३० | कशेदका २४ |
| भंगारिध | ८ | १४ | ८ | उरःफलम् १ |
| त्रिकास्थिनी | १ | १ | १ | — |
| नितंबास्थिनी | १ | — | १ | १ |
| अक्षकास्थिनी | २ | २ | २ | २ |
| अंघास्थिनी | २ | २ | — | २ |
| अंघफलकास्थिनी | २ | — | — | — |
| गुदास्थि | २ | २ | २ | २ |
| — | — | — | १ | १ |
| — | — | — | — | कण्ठास्थि १ |
| पवमन्तराघौ | १२० | १३८ | १७ | ५८ |
३६८
सुश्रुतसंहिता
अस्थिसंख्याविवरणम् (२)
| अस्थिनामानि | संप्रदे | चरके | सुश्रुते | प्रत्यक्षशारीरे |
|---|---|---|---|---|
| ग्रीवायाम् | १३ | १५ | ६ | पृष्ठवंशे |
| कंठनाड्याम् | ४ | — | ४ | गणितानि |
| हनुबन्धने | २ | २ | ३२ | ऊर्ध्वहनु |
| दन्ताः | ३२ | ३२ | ||
| दन्तोद्गुलानि | ३२ | ३२ | नगणिता | |
| नासायाम् | ३ | १ | ३ | |
| शिरसि | ६ | शिरःकपाठानि ४ | ६ | शिरःकपाठानि |
| गण्डास्थिनी | २ | १ | २ | |
| कर्णास्थिनी | २ | — | २ | |
| जनु | २ | २ | — | |
| ताणु | १ | १ | १ | |
| हृन्वस्थि | १ | १ | — | |
| ललाटास्थि | — | — | ||
| — | ||||
| जतुकास्थि | ||||
| क्षभर्रास्थि | ||||
| नासाशुक्रिके | ||||
| नासामध्यसिरिका | ||||
| अभुपीठे | ||||
| एवं ग्रीवाशिरोस्थीनि, | १०० | ६४ | ६३ | केवल शिरोस्थीनि |
| एवम् शरीरेऽस्थि— | ||||
| संख्या— | ३६० | २६० | ३०० | †२०० |
† केवल वृत्तसंख्याकानि कर्णितरास्थीन्यन्तर्गम्य २०६ संख्यामस्यां नृवते ।
अंगप्रत्यंगानि ।
Labels for the human figure (अंगप्रत्यंगानि):
- Head: शिरः (Shira:), अग्नतनम् (Agnatana:), शिरोधरा (Shirodhara), अंसः (Ansa:), स्कन्धाः (Skandha:), उरः (Ura:).
- Neck: रुलाटम् (Rulata:), नासा (Nasa), ओष्ठः (Ostha:), अग्न्यम् (Agnya:), चिबुकः (Chibuka:).
- Torso: प्रवाहुः (Pravahu:), कक्षा (Kaksha), प्रपाणिः (Prapani:), स्तनपर्यन्तः (Stanaparyanta:), स्तनान्तरम् (Stanantar:), हृदयम् (Hridaya:), उदरम् (Udara:), कटिः (Kati:), बस्तिशिः (Bastishira:), मुष्कः (Mushka:), उरुः (Uru:), पाणिः (Pani:), मेदः (Meda:).
- Limbs: अंगुष्ठः (Angusta:), भदेशिनी (तज्जनी) (Badesini (Tajjani)), सङ्कला (Sankala), अनामिका (Anamika), कनिष्ठिका (Kanisthika), जानु (Janu), जङ्घा (Janga), गुल्फः (Gulfa:), पादः (Pada:), पाषाणिः (Pashani:), पादतलम् (Padatala:), प्रपदम् (Prapada:), अङ्गुष्ठः (Angusta:), कनिष्ठिका (Kanisthika), अनामिका (Anamika), मध्यमा (Madhyama), प्रदेशिनी (Pradeshini).
- Grouping: शरीरम् (Sharira:).
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