सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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वि० मन्तव्य—अन्न प्राशन का विधान छठे मास में अवश्य है, परन्तु यदि १-२ या ३-४ मास टाल दिया जाय तो और उत्तम है, और उचित तो यह है, कि जब तक दन्तोद्भव न हो या पूर्णरूप से दन्त न आएँ तब तक अन्न का प्राशन न किया जाय अथवा अत्यन्त थोड़ा किया जाय, शीघ्र अन्न देने से—शिशु का उदर बढ़ जाता है और अनेक वाधाएँ भी होने लगती हैं। और जब अन्न खाने लग जाता है, तब उसे रोकना अथवा थोड़ा खाने के लिए बाध्य करना बहुत ही कठिन है, अथवा असम्भव है। बड़ी बुद्धियों का विचार है कि जब तक जननी पुनः गर्भवती न हो तब तक अन्न देना ही न चाहिये, जितना ही अधिक दिनों में माता का दूध अथवा अपर्याप्त होने के कारण बकरी अथवा गौ का दूध दिया जाता है बालक उतना ही पुष्ट एवं स्वस्थ होता है और जीवन भर स्वस्थ रहता है। माता के गर्भवती होने पर भी माता का दूध बुझाकर बकरी का दूध यथासम्भव ३-५ वर्ष तक दिया जाय तो अत्युत्तम है। देखा जाता है कि जिन अभागों को थोड़े दिन दूध मिलता है अथवा शीघ्र अन्न देना प्रारम्भ कर दिया जाता है वे जीवन भर दुबले-पतले तथा अस्वस्थ रहते हैं ॥ ४६ ॥
नित्यमवरोधरतश्च स्यात् कृतरक्ष उपसर्गभ्यात्; प्रयत्नतश्च प्रहोपसर्गभ्यो रक्ष्या बाला भवन्ति ॥५०॥
बालक को सदा अवरोध में (अन्तःपुर में) रखले, उपसर्ग (गिरता आदि) भय से उसको बचाये। ग्रहों के उपद्रवों से बालक की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये।
वि० मन्तव्य—बालक के संरक्षण में सर्वदा सावधान रहना परमावश्यक है, वे संसार रूपी वाटिका के कोमल, सुगन्धित एवं मनोहर पुष्प हैं ॥ ५० ॥
अथ कुमार उद्भिजते त्रस्यति रोदिति नष्टसंज्ञो भवति नखदशनैर्धात्रीमात्मानं च परिणदति दन्तान् खादति कूजति जूम्भते भुवौ विक्षिपत्यूर्ध्वं निरीक्षते फेनमुद्भवति सन्दृष्टोऽक्रूरं भिन्नवर्चा दीनार्तस्वरो निशि जागर्ति दुर्बलो स्नानाङ्गो मत्स्यच्छुच्छुन्दरिमत्कुणगन्धो यथा पुरा पाञ्चाः स्तन्यमभिलषति तथा नाभिलषतीति सामान्येन प्रहोपसृष्टलक्षणमुक्तं, विस्तरेणोत्तरे वक्ष्यामः ॥५१॥
बालक उद्भिन हो जाता है, डरता है, रोता है, बेहोश हो जाता है। नख दांतों से घात्री को और अपने को नोचता, काटता है। दांतों को कटकाटा है कराहता है, जम्भाई लेता है, भुवों को ऊपर चढ़ाता है, ऊपर को देखता है, मुख से क्षाग फेंकता है। ओठों को काटता है। देखने में भयानक पतला-आम सल आता है, स्वर-दीन और पीड़ित होता है, रात को
सोता नहीं, दुर्बल, मलिन अंगों का, शरीर से मलली, छुल्लुन्दर, खटमल की गन्ध आती है, पहले जिस प्रकार घात्री के दूध को चाहता था, वैसा अब नहीं चाहता, ग्रहों से आक्रान्त शिशु के ये सामान्य लक्षण हैं, विशेष लक्षणों को उत्तर तंत्र में कहेंगे ॥
अक्तिमन्तं चैनं ज्ञात्वा यथावर्णं विद्यां प्राहयेत् ॥५२॥ बालक के शक्तिमान् होने पर वर्ण के अनुसार उसको विद्या पढ़ाये ॥५२॥
अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय षोडशदशवर्षा पत्नीमा-वहेत् पित्र्यधर्मार्थकामप्रजाः प्राप्स्यतीति ॥५३॥
विद्याध्ययन करने पर जब आयु पन्चीस वर्ष की हो जाये तब सोलह साल की कन्या से इसका विवाह करवा दे। जिससे कि यह पितृभ्रूण, धर्म, अर्थ काम और प्रजा को प्राप्त करे।
वक्तव्य—क्योंकि कहा है कि बिना संतान के स्वर्ग नहीं मिलता।
वि० मन्तव्य—पन्चीस वर्ष का पुरुष और १६ वर्ष की स्त्री पूर्णरूप से बलवीर्य युक्त हो जाते हैं तभी उनका विवाह होना चाहिये। इस प्रकार वे दोनों—पित्र्य-माता पिता-सास स्वसुर आदि बड़ों की सेवा कर सकते हैं, और उनके और्ध्व-दैहिक-श्राद्धादि कृत्य कर सकते हैं, धर्म-यज्ञ दान आदि एवं अपने धारण पोषण में समर्थ हो सकते हैं, अर्थ—धन कमाने के उपाय कर सकते हैं, काम-शारीरिक एवं मानसिक सुखों का लाभ और उपभोग कर सकते हैं और उत्तम सन्तान का उत्पादन कर सकते हैं और इसके विपरीत छोटी आयु में विवाह करने से उक्त सुखों का पूर्ण लाभ भी नहीं होता और भी वे दुःखी अथवा रोगी बने रहते हैं। आयु के उक्त २५ तथा १६ वर्षों का निर्देश उपलक्षण मात्र है, अतः—कोई पुरुष २० वर्ष की आयु में पूर्ण यौवन प्राप्त कर लेता है, और कोई ३० वर्ष में प्राप्त करता है, अत एवं-अद्याङ्गसंग्रह में-२१ वर्ष, शाङ्गधर में २० वर्ष और मनुस्मृति में ३० वर्ष की आयु में विवाह का विधान किया गया है। परन्तु नारी का सोलह १६ वर्ष के पूर्व विवाह होना ही नहीं चाहिये, भलेही कोई कुछ कहें। वाग्भट के शब्दों में—पूर्णाषोडशवर्षा स्त्री पूर्णविशेष संयुता। शुद्ध गर्भाशये मार्गं रक्ते शुक्रेऽनिले हृदि। वीर्यवन्तं सुतं सृते, ततो न्यूनान्दयोः पुनः। रोगी अल्पायुः अधन्यो वा गर्भो भवति नेव वा। अ० ह० अ० १ ॥५३॥
ऊनषोडशवर्षीयामप्राप्तः पञ्चविंशतिम्। यथाधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥५४॥ जातो वा न चिरं जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः। तस्माद्व्यन्तबालार्थां गर्भाधानं न कारयेत् ॥५५॥ पन्चीस वर्ष की आयु से कम आयु का पुरुष सोलह साल से कम आयु की कन्या में यदि गर्भाधान करता है, तो गर्भ