सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुभुतसंहिता
[ ४०-१० ]
उदर में ही मर जाता है। यदि किसी प्रकार उत्पन्न हो जाये तो वह देर तक नहीं जीता। यदि किसी प्रकार जीवित रह जाये तो निर्बल इन्द्रियोवाला होता है। इसलिये अत्यन्त छोटी आयु की कन्या में गर्भाधान न करे।
इसीसे संग्रह में कहा है—पुमानेकविशतिवर्षः कन्यां द्वादशवर्षदेशीयाम्...उद्वहेत्। तस्यां षोडशवर्षीयायां पञ्चविशतिवर्षः पुरुषः पुत्रार्थं यतेत, तदा तो प्रातवीर्यो वीर्योन्निवर्त अवश्यं जनयतः॥
वि० सन्तव्य—१६ वर्ष से नीचे नारी को गर्भाधान हो जाने से सन्तान की हानि तो होती ही है, नारी को भी अनेक कष्ट फेलने पड़ते हैं, और जीवन भर के लिये रोगिणी बनकर जीना पड़ता है। उसके साथ २ पति देवता भी पत्नी एवं सन्तान के कष्टों से व्याकुल बने रहते हैं ॥५४, ५५॥
अतिबुद्धायां दीर्घरोगिण्यासन्येन वा विकारोणोपसृष्टायां गर्भाधानं नैव कुर्वीत। पुरुषस्याप्येवंविधस्थं त एव दोषाः संभवन्ति ॥५६॥
अति बूढ़ी, चिरकालीन रुग्ण, अथवा किसी अन्य रोग से पीड़ित स्त्री में गर्भाधान न करे। इसी प्रकार के व रुग्ण पुमान् में भी यही दोष होते हैं। ( अर्थात् गर्भ उदर में मर जाता है )।
वि० सन्तव्य—अतिबुद्धा-५० वर्ष के पश्चात् भी कभी २ गर्भाधान हो जाता है, परन्तु वह गर्भ उत्तम गुण सम्पन्न नहीं होता। दीर्घरोगिणी—कुछ अर्थ आदि लम्बे रोगोंवाली स्त्री की सन्तान भी अर्थ आदि से उपद्रुत होती है, अथवा जीर्ण ज्वर-यक्ष्मा, श्वास आदि रोगों से पीड़िता को प्रसव काल में मृत्यु आदि का भय हो सकता है और सन्तान भी रोगयुक्त, अपृष्ठ तथा निर्गुण होती है। अन्येन वा विकारोण-उपदंश आदि योनि रोगों से उपद्रुत नारी में भी गर्भाधान करने से लाभ के स्थान में हानि ही होती है। इसी प्रकार के पुमान् भी इस योग्य नहीं होते कि वे गर्भाधान करें अन्यथा वेही हानियाँ होती हैं, जो नारी के लिये कही गई हैं ॥५६॥
तत्र पूर्वोक्तैः कारणैः पतिष्यति गर्भं गर्भोऽशयकटीवं-क्षणवस्तिशुलानि रक्तदुर्जनं च। तत्र औतैः परिषेका-वगाहप्रदेहादिभिरुपचरेउजीवनीयश्रुतस्त्रीरपानेन्द्र। गर्भ-स्फुरणे मुहुर्मुहुस्तस्मन्धारणार्थं स्त्रीरमुत्पलादिसिद्धं पाय-येत्। प्रसंसमाने सदाहपाश्चैर्पृष्ठशुलास्तुरदानाहमूत्रसङ्घाः, स्थानात् स्थानं च प्रकासति गर्भं कोष्ठे संरम्भः, तत्र स्निग्धशीताः क्रियाः। वेदनायां महासहाह्नुदसहासमुधु-कश्चद्वृत्पाकण्टकारिकासिद्धं पयः शर्कराश्रोदसिन्धुं पाययेत्, मूत्रसङ्घं दुर्भादिसिद्धम्, आनाहे हिङ्गुसौवर्चल्लजुनव-र्चासिद्धम्। अत्यर्थं स्रवति रक्तं कोष्ठागारिकागारमृत्पि-ण्डसमङ्गाघातकीकुपुमनवमालिकागैरिकसज्जरसरसाञ्जन-
चूर्णं मधुनाऽवल्लिहात्, यथालार्भं न्यग्रोधादिवस्वक्प्रवाह-कलकं वा पयसा पाययेत्, उत्पलादिकलकं वा कश्चैरुद्गाटकशालूककलकं वा श्रुतेन पयसा, उदुम्बर-फलौदककन्दकवाथेन वा शर्करामधुमधुरेण गालिपिष्टं, न्यग्रोधादिवस्वरसपरिपीतं वा वस्त्रावयवं योन्यां धारयेत्। अथाष्टशोणितवेदनायां मधुकरैवदारु-मञ्जिष्ठापयस्यासिद्धं पयः पाययेत्। तदेवाश्रमन्तकशता-वरीपयस्यासिद्धं विदारिगन्धादिसिद्धं वा वृहतीद्वयोरुप-ल्लक्षतावरीसारिवापयस्यामधुकसिद्धं वा, एवमुपक्रान्तया उपावर्तन्ते, सजो गर्भश्चाप्यायते। व्यवस्थिते च गर्भे गन्धेनोदुम्बरजलादुसिद्धेन पयसा भोजयेत्।
अतीते लक्षणस्तेहवध्यांभिर्यवाग्भिरुद्गलकादीनां पाचनीयोपसंस्कृताभिरुपक्रमेत् यावन्तो मासा गर्भस्य तावन्त्यहानि। वस्त्युदरशुल्लेषु पुराणगुद्दे दीपनीय-संयुक्तं पाययेदरिष्टं वा। वातोपद्रवगृहीतत्वात् क्षोतसां द्योयते गर्भः, सोऽतिकालमवतिष्ठमानो व्यापद्यते, तां मृदुना स्नेहादिकमेणेपचरेत्, उक्तो-शरससंसिद्धान्नलपस्नेहां यवाग् पाययेत्, माषतिल-बिल्वशलादुसिद्धान्नं वा कुल्माषान् भक्षयेन्मधुमाध्वीकं-चानुपिषेत् सप्तरात्रम्। कालातीतस्थायिनि गर्भे विशेषतः सधान्यमुदूखलं मुसलेनाभिहन्त्याद्विषमे वा यानासने सेवेत्। वाताभिपन्न एव जुष्यति गर्भः, स मातुः कृषि न पूरयति मन्दं स्पन्दते च, तं वृद्धीण्यैः पयोभिर्मांसरसैरुपचरेत्। शुक्रशोणितं वायुनाऽभिप-पन्नमवक्रान्तजीवमाध्मापयत्युदरं, तं कदाचिवाह्नछ्योप-शान्तं नैगमेवापहृतमिति भाषन्ते, तमेव कदाचित् प्रळीयमानं नागोदरमित्याहुः, तत्रापि लीनवत् प्रतीकारः ॥५७॥
गर्भावकति अध्यायं में कहे तथा मूद्रगर्भ निदान में कहे कारणों से गर्भ के गिरते समय गर्भाशय-कटिबंध-गर्भ में शूल होता है। रक्त दिखाई देता है। इसमें शीतस्पर्श, शीतवीर्य औषधियों से परिषेक, अवगाहन, प्रदेह आदि करते। जीवनीय गुण से सिद्ध किया दूध पीने को देवे। गर्भ के स्फुरण होने में उसको रोकने के लिए उत्पलादि गुण से सिद्ध किया दूध बार-बार पीने को देवे। गर्भ के बढ़ने के समय जलन, पाश्चैर्शूल, पृष्ठशूल, रक्त प्रदर, आनाह, मूत्र का अवरोध होता है। गर्भ के एक स्थान से दूसरे स्थान पर खिसका आने पर कोष्ठ में शोथ होती है, इसमें स्निग्ध शीतल उपचार करें। वेदना होने पर मुद्रागर्णी, मुलेहटी, गोखरू, कटरी से सिद्ध किये दूध में शर्करा और मधु मिलाकर पिलाये। मूत्र के अवरोध में पंचतृणमूल से सिद्ध दूध देवे। आनाह में हींग, संवल, कडुन