सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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गारीरस्थानम्
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नालन्डेवन किया ही न जाय । अतएव भगवान् पुनर्वसु ने—अपरागत के पश्चात् नालन्डेवन का विधान बतलाया है, (३० शा० अ० ८-४७-४८) ॥१२॥
अथ कुमारं शोताभिरिन्द्रिराश्वत्स्य जातकर्मणि कृते मधुसपिरनन्तचूर्णमङ्कुल्याऽनामिकया लेहयेत्, ततो बलातैलेनाभ्यञ्ज्य, क्षीरवृक्षकषायेण सर्वगन्धोद्भवेन वा लघुहंसप्रतपेन वा वारिणा स्नापयेदेन कपित्थपत्रकषायेण वा कोण्णेन यथाहालं यथादोषं यथाविभवं च ॥१३॥
फिर उण्डे जल से बालक को आश्वसित करके जातकर्म करने के पश्चात् धी और मधु से मिश्रित थोड़ी सुवर्णभस्म अनामिका अंगुलि से चटाये । फिर बलातैल का अभ्यंज करके बरगद आदि क्षीर वृक्षों की खन्चा से बनाये क्वाथ से अथवा एलादि गण के जल से या चाँदी अथवा सुवर्ण को तपाकर बुझाये जल से या कैथ के पत्तों के गरम कषाय से समय, दोष और वैषम का ध्यान रखकर स्नान कराये ।
वक्तव्य—यह समझ लेना चाहिये कि मधु श्लेष्मा की निकालता है। बच्चे के मुख में रूकी श्लेष्मा इससे निकल जाती है। धी और स्वर्ण विषनाशक है। इसी से कहा है—'न सज्जति हेमपाङ्कं पद्मपत्रं उन्मृदु विषम् ।' स्वर्ण खानेवाले के शरीर में विष प्रभाव नहीं करता। बच्चे पर विष जल्दी प्रभाव करता है, इसी से उसकी रक्षा की है। सर्वगन्ध से अभिप्राय-एलादि गण से है।
वि० मन्तव्य—सू० १२ के अनुसार शिशु के मुख नासा का परिमार्जन-शोधन कर देने पर भी यदि श्वास की गति न हो तो शीतल जल के छोटे मारने चाहिये, इससे शिशु हुलमसी लेता है और रो पड़ता है, श्वास की गति चालू हो जाती है—गर्भाशय में तो श्वास चलता ही नहीं (दे० सु० शा० अ० २ श्लो० ५०) । यदि चेतना हीन या मूर्च्छित हो तो—कानों के पास पाषाणों की अथवा कांसा के खड्गताल आदि की ध्वनि तथा सूर्य-पंखा आदि से वायु तब तक करे जब तक श्वास-प्रश्वास चालू हो जाय और हाथ-पांव हिलाना प्रारम्भ हो जाय, अर्थात् सचेतन हो जाय। यदि हतने पर भी कोई फल न हो तो सैन्धव लवण मिश्रित घृत वक्षस पर मले, इससे वमन हो जाता है और जीवन लाभ हो जाता है। तथापि लाभ न हो तो नाक को अग्नि से तपावे, सम्भव है प्राण आ जायें तत्पश्चात्-अभ्यङ्ग आदि उपचार करे ॥१३॥
धमनोत्ता हृदिस्थानां विद्युत्त्वादनन्तरम् । चतुरात्रात् त्रिरात्राद्वा क्षोणां स्तन्यं प्रवर्तते ॥१४॥ हृदय में स्थित धमनियों के खुलने के पीछे—तीन या चार दिन के अनन्तर स्त्रियों में दूध आता है ।
वक्तव्य—पहले पीयूष (कोलोस्ट्रम) आता है । जिसे बोल-चाल की भाषा में खीस कहते हैं । इसके देने न देने में भेद है, इसके देने से मृदु विरेचक गुण के कारण यह मल को बाहर करता है । न देनेवाले भारी होने से इसको नहीं देते । वे इसके लिये मधु देते हैं ।
वि० मन्तव्य—यहाँ स्तन्य का अर्थ उस स्तन्य-दूध से है जो शिशु के पीने योग्य होता है। वैसे तो श्वेत द्रव की प्रवृत्ति गर्भवती को ही होने लगती है, यथा—शा० अ० ३-२४ में कहा है तत्र यस्या दक्षिणे स्तने प्राक् पयोदर्शनं भवति । जैसे गो भैंस आदि का दूध भी ३-४ दिन पीने योग्य-शिशु के पीने योग्य नहीं होता वैसे ही मानुषी का भी नहीं होता। तीन चार दिन पर दूध की प्रवृत्ति होती है और 'स्तन्यावतरणे नारीणां ज्वरो दोषैः प्रवर्तते' अर्थात् दूध उतरने में प्रसूता को ज्वर हो जाता, है फलतः उस समय भी दूध नहीं पिलाया जाता, परन्तु यह ज्वर एक दो दिन में शान्त भी हो जाता है जो छठी का दूध कहलाता है ॥१४॥
तस्मात् प्रथमेऽह्नि मधुसपिरनन्तमिश्रं मन्त्रपूर्वतं त्रिकालं पाययेत्, द्वितीये लक्ष्मणासिद्धं सपिः, तृतीये च; ततः प्राङ्निवारितस्तन्यं मधुसपिः स्वपाणितलसमितं द्विकालं पाययेत् ॥१५॥
इसलिये पहले दिन धी और मधु के साथ थोड़ा सा स्वर्ण मन्त्र से पवित्र करके तीन बार पिलाये । दूसरे दिन लक्ष्मणा से सिद्ध किया घृत देवे । तीसरे दिन भी यही देवे, फिर धी और शहद को (विषममात्रा में) बच्चे की हथेली की मात्रा में दो समय देकर स्तन रिलाना आरम्भ करे ।
वक्तव्य—अनन्त बराबर सुवर्ण, इसकी मात्रा आधी रती या चौथाई रती दे । 'अनन्ता' पाठ मानकर हाराणचन्द्र जी 'सारिवाली' कहते हैं अष्टांगसंग्रह में दूवाँ ली है । यथा 'अनन्तामिश्रं मधुसपिषी-अनन्ता दूवाँ' ।
“ऐन्द्री ब्राह्मी शंखपुष्पी वचेन्द्रीकल्कं मधुघृतोपेतं हरेणु-मार्गं कुद्याभिर्मंत्रितं सौवर्णं नाश्वत्थपत्रेण वा मेघायुर्वलजननं प्राशयेद्, ब्राह्मीवचानन्ता शतावरी अन्यतमचूर्णं वा ॥संग्रह ।
चरक में पहले दिन स्तनपान करना कहा है । यथा—ततोऽनन्तरं जातकर्म कुमारस्य कार्यम् । तद्यथा मधुसपिषी मनोपमन्त्रिते यथाम्नायं प्रथमं प्राथितुं दद्यात् । स्तनमत ऊर्ध्वमेतेनैव विधिना दक्षिणं पातुं पुरस्तात् प्रयच्छेत् ।
वि० मन्तव्य—अतः तब तक मधुसपि आदि चटाकर जीवन यापन करे । अथवा वे द्रव देवे जिनकी व्यवस्था बुढ़ा स्त्रियाँ करें ॥१५॥
अथ सूतिकां बलातैलाभ्यक्तां वातहरोषघनिष्कवायेनोपचरेत् । सरोषदोषां तु तदहः पिप्पलीपिप्पलामूलहस्ति-