भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १० ]

पिप्पलीचित्रकश्मृगवेरचूर्ण गुडोदकेनोष्णेन पाययेत्, एवं द्विरात्रं त्रिरात्रं वा कुर्यादादृष्टशोणितात्। विमुद्धे ततो विदारिगन्धादिसिद्धां स्नेहयवाग् क्षीरयवाग् वा पाययेत्-स्विरात्रम्। ततो यवकोलकुलस्थसिद्धेन जाङ्गलरसेन शाल्योदनं भोजयेद्बलमग्निबलं चावेदय। अनेन विधिनाऽध्वधमासमुपसंस्कृता विमुक्ताहाराचारा विगतसूतिकामिधाना स्यात्, पुनरात्तवदर्शनादित्येके ॥१६॥

इसके पश्चात् सूतिका के शरीर पर बलतैल का अभ्यंग कराकर एरण्ड-मद्वदाव आदि वातहर औषधियों के क्वाथ से स्नान कराये। यदि दोष पूरी तरह न निकलता हो तो (रक्त बन्द हो गया हो तो) उसी दिन पिप्पली, पिप्पलीमूल, गज-पिप्पली, चित्रक, सोंठ के चूर्ण को गुड़ के गरम पानी के साथ पिलाये। इसी प्रकार दो दिन, तीन दिन या जब तक दूषित रक्त न निकल जाये तब तक करे। रक्त का शोधन हो जाने पर विदारीगन्धादि गण से सिद्ध किये घी से युक्त यवागू को या सिद्ध किये दूध में बनाई यवागू को तीन दिन पीने के लिये देवे। फिर जी, बेर, कुलस्थी सिद्ध या जांगल मांस रस के साथ शाली धान्यों का भात अग्निबल के अनुसार खाने को देवे। इस प्रकार डेढ़ (१२) महीने तक नियम पालन करने पर आहार-और आचार (विहार) परहेज को छोड़ने से 'विगतसूतिका' शब्द से कही जाती है (अर्थात् डेढ़ मास के पीछे उसके लिये सूतिका का परहेज नहीं रहता)। कई आचार्यों का मत है कि प्रसव के पीछे प्रथम बार आर्तव दर्शन तक वह सूतिका रहती है, उसे सूतिका का आहार विहार तब तक पालन करना चाहिये।

वि० मन्तव्य—उशेषदोषां—यदि गर्भाशय से निकल जाने योग्य रक्त आदि न निकल गये हों। विगतसूतिकाऽभिधाना—अब उसका नाम 'सूतिका' या 'प्रसूता' नहीं रह जाता। अतः सूतिका के लिये विहित उपचारों की भी आवश्यकता नहीं रह जाती। पुनरात्तव दर्शनात्—प्रसव से ४०-४५ दिन पर थोड़ा बहुत आर्तव दिखाई दे जाता है स्वस्थ स्त्री को। इसके पश्चात् किसी २ को प्रतिमास आर्तव होने लगता है और किसी २ को जब तक बालक को दूध पिलाती है तब तक नहीं होता। आर्तव दिखाई देने पर पुनः गर्भाधान की सम्भावना हो जाती है, परन्तु अधिकांश स्त्रियों को नियमितरूप से-प्रसव से-४०-४५ दिन पर अथवा १-२-३-४-५ वर्ष पर गर्भाधान हुआ करता है ॥१६॥

धन्वभूमिजातां तु सूतिकां घृन्तैल्योरन्यतरस्य मात्रां पाययेत् पिप्पल्यादिकपायानुपानां स्नेहनित्या च स्यात् त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा बलवती; अवलां यवागू पाययेत् त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा। अत ऊर्ध्वं स्निग्धेनात्रसंसर्गेणोपचरेत् ॥१७॥

धन्वभूमि (मरुप्रदेश) में उत्पन्न प्रसूता को घी या तैल इनमें से किसी एक की मात्रा को पिप्पल्यादि कपाय के अनुगुणन से पिलाये। बलवान् स्त्री को पाँच दिन स्नेह का पान, अर्थात् आदि देवै। निर्वल प्रसूता को तीन या पाँच दिन यवागू देनी चाहिये। इसके बाद स्निग्ध अन्नसंसर्ग (पेया, विजेनी अन्न) विधि बरते।

वक्तव्य—“अथ सूतिकां बलातैलेनाभ्यज्यात्, बुभुक्षितां च पंचकोलचूर्णेन यवान्युपकुञ्चिकाचव्यचित्रकव्योपसेन्यवचूर्णेन वा युक्तामहःपरिणामिनीं यथासात्त्व्यं स्नेहमात्रां पाययेत् स्नेहयोग्यां तातहरीषधन्वार्थं हस्तपंचमूली क्वाथं पीतवत्थाश्रमयकेनाभ्यज्य वेष्टयेदुदरं वस्त्रेण। तथा न वायुरुदरे विकृतिमुत्सादयति अन्वकाशत्वात्। जीर्णं तु स्नेहै पूर्वैषधिभिरेव सिद्धां विदार्थादि-गणकवायेन वा क्षीरेण यवागू सुस्विन्नां द्रवां मात्रया पाययेत्” ॥ (अ० सं० शा० अ० ३)।

वि० मन्तव्य—धन्वभूमिजातां तु सूतिकां—धन्व भूमि-मरुभूमि आरोग्यद भूमि होती है, वहाँ की निवासिनी प्रायः अधिक स्वस्थ होती है, अतः उसे स्नेह की मात्रा का विधान किया गया है, अर्थात् उसे अधिक से अधिक घृत आदि का प्रयोग किया जा सकता है और वह उसे पच भी जाता है। वह ५-७ दिन में ही पुनः पूर्ववत् स्वस्थ-बलवती हो जाती है। अवलां—अनूभूमि अन्तः देश की निवासिनी प्रसूता प्रायः अवला-दुर्बला होती है। अतः उसे यवागू दलिवा अथवा खिचड़ी आदि में मिलाकर स्नेह देना चाहिये। ११ दिन के पश्चात् उचित-स्वामाविक भोजन की व्यवस्था करे, परन्तु वह स्निग्ध हो। इस प्रकार ११-१२ मास में प्रसूता पूर्ववत् पूर्ण स्वस्थ हो जाती है ॥१७॥

प्रायशश्चनेनां प्रभूतेनोष्णोदकेन परिषिञ्चेत् क्रोध-यासमैथुनादींश्च परिहरेत् ॥१८॥

प्रायः करके बहुत गरम जल से प्रसूता को स्नान करावे। क्रोध, यकान, मैथुन आदि से बचे।

वि० मन्तव्य—पुनरात्तव दर्शन पर्यन्त उष्णोदक से स्नान होना चाहिये और क्रोध आदिका पूर्णरूप से परित्याग भी ॥१८॥

मिथ्याचारात् सूतिकाया यो व्याधिरुपजायते।

सोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यो वा भवेदत्यपतपणात् ॥१९॥

तस्मात्तां देशकालो च व्याधिसात्त्व्येन कर्मणा।

प्रतीदयोपचरेन्नित्यमेवं नात्ययमाप्नुयात् ॥२०॥

प्रसूता के मिथ्या आचार से या अपतप्य के कारण प्रसूता को जो रोग उत्पन्न हो जाता है, वह कष्टसाध्य होता है, या असाध्य हो जाता है। इसलिये देश, काल और रोग सात्त्व्य को देखकर चिकित्सा करे। सब्दा परीक्षा करके इस प्रकार करे, जिससे कोई विपद या हानि न हो।