सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[अ० १०]
ठोड़ीवाला, शिर में चोट लगा, कास, श्वास, शोष से पीड़ित तथा विलक्षण आकार का उत्पन्न होगा।
वक्तव्य—ताश्चैनां यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युरनागताऽऽवीर्यां प्रवाहिष्ठाः। या ह्यनागताऽऽवीर्याः प्रवाहते, व्यर्थमेवास्यास्तत् कर्म भवति। प्रजा चास्या विकृता, विकृतिमापन्ना वा श्वासकासशोषप्लीहाप्रसक्ता वा भवति। (२) तथा च कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहते। ततोऽनन्तरं बलवत्सरम्। च० शा० ८४४।
वि० मन्तव्य—अपत्यपथ के भीतर बला तेल आदि किसी स्नेह का अभ्यङ्ग करे। इससे वायु का अनुलोमन हो जाता है, और प्रसव हो जाता है। तथापि यदि न हो तो—गर्भिणी से कहे कि—जब आवी का रेंग हो तब प्रवाहण कर आदि २। यदि इतना करने पर भी प्रसव न हो तो—॥६॥
तत्र प्रतिलोममनुलोमयेत्, प्राञ्जलमार्कयेत् ॥१०॥ यदि गर्भ उलटा हो ( नितम्ब नीचे, शिर ऊपर ) तो उसे सीधा करें। सीधा हो ( शिर नीचे हो तो ) तो उसे बाहर खींचे। ( प्रतिलोम कई प्रकार का है )—इसे मूढगर्भ चिकित्सा में कहेंगे।
वि० मन्तव्य—समक्षो कि मूढ गर्भ-गर्भमूढ—टेढ़ा-मेढ़ा हो गया है, तब उक्त चार स्त्री-परिचारिकाओं में जो सबसे निपुण हो गर्भ को सीधा करके—अपत्यपथ में हाथ डालकर सीधा करके निकाल लेवे यदि तथापि न निकले तो—॥१०॥
गर्भसङ्के तु योनिं धूपयेत् कृष्णसर्पनिर्मोकेण पिण्डीतकेन वा, वधनीयाद्विरण्यपुष्पोमूलं हस्तपादयोः, धारयेत् सुवर्चर्द्धा विशलयां वा ॥११॥
गर्भ के योनि में रुक जाने पर ( बाहर न आने पर—बेदनायें बन्द हो जाने पर ) काले साँर की कँचुली, अथवा सैनफल से योनि में धूपन करे। कलिहारी की जड़ को हाथ पैर में बाँधे। हुलहुल या विशलया ( कलिहारी ) को धारण करे।
वि० मन्तव्य—यह धूपन आदि उपचार करे। यदि तथापि प्रसव न हो तो—अथर्व वेद के शांता ब्रह्मण द्वारा मन्त्र यन्त्र आदि का प्रयोग करे यथा—एक सिद्ध मन्त्र—
हृहामृतं च सोमश्च चित्रमानुश्च भामिनी।
उच्चैःश्रवाश्च तुरगो मन्दिरं निवसन्तु ते ॥
यह मन्त्र गर्भवती के कान में कहना चाहिये और वह इसे ध्यान देकर सुने। अथवा निम्न मन्त्र से अभिमन्त्रित जल पीने को देवे यथा—
हृदममृतमर्पामुदुतं वै तव लघुगर्भमिमं प्रमुञ्चतु स्त्रि।
तदनलपनाकंवासवास्ते सहलवणाम्बुचैर्दिशान्तु शान्तिम् ॥
एक सिद्ध यन्त्र—चक्रम्यूह का आकार कांस्य की थाली में हरिद्राद्रव से लिखकर दिखावे तथा शुद्ध जल से धोकर गिलावे। इतने पर भी यदि प्रसव न हो तो मूढगर्भ चिकित्सा अ० १५ के अनुसार उपचार करे ॥११॥
अथ जातस्योलंबं मुखं च सैन्यवसर्पिषा विशोध्य घृताक्तं मूर्ध्नि पिचुं दद्यात्, ततो नाभिनाडीमष्टाकुलमायम्यम्य सूत्रेण बद्ध्वा छेदयेत्, तत्सूत्रैकदेशं च कुमारस्य प्रीवायां सम्यग् वधनीयात् ॥१२॥
बालक के पैदा होने पर प्रथम जरायु को हटाकर, घी और सैन्यव से मुख का शोधन करे। घी से स्निग्ध पिचु को शिर पर रखे। फिर नाभि नाड़ी को नाभि से आठ अंगुल नाप कर धागे से बाँधकर काट देवें। धागे के एक भाग को बच्चे के गले में बाँध देवें।
वक्तव्य—नाड़ी को दो स्थानों से बाँधते हैं। जिससे रक्त प्रवृत्ति बच्चे की तरफ से भी न हो, और माता की तरफ से भी न हो। जब तक नाड़ी में स्नन्दन प्रतीत होता रहे, तब तक नाड़ी को नहीं काटना चाहिये। स्नन्दन बन्द होना इस बात का चिह्न है कि माता से रक्त आना बन्द हो गया। इसको नाभि से दो इञ्च बाँधते हैं। गले में लटकाने से नाल मिट्टी आदि में खराब नहीं होती। मल मूत्र से बची रहती है। नाड़ी के ठीक प्रकार न काटने से—“असम्यक् करुने हि नाञ्चा आयामव्यायामोत्पिण्डकापिण्डकालिकाविनाभिकाविजुभिकावाधेभ्यो भयम् ॥” गले में ढीला लटकाये। काटने के लिये—नाभिबन्धनात् प्रभृत्यर्घांगुलमभिज्ञानं कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्य हीत्वा तीक्ष्णेन रौक्षमराजतायसनां छेदना-नामन्यतमेनाद्धारेण छेदयेत्ताम् ॥ चरक० शा० अ० ८॥
वि० मन्तव्य—यदि जात शिशु स्वस्थ है, तो ईश्वर का धन्यवाद करो। यदि गर्भनाल शिशु के साथ ही बाहर आ गई हो तो नाभि से आठ अंगुल पर सूत्र से बाँध कर—कसकर बाँधकर एक अंगुल आगे से काट देवे और यदि प्रसूता के गर्भाशय से सम्बद्ध हो तो नाल पर दो बन्धन लगाकर बीचसे काट देना चाहिए, बन्धन लगा देने से शिशु तथा प्रसूता के शरीर से नाल द्वारा रक्त ख़ाव नहीं होता। प्रीवा में बाँधने से क्षतका लगने का भय नहीं रहता। अन्यथा समय से उलझ जाने पर अनेकानेक हानियाँ हो सकती हैं। और जब तक शिशु पूर्णरूप से प्रकृतिस्थ न हो तब तक नाल छेदन नहीं करना चाहिए। सच यह है, कि माता के शरीर से जन्म हो जाने पर भी शिशु को पोषण मिलता रहता है, जब तक नाल गर्भाशय से सम्बद्ध रहे तब तक