सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुमुक्षुसंहिता
[ अ० १० ]
क्रोधशोकावात्सल्यादिभिश्च छिप्याः स्तन्यनागो भवति । अथास्याः क्षौरजननार्थं सौमनस्यमुत्पाद्य यवगो- धूमशालिषष्टिकमांसरससुरासौवोकरपिण्याकळमुनमरस्य- कशेरुकशृङ्गाटकविसविद्वारिकन्दमधुकगतावरोनालिका- लायूकालशाकप्रभृतीनि विदध्यात् ॥३०॥
क्रोध, शोक, अममत्व आदि से दूध सूख जाता है । इस अवस्था में दूध को बढ़ाने के लिए मन को प्रसन्नता उत्पन्न करके जो, गेहूँ, शालि, साठी, मांसरस, सुरा, काञ्ची, तिल- खली, लहसुन, मछली, कसेरू, पिंपाड़ा, बिस, विदारीकन्द, मुलेहटी, शतावरी, नालिका, अलायू, काल शाक आदि देवे ।
वि० मन्तव्य—स्तनप्रवृत्ति के लिए देखिए—नि० स्था० अ० १० श्लो० १५ से २७ । निरन्तर-सच्चा स्नेह ही स्तन्य की प्रवृत्ति का हेतु है तथापि यदि क्रोध शोक आदि के कारण स्तन्य प्रवृत्ति न हो तो उचित उपाय करे लाभ अवश्य होता है । स्तन्य का क्षय होने पर—स्तन ढीले हो जाते हैं । अथवा घट जाते हैं । इस दशा में कफबर्द्धक द्रव्यों का प्रयोग करे । (मु० सू० अ० १५ सू० १२) ॥३०॥
अथास्याः स्तन्यमप्यु परीक्षेत तच्चेच्छीतलममलं तनु शङ्खावभासमप्यु न्यस्तमेकीभावं गच्छत्यफेनिलम- तन्तुमन्तोत्प्लवतेऽवसीदति वा तच्छुद्धमिति विद्यात्, तेन कुमारस्यारोग्यं शरीरोपचयो बलवृद्धिश्च भवति । न च वृषितशोकातशान्तप्रदुष्टधातुगभिणीवज्ररितानिखीणा- तिस्थूलविदग्धभक्तविरुद्धाहारतर्पितायाः, स्तन्यं पाययेत्, नाजांणौषधं च बालं, दोषोषधमलां नीत्रवेगोत्पत्ति- भयात् ॥३१॥
इसके पीछे दूध की परीक्षा जल में करे । यदि वह दूध- शीतल, निर्मल, पतला, शङ्ख के समान कान्ति का, जल में ढाला हुआ मिश्रित हो जाता है, क्षाग रहित, तन्तु की भांति नहीं, पानी में न बैठता है और न ऊपर तैरता है, तो इस दूध को शुद्ध समझे । इससे बच्चे में आरोग्य शरीर की पुष्टि, बल की वृद्धि होती है । मूली होने पर, शोक से दुःखी, थकी, वृषित थात, गमवती, ज्वर आए हुए, अतिक्षीण, अतिस्थूल, विदग्ध भोजन या विरुद्ध भोजन किए, उपवास किए—इन अवस्थाओं में दूध न पिलावे । बालक को यदि औषध न पची हो तो उसे दूध न देवे । क्योंकि दोष औषध और मल से तीव्र वेगोत्पात्ति का मथ रहता है ।
वि० मन्तव्य—दूध पिलानेवाली के दूध की परीक्षा अवश्य कर ले । कदाचित् दूध अशुद्ध हो तो शिशु अस्वस्थ हो जाता है । एतदर्थं देखिए नि० स्थान अ० १० और
शुद्ध दूध भी पिलानेवाली की क्षुधित आदि दशाओं में नहीं नहीं पिलाना चाहिये । यदि शिशु को कोई औषध दी गई हो जब तक वह पच न जाय तब तक दूध न पिलाया जाय । यदि बालक—मुखपाक आदि किसी कारण से स्तन चूचुक का आचूषण न कर सकता हो तो सीपी या चम्मच अथवा कोमल कपड़ा की बत्ती द्वारा दूध पिलाना चाहिये । शिशु दूध पीता रहे तब तक इस सूत्र को ध्यान में रखना चाहिए ॥३१॥
भवन्ति चान्न—
धाड्यास्तु गुरुभिर्भोज्यैर्विषमैर्दोषलैस्तथा । दोषा देहे प्रकृष्यन्ति ततः स्तन्यं प्रदुष्यति ॥३२॥ मिथ्याहारांबहारिण्या दुष्टा वातादयः छिप्याः । दूषयन्ति पयस्तेन शारीरा व्याधयः शिशोः । भवन्ति कुशलतांश्च भिषक् सम्यग्निर्भावयेत् ॥३३॥
इसमें श्लोक भी हैं—धात्री के गुरु, विषम और दोषकारक भोजनों के करने से दोष शरीर में वृषित होते हैं, इससे दूध वृषित हो जाता है मिथ्या आहार विहार करनेवाली धात्री के वृषित हुए वातादि दोष दूध को भी वृषित कर देते हैं, इससे बच्चे में रोग उत्पन्न होते हैं । इन रोगों को कुशल वैद्य भली प्रकार पहचाने ।
वि० मन्तव्य—यह सच है कि क्षौरपायी शिशु कोई अन्य पदार्थ तो खाता नहीं है, उसे यदि कोई विकार हो तो उसका कारण दूध ही हो सकता है । अतः दूध पिलानेवाली के आहार- विहार पर पूर्णरूप से ध्यान और नियन्त्रण रखना आवश्यक है । आहार रस से दुग्ध का निर्माण होता है, यथा—रसप्रदाय- मधुरः पक्वाहारनिमित्तजः । कृत्स्नदेहात् स्तनो प्राप्तः स्तन्यमिल- भिषीयते ॥ तथा—आहाररसयोनित्वात् एवं स्तन्यमपि छिप्याः । अतः धात्री के आहार-विहार से दूध में विकृति आती है और विकृत दूध पीने से शिशु में विकृति आती है । दुग्धशोधनार्थं धात्री को दुग्ध शोधक क्वाथ आदि पिलाना चाहिए ॥३२,३३॥
अङ्गप्रत्यङ्गदेशे तु रुजा यत्रास्य जायते । सुहृदुः स्पर्शति तं स्पर्शयमाने च रोदिति ॥३४॥ निमलितानक्षो मूर्धस्थे शिरोरोगे न धारयेत् । वस्तिस्थे मूत्रसङ्घातां रुजा वृष्यति मूच्छति ॥३५॥ विषमूत्रसङ्घवेण्यच्छर्वाधमानात्रकूजनेः । कोष्ठे दोषान् विज्ञानायात् सर्वत्रस्थान्श्व रोदनैः ॥३६॥ बच्चे के जिस अंग-प्रत्यङ्ग में वेदना होती है, वह उस स्थान को बार-बार स्वयं छूता है, परन्तु दूसरा कोई छूए तो वह रोता है । शिर में रोग होने पर आँखें बन्द कर लेता है, शिर को सीधा नहीं रखता । मूत्राशय में रोग होने पर मूत्र का रक्ता, पीड़ा, प्यास और मूर्च्छा होती है । कोष्ठ में स्थित दोषों