सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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को मल-मूत्र के रूकने से, विवर्णता से, वमन से, आध्मन से, आंतों की गड़गड़ाहट से पहचाने । सारे शरीर में उत्पन्न विकार को रोगे से समझे ।
वि० मन्तव्य—शिशु स्वतः बोलकर अपना कष्ट बतला नहीं सकता, अतः इन लक्षणों से और अपनी प्रतिभा से उसे जानने का प्रयत्न करना चाहिये ॥३४-३६॥
तेषु यथाभिहितं भृदुच्छेदनीयमौषधं मात्रया क्षीर-पत्य क्षीरसर्पिषा संयुक्तं विदध्यान्, धाड्याश्च केवलं, क्षीरात्राऽस्यात्मनि धाड्याश्च पूर्ववत्, अत्रादस्य कषाया-दीनात्मन्येव न धाड्याः ॥३७॥
इन रोगों में इन रोगों के अनुसार कोमल कफ-मेद का लेवन करनेवाली, औषध को मात्रा से दूध पीनेवाले बच्चे को दूध और घी के साथ मिलाकर देवे । और धात्री को अकेली औषध पिलाये । दूध और अन्न खानेवाले बालक को पूर्व की भांति बच्चे और धात्री दोनों को औषध देवे । अन्न खानेवाले बच्चे में केवल बच्चे को ही कषाय आदि औषध देवे, धात्री को औषध न दे ।
वि० मन्तव्य—शिशु तीन प्रकार के होते हैं १—क्षीरप अर्थात् केवल दूध पीनेवाले । २—क्षीराद् अर्थात् दूध के साथ २ अन्न खानेवाले । ३—अत्राद् अर्थात् धात्री का दूध छोड़कर केवल अन्न पर निर्वाह करनेवाले । बालक को चाटने का भी अभ्यास नहीं होता, अतः दुग्ध एवं घृत में बालक औषध पिलानी चाहिये । औषध तीक्ष्ण या उग्र नहीं हो, क्योंकि शिशु स्वभावतः कोमल एवं सुकुमार होते हैं । चरक के शब्दों में—और यदि कुमार को कोई व्याधि आ जाय तो प्रकृति, निमित्त, पूर्वरूप, रूप एवं उपशय के द्वारा भली भाँति समझ-कर तथा रोगी, देश, काल, रागाश्रय आदि का विचारकर मधुर, मृदु, लघु, सुगन्धित, शीत एवं कल्पाण कारक औषध एवं उपचारों का प्रयोग करते हुए चिकित्सा करे, क्योंकि कुमारों को इसी प्रकार के औषध एवं उपचार अनुकूल होते हैं, और इस प्रकार वे सुख का सदा के लिये लाभ करते हैं । जब वे स्वस्थ रहें तब स्वस्थवृत्त का अनुष्ठान व्यवस्था करे । इस प्रकार वह—बल, वर्ण, शरीर एवं आयुः की सम्पत्ति को प्राप्त कर लेते हैं । (च० शा० अ० ८६) ॥३७॥
तत्र मासादूर्ध्वं क्षीरपायाङ्कुलिषर्वद्वयग्रहणसंमिता-मौषधमात्रां विदध्यान्, कोलास्थिसंमितां कल्पमात्रां क्षीरात्रादाय, कोलसंमितामत्रादायेति ॥३८॥
एक मास से ऊपर की आयुवाले दूध पीनेवाले बच्चे को दूध-घी में मिलाई औषध को अंगुली के प्रथम दो पंखों तक मात्रा में देवे । दूध और अन्न खानेवाले को औषध कल्क की,
बेर की गुठली के बराबर मात्रा देवे । अन्न खानेवाले को बेर बराबर मात्रा देवे ।
वक्तव्य—प्रथमे मासि जातस्य शिशोर्भोजरुक्तिः । अव-लेक्षा तु कर्तव्या मधुक्षीरसितायुतैः ॥ एकैको वर्षयेतावत् याव-त्सर्वस्वरो भवेत् । तदूर्ध्वं माषद्विद्विः स्याद् यावत् स्युः षोडशा-ब्दकाः ॥३८॥
येषां गदानां ये योगाः प्रवदयन्तेऽगदङ्कराः । तेषु तत्कल्कसंलिप्तौ पाययेत शिशुं स्तनौ ॥३९॥
जिन जिन रोगों को नष्ट करनेवाले योग आगे कहे जायेंगे उन उन रोगों में उन उन योगों के कल्क से स्तनों पर लेप करके बच्चे को स्तन पिलाये ।
वि० मन्तव्य—जो ज्वर आदि नाशक औषध बड़ी आयु-वालों को दिये जाते हैं, वे ही बालक को देवे, परन्तु उनकी मात्रा न्यून हो, अथच यथासम्भव उनके लिये मृदु, मधुर, लघु एवं शीत औषधों का चुनाव करे ॥३९॥
एकं द्वे त्रणि चाहानि वातपित्तकफज्वरे । स्तन्यपायाहितं सर्पिरितराभ्यां यथार्थतः ॥४०॥
न च तृष्णाभयाद्भ्रत पाययेत शिशुं स्तनौ । विरेकवस्तिवमनान्युते कुर्याच्च नात्ययात् ॥४१॥
स्तनपायी शिशु को ज्वर में क्रमशः वातज्वर में एक दिन, पित्तज्वर में दो दिन और कफज्वर में तीन दिन घृत न देवे । क्षीरान्नभोजी को और अन्नभोजी को जैसा उचित समझे, वैसा करे । बच्चे को प्यास लगी है, इस थोड़े में बार-बार स्तन न देवे । बिना जलरत के बच्चे को वमन, विरेचन या वस्ति न देवे ।
वक्तव्य—घी बच्चे को सदा देना चाहिये, योग्य मात्रा में ऐसा पता लगाता है । इससे यह नियम ज्वर के लिये अपवाद रूप दिया है । बच्चे को रोता देवकर चुग कराने के लिये बार बार स्तन सुख में देना हानिकारक है । एरण्ड तेल का विरे-चन के लिये उपयोग प्रायः करते रहना ठीक नहीं है । इन साधारण बातों का यहाँ निर्देश है ।
वि० मन्तव्य—आवश्यकतानुसार लंघन आदि को व्यवस्था भी करे । यथा आमाशय विकारों में लंघन और हृस्वडस्वा (श्वास) में वमन एवं विरेचन आवश्यक होता है ॥४०,४१॥
मस्तुलुङ्गभ्याद्यस्य वायुस्तात्वस्थि नामयेत् । तस्य तुद्वैऋयुक्तस्य सर्पिमधुरकैः श्रुतम् ॥४२॥
पानाभ्यञ्जनयोग्येभ्यं शोताम्बूद्देजनं तथा । मस्तुलुंग के क्षय के कारण वायु तात्वस्थि को मुका देती है । तब बच्चे को प्यास लगती है, और चेहरा गरीब दीखता है । इसमें काकोल्यादि गण से विद्व घृत का पान