सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
[ अ० १० ]
गम्भारी, बरगद आदि क्षीर वृक्षों के कोमले पत्ते और छाल, घृत, इनको पाँचवें मास में । पृश्निपर्णी, बला, सहजन, गोखरु और गिलोय छठे मास में । सिंधाड़ा, विस, द्राक्षा, कसेरु, मुल्हठी और मिश्री सातवें मास में, प्रत्येक मास में दूध के साथ इनको देवे । ये सात योग आधे श्लोक में कहे गये हैं । गर्भ खाव में क्रमशः दूध के साथ इनको बरतना चाहिये ॥
कपित्थवृहतीबिल्वपटोलेलुनिदिग्धिकाः ।
मूलानि क्षीरसिद्धानि पाययेद्विषगृहमे ॥ ६३ ॥
नवमे मधुकानन्तापयस्यासारिवाः पिवेत ।
क्षीरं शुण्टीपयस्याभ्यां सिद्धं स्यादशमे हितम् ॥ ६४ ॥
सखीरा वा हिता शुण्टी मधुकं सुरदारु च ।
एवमाप्यायते गर्भस्तीव्रा रुक् चोपशाम्यति ॥ ६५ ॥
आठवें मास में—कैय, बड़ी कटेरी, बेल, परवर, ईख, छोटी कटेरी, की जड़ से सिद्ध किया दूध देवे । नवम मास में—मुल्हठी, दूवा, क्षीर विदारी और अतन्त मूल से सिद्ध दूध पीये । दसवें मास में—सोठ और क्षीरकाकोली से सिद्ध किया दूध देना चाहिये । अथवा सोठ, मुल्हठी, देवदारु से सिद्ध किया दूध देवे । इस प्रकार से गर्भ पृष्ठ होता है, और तीव्र वेदना शान्त होती है ॥ ६३-६५ ॥
निवृत्तप्रसवायास्तु पुनः षड्भ्यो वर्षभ्य ऊर्ध्वं प्रसव-मानायां नार्याः कुमारोऽल्पयुर्भवति ॥ ६६ ॥
प्रसव निवृत्ति के पीछे यदि छः साल के ऊपर प्रसूति हो तो बालक अल्पायु होता है ।
वक्तव्य—गर्भाशय या योनि दोष के कारण ही प्रसव-या गर्भाधान होना रुकता है । इनकी चिकित्सा न करने पर यदि आहार-विहार के कारण अचानक गर्भ रहकर प्रसव होता है, तो वह अल्पायु होता है ।
वि० मन्तव्य—किसी २ को १५-२० वर्ष पश्चात् सन्तान होती है या होनी प्रारम्भ हो जाती है ॥ ६६ ॥
अथ गर्भिणी व्याध्युत्पत्तावत्यये छद्वेयेन्मधुरास्लेनात्रो-पहितेनानुलोमयेच्छ, संक्रमनीयं च मृदु विदध्यादनपानयोः, अन्नीयाच्च मृदुवोयं मधुरप्रायं गर्भाविरुद्धं च, गर्भाविरुद्धाच्च क्रिया यथायोगं विदधीत मृदुप्रायाः ॥ ६७ ॥
गर्भवती स्त्री को यदि कोई महान् भयानक रोग उत्पन्न हो जाय तो मधुर-अम्ल अन्न के साथ वमन करे और मधुर-अम्ल अन्न से उसे अनुलोमन कराये । संशमनीय चिकित्सा करे । खान पान में नरम वस्तु देवे । मृदुवीर्य, प्रायः करके मधुर, गर्भ के लिये अविरोधि भोजन करे । गर्भ के अपतिकूल एवं कोमल जो योग्य क्रियायें—उपचार हों, उनको बरते ।
वि० मन्तव्य—सामान्यतः गर्भिणी को वमन विरेचन का निषेध है, तथापि अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर करना चाहिये, यथा—अलसक विलम्बिका आदि विषविकारों में तथा कफजनित विकारों में—वमन तथा पित्तज विकारों में एवं पुरीषरोध आदि में विरेचन आवश्यक होता है ॥ ६७ ॥
सौवर्णं सुकृतं चूर्णं कुष्ठं मधु घृतं वचा ।
मत्स्याक्षकः शंखपुष्पी मधु सर्पिः सकाच्छनम् ॥ ६८ ॥
अर्कपुष्पी मधु घृतं चूर्णितं कनकं वचा ।
हेमचूर्णाणि कैडर्यः श्वेता दूर्वा घृतं मधु ॥ ६९ ॥
चत्वारोऽभिहिताः प्राशाः श्लोकाधृषु चतुष्वर्षि ।
कुमारार्णां वपुर्मधाबलवृद्धिविवर्धनाः ॥ ७० ॥
इति भगवता श्रीधन्वन्तरिगोपदिष्टायां तच्छिष्येण
महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां
तृतीयं शारीरस्थानं समाप्तम् ॥ ३ ॥
( १ ) सुवर्णं भरम, कूठ, मधु घृत और वच इनका उत्तम चूर्ण, ( २ ) ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मधु, घी और सुवर्णभरम, ( ३ ) अर्कपुष्पी, मधु, घी, सुवर्ण भरम और वच, ( ४ ) स्वर्ण भरम, वकायन, श्वेता ( अपराजिता ), दूर्वा, घी और मधु, ये चार प्राश आधे श्लोकों से बताये गये हैं । ये योग बालकों के शरीर-मेधा, बल और बुद्धि को बढ़ाते हैं ।
वक्तव्य—कैडर्य का अर्थ गम्भारी उत्तम है । क्योंकि कहा भी है—
गर्भे शुष्के तु वातेन बालानां चापि शुष्यताम् ।
शिताकाश्मर्यमधुकैः, हितमुत्थापने पयः ॥ ६८ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भिणीव्याकरणं
शारीरं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥