सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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सुश्रुतसंहिता
त्वचां विभागाः
तस्य स्वरवेवंप्रवृत्तस्य ( भूतात्माधिष्ठितस्य ) त्वचः मु० शा० शुक्रशोणितस्याभिपच्यमानस्य वीरस्येव सन्तानिकाः सप्त त्वचो भवन्ति
| संख्या | नाम | कार्यक्रमम् | प्रमाणम् | अधिष्ठानम् |
|---|---|---|---|---|
| प्रथमा | अवभासिनी | सर्ववर्णानवभासयति | ||
| पंचविधां छायां | ||||
| च प्रकाशयति | ब्रीहेरष्टादशभागप्रमाणा | सिध्मपञ्चकटकौ | ||
| द्वितीया | लोहित्वा | ब्रीहिषोडशभागप्रमाणा | तिलकालकन्यच्छव्यंगानि | |
| तृतीया | श्वेता | ब्रीहिद्रादशभागप्रमाणा | चर्मदलम् अजगल्ली मशकः | |
| चतुर्थी | ताम्बा | ब्रीहेरष्टभागप्रमाणा | विविधकिलासकुष्ठानि | |
| पञ्चमी | वेदिनी | ब्रीहिर्पञ्चभागप्रमाणा | कुष्ठविसर्पौ | |
| षष्ठी | रोहिणी | ब्रीहिप्रमाणा | ग्रन्थिः, अपची, अर्मुदम्, रुली | |
| पदम्, गलगण्डम् | ||||
| सप्तमी | मांसधरा | ब्रीहिद्रयप्रमाणा | भगन्दरः, विद्रधिः अर्शः |
कलाः ( सप्त ) ( मु० शा० अ० ४.५. २३ )
धातवाशयान्तरमर्यादाः
| संख्या | नाम | अधिष्ठानम् | कार्यम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मांसधरा | मांसम् | यस्यां सिरास्त्राद्युधमनीक्षोतसां प्रताना भवन्ति । |
| द्वितीया | रक्तधरा | मांसस्य अभ्यन्तरतः | तस्यां शोणितं विशेषतश्च सिरासु यकृतस्त्रीहानश्च भवन्ति । |
| तृतीया | मेदोधरा | उदरस्थमण्वस्थिषु | |
| चतुर्थी | श्लेष्मधरा | सर्वसन्धिषु | स्नेहाभ्यक्तं यथा हृक्षचक्रं साधु प्रवर्तते संघयः साधु वर्तन्ते संरिलघाः श्लेष्माणः तथा । |
| पञ्चमी | पुरीषधरा | पक्वाशयस्था | या अन्तःकोष्ठे मलमभिभिभजत् यकृतसमन्तात् कोष्ठं च, तथाऽन्नाणि समाश्रिता (सा) उपद्रुकस्थं विभजते मलम् । |
| षष्ठी | पित्तधरा | पक्वामाशयमध्यस्था | या चतुर्विधमन्नपानमुपसुक्तमाशयात् प्रच्युतं पक्वाशयोः पस्थितं धारयति (पाकार्यम्) । |
| सप्तमी | शुक्रधरा | सर्वधारीरन्यापिनी | यथा पयसां सपिस्तु गृहं चेक्षी रसो यथा शरीरेषु तथा शुक्रं विद्यात् । |