सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
३२८
मुमुक्षुसंहिता
[ अ० ८ ]
बार २ सिरा बेध किया जाय तो बहुत लाभ हो। परन्तु खेद है कि कोई चिकित्सक इधर ध्यान ही नहीं देता। सु० सू० अ० १४ के श्लो० ३३ तथा ३४ में कहा गया है कि—रक्त का समीचीन विद्यावण हो जाने पर शरीर में लघुता, वेदना की शान्ति, व्याधि के वेग का परिक्ष्य तथा मन्स का प्रसाद (प्रसन्नता-निर्दोषता) हो जाता है और कुछ आदि स्वर्गदोष, मन्त्रियार्थ, व्रणशोथ तथा अन्य सब रक्तविकार कभी नहीं होते ॥
बालस्थविररुक्षक्षतक्षीणभीरूपरिश्रान्तमद्यपाध्वस्त्रीक-शितवमित्रविरिक्तास्थापितानुवासितजागरितकलोबकुगग-भिणोनां कासश्वासजोषप्रवृद्धश्चराक्षपक्षपाघातोपवासपि-पासामूर्च्छाप्रपीडिनां च सिरां न विध्येत, यश्चाव्यध्याः, न्यध्याश्चाष्टाः, ष्टाश्चायन्त्रिताः, यन्त्रितश्चानुस्थिता इति ॥३॥
निम्न अवस्थाओं में सिराबेध न करे—बालक, बृद्ध, रूक्ष, उग्रक्षतः से क्षीण, डरपोक, थका हुआ, मद्य पीनेवाला, यात्री; एवं स्त्री के सेवन से कुश, वमन, विरेचन आस्थापन-अनुवासन दिये, रात में जागरण किया, नपुंसक, कुश, गर्भवती, कास, श्वास, शोष, तीव्रस्वर, आन्धेपक, पक्षाघात, उपवास, प्यास, मूर्च्छा से पीड़ित अवस्थाओं में वैद्य सिरा का वेधन न करे। अवेध्य शिराओं में भी वेधन न करे। वेधन योग्य सिरा यदि दिखाई न दें, तो उसमें भी वेधन न करे। देखने पर भी यदि सिरा को बाँधा नहीं गया, तो भी वेधन न करे। बाँधने पर भी यदि सिरा ऊपर को न उभरें, तो भी वेधन न करे।
वक्तव्य—सिरा में इजैक्षण देने के लिए जो विधि बरती जाती है, वही विधि सिरा बेध की है। प्रायः करके कोहनी के जरा नीचे सिरा (त्रैक्रियल वेन) का वेधन करते हैं। इसमें सिरा का वेधन करने के लिये पहले सिरा को ऊँचा उभारना आवश्यक है। इसके लिये बाहुपर कसकर पट्टी, रवड़ की नली, या दूसरी तरह से दबाव देते हैं। जिससे रक्त का ऊपर जाना जरा देर के लिये रुक जाये। रक्त न जाने से सिरा में रक्त रुकने से सिरा फूल आती है। फूलने पर उभर आती है। अब इसका वेधन किया जाता है ॥३॥
शोणितावसेकसाध्याश्च ये विकाराः प्रागभिहित्वा स्तेषु चापक्वेध्वन्येषु चानुक्तेषु यथाभ्यासं यथान्यायं च सिरां विध्येत् ॥४॥
रक्त मोक्षण से अच्छे होनेवाले रोग पहले सूत्रस्थान अध्याय चौदह में कह दिये हैं, उन रोगों में तथा रक्त मोक्षण से ठीक होनेवाले जो रोग वहाँ नहीं कहे (जैसे गुरुत्व, प्लीहा आदि), उनमें एवं रोगों की अपकावस्था में (रक्त मोक्षण साध्य
रोगों की), अभ्यास के अनुसार (जिस शिरा का वैद्य वेधन करते हैं) जैसा न्याय (उचित) हो, वैद्य उस प्रकार सिरा का वेधन करे। (यथाभ्यासमिति यथासमीपमिति—डल्हणः) ॥४॥
प्रतिषिद्धानामपि च विषोपसर्गं आत्ययिके च सिरा-न्यधनमप्रतिषिद्धम् ॥५॥
जिन लोगों के लिये सिराबेध का निषेध किया है, उनमें भी विष के उपद्रव होने पर तथा आत्ययिक रोग (विनाशक रोग-विद्रधि, अन्तः विद्रधि आदि) होने पर सिरा वेधन करना चाहिये ॥५॥
तत्र सिन्धस्विन्नमातुरं यथादोषप्रत्यतीकं द्रवप्राय-मन्तं भुक्तवन्तं यवाम् पातवन्तं वा यथाकालमुपस्थाप्या-सीनं स्थितं वा प्राणान्बाधमानो वस्त्रपट्टचमोन्तवर्त्तकल-लतानामन्यतमेन यन्त्रयित्वा नातिगाढं नातिश्रिथिलं शरीरप्रदेगमासाद्य प्राप्ते शास्त्रमादाय सिरां विध्येत् ॥६॥
रोगी को स्नेहन देकर दोष के विपरीत पतला सा अन्न पिलाकर अथवा यवाम् पिलाकर योग्य काल में अपने समीप बिठाकर या खड़ा करके, जीवन में जिससे हानि न हो, ऐसे वस्त्र पट्ट, चर्म, अन्तवर्त्तकल, लतादि किसी वस्तु से बाँधकर बहुत कड़ा या बहुत ढीला न हो, ऐसे ढंग से शरीर के उस भाग में यथोक्त शस्त्र से शिरा का बेध करे ॥६॥
नैवातिशीते नात्युष्णे न प्रवाते न चाग्निरे ।
सिराणां न्यधनं कार्यमरोगे वा कदाचन ॥ ७ ॥
बहुत शीतकाल में या अधिक गरमी में, जोर से चलती वायु में, आकाश के मेघान्छन्न होने पर, तथा बिना किसी रोग के सिरा का वेधन न करे।
वि० मन्तव्य—रक्तक्षायण भी वमन विरेचन के समान शोधन कर्म है, अतः वमन विरेचन के समान देश काल आदि का विचार कर लेना चाहिये। एतदर्थ—सूत्रस्थान का अध्याय १२ तथा अध्याय १६ और चिकित्सा स्थान का अ० ३३ आदि अवश्य देख लेना चाहिये। अरोगे वा कदाचन—का तात्पर्य है कि अरोग-आरोग्य म भी कभी २ रक्तक्षाय कराना चाहिये, यथा वमन विरेचनात्मक संशोधन किया जाता है—शीतोद्भव दोषचय वसन्ते विशोधयन् ग्रीष्मजमभ्रकाले। घनोत्पत्ये वाषिक् माशु सम्यक् प्राप्नोति रोगान् क्लुप्तान् न जातु ॥ इन्हीं समयों में सिराबेध भी किया जाता है और आत्ययिक दशा में जब भी आवश्यक हो तभी रक्त क्षायण कर देना चाहिये, परन्तु तदनु-कूल व्यवस्था करके। जैसा कि १० वें श्लोक में कहा गया है—सिराबेध करते समय सु० सू० अ० १४ के पाठ-२१ से ४५ अवश्य देखिये और आवश्यकतानुसार तदनुसार कार्य-कौजिये ॥
अ० ८]
शारीरस्थानम्
३३६
तत्र व्यध्यसिरं पुरुषं प्रत्यादित्यमुखमरतिमात्रोच्छित्ते उपवेश्यासने सकथनोराकुञ्चितयोनिवेश्य कूपरे सन्निवृत्तस्योपरि हस्तावन्तर्गुढाकुष्ठकृतमुष्ठी मन्ययोः स्थापयित्वा यन्त्रणशाटकं श्रीवामुष्ट्योरुपरि परिक्षिप्यान्येन पुरुषेण पश्चात् स्थितेन वामहस्तेनोत्तानेन शाटकान्तर्यं प्राहयित्वा ततो वृयात्—दाक्षिणहस्तेन सिरोस्थापनाथं नात्यायतजिथिलं यन्त्रमावेष्टयेति, अस्फुरावाणार्थं च यन्त्रं पृष्ठमध्ये पीडयेति, कर्मपुरुषं च वायुभूणमुखं स्थापयेत्, एष उत्तमाङ्गगतानामन्तमुखवर्जानां सिराणां न्यधने यन्त्रगविधिः। पादव्यध्यसिरस्य पादं समे स्थाने मुस्थितं स्थापयित्वाऽन्यं पादमीषत्तमं कुचितमुन्मैः कृत्वा व्यध्यसिरं पादं जानुसन्धेयः शाटकेनावेष्ट्य हस्ताभ्यां प्रपीड्य गुल्फं व्यध्यप्रदेगस्योपरि चतुरङ्कुले प्लोतादीनामन्यतमेन वद्ध्वा वा पादसिरां विध्येत्। अथोपरिष्टाङ्गस्तौ गुढाकुष्ठकृतमुष्ठी सम्यगासने स्थापयित्वा। मुखोपविष्टस्य पूर्ववचनत्रं वद्ध्वा हस्तसिरां विध्येत्। गुधसोविश्वान्धोः सङ्क्षिप्तजानुकूपरस्य श्रोणीपृष्ठकन्धेपूत्राभितपृष्ठस्यात्राकजिरस्कस्योपविष्टस्य विस्फूजितपृष्ठस्य विध्येत्। उद्वरोरसोः प्रसारितोरस्कस्योत्राभितजिरस्कस्य विस्फूजितदेहस्य। बाहुभ्यामवलम्बमानदेहस्य पार्श्वयोः। अवनामितमेदस्य मेदं। उत्तमितविदृष्टजिह्वाप्रस्याधो जिह्वायाम्। अतिन्यात्ताननस्य तालुनि दन्तमूलेषु च। एवं यन्त्रोपायान्त्यांश्च सिरोस्थापनहेतून् बुद्ध्याऽवेदय शरीरवशेन व्याधिबशेन च विदध्यन्त ॥१॥
जिस पुरुष का सिरा वेध करना हो, उसको बालिशतर ऊँची चौकी पर सूर्य की ओर मुख रखकर बिठाये। टांगों को घुटनों पर मोड़कर घुटने पर दोनों कोहिनियों को रखवाकर, अंगुठा अन्दर की रखते हुए मुट्ठियाँ बन्द करावे। इन मुट्ठियों का श्रीवा में मन्त्रा पर रखवाये। फिर गर्दन और मुट्ठियों को यंत्रण-शाटक ( बांधने के कपड़े ) से लपेट कर-धुमाकर पीछे की ओर खड़े दूसरे व्यक्ति के बायें हाथ में यंत्रण-शाटक के दोनों छोर पकड़ाकर, वैद्य उस व्यक्ति से कहै कि दहिने हाथ से शिराओं का उत्थान करने के लिये न बहुत जोर से न बहुत धीमे, यंत्रशाटक को कसने लगे। रक्त का निर्हरण होने के लिये यंत्र को पीठ के मध्य में ऐंटन दो। रोगी मुख में हवा भर कर बैठे। यह यन्त्रणविधि अन्तर्गत सिराओं को छोड़कर शिरोगत शेष शिराओं के वेधन के लिये है।
जिस पुरुष के पैर की सिरा का वेधन करना हो, उसका पैर समान स्थान पर अच्छी प्रकार रखकर दूसरे पैर को थोड़ा सा ऊँचा करके, जिस पैर में सिरावेध करना हो, उस पैर को घुटने के नीचे यन्त्रण शाटक से लपेटकर, गुल्फ पर्यन्त दोनों हाथों से दबाकर अथवा वेध्य स्थान के ऊपर चार अङ्गुल प्लोत
(कगड़ा) या चमड़ा किसी से बाँधकर पैर की शिरा का वेधन करे।
हाथों की शिराओं के वेधन के लिये अंगुठे को मुट्ठी के अन्दर की ओर दबाकर अच्छी तरह आसन पर मुख पूर्वक बिठाकर, पुरुष के हाथ को पूर्वोक्त विधि से बाँधकर हाथ की सिरा का वेधन करे।
ग्रन्थी और विश्वाची में घुटने और कोहनी को संकुचित कराकर फिर यन्त्रण करे। श्रोणी, पीठ, कन्धे में सिरावेध करना हो तो पीठ को ऊँचा करके और सिर को झुकाकर बैठे हुए व्यक्ति को सीधी तनी हुई पीठ होने पर सिरा वेध करे। पेट और छाती में सिरा वेध करना हो तो, शिर को ऊँचा उठाकर, छाती तथा मध्य शरीर को फैलाकर शरीर में दश-मान सिरा का वेधन करे। पार्श्वों में शिरावेध करना हो तो बाहूओं से शरीर को थमाकर सिरा का वेध करे। मेहन पर सिरावेध करना हो तो मेहन को बिना झुकाये सिरा वेध करे। जिह्वा के सिरावेध में जिह्वा को ऊपर उठाकर, जिह्वाग्र को दबाकर जिह्वा के नीचे की सिराओं का वेधन करे। तालु और दन्तमूलों के सिरावेध में मुख को खोलकर तालु और दन्तमूलों में सिरावेध करे।
इसी प्रकार अनुक्त स्थानों में सिराओं को यंत्रों से अथवा अन्य उपायों से बांधकर-सिराओं को उभारनेवाले साधनों से काम लेकर, शरीर रोग के अनुसार सिरा का वेधन करे ॥१॥
मांसलेखवकाशेषु यवमात्रं शस्त्रं निदध्यात्, अतोऽन्यथाऽर्धयवमात्रं ब्रीहिमात्रं वा ब्रीहिमुखेन, अस्थनामुपरि कुठारिकया विध्येदर्थयवमात्रम् ॥२॥
मांसल प्रदेशों में जो मात्र शस्त्र से वेधन करे। मांसल स्थानों से भिन्न-स्थानों में आवे जो के बराबर या ब्रीहिमुख शस्त्र से जो भर वेधन करे। अस्थियों के ऊपर कुठारिका नामक शस्त्र से आधा जो के बराबर गहरा सिरावेध करे।
वि० मन्तव्य—मांसल-अधिक मांसवाले अवयवों में वेधन करते समय सिरा शस्त्र के दबाव से मांस में धँस जाती है—धँस सकती है, अतः ब्रीहिमुख—नेहरेने जैसे पर दोनों ओर धारवाले शस्त्र से वेध किया जाता है और जहाँ सिरा के नीचे अस्थि रहती है वहाँ कुठारिका कुल्हाड़ी के आकार का छोटा अस्थि उपयुक्त होता है। इस शस्त्र के उपयोग की विधि—कुठारिकां वामहस्तन्यस्तां इतरहस्तमध्येमांसगुल्फगुष्ठविष्टभ्या अभिहन्त्यात् सु० सू० अ० ८-५। अर्थात्-कुठारिका को बायें हाथ से वेधस्थल पर रखकर-दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली को अंगुठा से बलपूर्वक स्तम्भ करके कुठारिका की पीठ पर आधात करे-मारे। इस प्रकार वह सिरा का वेधन कर देती है; परन्तु आधात-चोट उतनी ही हो जिससे सिरा का आधा भाग करे, समस्त सिरा न कट जाय अथवा उससे भी आगे कुठारिका की धार न धँस जाय ॥२॥
३४०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ६ ]
व्यधे वर्षासु विधेयत् प्रोष्ठकाले तु भीतले ।
हेमन्तकाले मध्यहि गुरुकालाह्वयः स्मृताः ॥१०॥
वर्षाभ्युतु में जब बादल न हो, प्रोष्ठभ्युतु में ठण्ड के समय, हेमन्तभ्युतु में मध्याह्न में शस्त्र कर्म करना चाहिये ॥
वक्तव्य—आत्म्यिके पुनः कर्मणि काममृतु विकल्प्य कृत्रिमगुणोपधानेन यथतु गुणविपरीतेन भेषजं संयोगप्रमाण-विकल्पेनोपपाद्य प्रमाणवीर्यसमं कृत्वा ततः प्रयोजयेत्-उत्तमेन यत्नेनावहितः ॥ चरक ॥
वि० मन्तव्य—सिरावेधन एवं छेदन मेदन आदि सभी प्रकार के शस्त्रकर्म के लिये उत्काल उपयुक्त होते हैं ॥१०॥
सम्यक्गुरुहनिपातेन धारया या सवेदसूक्त ।
सुहृतं रुद्धा तिष्ठेच्च सुविद्धां तां विनिदिशन् ॥११॥
अच्छे प्रकार शस्त्र चलाने से धारा के रूप में कुछ काला-काला खून बहे, पीछे रुक जाये, उसे सुविद्ध जानना ॥११॥
यथा कुसुम्भपुष्पेभ्यः पूर्वं स्रवांत पोतिका ।
तथा सिरासु विद्धासु दुष्टमग्ने प्रवर्तते ॥१२॥
जिस प्रकार कुसुम्भ के फूलों से पहले पोला रंग आता है, उसी प्रकार सिराओं का वेध करने पर पहले दूषित रक्त निकलता है ।
वि० मन्तव्य—यह दुष्ट रक्त दोषानुसार वर्णवाला होता है, यथा-वायु से दूषित रक्त-अदृग-कालापन लिये लाल, कफ से दूषित रक्त-नीलापन लिये अथवा नीलापन लिये लाल, कफ से दूषित रक्त-सफेदी लिये लाल और त्रिदोष दूषित रक्त क्वाथ अथवा गोमूत्र के सहस्र वर्णवाला होता है । यह भी स्मरणीय है कि कुछ रक्त उत्क प्रकार का निकलकर शुद्ध रक्त आने लगता है और तब उसे रोंकने का उपाय करना चाहिये । रोंकने के उपाय देखिये सु० सू० अ० १४ पाठ ३६ । और यदि सिरावेध करने पर रक्त की उचित रूप से प्रवृत्ति न हो तो उत्क अ० १४ के पाठ ३५ के अनुसार उपाय करो । दूषित रक्त भी ६५ तों० से अधिक नहीं निकालना चाहिये एक बार में, आवश्यकता हो तो पुनः १०-२० दिन के पश्चात् सिरावेध कर देना चाहिये । इस प्रकार ३-४ अथवा १०-२० बार सिरा-वेध किया जाता है । आरोग्य लाभ या रोगशान्ति पर्यन्त अनेक बार ॥१२॥
मूर्च्छतस्तथातिभीतस्य श्रान्तस्य तृषितस्य च ।
न वहान्त सिरा विद्धास्तथाऽनुत्थितेत्यन्त्रिताः ॥१३॥
मूर्च्छित, बहुत डरे, थक हुए, प्यासे, एवं न उभरी, न बांधी हुई, सिराओं में वेधन करने पर रक्त भली प्रकार नहीं बहता ।
वि० मन्तव्य—सिरावेध होते ही, रक्त की गन्ध आते ही कोई २ रोगी मूर्च्छित हो जाता है तब रक्तछाव नहीं होता । अतिभीत, श्रान्त तथा तृषित का रक्त शाद्धा रहता है, अतः
भीत को आश्वासित करके, श्रान्त एवं तृषित का जल पिठाकर सिरावेध करना चाहिये ॥१३॥
क्षीणस्य बहुदोषस्य मूर्च्छयाऽभिहतस्य च ।
भूयोऽपराह्नि विस्त्राण्य साऽपरेद्युश्च्यहेऽपि वा ॥१४॥
क्षीण, बहुत दोषवाले, मूर्च्छा से पीड़ित व्यक्ति में सिरावेध अपराह्न में दूसरे या तीसरे दिन करना चाहिये ॥१४॥
रक्तं सशेषदोषं तु कुर््यादपि विचक्ष्णः ।
न चातिनिःसृतं कुर््याच्छेषं संशमनैर्जयेत् ॥१५॥
दूषित रक्त को भी सम्पूर्ण रूप से बाहर नहीं करना चाहिये । उस दोष से युक्त शेष रक्त की चिकित्सा संशमन विधि से करे ।
वि० मन्तव्य—इस श्लोक को भली भाँति समझने के लिये देखिये सू० अ० १४ का श्लोक ४३ । तथा ४४ । संशमन विधि है—रक्त शोधन क्वाथ आदि का पान ॥१५॥
बलिनो बहुदोषस्य वयःस्थस्य शरीरिणः ।
परं प्रमाणामच्छन्ति प्रस्थं शोणितमोक्षणे ॥१६॥
बलवान्, मजबूत, दोषवाले और तरुण व्यक्ति का रक्त अधिक से अधिक एक प्रस्थ ( १३३ पल ) निकालना चाहिये । कहा भी है—
“वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे ।
सार्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहूर्मनीषिणः” ॥१६॥
तत्र पाददाहपादहर्षचिप्पविसर्पवातशोणितवातकण्टकविचिचिकापादद्वारोप्रभृतिषु क्षिप्रसमर्पण उपरिष्टाद् द्रव्यकुले व्रीहिमुखेन सिरां विधेयत्, इक्षोपदे तत्तिक्रितिते यथा वक्ष्यते, क्रोष्टुकुशिरः खञ्जपकुलत्रातवेऽनासु जह्न्यायां गुल्फस्योपरि चतुरङ्कुले, अपच्यामिन्द्ररस्ते रथस्ताद् द्रव्यकुले, जानुसन्धेरुपथयो वा चतुरङ्कुले गुधस्यां, ऊरूमूलसन्नितां गलगण्डे, एतेनेतरसकथि वाहू च व्याख्यातौ, विरोतस्तु वामबाहौ कूर्परसन्धेरभ्यन्तरतो बाहुमध्ये प्लीहि कनिष्ठिकातामिकयोमध्ये वा, एवं दक्षिणबाहौ यक्ष्महाल्ये ( कफादरे च ) एतामेव च कासश्वासयोरप्यादिशन्ति, गुधस्यामिव विरवाच्यां, श्राणि प्रति समन्ताद् द्रव्यकुले प्रवाहिकायां शूलिन्यां, परिवर्ति कोपदंगशुक्रदाषशुक्रव्यापस्तु मेदमध्ये, (वृषणयोः पार्श्वमूत्रवृद्ध्यां, नाभेरधश्चतुरङ्कुले सेवन्त्या वामपार्श्वे दकोदरे), वामपार्श्वे कक्ष्मास्तनयोरन्तरेऽविद्रधौ पार्श्वशुले च बाहुशोषावबाहुकथोरप्येके वदन्यंसंयोरन्तरे, त्रिकसन्धिमध्येगतां तृतीयके, अधः स्कन्धसन्धिगतामन्यतरपार्श्वसंस्थितां चतुथके, हतुसन्धिमध्येगतामपस्मारे, शंखकेशान्तसन्धिगतामुरोऽपाङ्गल्ललाटेषु चोन्मादे, जिह्वारोगेष्वधोजिह्वायां दन्तठ्याधिषु च, तालुर्न तालुल्लेष, कर्णयोर्कुरि समन्तात् कर्णशुले तद्द्वोगेषु च, मन्त्रा-
८०८]
शारीरस्थानम्
३४९
प्रहणे नासारोगेषु च नासाग्रे, तिमिराक्षिपाकप्रशुतिष्व- ह्यामयेषूपनासिके ललाट-यामपाङ्ग्या वा, एता एव शिरोरोगाधिगम्यप्रशुतिषु रोगेविवति ॥१७॥
पाददाह, पादहर्ष, चिप्प, विसर्प, वातरक्त, वातकण्टक, विचर्चिका, पाददारी इत्यादि रोगों में क्षिप्र सर्ग के दो अंगुल ऊपर ब्रीहिमुख शस्त्र से सिरा वेध करे। श्लीपद में सिरा वेध इस रोग की चिकित्सा में कहेंगे। क्रोष्ठ शीर्ष, खड्ग, पंगुल तथा वातवेदना में—जंघा में—गुरुफ के ४ अंगुल ऊपर सिरावेध करे। अपची में इन्द्र वस्ति सर्ग के दो अंगुल नीचे सिरावेध करे। ग्रन्थरी में जानुसन्धि के चार अंगुल ऊपर या नीचे सिरावेध करे गलगण्ड में ऊरूमूल की सिरा का वेधन करे। इसी तरह दूसरी टाँग और दोनों बाहुओं के सिरावेध को सम- झना। विशेष भेद प्लीहा-रोग में वाम बाहु के मध्य में भीतर की ओर कूर्प सन्धि के समीप अथवा कनिष्ठिका और अनामिका के मध्य देश में सिरा वेध करे। इसी तरह यकृत दाल्युदर रोग में कास-श्वास में दक्षिण बाहु में सिरावेध करे। विश्वाची रोग में ग्रन्थरी के समान सिरावेध करे। शूलयुक्त प्रवाहिका में शोणी के चारों ओर दो अंगुल की दूरी पर सिरावेध करे। परिवर्त्तिका उपदेश शूक रोग और शुक्र रोगों में मेहन के मध्य में, मूत्रवृद्धि में वृषाणों के पाश्वों में उदकोदर में नाभि के नीचे, सीवनी के बाईं तरफ अंगुल पर सिरावेध करे अतः विद्रधि और पाश्वशूल में वाम कक्षा में, कक्षा और स्तन के बीच सिरावेध करना बाहुशोथ और अवबाहुक रोग में कन्धे के मध्य में सिरा वेध करे, ऐसा कई आचार्य कहते हैं। तृतीयकञ्चर में त्रिकसन्धि के मध्य की सिरा का वेधन करे। चतुर्थकञ्चर में किसी भी एक पाश्व में स्कन्ध सन्धि के नीचे सिरावेध करे। अपस्मार में हनुसन्धि के बीच में रहनेवाली सिरा का, अपस्मार और उन्माद में शंख तथा केशान्त सन्धिगत, वक्षस्थल, अपांग और ललाट में रहनेवाली सिराओं का वेध करे। जिह्वा रोग और वृन्त रोगों में जीभ के नीचे रहनेवाली सिराओं का वेध करे। तालु के रोगों में तालु में सिरा वेध करे। कर्ण पीड़ा और कर्ण रोगों में कानों के ऊपर चारों ओर सिरावेध करना चाहिये। गन्ध का ग्रहण न होने पर और नाक की बीमारियों में नाक के अग्र भाग में सिरा वेध करे। तिमिररोग, अक्षि- पाक आदि रोगों में नाक के समीप ललाट की या अपांग की सिराओं का वेधन करे। शिशोरोग, अधिमन्थ आदि रोगों में इन्हीं सिराओं में वेध करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—यद्यपि सिरा सर्वाङ्गशोथिनी होती है, क्योंकि सिरा में सर्व शरीरगामी रक्त का वहन होता है, (यदि उससे रक्त का वहन न होका जाय तो सारा रक्त निकल जाता है)।
तथापि रग्ग स्थान पर जैसे जलौका एवं सिनी आदि का प्रयोग किया जाता है, करने का विधान है और ठाम भी देखा जाता है, परन्तु यह एक विलक्षणता है कि अन्य स्थित रोग की शान्ति के लिये अन्यत्र सिरावेध किया जाता है और विभिन्न रोगों के लिये भिन्न भिन्न स्थानों में भी। यथा अपची रोग में इन्द्रवस्ति के नीचे, गलगण्ड में ऊरूमूल में। अस्तु, होगा कोई परस्पर सम्बन्ध ॥१७॥
दुष्टव्यधा विशतिः—दुर्विद्वाऽतिविद्वा कुञ्चित्वा पिच्छिता कुट्टिताऽप्रसृताऽत्युदीर्णाऽन्ते विद्वा परिशुष्का कृणिता वेपिताऽनुस्थितविद्वा शस्त्रहता तिर्यविद्वाऽप- विद्वाऽव्यधा विद्रता वेतुका पुनः पुनर्विद्वा सिरास्त्ना- यवस्थिसन्धिमर्म्मसु चेति ॥१८॥
दूषित रूप में वेधन हुई सिराई बीस हैं, यथा—दुर्विद्वा, अतिविद्वा, कुञ्चित्वा, पिच्छिता, कुट्टिता, अप्रसृता, अत्युदीर्ण, अन्ते- विद्वा, परिशुष्का, कृणिता, वेपिता, अनुस्थित विद्वा, शस्त्रहता, तिर्यग विद्वा, अपविद्वा, अव्यधा, विद्रता, वेतुका, पुनः पुनः विद्वा, मांस सिरा-स्त्नायु अस्थि और सन्धि मर्मों में विद्वा, इस प्रकार से दूषित वेधन बीस प्रकार का है।
वि० मन्तव्य—सिरा वेध की अकुशलता के कारण उक्त प्रकार के २० दुष्ट व्यध (वेध) हो सकते हैं और उनसे निम्न सू- १६ में लिखी व्यापद हो सकती हैं ॥१८॥
तत्र या सूक्ष्मशस्त्रविद्वाऽव्यक्तमस्तु क्लवति रुजाशो- फवती च सा दुर्विद्वा, प्रमाणतिरिक्तविद्वायामन्तः प्रविशति शोणितं शोणितातिप्रवृत्तिर्वा साऽतिविद्वा, कुञ्चित्वायामप्येवं, कुण्टगच्छप्रमथिता पृथुलोभावमापन्ना पिच्छिता, अनासादिता पुनरन्तयोश्च बहुशः शस्त्रभि- हता, कुट्टिता, जीतभयमूर्च्छाभिरप्रवृत्तशोणिता, अप्रसृता, तीक्ष्णमहामुखशस्त्रविद्वाऽत्युदीर्णा, अल्परक्तसाविष्यन्ते- विद्वा, क्षीणशोणितस्यानिलपूर्ण परिशुष्का, चतुर्भुगासा- दिता किंचित्प्रवृत्तशोणिता कृणिता, दुःस्थानवन्धनाद्वपमा- नायःशोणितसंसोहो भवति सा वेपिता, अनुस्थितविद्वा- यामप्येवं, छिन्नाऽतिप्रवृत्तशोणिता क्रियासङ्करी गन्त्रहता तिर्यक्प्रणिहितगन्धा किञ्चच्छेषा तिर्यग्विद्वा, बहुगः क्षता हीनगन्धप्रणिधानेनापविद्वा, अगन्त्रकृत्या अव्यधा, अन्- वस्थितविद्वा विद्रता, प्रदेशस्थ बहुशोऽवच्छटनादोद्द- व्यधा मुहूर्मुहुः शोणितस्त्वावा वेतुका सूक्ष्मशस्त्रव्यधा- द्विद्वा रुजा शोफैः क्लवैः मरणं चापादयति ॥१९॥
सूक्ष्मशस्त्र से वेधन करने पर थोड़ा रक्त आता हो, वेदना और घृजन हों, उसे दुर्विद्वा समझना। प्रमाण से अधिक वेधन
३४९
सुश्रुतसंहिता
[ १०० ]
होने पर रक्त शरीर के अन्दर हो, उसे अतिविद्धा जानना। कुक्षिता में भी अतिविद्धा के लक्षण होते हैं। कुण्डित शस्त्र से कुचली जाने के कारण चौड़ी हुई सिरा पिच्छिता कहाती है। सिरा के न मिलने पर पास की सिराओं में बार-बार वेषन करने पर कुक्षिता कहलाती हैं। शीत, भय, या मूर्च्छा से रक्त न निकलने पर अमसुता कहलाती हैं। तीक्ष्ण और बड़े मुखवाले शस्त्र से वेषन होने पर अत्युद्गीर्णा कहलाती हैं। शिरा के अन्तिम छोर पर वेषन करने पर थोड़ा सा रक्त निकलने पर अन्ते विद्धा कहलाती हैं। जिसका रक्त क्षीण होकर वायु भर गई हो उसे परिशुष्का कहते हैं। शस्त्र जब सिराके चौथाई भाग में ही प्रवेश करे, थोड़ा-सा रक्त निकले, उसे कृणिता कहते हैं। स्थान को छोड़कर सिरा को बाँधने से कर्पनेवालो सिरा का रक्त बाहर नहीं आता, इसे वेपिता कहते हैं। शिरा के न उठने पर भी वेषन करने पर वेपिता के लक्षण होते हैं उसे अनुस्थितविद्धा कहते हैं। शस्त्र से कटने के कारण बहुत मात्रा में रक्त निकले, सिरायें अपना कार्य न करें, उसको शस्त्रहा कहते हैं। तिरछा शस्त्र चलाने के कारण जो शिरा कटने से थोड़ी बच गई हो उसे तिर्यगविद्धा कहते हैं। हीन शस्त्र प्रयोग के कारण बहुत स्थानों पर चोट लगने पर अपविद्धा होती है। शस्त्र कर्म के अयोग्य सिराओं को अव्यध्या कहते हैं। चंचल सिराओं का वेषन होने से विदुता कहते हैं। शिरा प्रदेश के जोर से दबने पर जब शस्त्र से ऊपर ही ऊपर विद्ध हो जाते हैं और इन क्षता से रक्त बार-बार बहता हो, तो इसे वेनुका कहते हैं। सूक्ष्म शस्त्र के कारण बार-बार वेषन करने पर कटी सिराओं को पुनः पुनः विद्धा कहते हैं। मांस-सिरा-स्नायु सन्धि और अस्थि मर्म पर वेषन करने से पीड़ा, सूजन विकलता और मृत्यु होती है ॥१९॥
भवति चान्न—
सिरासु शिखितो नास्ति चला होता स्वभावतः।
मत्स्यवत् परिवर्तन्ते तस्माद्यन्तेन ताडयेत् ॥२०॥
इसमें श्लोक भी हैं—शिराओं में चंचलता (अस्थिरता)
स्वभाव से ही है। ये सिरायें मछली की तरह परिवर्तन करती हैं (मछली हाथ में आकर जैसे फिसल जाती है)। इसलिये सिराओं के विषय में उनकी जानकारी किसी को भी नहीं है। अतः इनका भेदन प्रयत्न पूर्वक करे ॥२०॥
अज्ञानता गृहीते तु अस्त्रे कायनिपातिते।
भवन्ति व्यापदश्चैता वहवृश्चाप्युपद्रवाः ॥२१॥
शस्त्र कर्म में अज्ञ व्यक्ति यदि शरीर पर शस्त्र चलाये तो पूर्वोक्त बहुत से रोग उत्पन्न होते हैं, और बहुत उपद्रव भी होते हैं ॥२१॥
स्नेहादिभिः क्रियायोगैर्न तथा लेपनैरपि।
यान्त्यासु व्याधयः शान्तिं यथा सम्यक् सिराव्यधात् ॥
स्नेहन, स्वेदन, अथवा लेपों से रोग उतनी अच्छी तरह जल्दी शान्त नहीं होते हैं, जितना सिरा वेष से जल्दी और अच्छी तरह शान्त होते हैं ॥२२॥
सिराव्यधश्चिकित्साधं शल्यतन्त्रे प्रकीर्तितः।
यथा प्रणिहितः सम्यग्बस्तिः कायचिकित्सिते ॥२३॥
शल्य तंत्र में सिरावेष चिकित्सा का आधा भाग है, जिस प्रकार कि काय चिकित्सा का बस्ति आधा भाग है। (यथा-तस्माच्चिकित्साधं सस्मिति ब्रुवन्ति, सर्वा चिकित्सामपि बस्तिमेकं चरकः)।
वि० मन्तव्य—सिरावेष का महत्त्व—शल्यशास्त्रिक रोग शान्ति के सब उपाय एक ओर और अकेला सिरावेष एक ओर अर्थात् यह अकेला ही सबके समान है, जैसे कायचिकित्सा में सभी संशमन उपाय एक ओर अकेला बस्ति प्रयोग एक ओर माना जाता है भगवान् पुनर्वसु ने तो कहा है कि बस्ति को कायचिकित्सा का आधा भाग है तो सभी आचार्य कहते हैं, परन्तु कुछ आचार्य उसे समस्त चिकित्सा मानते हैं अर्थात् बस्ति प्रयोग से सभी रोगों को पूर्ण चिकित्सा हो सकती है ॥२३॥
तत्र स्निग्धस्विन्नवान्तरिक्षास्थपितातुवासितसिराविद्धैः परिवर्त्यानि—क्रोधयासमैश्वेतद्विवास्वप्नवाग्वायामयानाध्ययनस्थानासनचन्द्रकमणशीतवातातपविरुद्धसात्त्याजोर्णान्यावल्लभात्, मासमेके मन्यन्ते। एतेषां विस्तरमुपरिष्टाद्धव्यामः ॥२४॥
स्नेहन, स्वेदन, वसन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन और सिरावेष करने पर क्रोध, परिश्रम, मेथुन, दिन में सोना, बहुत बोलना, व्यायाम, सवारी करना, पढ़ना, बैठना, खड़े रहना, घूमना, शीतल वस्तुयें, वायु, धूप विरुद्ध असाध्य-अजीर्ण भोजन, इनसे शरीर में बल आने तक बचा रहे। कोई आचार्य कहते हैं कि एक मास तक बचे। इनका विस्तर आतुरोपद्रव चिकित्सा में कहेंगे ॥२४॥
सिराविषाणतुम्बैस्तु जलौकामिः पदैस्तथा।
अवगाढं यथापूर्वं निर्हरेद् दुष्टशोणितम् ॥२५॥
दूषित रक्त को सिरामोक्षण, तुम्बी, जौक या पाछना से निकाले। पूर्व-पूर्व प्रकार गंभीर देश के लिये बरतना चाहिये। अतिशय गम्भीर होने पर सिरावेष करे, सबसे गहराई होने पर पाछे।
वि० मन्तव्य—इसके लिये देखिये सु० सू० अ० १३ ॥२५॥
अवगाढे जलौका स्यात् प्रच्छन्नं पिण्डिते हितम्।
सिराव्यध्यापके रक्ते शृङ्गलावृ त्वचि स्थिते ॥२६॥
अ० ६ ]
शारीरस्थानम्
३४३
खूब गहरे भाग में दूषित हो (एक-स्थान पर हो) तो जाँक लगाये, रक्त स्थान पर पिण्डित रूप में हो तो पाछना चाहिये। दूषित रक्त अङ्ग में फेला हो तो खिरा बेध करे। स्वचा में दूषित रक्त हो तो सींग या अलावु से निकाले।
चरक में—'भिषग्वातान्वितं रक्तं विषाणेन विनिर्हरेत् । पितान्वितं जलौकोभिः कफान्वितमलावुभिः ॥ यथासन्नं विकारस्य व्यधयेदाशु वा शिराम् ॥ चरक० चि० अ० २१।६८ ॥
वि० मन्तव्य—खुनना या गोदना भी "प्रच्छन" ही है, इसे "पच्छ लगाना" कहते हैं। स्थानिक वेदना शान्ति के लिये यह अच्छा उपाय है ॥२६॥
इति सुश्रुतसंहितायां शरीरस्थाने खिराव्यधविधिश्चारीरं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
अथातो धमनीव्याकरणं आरीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे धमनी व्याकरण शारीर की व्याख्या करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—धमनी का व्याकरण—विशेष आकार या विवरण इस अध्याय में किया गया है ॥१, २॥
चतुर्विंशतिधर्मन्यो नाभिप्रभवामभिहिताः तत्र केचिन्वाहः सिराधमनीक्षोतसामविभागः, सिरा विकारा एवं हि धमन्यः क्षोतांसि चेति । तत् न सम्यक्, अन्यथा एवं हि धमन्यः क्षोतांसि च सिराभ्यः, कस्मात् ? व्यञ्जना-न्यत्वात्, मूलसन्निभ्यमात्, कमवैशेष्यात्, आगमाच्छ-केवलं तु परस्परसन्निष्कषात् सृष्टशागमकर्मत्वात् सौक्ष्म्या-च्च विभक्तकर्मणामप्यविभाग इव कर्मसु भवति ॥ ३ ॥
नाभि से उत्पन्न होनेवाली धमनियाँ चौबीस कहीं हैं। इस में कई कहते हैं कि सिरा, धमनी, क्षोत, इनका परस्पर कोई भेद नहीं है, धमनियाँ और क्षोत सिराओं के ही रूपान्तर हैं। यह बात ठीक नहीं है, धमनियाँ और क्षोत सिराओं से अलग ही हैं, क्योंकि—इनके लक्षण (आकृति, विह्व) भिन्न हैं, इनके मूल भी भिन्न हैं, कर्म भी अलग हैं, शास्त्र में भी इनको पृथक् २ माना है। तथापि परस्पर में सम्बन्ध रहने से, शास्त्र में समान वचन मिलने से, साधारण कर्म के कारण, सूक्ष्मता के कारण, शिरा, क्षोत और धमनी के कार्य भिन्न होने पर भी ये सब एक से ही मालूम होते हैं।
वक्तव्य—"क्षोतांसि, खिरा धमन्यो रसवाहिन्यो नाड्यः पथानो, मार्गाः शरीरच्छिद्राणि संवाता संवृतानि स्थानानि आशयाः क्षया निकेताश्चेति शरीरं धात्ववकाशानां लक्ष्याणां नामानि भवन्ति ॥
(२) धमनाद् धमन्यः, सरणात् खिराः, खवणात् क्षोतांसि ॥ चरक, (३) आकाश से दो-खिरा-धमनी-क्षोत (इनकी सुधिरता) बनते हैं। यथा—आकाशीयवकाशानां देहे नामानि देहिनाम्। खिराः क्षोतांसि मार्गाः खं धमन्यो नाड्य आशयाः" ॥३॥
वि० मन्तव्य—धमनी के सम्बन्ध में जैसा विवाद श्रोण-नाथ सेन (दे० प्रत्यक्षशारीरं), श्री हरिप्रपन्नजी (दे० रस-योगसागर का उपोद्घात), श्रीगङ्गाधर शास्त्री, तथा श्रीवाणकर आदि सुप्रसिद्ध मनीषियों में आज चल रहा है वैशा ही श्री सुश्रुत के समय में भी चल रहा था, हम इस विवाद को विविध वाद मानते हैं, विरुद्ध वाद नहीं, परन्तु श्री गणनाथ सेन एवं गङ्गाधर शास्त्री आदि ने कुछ बहुत आगे बढ़कर लिख डाला है, उसका प्रतिवाद भी अनेक मनीषियों ने किया है। अस्तु, किसी शब्द या वाक्य आदि का अर्थ करने-लगाने—समझने की विधि भगवान् पुनर्वसु ने इस प्रकार बतलाई है कि—तन्त्र-कर्त्ता (शास्त्रकर्त्ता) के अभिप्राय को तथा तन्त्र युक्तियों को समझकर "अर्थ" प्रकृत अर्थ कहना चाहिये, अतः "धमनी" का अर्थ करने में शास्त्रकर्त्ता का अभिप्राय देखना बहुत आवश्यक है, तन्त्राध्येता को तन्त्रकर्त्ता की ही बुद्धि से अवगम करना (समझना) चाहिये। तभी सत्य अर्थ किया जा सकता है, दूसरे तन्त्र कर्त्ताओं की दृष्टि से देखना उचित नहीं और उससे अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है। देखें च० सू० अ० २६ श्लोक ३७। अर्थ भी दो प्रकार का होता है १—तात्त्विक या वास्तविक अर्थ और २—व्यावहारिक बोलचाल लेनदेन आदि विषयक अर्थ। यह दोनों ही अर्थ ठीक—बहुत ठीक या समीचीन होते हैं, यथा—पाश्चमोतिक होने के नाते हरड एवं बहेड़ा में कोई भेद नहीं, परन्तु हरड हरड है और बहेड़ा बहेड़ा। तत्त्वतः—केचित् आहुः—के कथनानुसार खिरा, धमनी एवं क्षोतसु में कोई भेद नहीं है, कारण १—अनेक आचार्य ऐसा कहते हैं, यथा-धमानात् धमन्यः, खवणात् क्षोतांसि, सरणात् खिराः, ओजोवहाः शरीरेऽस्मिन् विषम्यन्ते समन्ततः। चरक सू० अ० ३०। खिरा भी नाभिप्रभवा हैं और धमनी भी, सु० शा० अ० ६ सू० २ तथा सु० शा० अ० ७ श्लोक ४-५, धमन्यो रसवाहिन्यो धमन्ति पवनं तनो। शा० सं० आदि अनेक शास्त्र
१४४
सुश्रुतसंहिता
[ १०१ ]
वाक्यों के अनुसार रसवहन कर्म की समाप्ता से सिरा धमनी एक ही वस्तु है। रहा ध्यान का भेद या प्रश्न—ध्यान वस्तुतः सिरा एवं स्तोतों में भी होता है, यद्यपि वह अस्फुट या अत्युक्त होता है। अन्यथा रस आदि का सञ्चार ही नहीं हो सकता, यदि वायु भी रस आदि को धकेलता है तो वह ध्यान हुए बिना आगे नहीं सरक सकता है। इसी सूत्र में स्वीकार किया गया है कि सिरा का विकार (कार्य-रूपान्तर में परिवर्तन) ही धमनी है, क्योंकि हृदय सिरामर्म है और उसी में नाभि से आनेवाली तथा शरीर से आनेवाली सिरा आती हैं और यहाँ से आगे चलनेवाली सिराओं में धमन अधिक स्फुट या व्यक्त हो जाता है। परन्तु वह भी रस का या रसमय रक्त का ही वहन करती हैं और वही आगे चलकर “वहुधा फलन्ति” (च० सू० अ०) बहुत प्रतानों के रूप में फलित हो जाती है—फैल जाती है, अतः स्तोत्र कही जाती है, रस का वहन यहाँ भी होता है। धमन भलेही अस्फुट हो जाता है। अतः वस्तुतः रस वहन की दृष्टि से इनमें कोई भेद नहीं है। यह है तात्त्विक या वास्तविक अर्थ। आगे व्यावहारिक अर्थ सुनिये—इस प्रकार पूर्व पक्ष या अनेक महर्षियों के मत का प्रतिपादन करके भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं ‘तत् तु न सम्यक्’—अर्थात् वह उल्लिखित मत ठीक तो है, परन्तु बहुत ठीक नहीं, कारण—जिनको हम इस अध्याय में धमनी एवं स्तोतस् नाम से लिखेंगे, वे धमनी एवं स्तोतस् सिराओं से भिन्न हैं, क्योंकि उनका जो लक्षण लिखेंगे वह भी सिराओं से भिन्न है, मूलतः भी भिन्न है, अर्थात् मूलतः सिरा ४० कही हैं, परन्तु धमनियाँ २४ मानी हैं, कर्म भी भिन्न हैं अर्थात् हम शब्द, स्पर्श, रूप रस एवं गंध का वहन तथा लेपाऽम्यङ्ग आदि के वीर्य का वहन आदि कर्म धमनियाँ का मानेंगे। कहेंगे सिराओं का नहीं कहेंगे और हम आगम अर्थात् आसवचन का भी उदाहरण—प्रमाण उपस्थित कर सकते हैं, यथा—आगम में अनेकत्र—ऐसे वचन मिलते हैं जहाँ एक ही वाक्य में—सिरा धमनी तथा स्तोतस् का नामोल्लेख किया गया है, यथा—मर्मसिरास्नायुधमनीः परिहरन् शब्दकर्म कुर्यात् तथा—सू० अ० ११ के पाठ २६ में स्वार कर्म का त्रिषेध करते हुए—एक ही पाठ में सिरा और धमनी पढ़ा गया है। इन सब कारणों से हम सिरा से धमनी को पृथक् मानते हैं। यह सब व्यावहारिक अर्थ है, अतएव इसी सूत्र में “सदृशप्रमकर्मवात्” कहकर धन्वन्तरि भी स्वीकार करते हैं कि सिरा एवं धमनी को एक मानना कोई अनुचित नहीं है, क्योंकि आगम में अनेकत्र—सिरा एवं धमनी को पर्याय माना
है और दोनों का कर्म (रस वहन) भी एक ही है। यथा—आकाशीय (खोलले सुषिर) अवकाशानां देहे नामानि देहिनां। सिरा स्तोतांसि, मार्गाः खं धमन्यः (डल्हन) और स्तोतांसि, सिरा, धमन्यो, रसायिन्यः, रसवाहिन्यो नाङ्ग्यः—आदि शब्द पर्यायवाचक हैं। च० वि० अ० ५। और आगे इसी अध्याय में स्तोतों का नाम निर्देश करते समय लिखा है ‘एषु अधिकारः’ (सू० १२) अर्थात् हम इन्हीं को स्तोत्र कहेंगे। यह शास्त्रसमय है। स्तोतस् का विचार उक्त सू० १२ में किया जायगा। किमधिकम्।
इस समस्त कथानक का तत्पर्य यह है कि—सिरा कहिये अथवा धमनी दोनों का उद्भव नाभि (गर्भ की नाभि अर्थात् धृच्छी और जात प्राणी की नाभि नामक मर्म अर्थात् अन्त्र) से हुआ है—आरम्भ वहाँ से हुआ है और आगे चलकर सिरा ही हृदय रूप में परिणत हो गई हैं और हृदय से आगे सिरा ही धमनी रूप में परिणत हो गई हैं। अब उनमें केवल धमन स्फुट हो गया है, कर्म वही रसवाहन ही है। आगे चलकर सिरा ही अथवा धमन के भेद से धमनी ही स्तोतस् रूप में परिणत हो गई है, केवल स्तोतस् रूप में परिणत होने पर धमन अस्फुट हो गया है और आगे चलकर स्तोतस् ही सिरा रूप में परिणत हो गया है और जिस रस को लेकर सिरा—नाभि से चली थी, उसका समस्त शरीर में वितरण करके उसके द्वारा प्रत्येक सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवयव का तर्पण करके बचे-खुचे रस को लेकर हृदय में आ पहुँचती है और इधर नाभि से रस को लानेवाली सिरा भी रस लेकर आ पहुँचती है और जितना रस-शरीर तर्पण में व्यय होता है उसकी पूर्ति हो जाती है, फिर पूर्ववत् हृदय से धमनी द्वारा रस चल पड़ता है। यह क्रम जीवन भर चलता रहता है। यही सब कुछ—तत्र “रस गतो” वातुः—अहः रहः गच्छति इत्यतो रसः, तथा तत्र एतेषां वातूनां अन्तर्धानरसः प्रीणयिता (सू० सू० अ० १४ सू० १३-११) आदि वाक्यों का तत्पर्य है। कोई कुछ भी कहे, परन्तु अग्निवेष का सदा ध्यायी भेद-सिराओं के घूम फिरकर पुनः हृदय में पहुँचने को कथा को जानता था—यथा—हृदो रसो निःसरति तत एव च सर्वतः। सिरामिः हृदयं च एति तस्मात् हृत्प्रभवाः सिराः ॥ (भेद संहिता) अर्थात्—हृदय से रस निकलता है और सब और घूम फिर कर सिराओं द्वारा हृदय में आ जाता है, इसलिये—केवल इस कर्म को देखकर सिरा को “हृदय-प्रभवा”—हृदय से—उद्भूत होनेवाली कहा जाता है। ऐसे तो मूलतः सिरा नाभिप्रभवा ही हैं। पाठों से
अ० ६ ] ४४
शारीरस्थानम्
३४५
निवेदन है कि इस सन्दर्भ को समझने के लिये—सू० ५० अ० १४ का अध्ययन अवश्य करें। संक्षेपतः—सिरा में जहाँ धमन होता है वहाँ उसका नाम धमनी हो जाता है। ४० एवं २४ का विचार—स्यात्—नाभि से उद्भूत ४० सिराओं में १६ सिरा रसायनी हैं, जो रस को लेकर शरीर का तर्पण करती हैं और २४ वे हैं जो हृदय की ओर आकर रक्त को लेकर शरीर का तर्पण करती हैं ॥३॥
तासां तु खलु नाभिप्रभवार्णा धमनीनामूर्ध्वंगा दश, दश चाधोगामिन्यः चतस्रस्रित्यर्गगाः ॥४॥
नाभि से उत्पन्न होनेवाली इन दस धमनियों में दस ऊपर को दस नीचे को, और चार तिरछी जाती हैं ॥४॥
ऊर्ध्वंगाः शब्दरूपरसगन्धप्रश्वासोच्छ्वासजुम्भिततुद्धसितकथितरुदित्तादीन् विशोषानभिग्रहन्त्यः शरीरं धारयन्ति । तान्मु हृदयमभिप्रपन्नास्त्रिधा जायन्ते, ताभिः शत । तासां तु वातपित्तकफजोणितरसान् द्वे द्वे वहतस्ता दश, शब्दरूपरसगन्धान्प्राभिगृह्णीते, द्वाभ्यां भाषते, द्वाभ्यां घोषं करोति, द्वाभ्यां स्वपिति, द्वाभ्यां प्रतिबुध्यते, द्वे वाश्रुवाहिन्यो, द्वे स्तन्यं स्त्रिया वहतः स्तनसंश्रिते, ते एव शुक्लं नरस्य स्तनाभ्यामभवहतः, तास्त्वेताभिः शत सविभागा व्याख्याताः । एताभिर्लुब्धं नामेन्द्ररूपाश्वं प्रोष्टोः स्कन्धप्रोवाबाहुवो धार्यन्ते याप्यन्ते च ॥५॥
ऊपर को जानेवाली धमनियाँ—शब्द, रूप, रस, गन्ध, प्रश्वास, उच्छ्वास, जम्भाई, होंक, हंसना, बोलना, रोना इत्यादि को वहन करतीं हुई शरीर को धारण करती हैं। ये धमनियाँ हृदय में पहुँचकर तीन भागों में विभक्त होकर तीस बन जाती हैं। इनमें से वात, पित्त, कफ, रक्त आदि रस को दो दो वहन करती हैं, इस प्रकार ये दस होती हैं। आठ धमनियाँ शब्द, रूप, रस और गन्ध का वहन करती हैं। दो धमनियों से बोला जाता है। दो धमनियों से घोष (अव्यक्त शब्द) होता है। दो से सोया जाता है। दो से जागा जाता है। दो से आंसुओं का वहन करती हैं। दो स्त्री के स्तनों में रहती हुई दूध का वहन करती हैं। वे ही दो धमनियाँ पुरुषों के स्तन में से शुक्र का वहन करती हैं। इस प्रकार से तीस धमनियों का व्याख्यान कर दिया। इन्हीं से नाभि के ऊपर उदर, पार्श्व, पीठ, उर, स्कन्ध, प्रोवा और बाहु का धारण और पोषण होता है।
वि० मन्तव्य—ऊर्ध्वंगा धमनियाँ—शब्द, रूप, रस एवं गन्ध नामक चार ही विषयों का अभिवहन करती हैं और स्पर्श का अभिवहन तिर्यग्गा धमनियाँ करती हैं (दे० सू० ६)। भाषते और घोषते—भाष व्यक्त्यायां वाचि (श्वादिगण) अर्थात् व्यक्त-हकारादि व्यंजन युक्त वाणी का उच्चारण करता है और घोषते—
घुषि शब्दे (चुरादिगण) अर्थात् शब्द-अकारादि स्वरों का उच्चारण करता है। पाठक स्वयं अनुभव करें कि बोलने और चिल्लाने में नाभि पर बल-जोर पड़ता है कि नहीं। यदि पड़ता है तो समझिये कि धमनी नाभिप्रपन्ना है कि नहीं। जिन दो धमनियों के द्वारा भाषते-बोलता है वे वातिन्द्रिय का और जिन दो धमनियों द्वारा घोषते-पोषण करता है वे कण्ठ-गत स्वरवह अवयव का धारण एवं यापन करती हैं। यह वे हैं जिनका वर्णन अ० ६ सूत्र २७ में किया गया है। जिनके आघात से मूकता एवं स्वर वैकृत हो जाता है और अ० ७ में—“वाग्वहे च द्वे” कहकर जिनको अवैध्य माना है। इसी प्रकार शब्द आदि का वहन करनेवाली धमनियों को अ० ६ तथा अ० ७ में देखकर समझने का प्रयत्न किया जाय। सोना जागना भी धमनियों के द्वारा होता है, जब मनस एवं इन्द्रियाँ कलंकृत हो जाती हैं—यक जाती हैं, फलतः विषय ग्रहण से निवृत्त होती हैं तब मानव सोता है (च० सू० अ० ३१)। शब्द आदि विषयों का वहन धमनियाँ करती हैं, यक जाने पर वहन करना छोड़ देती हैं, फलतः निद्रा आ जाती है। धार्यन्ते और याप्यन्ते—इनके द्वारा धारण होता है—जीवन की स्थिति बनी रहती है, और रस का भी वहन करती है, अतः भरण्या-पोषण भी होता है और यापन अवयवों का सञ्चालन भी होता है। अतएव पक्षाघात में—“अधोगामा, तिर्यग्गामा तथा उर्ध्वदेहगा धमनी” का उल्लेख किया है (दे० नि० अ० १ श्लो० ६०)। धमनियों की विकृति से अवयवों का सञ्चालन घट जाता है—रुक् जाता है ॥५॥
भवति चात्र—
ऊर्ध्वगमास्तु कुर्वन्ति कर्माण्येतानि सर्वशः ।
इसमें श्लोक भी है—ऊपर को जानेवाली धमनियाँ इस प्रकार से इन सब कार्यों को करती हैं।
अधोगमास्तु वद्यामि कर्म चासां यथायथम् ॥६॥
अधोगमास्तु वातमूत्रपुरीषशुक्रातैवादीन्यधो वहन्ति । तान्मु पित्ताग्नयमभिप्रपन्नास्तत्रस्थमेवात्रापानरसं विप्रक्वमौषय्याद्विवेचयन्त्योऽभिग्रहन्त्यः शरीरं तर्पयन्ति, अर्पयन्ति चोर्ध्वगानां तिर्यग्गाणां च रसस्थानं चाभिपूरयन्ति मूत्रपुरीषस्वेदाश्च विवेचयन्ति, आमपक्वाशयान्तरे च डाधा जायन्ते, ताभिः शत, तासां तु वातपित्तकफजोणितरसान् द्वे द्वे वहतस्ता दश, द्वे अन्नवाहिन्यावन्नाश्रिते, तोयवहे द्वे, मूत्रबस्तिमभिप्रपन्ने मूत्रवहे द्वे, शुक्लवहे द्वे शुक्लप्रादुर्भावय द्वे विसर्गाय, ते एव रक्तमभिग्रहतो विमजतरश्च नारीणामार्तवसंज्ञं, द्वे वचोऽनिरसन्यो स्थूला-न्त्रप्रतिबद्धे अष्टावन्त्रास्तिर्यग्गामिनीनां धमनीनां स्वेदमर्पयन्ति, तास्त्वेताभिः शत सविभागा व्याख्याताः । एताभि-
३४६
सुश्रुतसंहिता
[ ७० ]
रघोनाभेः पक्वाशयकटीमूत्रपुरोषगुदबस्तिमेदस्कथोनि धार्यन्ते याप्यन्ते च ॥७॥
नीचे की तरफ जानेवाली धमनियों के कार्यों को ठीक प्रकार से कहता हूँ। अघोगामी धमनियाँ वायु (अपना वायु), मूत्र, मल, शुक्र, आर्त्तव, को नीचे की ओर वहन करती हैं। ये पिताशय में पहुँचकर अग्नि की उष्णिमा से भली प्रकार परिगक हुए अन्नरस और जलीय रसों का विवेचन और वहन करती हुई शरीर का पोषण करती हैं। ऊर्ध्वगत और तिर्यग्गत धमनियों को रस पहुँचाती हैं और रस स्थान (हृदय) को रस से भरती हैं। मूत्र, मल, स्वेद का अलग-अलग विभाग करती हैं। इन धमनियों के आमाशय और पक्वाशय के बीच में तीन विभाग होते हैं। इस प्रकार से ये तीस हो जाती हैं। इनमें से वात, पित्त, कफ, रस और रक्त को दो-दो धमनियाँ वहन करती हैं। इस प्रकार दस धमनियाँ हुईं। अंत्रों का आश्रय करके अन्न को ले जानेवाली दो, जल का वहन करनेवाली दो, मूत्राशय में मूत्र को ले जानेवाली दो, शुक्र की उत्पत्तिकरने के लिये शुक्र को ले जानेवाली दो, शुक्र को बाहर निकालने के लिये दो। ये ही दो धमनियाँ स्त्रियों में आर्त्तव का वहन करती हैं और विसर्ग करती हैं। स्थुलांत्र से सम्बद्ध दो धमनियाँ मल को निकालती हैं। शेष आठ धमनियाँ तिर्यक् जानेवाली धमनियों को स्वेद पहुँचाती हैं। इस प्रकार से तीस धमनियों का न्याख्यान कर दिया। अघोगामी धमनियाँ उपर्युक्त इन सब कार्यों को करती हैं।
वि० मन्तव्य—अघोगामा धमनियों के सम्बन्ध में—आपाततः यह नहीं समझना चाहिये कि मूत्र एवं पुरीष आदि धमनियों में से होकर निकलते हैं, अपितु यह समझना चाहिये कि ये धमनियाँ उन अवयवों का धारण एवं यापन करती हैं, जिनके द्वारा उक्त कार्य होते हैं। पिताशय—पित्त-पाचक पित्त का आशय अर्थात् कार्य करने का आशय अर्थात् अन्न। अन्न से अन्नपान के विपक्व रस को विवेचयत्यः अर्थात् अन्नपान में से पृथक् करके उसका वहन करती हुई शरीर का तर्पण करती हैं। मूत्रपुरीषस्वेदांश्च विवेचयन्ति—अर्थात् मलाशय में पहुँचे रसहीन अन्नपान = मलद्रव में से मूत्र एवं स्वेद अर्थात् मलद्रव के जलीयांश को पृथक् करती हैं। आगे चलकर यह जलीयांश उक्त रस में ही मिश्रित हो जाता है और रस, रक्त में और वृद्धों में जाकर रक्त से पृथक् होकर मूत्र रूप में परिणत हो जाता है और तिर्यग्गा धमनियों में पहुँच जाता है वह स्वेद रूप में परिणत हो जाता है। यह स्मरण रखना चाहिये कि अन्नपान का लक्षण-अधिकांश इसी जलीयांश के साथ शरीर में पहुँचता है। अतः एवं च मूत्र स्वेद में समान रूप से लक्षण रस पाया जाता है। द्वे अन्नवाहिन्या अन्नाश्रिते—ये वे धम-
नियाँ हैं, जिनके द्वारा अन्न में गति होती है और जिनको विकृति से अन्न की गति में रुकावट होने लगती है अथवा अवरोध हो जाता है रुकावट होने से अन्नपान विलम्ब से सरकता है, परन्तु पाचन में कोई न्यूनता नहीं आती है, अवरोध होने से आनाह नामक रोग हो जाता है, जिसमें अन्नपान वहीँ का वहीँ पड़ा रहता है—सरकता ही नहीं, इन दोनों दशाओं में भी रस का विवेचन करनेवाली धमनियाँ क्रियाशील रहती हैं। योगवहे द्वे—ये वे धमनियाँ हैं, जिनकी विकृति से तृषा उत्पन्न होती है—तृषा रोग संज्ञेयतः—दो प्रकार का देखा जाता है १—वह जिसमें जितना जल दिया जाता है वह विलीन होता रहता है और २—वह जिसमें आमाशय में जल भरा रहता है—पर शोष है, मुख शोष आदि होते रहते हैं। इसे सु० उ० अ० ४८ के श्लो० ८ में “क्षोतीनिरोधो” कहकर सूचित किया गया है। मूत्रवहे द्वे—ये मूत्रवह क्षोतों का धारण एवं यापन करती हैं। शुक्रवहे द्वे—जो अण्डकोश का और द्वे विसर्गाय—शुक्रवाही क्षोतों का धारण एवं यापन करती हैं। और ये शुक्र के साथ २ नारियों के आर्त्तव का उत्पादन एवं विसर्जन करती हैं अर्थात् उन अवयवों का जहाँ शुक्र एवं आत्तव का निर्माण होता है और जिनके द्वारा विसर्जन होता है धारण एवं यापन करती हैं। स्थुलान्न (मलाशय) में सम्बद्ध वे दो धमनियाँ—जिनके धमन से पुरीष का निरसन-बहिर्निर्गम होता है, यदि ये निष्क्रिय हो जाती हैं तो पुरीष निकलता ही नहीं, बसित द्वारा दो गयी औषध भी लौटकर नहीं आती। स्थुलान्न में आठ धमनियाँ और हैं जो तिर्यग्गामा धमनियों को स्वेद-नलद्रव में से जलीयांश का समर्पण प्रदान करती हैं। उक्त कार्यों के अतिरिक्त वे—पक्वाशय आदि का धारण एवं यापन करती हैं, तत्स्थानपि-गर्भाशय का भी धारण यापन करती हैं। पाठक एक सचाई पर ध्यान दें—ऊर्ध्वगा धमनियाँ हृदय में जाकर २० हो जाती हैं। उनमें से १०—वात, पित्त, कफ, शोणित तथा रस का वहन करती हैं और अघोगामा धमनियाँ आमाशय एवं पक्वाशय के मध्य (अन्न या नाभिमर्म) में उपन्य होती हैं और उनमें से १० धमनियाँ—वात, पित्त, कफ, शोणित एवं रस का वहन करती हैं। पिताशय—(पित्त के कार्य का स्थान—अन्न-नाभि नामक मर्म ग्रहणी) से अन्नपान रस को लेकर समस्त शरीर का तर्पण करती हैं और रसस्थान—हृदय का अभिपूर्णण करती हैं। तात्पर्य यह है कि नाभि से उत्पन्न (नाभिप्रभवा) धमनी है, वे ही हृदय में रस पहुँचाती हैं। हृदय से उत्तम ध्यान स्फुट हो जाता है यही एकमात्र कारण है जो सिरा को ही धमनी कहने-कहलाने के लिये प्राचीन तथा अर्वाचीन लेखकों को बाध्य करता है ॥६॥७॥
४०६]
शरीरस्थानम्
३४७
भवति चात्र—
अधोगामास्तु कुर्वन्ति कर्माण्येतानि सर्वैशः । तर्जंगाः संप्रवद्व्यामि कर्म चासां यथायथम् ॥८॥ तिर्जंगाणां तु चतसृणां धमनीनामेकैका शतधा सह- स्रधा चोत्तरोत्तरं विभज्यन्ते, तास्त्वसङ्ख्येयाः, ताभिर्द- शरीरं गवाक्षितं विवद्वमाततं च, तासां मुखानि रोम- कूपप्रतिबद्धानि, यैः स्वेदमभिवहन्ति रसं चाभितर्पयन्त्य- न्तर्बहिश्च, तैरेव चाभ्यङ्गपिपेकावगाह्यलेपनवीर्याण्यन्तः- शरीरमभिप्रतिपद्यन्ते त्वच्च विपक्वानि, तैरेव च स्पर्श- मुखमुखुं वा गृह्णाति, तास्त्वेताश्चतस्त्रो धमन्यः सर्वाङ्ग- गताः सविभागा व्याख्याताः ॥९॥
तिर्जगत् धमनियों को और इनके कार्यों को कहता हूँ— चार तिर्जगत् धमनियों में प्रत्येक धमनी उत्तरोत्तर सैकड़ों और हजारों विभागों में विभक्त होती है। इस प्रकार से इनके विभाग असंख्य हो जाते हैं। इन धमनियों से यह शरीर गवाक्षित (झरोखों के रूप में माल के समान) के रूप में बंधा हुआ एवं फैला रहता है। इन धमनियों के मुख रोमकूपों से मिले रहते हैं। इनके मुखों के द्वारा पसीने का वहन होता है, ये रस द्वारा, अन्दर और बाहर तर्पण करती हैं। इनके मुखों से त्वचा पर क्रिया अभ्यंग, परिपेक, अवगाहन, आलेपन, आदिकावीर्य शरीर के अन्दर पहुँचता है। इन्हीं के द्वारा मुख- कर और असुखकर स्पर्श ग्रहण क्रिया जाता है। इस प्रकार शरीर शरीर में फैले ये चार धमनियों विभाग के साथ कह दी हैं।
यथा स्वभावतः खानि मृणालेषु बिसेषु च ।
धमनीनां तथा खानि रसो यैरुपचीयते ॥१०॥
जिस प्रकार कमलनाल और विस में स्वभाव से स्रोत रहते हैं, उसी प्रकार धमनियों में छिद्र होते हैं, जिनसे रस का ग्रहण ये करती हैं। (मृणाल जिस प्रकार छेदों से रस खींचते हैं, उसी प्रकार धमनियाँ रस को ग्रहण करती हैं) ॥१०॥
पञ्चाभिभूतास्त्वथ पञ्चकृत्वः
पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयन्ति ।
पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयित्वा
पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले ॥११॥
पंचाभिभूताः (पंचमहाभूतों से उत्पन्न हुई धमनियों) पञ्च- न्द्रिय (पींच इन्द्रियोंवाले कर्म पुरुष को) पंचसु (कान, नाक, जिह्वा, त्वचा, नेत्र इनके अधिष्ठानों में), पंचकृत्वः (पर्याय- कम से पांचवार) भावयन्ति (नियुक्त करती हैं)। पंचेन्द्रियं (सदृशरूप इन्द्रिय पंचक को) पञ्चसु (आकशादि पंच महाभूतों में), भावयित्वा (नियुक्त करके) विनाशकाले (नाश होने के समय में) पञ्चत्वं (नाश को), आयान्ति (प्राप्त होती हैं)।
वक्तव्य—इस प्रकार से ये धमनियाँ पृथ्वी आदि पंच महाभूतों से उत्पन्न होकर प्राणियों को कान नेत्र आदि में पींच बार लगाती हैं। प्राणियों के नाश होते समय ये धमनियाँ सूक्ष्म शरीर को पंचमहाभूतों में समाप्त करती हुई स्वयं नष्ट ही जाती हैं। ज्ञान अलग-अलग होता है, इसलिये पंचवारात् शब्द कहा है। क्योंकि ज्ञान में मन का संयोग इन्द्रियों के साथ अवश्य है। मन एक है—अणुत्वमथ एकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ—एक समय में मन एकही इन्द्रिय के साथ संयुक्त हो सकता है, इसलिये पंचवारात् कहा है।
वि० मन्तव्य—पञ्चत्वं आयान्ति विनाशकाले—विनाश काल-मृत्यु काल में पञ्चत्व-पञ्चमहावशेषत्व को प्राप्त हो जाती हैं अर्थात् धमनियों का स्वरूप केवल पञ्चमहाभूतमय रह जाता है और उनका ध्यान ही जीवन है जिस क्षण में गर्भाधान होता है उसी क्षण में—स्फुरणं च योनेः (सु० शा० अ० ३-३३) गर्भाशय में जो स्फुरण होता है वही आगे चलकर ध्यान कह- लाता है और वह जीवन भर सदा सर्वदा होता रहता है और जब वह ध्यान रुक जाता है तब मृत्यु हो जाती है, जीवन की यही कहानी है ॥११॥
अत ऊर्ध्वं स्रोतसां मूलविद्वलक्षणमुपदेक्ष्यामः। तानि तु प्राणाञ्चोदकरसरक्तमासमेदामूत्रपुरीषशुक्रातैवहानि, येष्वधिकारः एकेषां बहूनि, एतेषां विशेषा बहुवः। तत्र प्राणवहे द्वे; तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्वत्स्याक्रोशन्विनमनमोहनभ्रमणवेपनानि मरणं वा भ- वति; अन्नवहे द्वे, तयोर्मूलमांसाशयोऽन्तवाहिन्यश्च धम- न्यः, तत्र विद्वत्स्याधमानं शूलोऽन्तद्वेषरक्षिः पिपासाऽऽन्धं मरणं च, उदकवहे द्वे, तयामूलं तालु क्लोम च, तत्र विद्वत्स्य पिपासा सद्योमरणं च, रसवह द्वे, तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्वत्स्य गाषः प्राणवहावद्वत्त्व मरणं, तर्ल्लङ्गानि च, रक्तवहे द्वे, तयोर्मूलं यकृतःप्लाहानो रक्तवाहिन्यश्च धमन्यः यत्र विद्वत्स्य श्यावाङ्गता ज्वरो दाहः पाण्डुता शोणितागमनं रक्तनेत्रता च, मांसवहे द्वे, तयोर्मूलं स्नायुत्वचं रक्तवहाश्च धमन्यः, तत्र विद्वत्स्य क्षयशुर्मांसशोषः सिरप्रन्थयो मरणं च, मेदोवहे द्वे, तयो- र्मूलं कटी बुक्की च, तत्र विद्वत्स्य स्वेदागमनं स्निग्धाङ्गता तालुशोषः स्थूलशोफता पिपासा च, मूत्रवहे द्वे, वस्तिमहं च, तत्र विद्वत्स्यान्तद्ववस्तिता मूत्रनिरोधः स्तब्धमेदता च, पुरीषवहे द्वे, तयोर्मूलं पक्षाशयो गुदं च तत्र विद्व- स्यानाहो दुर्गन्धता प्रथितान्व्रता च, शुक्रवहे द्वे, तयोर्मूलं स्तनो वृषणो च, तत्र विद्वत्स्य क्लीवता चिरात् प्रसेको रक्तशुक्रता च, आतैववहे द्वे, तयोर्मूलं गर्भाशय आतैव-
३४८
सुश्रुतसंहिता
[वि०]
वाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्राया वन्ध्यात्वं मैथुनासहि- ण्यत्वमार्तवनाशश्च, सेवनोच्छेदाद्रुजाप्रादुर्भावः, वस्ति- गुदविद्रलक्षणं प्रागुक्तमिति। स्तोतविद्रं तु प्रत्याख्यायो पचरेत्, उद्भूतजल्यं तु क्षतविधानेनोपचरेत् ॥१२॥
इसके आगे स्तोतों के मूल में विद्र होने से उत्पन्न लक्षणों को कहेंगे-ये स्तोत प्राणवह, अन्नवह, उदकवह, रसवह, मलवह शुक्रवह, आर्त्तवह हैं, इन्हीं स्तोतों का (योगवाही) शल्य तंत्र में वर्णन है। एक स्तोत के बहुत से भेद हैं, इनके फिर बहुत से भेद होते हैं। इनमें प्राणवह स्तोत दो हैं:—इनका मूल हृदय और रसवाहिनी धमनियाँ हैं। इनके विद्र होने से चिह्नाना, झुकना, मूर्च्छा, चक्कर आना, कम्पन अथवा मृत्यु भी हो जाती है। अन्नवह स्तोत दो हैं। उनका मूल आमा- शय और अन्नवाहिनी हैं। इनका वेधन होने पर आधमान, शल्ल, अन्न में द्वेष, वमन, प्यास, अन्धापन और मृत्यु होती है। उदक वह स्तोत दो हैं, इनका मूल तालु और क्लोम है। इनका वेधन होने पर प्यास, और तुरन्त मृत्यु होती है। रसवह दो स्तोत हैं, इनका मूल हृदय और रसवाहिनियाँ हैं। इनका वेधन होने पर शोष, प्रणवहा स्तोतों के विद्र होने पर होनेवाले लक्षण और मृत्यु होती है। रक्तवह स्तोत दो हैं, इनका मूल यकृत, प्लीहा और रक्तवाहिनी धमनियाँ हैं। इनका वेध होने पर अंगों में श्यावता, ज्वर, दाह, पाण्डुता, रक्त का आना और आँखों में सुखी होती है। मांसवह स्तोत दो हैं— इनका मूल स्नायु-त्वचा और रक्तवहा धमनियाँ हैं। इनका वेधन होने पर शाय, मांस शोष, शिराओं में गाँठें और मृत्यु होती है। मेदोवह स्तोत दो हैं—इनका मूल कटी और दो वृक्क हैं। इनमें वेधन होने से पसीने का आना, अंगों में स्तम्भता, तालु शोष, मांटी (गहरी) सूजन और प्यास होती है। मूत्रवह स्तोत दो हैं, इनका मूल वस्ति और मेहन है, इनके विद्र होने से वस्ति में फूलाव, मूत्र का अवरोध और मेहन में स्तम्भता होती है। पुरीषवह स्तोत दो हैं, इनका मूल पक्वाशय और गुदा है। इनमें वेधन होने से आनाह, दुर्गन्धता, आँतों में गाँठ पड़ना होता है। शुक्रवह स्तोत दो हैं, इनका मूल स्तन और दोनों वृषण हैं, इनके विद्र होने पर नपुंसकता, शुक्र का देर में क्षरण, और शुक्र के साथ रक्त आना होता है। आर्त्तवह स्तोत दो हैं—इनका मूल आर्त्तव- हा धमनियाँ और गर्भाशय है। इनका वेधन होने पर वन्ध्यापन, मैथुन की असहिष्णुता, आर्त्तव नाश होता है। सेवनी के कटने से वेदना उत्पन्न होती है। वस्ति, गुदा के विद्र होने पर होनेवाले लक्षण पहले कह दिये हैं। स्तोतों के
विद्र होने पर असाध्य कहकर चिकित्सा करे। स्तोतों में से शल्य निकालकर क्षतविधि से चिकित्सा करनी चाहिये।
वक्तव्य—सुश्रुत ने ये ग्यारह (दो के योग से बाईस) योग- वाही स्तोत कहे हैं। चरक में—स्तोतांसि दीर्घायाङ्कृत्या प्रतान- सहशानि। स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यण्नि च। तथा प्राणोदकान्नरसधिरमांसमेदोऽस्थिमजाशुक्रमूत्रपुरीषस्वेदवहा- नीति, वातपित्तश्लेष्मणाः पुनः सर्वशरीरचराणां स्तोतांख्यम- भूतानि ॥
अतिप्रवृत्तिः संगो वा सिराणां प्रन्थयोरपि। विमार्गो नाम वाऽपि स्तोतसां दुष्टि लक्षणम् ॥ आहारश्च विहारश्च यः स्यादो- षगुणेः समः। धातुभिर्विगुणश्चापि स्तोतसां स प्रवृध्कः ॥ चरक विमा० अ० ५३-३१-३२॥
वि० मन्तव्य—स्तोतस्—सु गतौ धातु (भ्वादि गणीय) से स्तोतस् शब्द निष्पन्न है, अर्थ है जिसमें से गति हो। प्राण अन्न एवं उदक आदि की गति जिनमें से होती है उनका ही नाम 'स्तोतस्' है। यह अर्थ इसी प्रकरण को ध्यान में रखकर किया गया है, क्योंकि इस प्रकरण में यही ११ स्तोतस् माने जाते हैं। भले ही अनेक आचार्य-बहुत असंख्य स्तोतस् मानते हैं—यथा-पुरुष में (नर नारी के शरीर में) जितने भी मूर्तिमान् भाव विशेष हैं उतने ही इसमें स्तोतों के प्रकार विशेष हैं, क्योंकि सभी भाव स्तोतों के बिना न उत्पन्न होते हैं और न क्षय को प्राप्त होते हैं, सब यह है कि—स्तोतस्— परिणाम-परिपाक (कारण से कार्य रूप में परिणत होने के लिये क्रियाशील धातुओं का अभिवहन करनेवाले) हैं, केवल मार्ग के अर्थ में अर्थात् जब रस रक्त रूप में परिणत होना चाहता है, तब स्तोतस् नामक मार्ग से वहाँ पहुँचता है जहाँ वह रक्त रूप में परिणत हो सकता है। कुछ आचार्य तो स्तोतों के समुदाय को ही पुरुष मानते हैं, क्योंकि स्तोतस् सर्व शरीर- व्यापी हैं और दोनों को प्रकृपित तथा प्रशान्त करनेवाले भाव- शरीर में सर्वत्र गति शील देखे जाते हैं, परन्तु उनका यह कहना सम्यक् नहीं है, क्योंकि—ये स्तोतस् जिसके (जिसे शरीर के) हैं और जिसका वहन (ले जाना) तथा आवहन (लेआना) करते हैं, वह सब उन स्तोतों से भिन्न है। पाठक इस सन्दर्भ को एक उदाहरण से समझें—किसी ने कहा कि नगर गलियों का ही समुदाय है। यद्यपि यह कहना भूत नहीं है,
१ क्लोम से फेरिक्स (pharynx) लेना चाहिये। गर्भविस्था में मुख के स्थान पर एक गद्दार रहता है जिसे कोईलम (coe- lom) और स्टोमोडेयम (stomodeum) कहते हैं। ये दोनों पीछे एक छिक्कली से अलग हो जाते हैं। क्लोम और कोईलम आपस में प्रायः मिलते हैं।
अ० १० ]
शारीरस्थानम्
३४२
तथापि सम्यक् भी नहीं है, क्योंकि जिन भवनों के कारण गलियाँ बनी हैं और, गलियों के मार्ग से जो वस्तुओं का ले जाना और ले आना होता है वह सब गलियों से भिन्न है। दोनों और भवन बन जाने से गली कही जाती है। वस्तुतः भवनों के समुदाय का नाम नगर है। इस सबका तात्पर्य यह है कि उन मार्गों का नाम खोतस है जिनके द्वारा शरीर गत द्रव्यों का एक स्थान से दूसरे स्थानों से आना-जाना होता है। मूल-विद्ध—शस्त्र तन्त्र की दृष्टि से यहाँ विद्ध अर्थात्—वेध होने से उत्पन्न लक्षण कहने की प्रतिष्ठा की गई है, परन्तु वेध के अतिरिक्त वातादि दोषों द्वारा प्रदुष्ट होने से भी विकार उत्पन्न हो जाते हैं। तदर्थं च० वि० अ० ५ देखिये ॥ १२ ॥
भवति चात्र— मूलात् खादन्तरं देहे प्रस्तुं त्वभिवाहि यत् । स्रोतस्तदिति विज्ञेयं सिराधमनिर्वर्जितम् ॥ १३ ॥ इसमें श्लोक भी है—शरीर में मूल छेद से आरम्भ हुए, रसको ले जानेवाले अन्तर ( छिद्र या अवकाश को स्रोत जानना चाहिये ॥ १३ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने धमनीव्याकरणशारीरं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
दशमोऽध्यायः
अथातो गभिणीव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके आगे गभिणी व्याकरण शारीर की व्याख्या करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १,२ ॥
गभिणी प्रथमदिवसान् प्रभृति नित्यं प्रहृष्टा शुच्य- लङ्कृता शुक्लवसना शान्तिमङ्गलदेवताब्राह्मणगुरुपरा च भवेत्, मलिनविकृतहोनागत्राणं न स्पृशत्, दुर्गन्धदुर्दुर्श- नानि परिहरेत्, उद्रेजनीयाश्च कथाः, शुष्कं पशुषत् क्षुधितं किलञ्च चात्रं नापमुञ्जोत, बहिर्निष्क्रमणं शून्या- गारचैत्यशमशान्तुष्माश्रयान् क्राधमयशस्करांश्च भावानु- च्छर्भाध्यादिकं च परिहरेद्यानि च गर्भं नापादयन्ति, न चामिर्णं तेलाम्भ्यङ्गोस्तादनादीनि सेवेत्, न चायासये- च्छरीरं, पूर्वोक्तानि च परिहरेत् शयनासनं मृद्वास्तरणं नायुरुचमपाश्रयोपेतमसंबाधं च विदध्यात् हृव्यं द्रवमधुर- प्रायं स्निग्धं दीपनीयसंस्कृतं च भोजनं भोजयेत्। सामा- न्यमेतदाप्रसवात् ॥ ३ ॥
गर्भवती स्त्री प्रथम दिन से ही लेकर सभी दिनों में नित्य सब मनवाली, पवित्र, अलंकारों को धारण किये, रवेत वस्त्र
धारण करनेवाली, शान्तिपरायण, मंगलकारी, ( स्वस्ति वाचन पढ़नेवाली ), देवता, ब्राह्मण, गुरु की सेवा ( पूजा ) करनेवाली हो। मलिन, विकृत या हीनांगों का स्पर्श न करे। दुर्गन्ध एवं बुरे दृश्यों का त्याग करे। बेचैनी उत्पन्न करनेवाली कथायें न सुने। शुष्क, बारी, सड़े गले अन्न को न खाये। घर से बाहर निकलना, सूते घर में जाना, चैत्य, शमशान, वृक्ष के नीचे रहना छोड़ दे। क्रोध एवं भय तथा निन्दित पदार्थों को, ऊँचे से बोलना आदि को और जिन कारणों से गर्भ को नुकसान पहुँचाता है, उनको छोड़ देवे। बार २ तैल का अभ्यङ्ग और उत्सादन ( उबटन ) लगाना छोड़ देवे। शरीर से मेहनत न करे और गर्भावक्रान्ति में कहे अपथ्यों को छोड़ देवे। शय्या, एवं आसन कोमल, बिछे हुये, बहुत ऊँचे नहीं होने चाहिये। इनमें सहारा-आश्रय रहना चाहिये, ये पीड़ा कारक यातङ्ग छोटे न हों। मन के लिये प्रिय, द्रव, मधुर रस की अधिकतावाले, स्निग्ध, अग्निवर्धक दीपनीय द्रव्यों से संस्कृत भोजन को खाये। प्रसूति होने तक के लिये यह साधारण नियम है।
वक्तव्य—सौमनस्यं गर्भाधारकाणां श्रेष्ठतमः। चरक। अपाश्रयोपेतम्—चैदोषा लगाया ( जयदेव )। अपाश्रयवन्द्वात-पश्चेति पर्यायो-हारणचन्द्रः। अपाश्रयोपेतं—प्रतिवाहकसहित-मिति ढल्हणः।
वि० मन्तव्य—यानि च गर्भं व्यापादयन्ति—जो आहार-विहार तथा औषध गर्भ का व्यापादन ( विकृत करना ) तथा व्यवय, व्यायाम आदि ( दे० शा० अ० ३-१६ ) और च० शा० अ० ८ सू० ३१ और ३२। चैत्य—देवताधिष्ठित वृक्ष—ग्रामवासियों के विश्वासानुसार जिस देवता का निवास माना जाता है, अथवा बौद्धविहार या संन्यासियों का आश्रय। अयशस्कर भाव-जिन कार्यो से अपयश हो। अपाश्रयोपेत-शयन-शय्या तथा आसन-पीड़ा-गद्दी आदि पर सिरहाना-तक्रिया आदि आश्रय-पीठ की ओर सहारा देनेवाला हो। असम्बाध-जिस पर कर्षट-पार्श्वपरिवर्तन, पाद प्रसारण आदि में बाधा न हो ॥ ३ ॥
विशेषतस्तु गभिणी प्रथमद्वितीयतृतीयमासेषु मधुर- शोतद्रवप्रायमाहारमुपसेवेत्; विशेषतस्तु तृतीये षष्ठिकौ- दनं पयसा भोजयेत्, चतुर्थं दध्ना, पञ्चमे पयसा, षष्ठे सर्पियेत्के; चतुर्थं पयोन्नवनीतसंसष्टमाहारयेउजाङ्गल- मांससहितं हृयमन्नं च भोजयेत्, पञ्चमे स्त्रीरसपिःसंसृष्टं, षष्ठे श्वदृष्टसिद्धस्य सर्पिषो मात्रां पाययेद् यवागू वा, सप्तमे सर्पः प्रथकपुण्यादिसिद्धम्, एवमाप्यायते गर्भः, अष्टमे बदरोदकेन बलातिबलाजतपुष्पापल्लपयोदधि- मस्तुतैलवणमदनफलमधुघृतमिश्रणास्थापयेत् पुराणपु- रीषशुद्धयर्थमनुलोमनार्थं च वायोः ततः पयोमधुरकषाय-
३५०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
सिद्धेन तैलेनानुवासयेत्, अनुलोमे हि वायोः सुखं प्रसूयते निरुपद्रवा च भवति, अत ऊर्ध्वं स्निग्धाभिर्यवागृभिर्जी- ङ्गलरसैश्चोपक्रमेदाप्रसवकालात् ; एवमुपक्रान्ता स्निग्धा बलवती सुखमनुपद्रवा प्रसूयते ॥ ४ ॥
विशेष करके गर्भवती प्रथम द्वितीय तृतीय महीनों में मधुर शीत-द्रव बहुल आहार का सेवन करे। विशेष करके तीसरे महीने में साठी के मात को दूध से खाये। चौथे महीने में दही से, पाँचवें में दूध से और छठे में घी से खाये ऐसा कई कहते हैं। चौथे महीने में दूध और मक्खन मिला भोजन करे, और जांगल मांस के साथ मन के लिये प्रिय अन्न खाये। पाँचवें में दूध से निकाले घी से मिलाकर (या दूध और घी से) खाये। छठे महीने में गोखरू से सिद्ध किया घी मात्रा से पिलाये। सातवें में विदारिगन्धादि से सिद्ध किया घी मात्रा से पिलाये। इस प्रकार करने से गर्भ पुष्ट होता है। आठवें में बैरों के पत्तों के पानी में बला, अतिबला, रॉफ, तिलकल्क, दूध, दही, मस्तु, तैल, लवण, मेनफल, मधु, घी मिलाकर आस्थापन वस्ति देवे। जिससे पुरातन मल का शोथन हो जाये और वायु का अनु- लोमन हो। फिर दूध और वायु का कोल्त्यादि मधुर गण से सिद्ध तैल से अनुवासन दे। वायु का अनुलोमन होने पर सुख पूर्वक प्रसव होता है और कोई उपद्रव नहीं होता। इसके आगे स्निग्ध यवागृ से एवं जांगल मांस रस से प्रसव काल आने तक भोजन देता रहे। इस प्रकार परिचर्या करनेपर स्निग्ध, बलवान्, उपद्रव रहित रहते हुए सुख पूर्वक प्रसव करती है।
वक्तव्य—छठे या सातवें मास में प्रायः मूल में एल्लुमिन आता है। इस बात का यह चिह्न है शरीर में विष की अधि- कता है, इससे पैरों पर तथा मुख में सूजन आ जाती है। इसीलिये इस समय मूत्रल और विषनाशक उपचार बताया है। गोखरू मूत्रल है। और घृत विप्रनाशक है, यथा—‘वातपित्त- विघोषन्मादशोषाच्छमीञ्चरापहम्’ चरक। विषकी अवस्था में घृत पान कराते हैं—‘दातव्यं सर्वरोगेषु (विषेषु) घृताशिनी हिताशिनी।’
चरक में—‘अतश्चैवास्याः तैलपिन्धु योनी प्रणयेत् गर्भ- स्थापनमार्गस्तेहनाथम् ॥’ इस विधि को बरतने पर प्रसव के समय होनेवाला योनिदारण नहीं होता ॥ ४ ॥
नवमे मासि सूतिकागारमेनां प्रवेशयेत् प्रगस्ते तिथ्यादौ। तत्रारिष्टं ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राणां श्वेत- रक्तपीतकृष्णेषु भूमिप्रदेशेषु विल्वन्यम्रोधतिन्दुकभलातक- निर्मितं सर्वागारं यथासङ्ख्यं तन्मयपर्यङ्कं समुपलिप्त- मिति सुविभक्तपरिच्छदं प्राग्द्धारं दक्षिणद्वारं वाऽष्टहस्ता- यतं चतुर्हस्तविस्तृतं रक्षामङ्गलसंपन्नं विधेयम् ॥ ५ ॥
नवम मास लगने पर गर्भवती को सूतिका घर में प्रवस्त तिथि आदि का विचारकर ले जाये। सूतिका घर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिये क्रमशः श्वेत, लाल, पीली एवं काली भूमि पर-बेल, बरगद, तिन्दुक और भिलावे का लकड़ी से बने घर में तथा इन्हीं की लकड़ियों से बने पलंग से युक्त, अच्छी प्रकार लिपी पोती दिवारोंवाले, सब साधन अलग र स्थान पर भले प्रकार से जहाँ रखे हों, पूर्वकी ओर या दक्षिण की ओर द्वारवाले, आठ हाथ लम्बे और चार हाथ चौड़े, रक्षा- कारक वस्तुओं से (सरसों, अजवायन आदि युक्त) तथा मङ्गलकारी वस्तुओं (मधु-लाजा आदि) से युक्त घर में ले जाये।
वक्तव्य—ततः प्रवृत्ते नवमे मासे पुण्येऽहनि प्रशस्तनक्षत्र- योगमुपगते भगवति शशिन, कल्याणकरे मैत्रे मुहुर्मुहूर्तं शान्ति कृत्वा गोब्राह्मणमनिमुदकं चादौ प्रवेश्य गोभ्यः तृणादकं मधु लाजांश्च प्रदाय ब्राह्मणभ्योऽक्षतान् सुमनसो नान्दीमुखानि च फलानि दृष्टानि दत्त्वोदकपूर्वमासनस्थेभ्योऽभिवाध स्वस्ति वाच- येत्। पुण्याहशब्देन गोब्राह्मणमनुवर्त्तमाना प्रदक्षिणं प्रविशेत् सूतिकाऽऽगारम्। तत्रस्था च प्रसवकालं परीक्षेत् ॥ चरक शा० अ० ८-३७ ॥ ५ ॥
जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्त हृदयवन्धने। सशूलै जघने नारो ज्ञेया सा तु प्रजायिनी ॥ ६ ॥ कुक्षि के शिथिल होने पर, हृदयवन्धन के छूट जाते पर, जघन में दर्द होने पर समझना चाहिये कि क्क्षी प्रसव करने वाली है।
वि० मन्तव्य—यह प्रसव का लक्षण है, इसके पूर्व सू० ४ के अनुसार आस्थापन एवं अनुवासन का प्रयोग करके कोष्ठ शुद्धि अवश्य कर देनी चाहिये ॥ ६ ॥
तत्रोपस्थितप्रसवायाः कटोपृष्ठं प्रति समन्ताद्देहना भवत्य- भीर्दणं पुरीषप्रद्युत्तिमूर्त्रं प्रसिच्यते योनिमुखाच्छ्लेष्मा च ॥ प्रसव के उपस्थित होने पर कटि एवं पीठ भाग के चारों ओर दर्द होता है, मल आता है, और मूत्र बार-बार प्रवाहित होता है, योनिमुख से श्लेष्मा आती है। (भवति, मूत्रमभीर्दणं प्रसिच्यते, यह पाठ ठीक है)।
वक्तव्य—‘तस्य स्तु खल्विमानि लिंगानि प्रजन्तकाल- मभितो भवन्ति। तथाया-कलमो गात्राणां ग्लानिरानन्त्याः शेथिल्यं विमुक्तवन्धनत्वमिव वक्षसः कुदोरेवच्छसनमधोमुखं, वंक्षणवस्तिकटिकुक्षिपाश्चर्यगुठनिस्तोदो, यानेः प्रसवणमनन्ताभि- लापश्च ॥’ चरक शा० अ० ८-३८ ॥ ये लक्षण आवश्यक प्रसवा के हैं।
प्रसव की तीन अवस्थाएँ हैं, प्रथमावस्था—ततोऽनन्तर- मावीनां प्रादुर्भावः, प्रसेकश्च गर्भोदकस्य। द्वितीयावस्था
अ० १० ]
शारीरस्थानम्
३५१
गर्भनाडीप्रबन्धमुक्तिः (२) श्रोणिवंक्षणवस्तिशिरःसु शूलं, स यदा विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्वाविशति । वस्तिशिरोऽवगच्छति । आवीनां त्वरणम् । गर्भस्थ परिवर्तनम् । योनिमुख-प्रपत्तिः विलश्याभावश्च । इति तृतीयावस्था । यदा च प्रजाता स्यात्तदैवैनामवेक्षेत कदाचिदस्याः अपरा प्रपन्नाऽप्रपन्ना चेति ॥ चरक० शा० अ० ८ ॥
वि० मन्त्रव्य—प्रसव वेदना का नाम 'आवी' है, यह प्रवादिका की वेदना के समान वैगवती वेदना होती है। कहा जाता है कि यह गर्भाशय की ऐंटन या पीड़न से उत्पन्न होती है या उसकी सूत्रक है और इसके साथ ही गर्भोदक का बड़े वेग के साथ प्रसेचन—निःसरण होता है—चरक के शब्दों में—ततोऽन्तरम् आवीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य (च० शा० अ० ८ ३८) । गर्भवती का जितना बड़ा उदर होता है उतना ही बड़ा गर्भ नहीं होता, अपितु गर्भाशय में गर्भोदक भरा रहता है, जिसमें गर्भ तैरता रहता है। इसका प्रसेचन हो जाने पर भी आवियों चालू रहती हैं। प्रथम द्वितीय-आवियों के प्रभाव से गर्भोदक तो निकल ही जाता है। अब आवी का प्रभाव गर्भ पर पड़ता है—जैसे पके आम को दबाने से (पीड़न से) प्रथम रस निकलता है और फिर दबाने से गुठली पर दबाव पड़ता है, वैसे ही गर्भ पर दबाव पड़ने से गर्भ—आम की गुठली के समान बाहर निकलने के लिये बाध्य होता है। अभीक्षणं.....च—गर्भ का दबाव मलाशय पर पड़ने से पुरीय की ओर वस्ति पर पड़ने से मूत्र की बार २ प्रवृत्ति होती है और प्रकृति की विलक्षण महिमा है कि गर्भाशय के मुख से रलेष्मा—लसीला द्रव पसीजने लगता है, जिससे गर्भ फिसलकर अपत्यरथ में से मुखपूर्वक बाहर आ जाय। आवी के दबाव से गर्भाशय का मुख खुल जाता है ॥७॥
प्रजनयिष्यमाणं कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनां कुमार-परिवृतां पुत्रामफलहस्तां स्वभ्यक्तामुष्णोदकपरिषक्ता-सूयेनां सम्भूतां यवागृभाकण्ठात् पाययेत्, ततः कृतोपधाने मृदुनि विस्तीर्णं शयने स्थितामाभुनसकथीमुत्तानामशङ्कनीयाश्रतस्तः स्त्रियः परिणतवयसः प्रजननकुण्डला कर्तितनखाः परिचरेयुरिति ॥८॥
प्रसव काल समीप आया जानकर शरीर पर अभ्यंग करके, गरम जल से स्नान करे। फिर शान्ति पाठ और स्वस्ति वाचन पढ़कर बालक और बालिकाओं से वेष्टित होकर पुन्नासफल हाथ में लेवे। फिर घी के साथ यवागृ को पेट भर के पिलाये; फिर विस्तीर्ण और कोमल शय्या पर तकिया लगाकर पीठ के भार चित्त लेट करके पैरों को तानकर बैठे, और जिनसे किसी प्रकार का संकोच न हो, वृद्धा एवं प्रसूति करने में कुशल, नख को कटाई हुई चार स्त्रियाँ इसकी सेवा में रहें ॥
वक्तव्य—आवीप्रादुर्भावे तु भूमौ शयनं विदध्यात् मृद्वा-स्तरणोपपन्नम् । तदध्यासीत साततस्तां ताः समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रियः पृथुपाशीरनारदासयन्ती वाग्मिप्राहिणीभिः सान्त्वनीयाभिः । च० शा० अ० ८-३६ ।
स्त्रियों के गुण—स्त्रियश्च बहुशः प्रजाता सौहार्दयुक्ताः रक्षिणाचाराः प्रतिपत्ति हुशलाः प्रकृतिवत्सलाः त्यक्तविषादाः क्लेशसहिष्णुबोधिमताः ॥ चरक० ॥
वि० मन्त्रव्य—प्रसव एक बहुत बड़ा काण्ड है। इस समय भगवान् ही रक्षा करता है, आवी एक प्रकार की दुःसह वेदना होती है। अनेक सुकुमारियाँ मूर्छित हो जाती हैं और अनेक मृत भी। अतः माङ्गलिक—कल्याण कारक कर्म और स्वस्ति वाचन (मुख हो मला हो कहलाना) और छोटे २ बच्चों का और उनका खेलना कूदना आदि और गर्भिणी के हाथ में फल आदि देना आवश्यक होता है। अतः एव अभ्यङ्ग तथा उष्णोदक से स्नान एवं प्राण रक्षार्थ यवागृगान भी आवश्यक होता है। ततः.....रिति - आवी के प्रारम्भिक वेगों के समय जब तक पुरीष, मूत्र एवं गर्भोदक की प्रवृत्ति होती रहे तब तक भूमि पर ही लेटना उचित होता है। इसके पश्चात् कोमल एवं विस्तीर्ण शय्या पर लेटाना और प्रसवोपचार करना चाहिये। कर्त्तितनखाः—अपत्यरथ के भीतर हाथ डालने की आवश्यकता पड़ सकती है, अतः प्रसव करानेवाली के पहिले ही नख काट देना अच्छा है। इस अवस्था में प्रायः प्रसव हो ही जाता है, परन्तु यदि न हो तो—॥९॥
अथास्या विशिखान्तरमनुलोममनुमुखमभ्यज्यानुभू-याच्छैतामेका—सुभगे प्रवाहस्वेति, नचाप्राप्तावी प्रवाहश्च, ततो विमुक्तं गर्भनाडीप्रबन्धे सशुलेषु श्रोणिवंक्षणवस्तिशिरःसु च प्रवाहेथाः शनैः, शनैः, ततो गर्भनिर्गमं प्रगाढं, ततो गर्भ योनिमुखं प्रपन्ने गाढतरमाविशन्त्यभावात्; अकालप्रवाहणाद्गृधिरं मूकं कुञ्जं व्यस्तहनुमूर्ध्वोभिघातिनं कासश्चासजोषोपदुतं विकटं वा जनयति ॥१०॥
जब स्त्री लेट जाये, तब विशिखान्तर (अपत्यमार्ग) को अन्दर से बाहर की ओर मालिश करती हुई परिचारिका उससे कहे, हे सुभगे! प्रवाहण करो, किन्तु आवी (प्रसव-वेदना) न होने पर प्रवाहण न करो। गर्भ नाड़ी का वन्धन छूटने पर श्रोणी, वंक्षण, वस्तिशिर में पीड़ा होने पर धीरे धीरे प्रवाहण करो गर्भ के बाहर आने पर जोर से प्रवाहण करो। गर्भ के योनिमुख में आ जाने पर और भी अधिक जोर करो। जब तक गर्भ बाहर न आ जाये। वेदना होने से पूर्व यदि प्रवाहण किया जायेगा तो पुत्र बहरा, गूँगा, कुबड़ा, टेढ़ी
२५२
सुश्रुतसंहिता
[अ० १०]
ठोड़ीवाला, शिर में चोट लगा, कास, श्वास, शोष से पीड़ित तथा विलक्षण आकार का उत्पन्न होगा।
वक्तव्य—ताश्चैनां यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युरनागताऽऽवीर्यां प्रवाहिष्ठाः। या ह्यनागताऽऽवीर्याः प्रवाहते, व्यर्थमेवास्यास्तत् कर्म भवति। प्रजा चास्या विकृता, विकृतिमापन्ना वा श्वासकासशोषप्लीहाप्रसक्ता वा भवति। (२) तथा च कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहते। ततोऽनन्तरं बलवत्सरम्। च० शा० ८४४।
वि० मन्तव्य—अपत्यपथ के भीतर बला तेल आदि किसी स्नेह का अभ्यङ्ग करे। इससे वायु का अनुलोमन हो जाता है, और प्रसव हो जाता है। तथापि यदि न हो तो—गर्भिणी से कहे कि—जब आवी का रेंग हो तब प्रवाहण कर आदि २। यदि इतना करने पर भी प्रसव न हो तो—॥६॥
तत्र प्रतिलोममनुलोमयेत्, प्राञ्जलमार्कयेत् ॥१०॥ यदि गर्भ उलटा हो ( नितम्ब नीचे, शिर ऊपर ) तो उसे सीधा करें। सीधा हो ( शिर नीचे हो तो ) तो उसे बाहर खींचे। ( प्रतिलोम कई प्रकार का है )—इसे मूढगर्भ चिकित्सा में कहेंगे।
वि० मन्तव्य—समक्षो कि मूढ गर्भ-गर्भमूढ—टेढ़ा-मेढ़ा हो गया है, तब उक्त चार स्त्री-परिचारिकाओं में जो सबसे निपुण हो गर्भ को सीधा करके—अपत्यपथ में हाथ डालकर सीधा करके निकाल लेवे यदि तथापि न निकले तो—॥१०॥
गर्भसङ्के तु योनिं धूपयेत् कृष्णसर्पनिर्मोकेण पिण्डीतकेन वा, वधनीयाद्विरण्यपुष्पोमूलं हस्तपादयोः, धारयेत् सुवर्चर्द्धा विशलयां वा ॥११॥
गर्भ के योनि में रुक जाने पर ( बाहर न आने पर—बेदनायें बन्द हो जाने पर ) काले साँर की कँचुली, अथवा सैनफल से योनि में धूपन करे। कलिहारी की जड़ को हाथ पैर में बाँधे। हुलहुल या विशलया ( कलिहारी ) को धारण करे।
वि० मन्तव्य—यह धूपन आदि उपचार करे। यदि तथापि प्रसव न हो तो—अथर्व वेद के शांता ब्रह्मण द्वारा मन्त्र यन्त्र आदि का प्रयोग करे यथा—एक सिद्ध मन्त्र—
हृहामृतं च सोमश्च चित्रमानुश्च भामिनी।
उच्चैःश्रवाश्च तुरगो मन्दिरं निवसन्तु ते ॥
यह मन्त्र गर्भवती के कान में कहना चाहिये और वह इसे ध्यान देकर सुने। अथवा निम्न मन्त्र से अभिमन्त्रित जल पीने को देवे यथा—
हृदममृतमर्पामुदुतं वै तव लघुगर्भमिमं प्रमुञ्चतु स्त्रि।
तदनलपनाकंवासवास्ते सहलवणाम्बुचैर्दिशान्तु शान्तिम् ॥
एक सिद्ध यन्त्र—चक्रम्यूह का आकार कांस्य की थाली में हरिद्राद्रव से लिखकर दिखावे तथा शुद्ध जल से धोकर गिलावे। इतने पर भी यदि प्रसव न हो तो मूढगर्भ चिकित्सा अ० १५ के अनुसार उपचार करे ॥११॥
अथ जातस्योलंबं मुखं च सैन्यवसर्पिषा विशोध्य घृताक्तं मूर्ध्नि पिचुं दद्यात्, ततो नाभिनाडीमष्टाकुलमायम्यम्य सूत्रेण बद्ध्वा छेदयेत्, तत्सूत्रैकदेशं च कुमारस्य प्रीवायां सम्यग् वधनीयात् ॥१२॥
बालक के पैदा होने पर प्रथम जरायु को हटाकर, घी और सैन्यव से मुख का शोधन करे। घी से स्निग्ध पिचु को शिर पर रखे। फिर नाभि नाड़ी को नाभि से आठ अंगुल नाप कर धागे से बाँधकर काट देवें। धागे के एक भाग को बच्चे के गले में बाँध देवें।
वक्तव्य—नाड़ी को दो स्थानों से बाँधते हैं। जिससे रक्त प्रवृत्ति बच्चे की तरफ से भी न हो, और माता की तरफ से भी न हो। जब तक नाड़ी में स्नन्दन प्रतीत होता रहे, तब तक नाड़ी को नहीं काटना चाहिये। स्नन्दन बन्द होना इस बात का चिह्न है कि माता से रक्त आना बन्द हो गया। इसको नाभि से दो इञ्च बाँधते हैं। गले में लटकाने से नाल मिट्टी आदि में खराब नहीं होती। मल मूत्र से बची रहती है। नाड़ी के ठीक प्रकार न काटने से—“असम्यक् करुने हि नाञ्चा आयामव्यायामोत्पिण्डकापिण्डकालिकाविनाभिकाविजुभिकावाधेभ्यो भयम् ॥” गले में ढीला लटकाये। काटने के लिये—नाभिबन्धनात् प्रभृत्यर्घांगुलमभिज्ञानं कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्य हीत्वा तीक्ष्णेन रौक्षमराजतायसनां छेदना-नामन्यतमेनाद्धारेण छेदयेत्ताम् ॥ चरक० शा० अ० ८॥
वि० मन्तव्य—यदि जात शिशु स्वस्थ है, तो ईश्वर का धन्यवाद करो। यदि गर्भनाल शिशु के साथ ही बाहर आ गई हो तो नाभि से आठ अंगुल पर सूत्र से बाँध कर—कसकर बाँधकर एक अंगुल आगे से काट देवे और यदि प्रसूता के गर्भाशय से सम्बद्ध हो तो नाल पर दो बन्धन लगाकर बीचसे काट देना चाहिए, बन्धन लगा देने से शिशु तथा प्रसूता के शरीर से नाल द्वारा रक्त ख़ाव नहीं होता। प्रीवा में बाँधने से क्षतका लगने का भय नहीं रहता। अन्यथा समय से उलझ जाने पर अनेकानेक हानियाँ हो सकती हैं। और जब तक शिशु पूर्णरूप से प्रकृतिस्थ न हो तब तक नाल छेदन नहीं करना चाहिए। सच यह है, कि माता के शरीर से जन्म हो जाने पर भी शिशु को पोषण मिलता रहता है, जब तक नाल गर्भाशय से सम्बद्ध रहे तब तक
अ० १० ]
४५
गारीरस्थानम्
३५३
नालन्डेवन किया ही न जाय । अतएव भगवान् पुनर्वसु ने—अपरागत के पश्चात् नालन्डेवन का विधान बतलाया है, (३० शा० अ० ८-४७-४८) ॥१२॥
अथ कुमारं शोताभिरिन्द्रिराश्वत्स्य जातकर्मणि कृते मधुसपिरनन्तचूर्णमङ्कुल्याऽनामिकया लेहयेत्, ततो बलातैलेनाभ्यञ्ज्य, क्षीरवृक्षकषायेण सर्वगन्धोद्भवेन वा लघुहंसप्रतपेन वा वारिणा स्नापयेदेन कपित्थपत्रकषायेण वा कोण्णेन यथाहालं यथादोषं यथाविभवं च ॥१३॥
फिर उण्डे जल से बालक को आश्वसित करके जातकर्म करने के पश्चात् धी और मधु से मिश्रित थोड़ी सुवर्णभस्म अनामिका अंगुलि से चटाये । फिर बलातैल का अभ्यंज करके बरगद आदि क्षीर वृक्षों की खन्चा से बनाये क्वाथ से अथवा एलादि गण के जल से या चाँदी अथवा सुवर्ण को तपाकर बुझाये जल से या कैथ के पत्तों के गरम कषाय से समय, दोष और वैषम का ध्यान रखकर स्नान कराये ।
वक्तव्य—यह समझ लेना चाहिये कि मधु श्लेष्मा की निकालता है। बच्चे के मुख में रूकी श्लेष्मा इससे निकल जाती है। धी और स्वर्ण विषनाशक है। इसी से कहा है—'न सज्जति हेमपाङ्कं पद्मपत्रं उन्मृदु विषम् ।' स्वर्ण खानेवाले के शरीर में विष प्रभाव नहीं करता। बच्चे पर विष जल्दी प्रभाव करता है, इसी से उसकी रक्षा की है। सर्वगन्ध से अभिप्राय-एलादि गण से है।
वि० मन्तव्य—सू० १२ के अनुसार शिशु के मुख नासा का परिमार्जन-शोधन कर देने पर भी यदि श्वास की गति न हो तो शीतल जल के छोटे मारने चाहिये, इससे शिशु हुलमसी लेता है और रो पड़ता है, श्वास की गति चालू हो जाती है—गर्भाशय में तो श्वास चलता ही नहीं (दे० सु० शा० अ० २ श्लो० ५०) । यदि चेतना हीन या मूर्च्छित हो तो—कानों के पास पाषाणों की अथवा कांसा के खड्गताल आदि की ध्वनि तथा सूर्य-पंखा आदि से वायु तब तक करे जब तक श्वास-प्रश्वास चालू हो जाय और हाथ-पांव हिलाना प्रारम्भ हो जाय, अर्थात् सचेतन हो जाय। यदि हतने पर भी कोई फल न हो तो सैन्धव लवण मिश्रित घृत वक्षस पर मले, इससे वमन हो जाता है और जीवन लाभ हो जाता है। तथापि लाभ न हो तो नाक को अग्नि से तपावे, सम्भव है प्राण आ जायें तत्पश्चात्-अभ्यङ्ग आदि उपचार करे ॥१३॥
धमनोत्ता हृदिस्थानां विद्युत्त्वादनन्तरम् । चतुरात्रात् त्रिरात्राद्वा क्षोणां स्तन्यं प्रवर्तते ॥१४॥ हृदय में स्थित धमनियों के खुलने के पीछे—तीन या चार दिन के अनन्तर स्त्रियों में दूध आता है ।
वक्तव्य—पहले पीयूष (कोलोस्ट्रम) आता है । जिसे बोल-चाल की भाषा में खीस कहते हैं । इसके देने न देने में भेद है, इसके देने से मृदु विरेचक गुण के कारण यह मल को बाहर करता है । न देनेवाले भारी होने से इसको नहीं देते । वे इसके लिये मधु देते हैं ।
वि० मन्तव्य—यहाँ स्तन्य का अर्थ उस स्तन्य-दूध से है जो शिशु के पीने योग्य होता है। वैसे तो श्वेत द्रव की प्रवृत्ति गर्भवती को ही होने लगती है, यथा—शा० अ० ३-२४ में कहा है तत्र यस्या दक्षिणे स्तने प्राक् पयोदर्शनं भवति । जैसे गो भैंस आदि का दूध भी ३-४ दिन पीने योग्य-शिशु के पीने योग्य नहीं होता वैसे ही मानुषी का भी नहीं होता। तीन चार दिन पर दूध की प्रवृत्ति होती है और 'स्तन्यावतरणे नारीणां ज्वरो दोषैः प्रवर्तते' अर्थात् दूध उतरने में प्रसूता को ज्वर हो जाता, है फलतः उस समय भी दूध नहीं पिलाया जाता, परन्तु यह ज्वर एक दो दिन में शान्त भी हो जाता है जो छठी का दूध कहलाता है ॥१४॥
तस्मात् प्रथमेऽह्नि मधुसपिरनन्तमिश्रं मन्त्रपूर्वतं त्रिकालं पाययेत्, द्वितीये लक्ष्मणासिद्धं सपिः, तृतीये च; ततः प्राङ्निवारितस्तन्यं मधुसपिः स्वपाणितलसमितं द्विकालं पाययेत् ॥१५॥
इसलिये पहले दिन धी और मधु के साथ थोड़ा सा स्वर्ण मन्त्र से पवित्र करके तीन बार पिलाये । दूसरे दिन लक्ष्मणा से सिद्ध किया घृत देवे । तीसरे दिन भी यही देवे, फिर धी और शहद को (विषममात्रा में) बच्चे की हथेली की मात्रा में दो समय देकर स्तन रिलाना आरम्भ करे ।
वक्तव्य—अनन्त बराबर सुवर्ण, इसकी मात्रा आधी रती या चौथाई रती दे । 'अनन्ता' पाठ मानकर हाराणचन्द्र जी 'सारिवाली' कहते हैं अष्टांगसंग्रह में दूवाँ ली है । यथा 'अनन्तामिश्रं मधुसपिषी-अनन्ता दूवाँ' ।
“ऐन्द्री ब्राह्मी शंखपुष्पी वचेन्द्रीकल्कं मधुघृतोपेतं हरेणु-मार्गं कुद्याभिर्मंत्रितं सौवर्णं नाश्वत्थपत्रेण वा मेघायुर्वलजननं प्राशयेद्, ब्राह्मीवचानन्ता शतावरी अन्यतमचूर्णं वा ॥संग्रह ।
चरक में पहले दिन स्तनपान करना कहा है । यथा—ततोऽनन्तरं जातकर्म कुमारस्य कार्यम् । तद्यथा मधुसपिषी मनोपमन्त्रिते यथाम्नायं प्रथमं प्राथितुं दद्यात् । स्तनमत ऊर्ध्वमेतेनैव विधिना दक्षिणं पातुं पुरस्तात् प्रयच्छेत् ।
वि० मन्तव्य—अतः तब तक मधुसपि आदि चटाकर जीवन यापन करे । अथवा वे द्रव देवे जिनकी व्यवस्था बुढ़ा स्त्रियाँ करें ॥१५॥
अथ सूतिकां बलातैलाभ्यक्तां वातहरोषघनिष्कवायेनोपचरेत् । सरोषदोषां तु तदहः पिप्पलीपिप्पलामूलहस्ति-
१४४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
पिप्पलीचित्रकश्मृगवेरचूर्ण गुडोदकेनोष्णेन पाययेत्, एवं द्विरात्रं त्रिरात्रं वा कुर्यादादृष्टशोणितात्। विमुद्धे ततो विदारिगन्धादिसिद्धां स्नेहयवाग् क्षीरयवाग् वा पाययेत्-स्विरात्रम्। ततो यवकोलकुलस्थसिद्धेन जाङ्गलरसेन शाल्योदनं भोजयेद्बलमग्निबलं चावेदय। अनेन विधिनाऽध्वधमासमुपसंस्कृता विमुक्ताहाराचारा विगतसूतिकामिधाना स्यात्, पुनरात्तवदर्शनादित्येके ॥१६॥
इसके पश्चात् सूतिका के शरीर पर बलतैल का अभ्यंग कराकर एरण्ड-मद्वदाव आदि वातहर औषधियों के क्वाथ से स्नान कराये। यदि दोष पूरी तरह न निकलता हो तो (रक्त बन्द हो गया हो तो) उसी दिन पिप्पली, पिप्पलीमूल, गज-पिप्पली, चित्रक, सोंठ के चूर्ण को गुड़ के गरम पानी के साथ पिलाये। इसी प्रकार दो दिन, तीन दिन या जब तक दूषित रक्त न निकल जाये तब तक करे। रक्त का शोधन हो जाने पर विदारीगन्धादि गण से सिद्ध किये घी से युक्त यवागू को या सिद्ध किये दूध में बनाई यवागू को तीन दिन पीने के लिये देवे। फिर जी, बेर, कुलस्थी सिद्ध या जांगल मांस रस के साथ शाली धान्यों का भात अग्निबल के अनुसार खाने को देवे। इस प्रकार डेढ़ (१२) महीने तक नियम पालन करने पर आहार-और आचार (विहार) परहेज को छोड़ने से 'विगतसूतिका' शब्द से कही जाती है (अर्थात् डेढ़ मास के पीछे उसके लिये सूतिका का परहेज नहीं रहता)। कई आचार्यों का मत है कि प्रसव के पीछे प्रथम बार आर्तव दर्शन तक वह सूतिका रहती है, उसे सूतिका का आहार विहार तब तक पालन करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—उशेषदोषां—यदि गर्भाशय से निकल जाने योग्य रक्त आदि न निकल गये हों। विगतसूतिकाऽभिधाना—अब उसका नाम 'सूतिका' या 'प्रसूता' नहीं रह जाता। अतः सूतिका के लिये विहित उपचारों की भी आवश्यकता नहीं रह जाती। पुनरात्तव दर्शनात्—प्रसव से ४०-४५ दिन पर थोड़ा बहुत आर्तव दिखाई दे जाता है स्वस्थ स्त्री को। इसके पश्चात् किसी २ को प्रतिमास आर्तव होने लगता है और किसी २ को जब तक बालक को दूध पिलाती है तब तक नहीं होता। आर्तव दिखाई देने पर पुनः गर्भाधान की सम्भावना हो जाती है, परन्तु अधिकांश स्त्रियों को नियमितरूप से-प्रसव से-४०-४५ दिन पर अथवा १-२-३-४-५ वर्ष पर गर्भाधान हुआ करता है ॥१६॥
धन्वभूमिजातां तु सूतिकां घृन्तैल्योरन्यतरस्य मात्रां पाययेत् पिप्पल्यादिकपायानुपानां स्नेहनित्या च स्यात् त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा बलवती; अवलां यवागू पाययेत् त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा। अत ऊर्ध्वं स्निग्धेनात्रसंसर्गेणोपचरेत् ॥१७॥
धन्वभूमि (मरुप्रदेश) में उत्पन्न प्रसूता को घी या तैल इनमें से किसी एक की मात्रा को पिप्पल्यादि कपाय के अनुगुणन से पिलाये। बलवान् स्त्री को पाँच दिन स्नेह का पान, अर्थात् आदि देवै। निर्वल प्रसूता को तीन या पाँच दिन यवागू देनी चाहिये। इसके बाद स्निग्ध अन्नसंसर्ग (पेया, विजेनी अन्न) विधि बरते।
वक्तव्य—“अथ सूतिकां बलातैलेनाभ्यज्यात्, बुभुक्षितां च पंचकोलचूर्णेन यवान्युपकुञ्चिकाचव्यचित्रकव्योपसेन्यवचूर्णेन वा युक्तामहःपरिणामिनीं यथासात्त्व्यं स्नेहमात्रां पाययेत् स्नेहयोग्यां तातहरीषधन्वार्थं हस्तपंचमूली क्वाथं पीतवत्थाश्रमयकेनाभ्यज्य वेष्टयेदुदरं वस्त्रेण। तथा न वायुरुदरे विकृतिमुत्सादयति अन्वकाशत्वात्। जीर्णं तु स्नेहै पूर्वैषधिभिरेव सिद्धां विदार्थादि-गणकवायेन वा क्षीरेण यवागू सुस्विन्नां द्रवां मात्रया पाययेत्” ॥ (अ० सं० शा० अ० ३)।
वि० मन्तव्य—धन्वभूमिजातां तु सूतिकां—धन्व भूमि-मरुभूमि आरोग्यद भूमि होती है, वहाँ की निवासिनी प्रायः अधिक स्वस्थ होती है, अतः उसे स्नेह की मात्रा का विधान किया गया है, अर्थात् उसे अधिक से अधिक घृत आदि का प्रयोग किया जा सकता है और वह उसे पच भी जाता है। वह ५-७ दिन में ही पुनः पूर्ववत् स्वस्थ-बलवती हो जाती है। अवलां—अनूभूमि अन्तः देश की निवासिनी प्रसूता प्रायः अवला-दुर्बला होती है। अतः उसे यवागू दलिवा अथवा खिचड़ी आदि में मिलाकर स्नेह देना चाहिये। ११ दिन के पश्चात् उचित-स्वामाविक भोजन की व्यवस्था करे, परन्तु वह स्निग्ध हो। इस प्रकार ११-१२ मास में प्रसूता पूर्ववत् पूर्ण स्वस्थ हो जाती है ॥१७॥
प्रायशश्चनेनां प्रभूतेनोष्णोदकेन परिषिञ्चेत् क्रोध-यासमैथुनादींश्च परिहरेत् ॥१८॥
प्रायः करके बहुत गरम जल से प्रसूता को स्नान करावे। क्रोध, यकान, मैथुन आदि से बचे।
वि० मन्तव्य—पुनरात्तव दर्शन पर्यन्त उष्णोदक से स्नान होना चाहिये और क्रोध आदिका पूर्णरूप से परित्याग भी ॥१८॥
मिथ्याचारात् सूतिकाया यो व्याधिरुपजायते।
सोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यो वा भवेदत्यपतपणात् ॥१९॥
तस्मात्तां देशकालो च व्याधिसात्त्व्येन कर्मणा।
प्रतीदयोपचरेन्नित्यमेवं नात्ययमाप्नुयात् ॥२०॥
प्रसूता के मिथ्या आचार से या अपतप्य के कारण प्रसूता को जो रोग उत्पन्न हो जाता है, वह कष्टसाध्य होता है, या असाध्य हो जाता है। इसलिये देश, काल और रोग सात्त्व्य को देखकर चिकित्सा करे। सब्दा परीक्षा करके इस प्रकार करे, जिससे कोई विपद या हानि न हो।
अ० १० ]
शारीरस्थानम्
३१५
वि० मन्तव्य—प्रसूता अत्यन्त दुर्बल एवं क्रुश होती है, अतः थोड़े भी मिथ्या आहार-विहार से भीषण आपत्ति आ सकती है। प्रसूता को अगतर्पण—(भूखे प्यासे रहना) नहीं करना चाहिये। भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में—स्तिका को जो भी रोग हो जाता है, वह कष्टसाध्य अथवा असाध्य होता है, क्योंकि-गर्भ की वृद्धि के लिये उसके सब रस-रक्त आदि धातुओं का क्षय-व्यय हो चुका है और प्रसववेदना तथा रक्त-क्षय से शरीर शून्य-निःशार हुआ होता है। अतः उसका उपचार-विधिपूर्वक-सावधान होकर करे और भौतिक (मासी आदि मृत नाशक), जीवनीय, वृंहणीय, मधुर तथा वातनाशक औषधों से सिद्ध-अभ्यङ्ग, उबटन, परिषेचन, अवगाहन, अन्न तथा पान की व्यवस्था करे। क्योंकि प्रजाता-प्रसूता नारियों का शरीर प्रायः खोलला होता है ॥१६, २०॥
अथापराऽपतन्त्यानाहाधमानो कुरुते, तस्मात् कण्ठ मस्याः केगवेष्टितयाऽङ्गुल्या प्रभुजेत्, कटुकालावृकृतवे- धनसर्पसर्पनिर्मोकेवो कटुतैलविभिन्नेर्योनिमुखं धूपयेत्, लाङ्गलीमूलकलकेन वाऽस्याः पाणिपादतलमालिम्पेत्, मूर्धनं वाऽस्या महावृक्षक्षीरमनुसेचयेत्, कृष्टलाङ्गलीमूल कलकं वा मद्यमूत्रयोः रन्ध्रतरेण पाययेत्, मालमूलकलकं वा पिप्पल्यादिं वा मध्येन सिद्धार्थकंकुष्ठलाङ्गलीमहावृक्ष- क्षीरमिश्रेण सुरामण्डेन वाऽस्यापायेत्, एतैरेव सिद्धेन सिद्धार्थकतैलेनोत्तरवस्ति दद्यात्, स्तिग्धेन वा कृतनखेन हस्तेनापहरेत् ॥२१॥
बाहर न आई अपरा (कमल) आधमान और आनाह करती है। इसलिये बाल लिपटी हुई अंगुली से इस प्रसूता के गले को अन्दर से खुरखुराए। कड़ई तुम्बी, अमलताम, सरसों, साप की कँचुली, इनको सरसों के तेल में मिलाकर योनिमुख में धूप देवे। कलिहारी की मूल के कलक को इसके हाथ-पैरों पर लेप करे। इसके सिर पर थोर का दूध डाले। कूठ और कलिहारी के मूल कलक को मद्य या मूत्र किसी एक के साथ पिलाये। शालिमूल के कलक को या पिप्पल्यादि गण के कलक को मद्य से पिलाये। सरसों, कूठ, कलिहारी, इनको थोर के दूध या सुरामण्डक में मिलाकर आस्थापन वस्ति देवे। इन्हीं से सिद्ध सरसों के तैल से वस्ति देवे। अथवा नख कटाये हुए हाथ को भी या तैल से चिकना करके इससे बाहर निकाल ले।
चरक में—“यस्याश्वदपरा न प्रपन्ना स्यादधेनामन्यतमा स्त्री दक्षिणेन पाणिना नामेऽरिष्टात् बलवन्निपीड्य सध्येन पाणिना पृष्ठ उपसंग्रह्य सुनिर्धृतं निर्धृतुयात् । अथास्याः पादपाण्यां श्रोणिमाकोटयेत् । तस्याः स्फिच्छावृपसंग्रह्य सुपीडितं पीडयेत् । अथास्या बालवेण्याकण्ठताखु परिस्पृशेत् ॥ चरक० १० ॥ ४५ ॥
वि० मन्तव्य—प्रसव के कुछ समय पश्चात् अपरा स्वतः गिर जाती है। यदि विलम्ब हो रहा हो तो उक्त उपचार करे। यथासम्भव उसका शीघ्र गिर जाना ही अच्छा होता है। अच्छा तो यह है कि—ज्यों ही प्रसव हो ल्यों ही ध्यान दिया जाय कि गिरी अथवा नहीं, यदि नहीं गिरी तो उन परिचा- रिकाओं में से एक स्त्री दाहिने हाथ से-नाभि से चार अंगुल ऊपर से बलपूर्वक दबाकर और बाएँ हाथ से पीठ की ओर से दबाकर नीचे की ओर को निचोड़ देवें, जिससे “अपरा” बाहर आ जाय। यदि इससे भी न निकले तो उदर को तो दबाए रहे और अन्य स्त्रियाँ उक्त उपाय करें और तब तक निरन्तर करें जब तक अपरा गिर न जाय। अतिम उपाय यह है कि अपत्य पथ में हाथ डालकर अपरा को निकाल देवें। अपरा निकल आने पर नाड़ीच्छेदन करे और इसके पश्चात् भूख लगने पर स्नेहमात्रा अथवा स्नेह यवगु आदि यथोचित पथ्य देकर-उदर पर स्नेहाम्यङ्ग करके-यक्ष से और स्वच्छ वस्त्र से उदर का आवेष्टन करकर कर देवें। इससे अवकाश न मिलने के कारण वायु उदर में कोई विकृति उत्पन्न नहीं कर सकता और गर्भाशय अपने स्वरूप में आ जाता है। अन्यथा कईयों का उदर बड़ा रह जाता है। एतदर्थं कश्यप संहिता का वाक्य स्मरणीय है, यथा—
प्रजातमात्रमाश्रय सृतां शक्ता प्रवाविका । न्युञ्जां शयानां संवाह्य पृष्ठे संशिल्य कुक्षिणा । पीडयेद् दृढपुदरं गर्भदोषप्रवृत्तये । महताऽदुष्टपट्टेन कुक्षिपार्थं च वेधयेत् । तेनादरं स्वस्थंस्थानं याति वायुश्च शाम्यति ॥
का० सं० सतिकोपक्रमणीय । ४०-४५ दिन में गर्भाशय अपनी पूर्ववत् स्थिति को प्राप्त हो जाता है। यदि उदर बड़ा ही रह जाय तो दशमूल, पिप्पलामूल तथा सोया का काय पिलाते रहना चाहिये ॥२१॥
प्रजातायाश्च नार्यां रूक्षगरीरायास्तीक्ष्णैरविशोधितं रक्तं वायुना तहेशगतेनातिसंरुद्धं नामरेषः पार्श्वयोवस्तौ वस्तिशिरसि वा ग्रन्थि करोति, ततश्च नामिवस्युदरशू- लानि भवन्ति, सूचामिरिव निस्तुवते भिद्यते दीयत इव च पकाग्रयः, समन्ताद्वाधमानसुदरं मूत्रसङ्गश्च भवतीति मक्कल्लक्षणम् । तत्र वीरतवादिस्िद्धं जलमूषकादिप्र- तांवापं पाययत्, यवश्चार्चूर्णं वा मुखादकेन पिप्पल्यादि- काथेन वा, पिप्पल्यादिचूर्णं वा सुरामण्डेन, वरुणादि- काथं वा पञ्चकोल्लेलाप्रतीवापं, पृथक्पुण्यादिकवाथं वा भद्रदारुमरिचसंसृष्टं, पुराणगुडं वा त्रिकटुकचतुर्जातक- कुस्तुम्बुरुमिश्रं खादेत्, अच्छं वा पिबेदरिष्टमिति ॥२२॥
३५६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
रक्त शरीरवाली प्रवृत्ता स्त्री के तीक्ष्ण औषधियों से अविशोधित रक्त में, उस स्थान की वायु नाभि के नीचे, पाश्वों में, वस्ति में, अथवा वस्ति शीर्ष में गॉठ उत्पन्न करती है। इससे नाभि, वस्ति और उदर में शूल होता है। पक्वाशय में सई चुमने के समान पीड़ा होती है। यह फटता हुआ सा प्रतीत होता है। पेट चारों ओर फैलता है, मुख रुकता है, यह मक्कल के (After pains) के लक्षण हैं।
वक्तव्य—“प्रजातायाः प्रजननशोणितसंजनितशूलमक्कलः, अवरुदरकपाकजनितो विद्रधिपरि मक्कलः। उल्लूणः—“विशेषतो हि शून्यशरीराः स्त्रियः प्रजाता भवन्ति ॥” चरक० ।
चिकित्सा—इस मक्कल में वीरतर्वादि गण के सिद्ध जल में ऊषकादिगण का प्रत्येप देकर पिलाये यवक्षार के चूर्ण को गरम पानी से या पिप्पल्यादि क्वाथ से दे। पिप्पल्यादि चूर्ण को सुरामण्ड से दें। वरुणादि क्वाथ में पंचकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ) और इलायची का प्रत्येप देकर पिलाये। शालिपर्णी आदि के क्वाथ में देवदारु और मरिच मिलाकर दें। या पुराने गुड को सोंठ, मरिच, पीपल, दालचीनी, इलाइची, तेजपात, नागकेसर, घनिया मिलाकर खाये। या केवल अरिष्ट (अभयारिष्ट-उल्लूण) पीवे।
वि० मन्तव्य—गर्भाशय के शोषन का पूर्ण ध्यान रखना चाहिये। तदर्थ—मक्कल नाशक उपायों का अवलंबन करे तथा अपरा पातन के उपायों का और आस्थापन तथा अनुवासन वस्ति का प्रयोग करे, इससे वायु का अनुलोमन हो जाता है, और वायु के अनुलोमन से गर्भाशय में रहे अपद्रव्य-अपरा एवं दुष्ट रक्त आदि सब बाहर निकल जाते हैं ॥१२॥
अथ बालं क्षोमपरिवृतं क्षोमवस्त्रास्तृतायां शय्यायां शाययेत् पीलुबद्रं रीतम्बरपुरुषकगाखाभिश्चैतं परिवीजयेत्, मूर्ध्नि चास्याहरहस्तेलपिचुमवचारयेत्, धूपयेच्छैतं रक्षा-न्तेधूपैः रक्षाणानि चास्य पाणिपादशिरोग्रोवास्ववसजेत्, तिलातसौसषपकर्णाश्चात्र प्रकिरेत्, अधिष्ठाने चार्नि प्रज्वालयेत्, त्रणितोपासनीयं चावेक्षेत् ॥१३॥
इसके पीछे बालक को रेगमी वस्त्र ओढ़ाकर रेगमी वस्त्र से बिछाई शय्या पर सुला देवे। पीलु, बेर, नीम, फालसा, इनकी शाखा से इसको हवा करे। प्रतिदिन इसके खिरर तैल का फोया रखे। रक्षोन्न धूप (सरसों, अजवायन, नीम के पत्ते नमक) से इसको धूप देवे। रक्षोन्न द्रव्यों को इसके हाथ, पैर, शिर, मीया में बांध देवे। तिल, अलसी, सरसों को इसके चारों ओर बिखेर देवे। घर में अग्नि जलती रखे। त्रणितोपासनीय अध्याय में कहे विधान को बरते।
वि० मन्तव्य—शिर पर—ब्रह्मरन्ध्र पर गर्भियों के दिनों में नवनीत का पिचु भी उपयोगी होता है। बालक के घर में, शय्या में, कपड़ों में धूप देना चाहिये। धूपन द्रव्य हैं—जो, सरसों, अलसी, हींग, गूगल, बचा, चौरपुष्पी, हरड या ब्राह्मी, दूब, जटामांसी, लोबान, वॉप की केंचुली सबको दरदरा कूटकर घृत में मसलकर रख लेवे। बालक के शयन, आसन, ओढ़ना एवं बिलावन सब—कोमल, लघु, स्वच्छ एवं सुगन्धित हो। स्वेद, मल, जूए आदि से रहित तथा मल मूत्र में उपसुष्ट न हो, अर्थात् नये अथवा घुले मली भाँति सूखे हों। खिलेने-विविच, छनकनेवाले, सुन्दर, लघु जिन का अग्रभाग तीक्ष्ण न हो, जो मुख में प्रविष्ट न हो सकें, जो घातक न हों और डरा-वने न हों। च० शा० अ० ८ ॥१३॥
ततो दशमेऽहनि मातापितरौ कृतमङ्गलकौतुको स्वस्तिवाचनं कृत्वा नाम कुर्यातां यदभिप्रतं नक्षत्र-नाम वा ॥१४॥
फिर दसवें दिन माता-पिता, मंगल, कौतुक, स्वस्तिवाचन करके, मन के अनुकूल या नक्षत्र के अनुसार इस बच्चे का नामकरण करें।
चरक में—“द्वे नामनी कारयेत्, नाक्षत्रिकं नामाभिप्रायिकं च। तत्राभिप्रायिकं घोषवदाद्यन्तस्यान्तम् ऊष्मान्तं वाऽहं त्रिपुरुषानूकमनवप्रतिष्ठितम्। नाक्षत्रिकं तु नक्षत्रदेवतासमानात्वं दृश्यत् चतुरशरं वा” ॥ चरक शा० ८-४५ ।
वि० मन्तव्य—नाम करण संस्कार—देश, जाति एवं कुल परम्परा के अनुसार किया जाता है। नाम—अभिप्रेत अर्थात् जो नाम रखना अभीष्ट हो। नक्षत्र नाम—ज्योतिः शास्त्रानुसार नक्षत्र का—अक्षर—जिस नाम में प्रथम हो। जिस नक्षत्र में जन्म होता है उस नक्षत्र के अक्षरों को ध्यान में रखकर नाम चुन लिया जाता है ॥१४॥
ततो यथावर्णा धात्रीमुपेयान्मध्यमप्रमाणं मध्यम-वयस्का(सा)मरोगां जीलवतीमचपलामलोलुपामङ्गा-मस्थूलां प्रसन्नश्रीरामलम्बाष्टीमलम्बोर्ध्वस्तनामव्यङ्गम-व्यसनिनीं जीवद्वत्सां दोग्ध्रीं वत्सलामलुदकमिणीं कुले जातामतो भूमिष्टंश्च गुणेरन्वितां श्यामाराग्यवबलबुद्धये बालस्य। तत्रार्ध्वस्तनीं कराळं कुर्यात्, लम्बस्तनीं नासि-कामुखं छादयित्वा मरणमापादयेत्। ततः प्रशस्तायां तिथौ शिरःस्तनातमहतवाससमुदङ्मुखं शिशुमुपवेश्य धात्रीं प्राङ्मुखो चापवेश्य दक्षिणं स्तनं धोतमोक्षपरिघृतमभि-मन्त्र्य मन्त्रेणानेन पाययेत् ॥१५॥
फिर वर्ण के अनुसार—(ब्राह्मण के लिये ब्राह्मणी
२०१०]
शरीरस्थानम्
३१७
इत्थादि) धात्रीको बुलाये। धात्री मध्यम आकार की (न बहुत लम्बी, न छोटी), बहुत उमर की न हो (मध्यम वय की प्रौढ़ा), नीरोगी, उत्तम स्वभाव की, चंचलता रहित, निर्लोभी, न मोटी, निर्मल दूधवाली, जिसके ओठ लम्बे न हों, जिसके स्तन लम्बे या ऊपर को न हों, अर्धग्री, ग्यसनों से रहित, जीवित बालकवाली, मधुर दूधवाली, प्रेम करनेवाली, नीच कर्म न करनेवाली, उत्तम कुल में उत्पन्न होने के कारण बहुत से गुणों से युक्त, श्यामा इस प्रकार की धात्री बालक के आरोग्य, बल और बुद्धि के लिये होती है। इनमें ऊर्ध्वस्तनवाली बालक को कराल (आगे निकले हुए दांतोंवाला) बना देती है। लम्बे स्तनोंवाली नासिका के मुख को बन्द करके मृत्यु का कारण बनती है। फिर प्रशस्त तिथि में शिर समेत बच्चे को स्नान कराके नये वस्त्र पहनाकर उत्तर की ओर मुख करके बिठाये। धात्री को पूर्व की ओर मुख करके बिठाये। पहले दक्षिण स्तन को धोकर थोड़ा-सा दूध बाहर निकालकर निम्न मंत्र से आमन्त्रित करके पिलाये।
वि० मन्तव्य—यदि किसी कारण से जननी दूध पिलाने योग्य न हो अथवा न रहे तो धात्री का चुनाव करे। यदि प्रमादवंश जननी दूध न पिलाना चाहे तो उसे समझा-बुझाकर दूध पिलाने के लिये तैयार करे क्योंकि—मातुरेव पिबेत् स्तन्यं तत् परं देहवृद्धये—अर्थात् जननी का दूध ही बालक के शरीर की पुष्टिबुद्धि के लिये परमात्तम होता है। श्यामा-श्यामवर्णा स्त्री प्रायः स्वस्थ गौरी की अपेक्षा अधिक स्वस्थ होती है, (पुरुष भी) और अतएव उसको दूध भी अधिक होता है—श्यामा हि प्रायशः प्रचुरस्त्रीरा भवति (डरलन) दूध पिलाने की उक्त विधि जननी एवं धात्री दोनों के लिये समान है, और यह एक दिन के लिये ही नहीं प्रतिदिन या प्रतिबार इसी प्रकार स्तन्यपान कराना चाहिये। दूध पिलाने के पूर्व पिठानेवाली अपने स्तनों को हाथ से मसल लिया करे, जिससे दूध तरल हो जाय और स्तन चूचकों की कठोरता दूर हो जाय और अधिक दूध हो तो पर्याप्त, अन्यथा थोड़ा सा दूध चुआ दिया करे, इस प्रकार सू० २६ में कथित काम आदि विकार नहीं होते और शिशु को चूषण में सरलता हो जाती है। जीवद्-वत्सा-जिसका अपना शिशु जीवित एवं स्वस्थ हो—यह दूध की उत्तमता का सूचक है। दोग्ध्री-धात्री को दो शिशुओं को पालना होता है, अतः दो के योग्य दूध होना आवश्यक है। धात्री के जो गुण लिखे हैं उनसे भी अधिक गुणोंवाली हो। वत्सला—इस शिशु के साथ अपने शिशु के समान स्नेह करनेवाली हो। कोई २ शिशु स्तन्य चूषण नहीं करते, परन्तु कुछ दिनों में अभ्यास हो जाने पर करने लगते
हैं। तब तक सीपी या चम्मच में दहकर दूध पिलाते रहना चाहिये ॥२५॥
चरवारः सागरास्तुभ्यं स्तनयोः क्षीरवाहितनः।
भवन्तु सुभगे नित्यं बालस्य वलवृद्धये ॥२६॥
पयोऽमृतसं पीत्वा कुमारास्ते शुभानने।
दीर्घमायुरवाप्नोतु देवाः प्राश्यामृतं यथा ॥२७॥
मंत्र—हे सुभगे ! तुम्हारे स्तनों में दूध को वहन करनेवाले चारों समुद्र बालक की बुद्धि के लिये हों। हे शुभानने ! जिस प्रकार देवता अमृत का पान करके दीर्घायु हुए, उसी प्रकार तुम्हारा अमृत रूपी दूध पीकर बालक दीर्घायु हो ॥
वक्तव्य—श्यामा “शीतकाले भवेदुष्णा, ग्रीष्मकाले च शीतला। तसकांचनवर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते”। विस्तार के लिये मेरी पुस्तक “हमारे भोजन की समस्या” पढ़ें ॥२६, २७॥
अतोऽन्यथा नानास्तन्योपयोगस्यासत्क्याद् व्याधि-जन्म भवति ॥२८॥
इससे विपरीत नाना (भिन्न-भिन्न) दूध के उपयोग करने से—असत्क्य-होने के कारण रोग उत्पन्न होते हैं।
वक्तव्य—बार-बार दूध बदलते रहने से दूध अनुकूल नहीं होता। दूध के अनुकूल न पड़ने से रोग होते हैं। इसलिये एकही धात्री को रखें। इसी प्रकार गाय या बकरी एक का ही दूध बच्चे को देना चाहिये। बार-बार दूध बदलना नहीं चाहिये। माता के दूध के अभाव में धात्री का दूध, धात्री के अभाव में बकरी या गाय का दूध देवे “स्तन्याभावे पयश्छागां गन्यं वा तद्गुणं हितम् ॥” वाग्भट में कहा है—मातुरेव पिबे-स्तन्यं तत्परं देहवृद्धये। स्तन्यधान्याद्युभे कार्यं तदसम्पदि वत्सले ॥२८॥
अपरिस्पृतेऽप्यतिस्वस्थस्तन्यपूर्णस्तनपानादुत्सुहित-स्नोतसः शिशोः कासश्वासवमीप्रादुर्भावः। तस्मादेवंविधानां स्तन्यं न पाययेत् ॥२९॥
स्तनों में से दूध न निकलने के कारण दूध के रुके रहने से, स्तनों के कठोर एवं भरे होने पर—स्तनपान करने से, स्नोतों के भराव होने पर बच्चे को कास, श्वास, वमन होता है। इसलिए इस प्रकार का दूध न पिलावे।
वक्तव्य—स्तनों में दूध रुकने से स्तन भारी और कठोर होते हैं। बच्चा दबा नहीं सकता। या जोर से दबाने पर स्नोतों में दूध का जोर होने से दूध जोर से आकर बच्चे के मुख में भर जाता है, इससे कास श्वास होता है। अतः पहले स्तनों में से दूध निकालकर फिर पीने को देना चाहिये ॥२९॥