भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

के ऊपरी भाग का संयोग स्थल जिसका नाम वंक्षण सन्धि है, यह उलूखल सन्धि है। यह जघनास्थि के बहिः पार्श्व में स्थित है। इस पर आघात होने से अधःकाय की चेष्टा (चलना आदि) का उपघात हो जाता है और साथ २ तत्संबद्ध सिरास्नायु पर भी आघात होने से शून्यता हो जाती है। नितम्ब—यह भी अस्थिमय मर्म है, यह दो चौड़ी कपालास्थियाँ हैं—“गुदभग-नितम्बेषु चत्वारि” (अ० ५ सू० १६) में से दोनों ओर की दो अस्थियाँ तथा—जानु नितम्ब—“कपालानि (अ० ५ सू० २०) में वर्णित हैं। ये श्रोणिकाण्ड से कुछ ऊँची, बस्ति आदि आशयों का आच्छादन करनेवाली—दोनों पासों से बचानेवाली, दोनों पासों में अन्दर से बंधी है, यह “नितम्बास्थि” कही जाती है। पार्श्वसन्धि—यह सिरामर्म है, यह दोनों बृक्ष हैं, यह—पार्श्व-फुफ्फुस से अधःभाग में प्रतिबद्ध, जघनास्थि के पार्श्वों के मध्य—परन्तु तिरछे किन्तु उससे ऊपर-ऊँचे में स्थित हैं। श्री त्रिलोक की नाथ वर्मा के शब्दों में—ये दोनों इन्द्रियाँ (नहीं-यन्त्र) उदर में उसकी पिछली दीवार से लगी हुई, रीढ़ के दाहिनी ओर बाँई ओर रहती हैं, उनके आगे अन्त्र की गेण्ड-लियाँ पड़ी रहती हैं, हर एक गुदे (बृक्ष) के पीछे १२ वीं पसली रहती है। ४० श० की २० अ० १२। इन पर आघात होने पर कोष्ठ में (बस्ति में) रक्त भर जाने से मृत्यु हो जाती है। बृहती नामक दो मर्म—यह दोनों भी सिरा मर्म हैं, परिमाण में आधा अंगुल है तथा कालान्तर या एक हैं। यह फुफ्फुस का, पीठ की ओर का भाग है, दोनों के दो भाग हैं। शेष देखिये स्तनमूल मर्म का वक्तव्य। अंसफलक—यह दोनों अस्थिमर्म हैं, पीठ के उपरिभाग में, पृष्ठ वंश के दोनों ओर, त्रिक (दोनों स्कन्ध तथा श्रीवा का सन्धान स्थल) से सम्बद्ध तथा बाहर से स्पर्शोपलम्ब्य हैं जो खम्बे या फर या पर कहे जाते हैं। ये कपालाकार हैं। अंस—कन्धे कहे जाते हैं, ये स्नायु मर्म हैं, बाहु के मूर्ध=ऊपर का शिर (सिरा) तथा श्रीवा के मध्य भाग में वत्तमान, अंसपीठ (भार उठाने योग्य पीड़ा) स्कन्ध (कन्धा) नामक प्रदेश को बांधनेवाले स्नायु अंस नामक मर्म कहे जाते हैं ॥२६॥

अत उध्वमूर्ध्वजत्रुगतानि व्याख्यास्यामः—तत्र कण्ठ-नाडीसुभयतश्चतस्रो धमन्यो द्वे नीले द्वे च मन्ये। न्यस्यासेन तत्र मुक्ता स्वरवैकृतमरसग्राहिता च; श्रीवायासुभयतश्चतस्रः सिरा मातृकाः, तत्र सद्योमरणं, शिरोभीवयोः सन्धाने कूकटिके, तत्र चलमूर्धता, कर्णपुष्पतोऽधः सन्त्रिते विधुरे, तत्र बाधियं, प्राणमार्गसुभयतः स्तोतमार्गप्रतिबद्धे अभ्यन्तरतः फणे, तत्र गन्धाज्ञानं, श्रुपुच्छान्तयोरधोऽरुणो-बाँध्यतोऽपाङ्गी, तत्रान्धं दृष्टयुपघातो वा श्रुवोऽरुपरि-निम्नयोरारवर्तो नाम तत्राप्यान्धं दृष्टयुपघातो वा श्रुवो-

रन्तयोरुपरि कर्णललाटयोर्मध्ये गङ्गौ, तत्र सद्यो मरणं, गङ्गखयोरुपरि केगान्त उक्षौपौ, तत्र सराह्यो जीवेत् पाकात् पतितगल्यो वा तोदुधृतगल्यः, श्रुवोर्मध्ये स्थपनो, तत्रोक्षेपवत, पञ्च सन्ध्यः शिरसि विभक्ताः सीमन्ता नाम, तत्रोन्मादभयचिन्तनाशैर्मरणं, प्राणश्रोत्राक्षिजिह्वा-संतर्पणीनां सिराणां मध्ये सिरासन्निपातः शृङ्गाटकानि, तानि चत्वारि मर्माणि, तत्रापि सद्योमरणं, मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात् सिरासन्धिस्सन्निपातो रोमावर्तोऽधिपतिः, तत्रापि सद्य एव। एवमेतानि समत्रिशदूर्ध्वजत्रुगतानि मर्माणि व्याख्यातानि ॥२७॥

इसके आगे जत्रु से ऊपर के मर्मों का व्याख्यान करेंगे—इस में कण्ठ नाडी के दोनों ओर चार धमनियाँ हैं, एक नीला और एक मन्धा। दूसरे पार्श्व में एक नीला और एक मन्धा, इनका वेधन होने पर गूँगापन, स्वर विकृति, रस का प्रहण न करना होता है। श्रीवा के दोनों ओर चार सिरा मातृकायें हैं, इनमें तुरन्त मृत्यु होती है। शिर और श्रीवा के सन्धि पर कूकटिका मर्म है, इन में शिर हिलता रहता है कर्ण पीठ के नीचे स्थिर विधुर मर्म है, इससे बहरापन होता है। नासिका मार्ग के दोनों पार्श्वों में स्तोत मार्ग से सम्बद्ध, अन्दर की ओर ‘फणा’ मर्म है, इससे गन्ध ज्ञान का नाश होता है। श्रुवों के अन्तिम (बाह्य) छोर पर, नीचे की ओर, आँखों के बाहर की ओर अपांग है, इस में अन्धापन, दृष्टि की विकृति होती है। श्रुवों के ऊपर नीचे की ओर आवर्त्त नामक मर्म है, इनमें भी अन्धापन और दृष्टि का विकार होता है। श्रुवों के अन्दर में ऊपर की ओर कान और माथे के बीच में शंख मर्म है, इनमें भी तुरन्त मृत्यु होती है। शंखों के ऊपर बालों के सिर पर उत्क्षेप मर्म है, इन में शल्य रहने पर जीता है, स्वयं पककर शल्य के गिरने से भी जी सकता है, परन्तु शल्य निकालने से नहीं जीता। श्रुवों के बीच में स्थपनी मर्म है, इसमें उत्क्षेप की भांति, लक्षण होते हैं। शिर में पांच सन्धियाँ अलग अलग पांच सीमन्त मर्म हैं, इन में उन्माद, चिन्ता, भय, चिन्तनाश के कारण मृत्यु होती है। नासिका, कान नाक-जिह्वा को पोषण देनेवाली सिराओं के मध्य में सिराओं के मिलने का नाम शृङ्गाटक है, ये चार मर्म हैं, इन में भी तुरन्त मृत्यु होती है। मस्तिष्क के अन्दर ऊपर की ओर, सिराओं के सन्धि स्थान, बालों के आवर्त्त (भैंवर चक्कर) के समान अविपत्ति मर्म है। इसमें भी तुरन्त मृत्यु होती है। इस प्रकार से ऊर्ध्व जत्रु के सैंतीस मर्मों का व्याख्यान कर दिया।

वि० मन्तव्य—दो नीला तथा दो मन्धा नामक मर्म—दोनों ओर एक एक। ये सिरा मर्म हैं, श्रीवा में कण्ठ नाडी के दोनों ओर—इनका स्पर्श किया जा सकता है। दोनों के