भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ. १ ] ४२

शारीरस्थानम्

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तथा शा० अ० ५-६ । हृदय-हृत् (हार्ट) । स्तन-बाह्यवत्तिस्तन-मण्डल (स्तन चूचुक नहीं अपितु स्तन का पूरा घेरा) से आच्छादित स्थान के भीतर अवस्थित फुफ्फुस का वाचक भी हो सकता है, यथा—स्तन शब्द घ्न-शब्दे धातु (भ्वादि गणीय) से निष्पन्न होता है और शब्द-शप आक्रोशे धातु (भ्वादि गणीय) से निष्पन्न होता है—शब्द तथा आक्रोश (चिल्लाना) फुफ्फुसों के ही बल पर ही सकता है, बाह्य स्तन से नहीं और स्तन का पर्याय “कुञ्ज” है और कुञ्ज शब्द-कुञ्ज-संयोगे धातु (तुदादि गणीय) से निष्पन्न होता है और कोञ्ज-संकोञ्ज (सिकुड़ना)—फुफ्फुस में ही होता है । बाह्य कुञ्जों में नहीं, भले ही ये दोनों शब्द बाह्य स्तनों के लिये भी साहित्य में प्रयुक्त होते हैं, परन्तु हमारा दृढ विश्वास है कि इस प्रकरण में स्तन शब्द फुफ्फुस के लिये आया है । विश्वास का कारण—ये सिरा मर्म है और फुफ्फुस का प्रत्येक कोष्ठ-प्रकोष्ठ सिरा से व्याप्त है । दूसरे इन पर आधात होने पर उरःक्षत, फलतः कफ पूर्णकोष्ठता एवं कास श्वास होने का उल्लेख है और रक्त के पूय भाव को प्राप्त होने का भी उल्लेख है तथा—इनहीं में जानेवाली दो वातवह नाडियों का भी उल्लेख है जो श्वासमार्ग के दो मार्ग होकर फुफ्फुसों में जाती हैं । और बाह्यस्तनों पर आधात होने से यहाँ तक कि उनमें व्रण, व्रणशोथ आदि हो जाने पर भी कास श्वास आदि कुछ भी नहीं होते, स्तन काट दिये जाते हैं, सङ्ग जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं तथापि कासश्वास नहीं होते । और—वक्षस उरस के मर्मों में हृदय को सद्योमारक मानकर अन्य स्तनमूल आदि मर्मों को कालान्तरमारक माना है । यही कारण है कि इन पर आधात होने पर यदि कास श्वास आदि हो जाते हैं तो कालान्तर में मृत्यु होती है । और उक्त मर्म दो हैं—दोनों फुफ्फुसों में १-१ ।

स्तनमूल नामक मर्म—फुफ्फुसों का अष्टस्तन दो अंगुल भाग है । स्तन रोहित नामक मर्म—फुफ्फुसों का बाह्यस्तन के चूचुक (स्तन का कुण्मण्डल) से उपलक्षित मध्य भाग से २ अङ्गुल ऊपरी भाग है । अपलाप नामक मर्म—अंसकूट के नीचे (भीतर) पाक्षों (फुफ्फुसों) के उपरि भाग में विद्यमान है । यहाँ स्पष्ट पार्श्व शब्द का प्रयोग किया है, अर्थ है—पशुकासु भवं पार्श्वम—पशुकासों के भीतर फुफ्फुस ही विद्यमान हैं । अपस्तम्भ नामक मर्म—उरस में दोनों और विद्यमान वातवह—श्वास वायु का वहन करनेवाली दो नालियाँ जो श्वासनलिका से विभक्त होकर दोनों फुफ्फुसों में जाती हैं । इस प्रकार १ गुद, २ वस्ति तथा ३ नाभि, यह तीन मर्म उदर के और १—हृदय तथा फुफ्फुसों के ८ मर्म (दोनों में ४-४) यह ९ मर्म उरस के कह दिये हैं । उरस शब्द श्रु गतो धातु से निष्पन्न होता है, जिसमें गति हो वह उरस कहलाता है, अतः एव वह हृदय एवं

फुफ्फुसों के लिये प्रयुक्त भी होता है, यद्यपि बाह्य स्तनों को भी “उरोज” तथा वक्षोज कहते हैं, परन्तु वह साहित्य की वात है—आयुर्वेद की नहीं ॥२५॥

अत ऊर्ध्वं पृष्ठमर्माणि व्याख्यास्यामः—तत्र पृष्ठवंसुभयतः प्रतिश्रोणिकाण्डमस्थिनी कटीकतरुणे, तत्र शोणितक्षयात् पाण्डुर्विषणों होनरूपश्च श्रियते, पार्थ्यो-जघनबहिर्भागे पृष्ठवंशमुभयतो कुकुन्दरे, तत्र स्वर्गान्तमधःकाये चेष्टोपधातश्च, श्रोणिकाण्डयोरुपर्याशयाच्छादनौ पार्श्वान्तरप्रतिबद्धौ नितम्बौ, तत्राधःकायगोवो दौर्बल्याच्च मरणं अधःपार्श्वान्तरप्रतिबद्धौ जघनपार्श्वमध्ययोरित्यैर्गूर्ध्वं च जघनान् पार्श्वसन्धौ, तत्र लोहितापूर्णकोष्ठतया श्रियते, स्तनमूलाहजुभयतः पृष्ठवंशस्य बृहती, तत्र शोणितातिप्रवृत्तिनिमित्तेरुपद्रवैर्श्रियते, पृष्ठोपरि पृष्ठवंशमुभयतच्छिक्संबद्धे अंसफलके, तत्र बाह्योः स्वापशोषौ बाहुमूर्ध्नीवामध्यं उपपीठस्कन्धवन्धनान्वसौ तत्र स्तन्धबाहुता, एवमेतानि चतुर्दशपृष्ठमर्माणि व्याख्यातानि ॥

इसके आगे पृष्ठ के मर्मों का व्याख्यान करेंगे—इसमें पृष्ठवंश के दोनों और प्रत्येक श्रोणिकाण्ड में कटिकतरुण नामक अस्थि मर्म है । इनमें रक्त के क्षय से पाण्डु वर्ण, विवर्ण और हीन रूपवाला होकर मर जाता है । पाक्षों में जघन के बाह्य भागों में पृष्ठ-वंश के दोनों और कुकुन्दर नामक मर्म हैं, इन में शरीर के निचले भाग में स्पर्श की अप्रतीति, और चेष्टा नाश होता है । श्रोणीकाण्ड के ऊपर, आशय को दर्पनेवाले, पार्श्वों के बीच में सम्बद्ध नितम्ब हैं, इन में शरीर के निचले भाग में शोष, और निर्बलता से मृत्यु होती है । पार्श्वों के नीचे लगे हुए, जघन और पार्श्वों के बीच में जघन के ऊपर और तिरछे पार्श्व सन्धि नामक मर्म हैं, इनमें रक्त के भर जाने से मृत्यु होती है । स्तनमूलों की सीध में पृष्ठवंश के दोनों और बृहती नामक मर्म है, इस में रक्त के अतिस्रावजनित उपद्रवों से रोगी मर जाता है । पीठ के ऊपर पृष्ठ वंश के दोनों और त्रिक से सम्बद्ध अंसफलक मर्म हैं, इन से बाहुओं में सुन्नता और शोष होता है । कन्धा और शीवा के मध्य में अंसपीठ और स्कन्ध को बांधनेवाला ‘अंस’ मर्म है । इस पर चोट आने से बाहु जड़ (अक्रियाशील) हो जाती है । इस प्रकार से पीठ के चौदह मर्म कह दिये हैं ।

वि० मन्तव्य—पृष्ठ के ऊपर वा बाहर से अङ्गुलि निर्देश योग्य तथा पृष्ठ के भीतर या पृष्ठ की भित्ति के समीप रहनेवाले मर्म पृष्ठमर्म कहे जाते हैं । कटिक तरुण—यह दोनों अस्थि मर्म हैं, और पृष्ठ वंश के अधोभागिक श्रोणिकाण्ड के दोनों और की दो तरुणस्थियाँ हैं । कुकुन्दर—यह दोनों सन्धिमर्म हैं, ऊपर