सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुद्रतसंहिता
[ अ० १ ]
दिये हैं।
वि० मन्तव्य—पाठक ध्यान दें कि इन सर्मों में कौन-कौन मांसमर्म हैं और कौन-कौन खिरामर्म, स्नायुमर्म, अस्थिमर्म अथवा सन्धिमर्म हैं। कूर्चमर्म—पाँव एवं हाथ की शलाकास्थियों को बाँधनेवाले स्नायु का जाल है। तलहृदय मांसमर्म है, लोहिताक्ष—खिरामर्म है और जानु एवं कूर्पर गुरुक एवं मणिबन्ध सन्धिमर्म हैं। इस प्रकार सर्वत्र विचार किया जाय तो सर्मों का रहस्य समझ में आ सकता है, कूर्च-कूची-झाड़ू के समानाकार अथवा झाड़ू की शलाका जैसे रस्सी से बँधी रहती है वैसे ही ये अस्थियाँ स्नायु-से बँधी हैं। कूर्च-शिर—कूर्च का मूल भाग या जहाँ से कूर्च जुड़ा रहता है—कूर्च का शिर। इस मर्म में अनेक अस्थियाँ रहती हैं। मणिबन्ध—मणि जैसी छोटी छोटी अस्थियों का बन्ध बन्धन स्नायु। इन्द्रवस्ति—मांसमर्म है। इसका वर्णन देखिये—चि० स्था० अ० १८ श्लो० २५-२६ में। लोहिताक्ष—यह लाल वर्ण के अक्षकों की का सा होता है, पाँव-टाँग में ठीकर आदि आघात से भी सूज जाता है और इसी के शोथ को “वाधी” कहते हैं और यही प्लेग की ग्रन्थि भी है, जिसे विदारिका या वातालिका कहते हैं। यद्यपि अन्यत्र की ग्रन्थियों के शोथ भी (सोपद्रव) प्लेग कहे जाते हैं, परन्तु ८०-६० प्रतिशत लोहिताक्ष के शोथ देखे जाते हैं और यह भीषण भी अतएव होता है क्योंकि यह मर्मस्थल है। विट्प—यह वृषण या वृषणवाहक स्नायु हैं, क्योंकि विट्प स्नायुमर्म है और इस पर आघात होने से—सर्वथा नाश होने से पाण्डव-नपुंसकता और स्वरूप आघात होने से अलङ्गुश्रुता होती है और उक्त सर्मों का परिमाण—लम्बाई चौड़ाई का विचार इसी अध्याय के श्लो० २८-२९ से कीजिये ॥२४॥
अत ऊर्ध्वमुद्रोरसोर्ममणिबन्धुव्याख्यास्यामः—तत्र वात-वर्चानिरसनं स्थूलान्नप्रतिबद्धं गुर्व नाम मर्म, तत्र सद्यामरणं; अल्पमांसशणितोऽध्यन्तरतः कट्यां मूत्राग्रयो वस्ति; तत्रापि सद्यामरणमश्मरीव्रणाहृते, तत्राप्युभयतो भिन्नं न जीवति, एकतो भिन्ने मूत्रस्त्रावी व्रणो भवति, स तु यत्तेनोपक्रान्तो रोहित; पक्रामाग्रयोर्योर्मध्यं सिराप्रभवा नाभि; तत्रापि सद्योमरणं, स्तनयोर्मध्यमधिष्ठायोरस्यामाशयद्वारं सत्वरजस्तमसामविष्टानं हृदयं, तत्रापि सद्य एव मरणं; स्तनयोरधस्ताद् द्रवकुलमुभयतः स्तनमूले, तत्र कफपूर्णाकोष्ठतया (कासश्चासाभ्यां) प्रियते, स्तनचूचुक्योरुर्वं द्रवकुलमुभयतः स्तनरोहितौ, तत्र लोहितपूणकोष्ठतया कासश्चासाभ्यां च प्रियते; अंसकूटयोरधस्तात् पार्श्वोपरिभागयोरपलापौ नाम, तत्र रक्तं पूयभावं गतेन मरणं,
उभयत्रोरसो नाङ्गौ वातवहे अपस्तम्भौ नाम, तत्र वात-पूणकोष्ठतया कासश्चासाभ्यां च मरणम्; एवमेतान्युद्रोरसोद्वादिश मर्मणि व्याख्यातानि ॥२५॥
इसके आगे उदर और छाती के सर्मों का व्याख्यान करेंगे—इनमें वायु और मल (पुरीष) को निकालनेवाला, स्थूलान्न से सम्बद्ध गुदा नाम का मर्म है। इससे तुरन्त मृत्यु होती है। थोड़े मांस और थोड़े रक्तवाला, कटि के अन्तरस्थित, मूत्र का स्थान ‘वस्ति’ नामक मर्म है। इसमें भी अश्मरीजन्म व्रण को छोड़कर वेधन होने से तुरन्त मृत्यु होती है। अश्मरी व्रण में भी दोनों तरफ से (आर-पार) वेधन होने पर रोगी नहीं बचता। एक तरफ वेधन होने पर मूत्रस्त्रावी व्रण हो जाता है। इस व्रण की सावधानी से निकित्सा करने पर यह मर जाता है। पक्राशय और आमाशय के बीच में सिराओं का उत्पत्ति स्थान नाभि है। इसके वेधन पर भी तुरन्त मृत्यु होती है। स्तनों के मध्य में, छाती के भीतर, आमाशय द्वार के पास में हृदय नामक मर्म है, यह हृदय सत्त्व, रज, तम का स्थान है, इसके आघात से भी तुरन्त मृत्यु होती है। स्तनों के नीचे दो अंगुल, दोनों ओर स्तनमूल नामक मर्म है। इसके कफ से मर जाने पर कास, श्वास से रोगी मर जाता है। स्तन चुचुकों के दो अंगुल ऊपर दोनों ओर स्तन रोहित मर्म हैं। इनके रक्त से मर जाने पर कास, श्वास के कारण रोगी मर जाता है। अंस कूटों के नीचे, पार्श्वों के ऊपर के भाग में अपलाप नामक मर्म है। इनमें रक्त के पूय में बदल जाने से मृत्यु होती है। छाती के दोनों ओर, वात को ले जानेवाली जो दो नाडियाँ हैं, उनका नाम अपस्तम्भ है, इनमें वायु के मर जाने पर कास श्वास के कारण रोगी मर जाता है। इस प्रकार छाती और ऊपर के बारह मर्म कह दिये हैं।
वक्तव्य—“स्तन मूल को Root of the lungs; स्तन रोहित = Base of lungs; अपलाप = Apex of lungs; अपस्तम्भ = Bronchi कहते हैं।
वि० मन्तव्य—गुद-वात-अपान वायु तथा वर्चस्-पुरीष का निरसन-निर्गमन होता है, जिसके द्वारा स्थूलान्न-मलाशय के साथ प्रतिबद्ध ऊपर के छोर से बँधा हुआ। इसका वर्णन—चि० स्था० अध्याय २ में देखिये। वस्ति—मूत्राशय—इसका वर्णन नि० अ० ३ के श्लो० १८-२४ देखिये। नाभि—तुलान्न जहाँ रसवाहिनी सिराओं का प्रभव-उत्पत्ति या मूल या प्रारम्भ है। यह नाभि—धुनी या तुल नामक उदर के बाहर हरयमान अवयव नहीं है। अपितु पक्राशय-मलाशय एवं आमाशय के मध्यवर्ती अन्त्र का नाम है, जहाँ अन्त्र में से रस का पुष्क-करण एवं ग्रहण होता है। विशेष देखिये शा० अ० ४-२६-२७