भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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शारीरस्थानम्

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अतः मर्म पर चोट लगने पर कुपित हुआ वायु चारों ओर से इन सिराओं में फैल जाता है। बदती हुई यह वायु शरीर में तीव्र वेदनायें उत्पन्न करती हैं। फिर वेदनासे पीड़ित यह शरीर सुख बन जाता है, और इसकी चेतना जाती रहती है। इसलिये शल्य को निकालने की इच्छावाला वैद्य परिश्रम के साथ मर्मों की परीक्षा करके शल्य को निकाले॥१६,२०॥

एतेन शेषं व्याख्यातम् ॥२१॥

वायु के लक्षणों के अनुसार पित्त और कफ के भी लक्षण पैदा होते हैं

वक्तव्य—पित्त के लक्षण दाह, चोष आदि हैं। कफ के लक्षण-तन्ना, भारीपन, स्तोनिरोध आदि हैं ॥२१॥

तत्र सद्यःप्राणहरमन्ते विद्वां कालान्तरेण मारयति, कालान्तरप्राणहरमन्ते विद्वां वैकल्प्यमापादयति, विशल्यधनं वैकल्प्यकरं च भवति, वैकल्प्यकरं कालान्तरेण क्लेशयति रुजां च करोति रुजाकरमतीववेदनं भवति ॥२२॥

इनमें सद्यः प्राणहर मर्मों के आस-पास पर आघात लगने से कालान्तर में मृत्यु होती है। कालान्तर प्राणहर मर्मों के छोर पर आघात लगने से वैकल्प्य कारक मर्म की अवस्था होती है। विशल्यधन मर्म वैकल्प्य कारक बन जाता है। वैकल्प्य कारक मर्म कुछ समय पीछे दुःख देता है और पीड़ा करता है। रुजाकर मर्म में तीव्र वेदना नहीं होती ॥२२॥

तत्र सद्यःप्राणहराणि समरात्राभ्यन्तरान्मारयन्ति, कालान्तरप्राणहराणि पक्षान्मासाद्या, तेष्वपि तु क्षिप्राणि कदाचिदाशु मारयन्ति विशल्यप्राणहराणि वैकल्प्यकराणि च कदाचिदत्यभिहतानि मारयन्ति ॥२३॥

इनमें सद्यः प्राणहर मर्म सात रात के अंदर रोगी को मार देता है। कालान्तर प्राणहर मर्म पन्द्रह दिन या महीने में मृत्यु को मारता है। इनमें भी क्षिप्रमर्म कभी शीघ्र भी मारक बन जाता है। विशल्य प्राणहर और वैकल्प्य कर मर्म कभी बहुत ज़ोर का आघात लगने पर मारक हो जाते हैं।

वि० मन्तव्य—इस प्रकरण में “सद्यः” शब्द का अर्थ—सात रात्र (सात दिन) और “कालान्तर” शब्द का अर्थ एक पक्ष (१५ दिन) तथा १ मास (३० दिन या २७ दिन) है ॥२३॥

अत ऊर्ध्वं सक्रियमर्मीणि व्याख्यास्यामः—तत्र पादस्याङ्गकुल्योर्मध्ये क्षिप्रं नाम मर्म, तत्र विद्वांस्याच्चेपकेण मरणं; मध्यमाङ्गुलीमनुपूर्वेषु मध्ये पादतलस्य तलहृदयं नाम, तत्र रुजाभिसरणं, क्षिप्रस्योपरिष्टादुभयतः कूर्चो नाम, पादस्य भ्रमणवेपने भवतः, गुल्फसन्धेरेध उभयतः कूर्चशिरः तत्र रुजाशोफो; पादजङ्घयोः सन्धाने गुल्फा, तत्र रुजाः स्तब्धपादां खञ्जता वा, पार्णिप्रति जङ्घामध्ये इन्द्रवस्तिः, तत्र शोणितक्षयेण मरणं, जङ्घावोः सन्धाने

जानु, तत्र खञ्जता, जानुन ऊर्ध्वमुभयतस्यकुलमाणी तत्र ओफाभिवृद्धिः स्तब्धसक्रियता च, ऊरुमध्ये उर्वी, तत्र, शोणितक्षयात् सक्रियशोषः, उर्व्या ऊर्ध्वमधो वङ्गक्षणसंवे-रुस्मूले लोहिताक्षं, तत्र लोहितक्षयेण मरणं पक्षाघातो वा, वङ्गक्षणवृषणयोरन्तरे विटर्पं, तत्र पाणत्वमत्यशुक्रता वा भवति, एवमेतान्येकादश सक्रियमर्मीणि व्याख्यातानि। एतेनेतरसक्रिय बाहू च व्याख्यातौ। विशेषतस्तु यानि सक्रिय गुल्फजानुविटपानि, तानि बाहौ मणिबन्धकूर्प-कक्षधराणि, यथा वङ्गक्षणवृषणयोरन्तरे विटपमेवं वंशः-कक्षयोर्मध्ये कक्षधरं, तस्मिन् विद्धे त एवोपद्रवाः विशेषतस्तु मणिबन्धे कुण्डिता, कूर्पराख्ये कुणिः, कक्षधरे पक्षाघातः। एवमेतानि चतुश्चत्वारिशच्छाखासु मर्मीणि व्याख्यातानि ॥२४॥

इनके आगे सक्रिय (टाँग) के मर्मों का व्याख्यान करें—इनमें पैर के अंगूठे और मध्यमा अंगुलि के बीच में क्षिप्र नाम का मर्म है। इसके वेधन होने पर आञ्चोपे के कारण मृत्यु होती है। मध्यमांगुलि की सीधी रेखा में पैर के तलुवे में तलहृदय नामक मर्म है, इसमें वेदना के कारण मृत्यु होती है। क्षिप्र मर्म के ऊपर में दोनों ओर कूर्च नाम का मर्म है। इससे पैर में तिरछापन और कम्पन आ जाता है। गुल्फ सन्धि के नीचे दोनों ओर कूर्चशिर नाम का मर्म है, इसमें वेदना और सूजन होती है। पैर और जंघा की सन्धि पर गुल्फ मर्म है, इसमें वेदना, पैर का स्तब्ध होना, या लंगड़ापन होता है। पार्णि के ऊपर जंघा के बीच में इन्द्रवस्ति नाम का मर्म है, इसमें रक्त-क्षय से मृत्यु होती है। जंघा और ऊरु की सन्धि पर जानु मर्म है, इससे लंगड़ापन होता है। जानु से ऊपर तीन अंगुल में दोनों ओर आणि नामक मर्म है। इसमें शोफ की वृद्धि, टाँग की स्तब्धता होती है। ऊरु के बीच में उर्वी मर्म है, इसमें रक्त के क्षय से टाँग सूख जाती है। उर्वी मर्म के ऊपर, वंक्षण सन्धि के नीचे, ऊरु की जड़ में लोहिताक्ष मर्म है। वंक्षण और वृषणों के बीच में विटर्प मर्म है, इससे नपुंसकता, शुक्र की कमी होती है। इस प्रकार से टाँग में ग्यारह मर्म कह दिये हैं। इसी से दूसरी टाँग और बाहु को समझना। विशेष मेद यह है कि टाँग में जो गुल्फ, जानु और विटर्प मर्म हैं, वे ही मर्म बाहु में मणिबन्ध, कूर्प और कक्षधर नाम से हैं। जिस प्रकार वंक्षण और वृषण के बीच में विटर्प मर्म है, उसी प्रकार वक्ष और कक्षा के बीच में कक्षधर है। इसके वेधन से वे ही (विटर्प के समान) उपद्रव होते हैं। मेद-मणिबन्ध के वेधन होने पर हाथ में निकम्मापन, कूर्प के विद्ध होने पर लूलापन, कक्षधर में पक्षाघात होता है। इस प्रकार शखाओं के चौवालीस मर्म