सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
का संयोग रहता है उस स्थल का नाम "मर्म" है। ये स्थल विशेषरूप से प्राणों के आधार हैं। प्राण के लिये देखिये अ० ३ का तीसरा सूत्र। और इसी अध्याय का ३५ वाँ श्लोक। तान् तान् भावान् आपद्यन्ते—"उन उन भावों—आपदाओं को प्राप्त होते हैं" के लिये देखिये—सू० स्था० अ० २५ के श्लोक २३ से ४० तथा इसी अध्याय के श्लो० ३६ से ४०। अभिधात—संक्षेपतः अभिधात तीन प्रकार से होता है १—गिरने आदि से चोट लगना, २ शत्रु द्वारा दण्ड एवं शस्त्र आदि की चोट लगना, ३—शस्त्र-कर्म हैं ॥१२॥
तत्र सद्यःप्राणहराण्यग्नेयानि, अग्निगुणेष्व्वासु क्षीणेषु क्षपयन्ति कालान्तरप्राणहराणि सौम्याग्नेयानि, अग्निगुणेष्व्वासु क्षीणेषु क्रमेण च सोमगुणेषु कालान्तरेण क्षपयन्ति, विशल्यप्राणहराणि वायव्यानि, शल्यमुखवावरुद्धो यावदन्तर्वायुस्तिष्ठन्ति तावज्जीवति, उद्धृतमात्रे तु शल्ये मर्मस्थानाश्रितो वायुनिष्क्रामति, तस्मात् सगल्यो जीवत्युद्धृतशल्यो त्रियते (पाकत्पतितगल्यो वा जीवति), वैकल्प्यकराणि सौम्यानि सोमो हि स्थिरत्वात्च्छैत्याच्च, प्राणावलम्बनं करोति, रुजाकराण्यग्निवायुगुणभूयिष्ठानि विशेषतश्च तौ रुजाकरो, पाञ्चभौतिकीं च रुजामाहुरेके ॥१६॥
इनमें सद्यः प्राणहर मर्म आग्नेय (अग्नि गुणवाले) हैं। शरीर में अग्निगुणों के शीघ्र कम होने से मारक होते हैं। कालान्तर प्राणहर मर्म सौम्य और आग्नेय गुणवाले हैं। अग्निगुणों के दुरन्त क्षीण होने पर और सौम्य गुणों के कुछ समय पीछे क्षीण होने पर कालान्तर में मारक हैं। विशल्य प्राणहर मर्म वायव्य हैं—शल्यमुख से रुकी हुई वायु जब तक अन्दर रहती है, तब तक रोगी जीता है। शल्य के निकालते ही मर्म स्थान में स्थित वायु निकल आती है। इसलिये शल्य रहने पर जीता है, शल्य के निकाल लेने पर मर जाता है। (अथवा पक जाने पर शल्य के गिर जाने से रोगी जीता है)। वैकल्प्य कारक मर्म सौम्य हैं। क्योंकि सोम स्थिर एवं शीतल होने से प्राणों को सहारा देता है। रुजाकर मर्म अग्निगुण-वायुगुण की अधिकतावाले हैं। अग्नि और वायु विशेषकर दर्द करनेवाले हैं। कोई आचार्य वेदना को पंचभूतजन्य वेदना मानते हैं।
वि० मन्तव्य—पाञ्चभौतिकीं च रुजामाहुः एके अर्थात्—रुजाकर में केवल आग्नेयरुजा-दाह-सन्ताप आदि तथा वायव्य-रुजा-शूल-उद्वेधन आदि ही रुजा नहीं होती, अपितु—पार्थिव रुजा-कफजरुजा-कण्डू, शैल्य आदि तथा आकाशीय रुजा—शून्यता, शोफ आदि रुजा भी होती हैं—ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं। हमारे विचार में उनका जो कहना है वह सभी आचार्यों को कहना चाहिये, क्योंकि मर्म ही नहीं शरीर के
किसी अवयव पर आघात होने से उक्त प्रकार की वेदना होती देखी जाती है ॥१६॥
केचिदाहुर्मांसादीनां पञ्चानामपि समस्तानां विवृद्धानां समवायात् सद्यःप्राणहराणि, एकहीनानामल्पानां वा कालान्तरप्राणहराणि, द्विहीनानां विशल्यप्राणहराणि, त्रिहीनानां वैकल्प्यकराणि, एकस्मिन्नेव रुजाकराणीति। नैवं, यतोऽस्थिस्मर्स्वप्न्यभिहतेषु शोणितागमनं भवति ॥
कई आचार्यों की मान्यता है कि मांस-सिरास्नायुअस्थि और सन्धि इन पाँचों के मिलने से और बढ़ने पर सद्यः प्राणहर मर्म होते हैं। कालान्तर प्राणहर मर्म एक रचना के कम होने से या थोड़े परिणाम में मिलने से होते हैं। दो रचनाओं के कम होने पर विशल्य प्राणहर मर्म होते हैं। तीन रचनाओं के कम होने से वैकल्प्य कारक, और एक ही रचना के होने से रुजाकर मर्म होते हैं। परन्तु यह बात नहीं है, क्योंकि अस्थि मर्म पर भी आघात होने से रक्त आता है, (जिससे ज्ञात होता है कि वहाँ भी मांससिरा का संयोग है)।
वि० मन्तव्य—जहाँ मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि एवं सन्धि का विवृद्ध—पूर्ण संयोग है सबके संयोगों का सम्मिलन है वहाँ जो "मर्म" बनता है वह सद्यः प्राणहर (सद्यः मारक) होता है और जहाँ मांस आदि में से किसी एक का हीन या अल्प संयोग होता है वह मर्म-कालान्तरमारक होता है। इसी प्रकार अन्य मर्म भी समझिये। परन्तु क्योंकि मांस सिरा आदि पांचों शरीर में सर्वत्र पाये जाते हैं, तथापि मर्म १०७ ही हैं, इसलिये यह "केचित् आहुः" कोई ऐसा कहते हैं वह ठीक नहीं है। इस के लिये देखिये निम्नलिखित श्लोक ॥
चतुर्विधा यास्तु सिराः शरीरे
प्रायण ता मर्मसु सान्निविष्ठाः।
स्नायवस्थिमासानि तथैव सन्धान्
सन्तप्य देहं प्रातयापयन्ति ॥१८॥
क्योंकि इस शरीर में जो चार प्रकार की सिराएँ हैं, वे प्रायः करके मर्मों में स्थित हैं। ये सिराएँ स्नायु, अस्थि, मांस और सन्धियों को पोषण देती हुई शरीर का पालन करती हैं ॥
ततः क्षते मर्मणि ताः प्रधृद्धा
समन्ततो वायुरभिस्तृणोति।
विवर्धमानस्तु स मातरिशवा
रुजः सुतीव्राः प्रवन्तोति काये ॥१९॥
रुजाभिभूतं तु ततः शरीरं
प्रलोयते नश्यति वास्य संज्ञा।
अतो हि शल्यं विनिवर्तुमिच्छ-
न्मर्माणि यत्नेन परीक्ष्य कर्षत ॥२०॥