भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

रक्तर सङ्घाये (नरम करे)। भली प्रकार नरम बन जाने पर इसको निकालकर इस शरीर को सात दिन तक खस, बाल, बाँस, बल्बज की बनाई किसी एक की कूची से धीरे धीरे रगड़ता हुआ त्वचा से लेकर सब ही बाहर और अंदर के अंग-प्रत्यंग भागों को, उनकी विशेषताओं को कहे हुये अनुसार आँख से देखे। (अप्रकाशे का अर्थ अँधेरे में भी करते हैं)।

वि० मन्तव्य—आजकल आयुर्वेदिक तथा एलोपैथिक विद्यालयों में शवच्छेद किया जाता है वहाँ—शव में—फुमालिन एवं संखिया का इन्जेक्शन कर दिया जाता है। फलतः वह सड़ता नहीं है, सूख अवश्य जाता है और उसमें रंग भी चढ़ा दिया जाता है, जिससे रक्त खिराएँ लाल बनी रहती हैं। धीरे २ महीनों चौर २ कर अङ्ग प्रत्यङ्ग देख लिये जाते हैं ॥

न शक्यश्चलुषा द्रष्टुं देहे सूक्ष्मतमो विभुः।

दृश्यते ज्ञानचक्षुभिस्तपश्चक्षुभिरेव च ॥५०॥

शरीर में अतिसूक्ष्म विभु-परमात्मा को आँख से नहीं देख सकते। यह आत्मा तो ज्ञान चक्षु से और तप की आँखों से ही देखा जा सकता है। इसीसे कहा है—

‘यद्वदुध्करं यद्वदुरापं यच्च दुर्गं यद् दुस्तरम्।

तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥’

वि० मन्तव्य—विभुः-विविधो भवति, विकृतो—विकार-युक्तो भवति इति अर्थात् जो विश्वरूप है या जो शरीर धारण करता है वह आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म है, एवमरे से भी नहीं देखा जा सकता, शुक्र में जो सर्पाकार कीटाणु देखा भी जाता है वह आत्मा नहीं, अपितु उसका पाञ्चभौतिक शरीर है। मले ही वह भी सूक्ष्म है परन्तु सूक्ष्मतम नहीं। वह तो ज्ञान चक्षु-सुख दुःख आदि गुणों-लक्षणों से देखा जाता है। अथवा तपःप्राप्त दृष्टि—विष्य दृष्टि से ॥५०॥

शरीरे चैव शाखे च दृष्टार्थः स्याद्विशारदः।

दृष्टश्रुताभ्यां सदेहभवपोहाचरेत् क्रियाः ॥५१॥

शरीर के विषय में और शास्त्र के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है। देखकर और सुनकर-संदेह को मिटाकर ही चिकित्सा कार्य आरम्भ करें।

वि० मन्तव्य—विशारद-प्रगल्भ—जो शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्गों को भली माँत देख लेता है और शास्त्र को समझ लेता है, वह विशिष्ट शारदा वाणी यस्य सः—विशारद—प्राध्यापक शरीर का व्याख्याता हो सकता है ॥५१॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने शरीरसंख्याध्याकरण-

शारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५१॥

पञ्चोऽध्यायः

अथातः प्रत्येकममनिर्देशं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अत्र इसके आगे प्रत्येक सर्मनिर्देश शरीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—प्रत्येक (२०७) सर्म का निर्देश—वर्णन है, जिसमें सर्म का लक्षण देखिये २२ वें सूत्र में ॥१,२॥

समोत्तरं सर्मशतम् तानि सर्माणि पञ्चात्मकानि भवन्ति, तद्यथा—मांसमर्माणि, स्निग्धमर्माणि, स्नायु-मर्माणि, अस्थिमर्माणि सन्धिमर्माणि चेति। न खलु मांसस्निग्धस्नायुअस्थिसन्धिष्वयतिरेकेणान्यानि सर्माणि भवन्ति, यस्मात्त्रोपलभ्यन्ते ॥३॥

सर्म एक सौ सात हैं। ये सर्म पाँच प्रकार के हैं, यथा—मांस सर्म, स्निग्ध सर्म, स्नायु सर्म, अस्थि सर्म और सन्धि सर्म। मांस, स्निग्ध, स्नायु, अस्थि और सन्धि से पृथक् कोई सर्म नहीं होते, क्योंकि इनसे पृथक् और नहीं मिलते। (सारयन्तीति सर्माणि)।

वि० मन्तव्य—पञ्चात्मक—मांस आदि मय अर्थात् उनसे निर्मित यथा मांसमर्म—मांस मय मर्म, स्निग्धमर्म—स्निग्धमय मर्म, स्नायुमर्म—स्नायुमय मर्म, अस्थिमर्म—अस्थिमय मर्म और सन्धिमर्म—सन्धिमय मर्म। यथा मृन्मय—मिट्टी से बना—निर्मित घट आदि। क्योंकि मांस आदि के अतिरिक्त—रहित मर्मस्थल उपलब्ध नहीं होते ॥३॥

तत्रैकादश मांसमर्माणि, एकचत्वारिंशत् स्निग्धमर्माणि, सप्तविंशतिः स्नायुमर्माणि अष्टावस्थिमर्माणि, त्रिंशतिः सन्धिमर्माणि चेति। तदेतत् समोत्तरं मर्मशतम् ॥४॥

इनमें ग्यारह मांसमर्म, इकतीस स्निग्धमर्म, सत्ताईस स्नायु-मर्म आठ अस्थिमर्म, और बीस सन्धि मर्म हैं। इस प्रकार से ये एक सौ सात मर्म हैं।

वि० मन्तव्य—विधि मेद से मर्मों की संख्या इस प्रकार है ॥४॥

तेषामेकादशैकस्मिन् सन्धिभन्वन्ति। एतेनेतरसन्धि-बाहु च व्याख्याती, उद्वरोस्त्रोद्गिदश, चतुर्दश पुष्टे, प्रौवा प्रत्युध्वं समन्त्रिशत् ॥५॥

इनमें से ग्यारह मर्म एक टाँग में होते हैं। इस प्रकार से दूसरी टाँग और दोनों बाहुओं को समझना चाहिये। पेट और छाती में बारह, पीठ में चौदह, प्रौवा से ऊपर के भाग में सैंत स मर्म हैं ॥५॥

तत्र सकथिमर्माणि क्षिप्रतलहृदं प्रकृचं कूर्च शिरोगुल्फं न्द्रवस्तिजान्वाणुयुर्वोलोहिताक्षणि क्षिप्रं चेति, एतेनेतरत्