भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २ ]

गर्भों वातप्रकोपेण दौह्द्रे वाऽवमानिते ।

भवेत् कुब्जः कुणिः पङ्कुमू को मिन्मिण एवं वा ॥५॥

गर्भावस्था में गर्भ के अन्दर वायु का प्रकोप होने से अथवा गर्भवती स्त्री की श्रद्धा का खण्डन होने से गर्भ कुब्जा, कुणि (विकृत हाथोंवाला) पंगु (लङ्कड़ा), अथवा मूक (गूज़ा) और मिन्मिन अस्पष्ट बोलनेवाला होता है ॥५॥

भातापित्रोन्तु नास्तिक्यादशुभैश्च पुराकृतैः ।

वातादीनां प्रकोपेण गर्भो वैकृतभापुन्यात् ॥६॥

माता-पिता के नास्तिक होने से, अथवा पूर्वकृत अशुभ कर्मों से, अथवा वातादि दोषों के प्रकोप के कारण गर्भ विकृत हो जाता है ।

वि० मन्तव्य—नास्तिक्यात्—आयुर्वेदीय उपदेशों के अनुसार आचरण न करने से ॥६॥

मलात्पत्वादयोर्गच्छ वायोः पक्वाशयश्च च ।

वातमूत्रपुरीषाणि न गर्भस्थः करोति हि ॥७॥

मल के अत्यन्त अल्प होने से, वायु और पक्वाशय का परस्पर संयोग न होने के कारण गर्भ-वायु, मूत्र और मल का त्याग नहीं करता१ ।

वि० मन्तव्य—गर्भ का पोषण माता के आहार रस के द्वारा होता है अतः मलाशय में पुरीष का सञ्चय होता ही नहीं । मलाशय में वायु की गति भी नहीं होती अतः पुरीष का या तद्गत वायु का निःसरण भी नहीं होता, और अतएव

(७) Cyclocephalic monster—नाक नहीं होती ।

(८) Octocephalic monster—कान मिलकर एक हो जाते हैं ।

(९) Omphalositic monster—हृदय नहीं होता ।

(१०) Double monster—दो भ्रूण जुड़े होते हैं । इसके निम्न में—

(i) Sternopagus—उरोऽस्थि मिली रहती है ।

(ii) Ischiopagus—श्रोणि प्रदेश पर जुड़े होते हैं ।

(iii) Cephalopagus—सिर जुड़े होते हैं ।

(iv) XiphoPagns—उरोऽस्थि का अधोभाग जुड़ा होता है । Syncephalic—सिर का कुछ भाग जुड़ा होता है । Monocephalic—सिर एक ही होता है । Synosomatic—शरीर एक देश से मिले होते हैं । monosomatic शरीर एक होता है । Double Parasitic monster—एक भ्रूण दूसरे भ्रूण के वीच में होता है ।

१ गर्भ का पोषण माता के रक्त और अपरा से होता है, अतः शरीर की शुद्धि भी इन्हीं से हो जाती है । इसलिये पक्वाशय-बन्ति आदि अवयव कार्य नहीं करते ।

मूत्र का निर्माण भी नहीं होता और न त्याग ही । तत्पर्य यह है भ्रूण के उत्क अवयव क्रियाशील ही नहीं होते, होने का आवश्यकता भी नहीं होती ॥७॥

जरायुणा मुखे च्छन्ने कण्ठे च कफवेष्टिते ।

वायोर्मांगनिरोधोऽन्च न गर्भस्थः प्ररोदिति ॥८॥

जरायु द्वारा गर्भ का मुख बन्द होने से तथा गले में कफ रक्ता होने से, दोषजनक वायु का मार्ग रक्ता रहने से गर्भस्थ बालक रोता नहीं है ।

वि० मन्तव्य—भ्रूण के फुफ्फुस भी क्रियाशील नहीं होते फलतः न श्वास लेता है, न बोलता एवं रोता है ॥८॥

निःश्वासोऽङ्गाससङ्क्षोभस्वप्नान् गर्भोऽभिगच्छति ।

मातुर्निश्वासितोऽङ्गाससङ्क्षोभस्वप्नसंभवान् ॥९॥

गर्भ के निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ और स्वप्न आदि सब कार्य माता के निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ और स्वर पर निर्भर रहते हैं । अर्थात् बच्चे का जीवन तथा मानसिक संकल्प आदि सब कुछ माता के साथ सम्बद्ध हैं । उनका प्रभाव बच्चे पर पड़ा रहता है ।

वि० मन्तव्य—जीवन के लिये अत्यावश्यक श्वास उच्छ्वास एवं जागरण स्वप्न आदि की प्राप्ति—गर्भ माता के ही श्वास आदि से कर लेता है ॥९॥

सन्निवेशः शरीराणां दन्तानां पतनोद्भवौ ।

तलेऽवसंभवो यश्च रोम्पाभेतत् स्वभावतः ॥१०॥

शरीर-अवयव-चरणादि की रचना-विशेष दूध के दाँतों का गिरना तथा नये स्थायी दाँतों का उत्पन्न होना, हथेली या पंख के तलुवें में बालों का उत्पन्न न होना, ये सब कार्य स्वभाव से ही होते हैं१ ।

वि० मन्तव्य—आयुर्वेददर्शन में—स्वभाव को भी कारण माना है (शा० अ० १ सू० ११) ॥१०॥

भाविताः पूर्वदेहेषु सततं गाछनुद्वयः ।

भवन्ति सवभूमिष्टाः पूर्वजातिस्मरा नराः ॥११॥

जिन लोगों ने पूर्व जन्म में निरन्तर शास्त्राभ्यास के द्वारा अन्तःकरण को पवित्र कर लिया होता है, वे इस जन्म में सत्यबहुल होते हैं, इन पुरुषों को अपनी पूर्व जाति का स्मरण रहता है२ ।

१ चरक में इसका उत्तर दूसरो प्रकार से दिया है—अर्थात्—जिस प्रकार मोम आदि के सौंचे में स्वर्ण रजत आदि डालने पर सौंचे के आकार के हो जाते हैं उसी प्रकार मनुष्य की योनि में वीज के पड़ने से वह भी उस आकार में ढल जाता है ।

१ देखिये भगवद्गीता में “पूर्वाभ्यासेन तेनैव” इत्यादि श्लोक ।