भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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शारीरस्थानम्

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अनया विप्रकृत्या तु तेषां शुक्रवहाः सिराः। हर्षात् स्फुटत्वमायान्ति ध्वजोच्छ्रायस्ततो भवेत् ॥४५॥ शुक्रमक्षण आदि विरुद्ध अथवा विशेष स्वभाव द्वारा शुक्रवही शिरायें हर्ष के कारण फूल जाती हैं, इसीलिये ध्वज (शिरन) की उत्तेजना होती है। बिना उपर्युक्त कारणों के उत्पादक केन्द्र-मस्तिष्क तथा मेरुदण्ड के केन्द्र उत्तेजित नहीं होते ॥४५॥

आहाराचारचेष्टाभिर्घोषैर्गोभिः समन्वितौ। क्षीपुसौ समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ॥४६॥

सहवास के समय स्त्री और पुरुष की चेष्टायें, आहार, और आचार जैसे होते हैं, इनकी संतान में भी वैसा ही आहार आचार एवं चेष्टा रहती है।

वि० मन्तव्य—इसका विशद वर्णन—च० शा० अ० ८ में देखिये। और गर्भाधान के पूर्व माता पिता के आहार, आचार तथा चेष्टा का भला बुरा प्रभाव गर्भ पर पड़ता है। यदा नार्थोपेयातां वृषस्थन्यो कथंचन।

सुव्रतः शुक्रमन्योन्यमनस्थितस्तत्र जायते ॥४७॥

जिस समय सम्भोग की इच्छावाली दो स्त्रियाँ काम से अभिभूत होकर परस्पर मिलती हैं, उस समय परस्पर शुक्र के मिलने से जो मांसपिण्ड बनता है, वह अस्थि रहित या कोमलस्थिवाला होता है।

वि० मन्तव्य—वात्स्यायन काम सूत्र में इसे 'विस्मृष्टि सुख' कहा है, केवल शुक्र क्षरण-शुक्र विसर्जन का सुख पाने की इच्छा में दो नारियाँ तथा दो पुमान् परस्पर सहवास करते हैं। शुक्र धातु ही नारी तथा नर को मधुन के लिये बाध्य करता है और उसके क्षरण में आनन्द का अनुभव होता है अतएव उपस्थ (योनि एवं शिरन) का विषय-आनन्द (सु० शा० अ० १-६) माना है। नारी का शुक्र भी पुमान् के शुक्र का सा लसीला, श्वेत एवं विशिष्ट गन्धवाला होता है। यह मग की भित्तियों से स्रवता है। इससे गर्भाधान हो जाता है मले ही वहपैचिक गुणों से हीन होता है। वृषस्थन्यो कामुकी-कामातुरा का नाम है जो अपने शुक्र का विसर्जनमात्र करना चाहती है किसी भी प्रकार से ॥४७॥

ऋतुस्नाता तु या नारी स्वप्ने मधुनभावहेतु। आर्त्तवं वायुरादाय कुक्षौ गर्भं करोति हि ॥४८॥

मासि मासि विवर्धेत गभिण्यो गर्भलक्षणम्। कललं जायते तस्या वर्जितं पैरुकेगुणैः ॥४९॥

१ वास्तव में यह बात संगत नहीं—चूकि स्त्रियों का शुक्र निरर्थक है—

“शोषितोऽपि सवत्येव शुक्रं पुसां समागमे।

गर्भस्य तन्न किञ्चित् करोतीति न चित्तयति ॥”

जो ऋतुस्नाता स्त्री स्वप्न में मधुन करती है, तो वायु आर्त्तव को प्राप्त करके कुक्षि में गर्भ रूप कर देती है। यह रुद्ध आर्त्तव गुल्म रूप में प्रतिमास बढ़कर गर्भ के लक्षणों को (जी मचलाना, आर्त्तव का न आना आदि) उत्पन्न कर देता है। यह गर्भ कलल के रूप में बदल जाता है, इसमें पिता के गुण (केश, नख, अस्थि, नहीं होते)।

वि० मन्तव्य—पुमान् के समान स्त्री को भी स्वप्न दोष होता है और उसके शुक्र का क्षरण भी होता है इस शुक्र को कभी २ वायु लेकर गर्भाशय में पहुँचा देता है और तत्रस्थ आर्त्तव के साथ मिला देता है फलतः उक्त प्रकार का गर्भ हो जाता है ॥४८, ४९॥

सर्पवृश्चिककृष्माण्डविकृताकृतयश्च ये।

गर्भोऽस्त्वेते स्त्रियश्चैव ज्ञेयाः पापकृतो भृशम् ॥५०॥

स्त्रियों के जो गर्भ सांप-बिच्छू, पेठे के समान विकृत आकृतियों वाले होते हैं, ये सब पापजन्य हैं ॥५०॥

१ रक्तगुल्म के लक्षण देखिये—चरक में इसके ही लक्षण मिलते हैं। इसी प्रकार चरक के शारीर में भी 'ओजोऽधानानामित्यादि' श्लोक देखना। 'लेखक की आशंका' में गर्भ के लक्षण देखिये। जो स्त्रियाँ गर्भ के लिये अतिसय उत्कण्ठित रहती हैं, उनमें स्रग्य आर्त्तव अवरुद्ध होकर गर्भ के लक्षण उत्पन्न कर देता है। परन्तु क्लोरोफॉर्म सुधाकर उदर की परीक्षा करें, तो कोई लक्षण स्पष्ट नहीं होते।

२ आजकल साधारण तौर से विकृत भ्रूणों के निम्न रूप हैं। यथा—

  • (क) Hemitaria इसमें बौना, दैत्य शरीर, अत्यन्त छोटा सिर, दो गर्भाशय आदि होते हैं।
  • (ख) Heterotaxia इसमें अवयव अपने स्थान पर नहीं होते।
  • (ग) Thratism बनावट की विकृति—
  • (१) Ectromelic monster हाथ-पैर पूरी आकृति के नहीं होते।
  • (२) Symelic monster—निचले अवयव मिले होते हैं।
  • (३) Celosomatic monster—मध्य भाग बाहर को निकला होता है।
  • (४) Exencephalic-monster—मस्तिष्क की बनावट ठीक नहीं होती।
  • (५) Pseudencephalic monster—बृहत्मस्तिष्क नहीं होता।
  • (६) Anencephalic monster—सम्पूर्ण मस्तिष्क नहीं होता।