भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २ ]

जो पुरुष अन्नहृत्त्व के कारण स्त्रियों में उनकी गुदा में पुरुष की तरह प्रवृत्त होता है, उसे कुम्भीक जानना चाहिये। अथवा जो मनुष्य अपनी गुदा में मेषुन करवाकर शिशुन की उत्पत्ति को प्राप्त करके—फिर स्त्रियों में प्रवृत्त होता है, इसका नाम 'कुम्भीक' है बिना अग्राकृतिक मेषुन के इसको शक्ति नहीं मिलती१। इसी का नाम गुदयोनि है।

वि० मन्तव्य—कुम्भीक को यह व्यसन होता है। इसका एक दूसरा भी रूप है यथा—बीजात् समाशात् उपतप्तबीजात् स्त्रीपुंसल्लिङ्गे भवति द्विरेताः ( च० शा० अ० २ )—अर्थात् माता-पिता के शोणित एवं शुक्र के समानांश होने तथा उपतप्त ( विकृत ) होने से जो सन्तान होती है वह स्त्रीलिंग ( योनि-भाग ) तथा पुल्लिंग ( शिशुन ) वाली तथा द्विविध-दोनों प्रकार के रेतस वाली होती है इसको कभी पुमान् के साथ और कभी स्त्री के साथ सहवास की इच्छा होती है। इसको योनि भी होती है और शिशुन भी होता है। कुम्भीक इस इच्छा को अन्य पुमान् से स्वगुद में रति कराकर पूर्ण करता है इस क्रिया में कुम्भीक का शुक्र भी स्वलिप्त हो जाता है ॥४०॥

हृष्टा न्यवायमन्येषां न्यवाये यः प्रवर्तते।

ईष्यकः स तु विज्ञेयः षण्डकं शृणु पञ्चमम ॥४१॥

इसके आगे ईष्यक को सुनो। जो पुरुष दूसरों के मेषुन को देखकर मेषुन में प्रवृत्त होता है, इसको ईष्यक कहते हैं। बिना मेषुन देखे इसमें उत्पत्ति नहीं होती२।

वि० मन्तव्य—यह सन्तान उनको उत्पन्न होती है जो नर नारी परस्पर की ईर्ष्या ( असहिष्णुता-मनमुटाव ) से अभिभूत होने पर फलतः मन्द हर्ष ( मेषुनामिलाष ) से युक्त होकर गर्भाधान करते हैं ॥४१॥

आगे पाँचवें षण्डक नपुंसक को सुनो।

यो भार्यायामृतौ मोहाद्वक्त्रनेव प्रवर्तते।

ततः स्त्रीचेष्टिताकारो जायते षण्डसंज्ञितः ॥४२॥

जो पुरुष मोह ( अज्ञान या स्वरस के लोम ) वश श्रुतु-काल में अपनी स्त्री के साथ स्त्री की भाँति ( नीचे पुरुष और स्त्री ऊपर होकर ) प्रवृत्त होता है, इससे जो पुत्र होता है, उसकी चेष्टा और आकार स्त्री के समान रहते हैं। इस अवस्था में पुरुष विपरीत वन्धन द्वारा क्रिया में प्रवृत्त होता है३।

१ कुम्भिल की उत्पत्ति—

“अरजस्कां यदा नारी श्लेष्मरेता व्रजेदती।

अन्यसक्ता भवेत् प्रीतिर्जायते कुम्भिलस्तदा ॥”

२ ईष्यक का लक्षण—

“इष्यभिभूतावपि मन्दहर्षावौष्यद्विहृत्यापि वदन्ति हेतुम् ॥”

३ षण्डस्तु स्याकृतिः स्त्रीचेष्टितश्च स्त्रीवदवोभूतस्वमेहस्यो-र्ध्वप्रदेशे अपरपुरुषात् वीर्यच्युतिं कारयति।

वि० मन्तव्य—षण्ड ( हिजड़ा ) को न योनि होती है और न शिशुन ही होता है परन्तु मेषुनामिलाष तो होती है, फलतः वह स्वमूत्रमार्ग पर अथवा स्वगुद में अन्य पुमान् से... यह प्रायः स्त्री की वेधभूषा में रहता है। कोई ऐसे भी होते हैं जिनके शिशुन होता है या बहुत छोटा एवं दुर्बल होता है। स्तन नहीं बढ़ते ॥४२॥

श्रुतौ पुरुषवद्वाऽपि प्रवर्तताङ्गना यदि।

तत्र कन्या यदि भवेत् सा भवेन्नरचेष्टिता ॥४३॥

यदि श्रुतुकाल में स्त्री पुरुष की भाँति ( पुरुष को नीचे रखकर ) मेषुन करती है, उससे यदि कन्या उत्पन्न होती है, तो उसकी चेष्टा पुरुष के समान होती है४।

वि० मन्तव्य—यह भी षण्ड के समान होती है किसी २ को योनि भी होती है परन्तु अपूर्ण। यह प्रायः नर के समान वेधभूषा में रहती है। इसके स्तन भी कुछ या अपूर्ण बढ़ते हैं। इन दोनों प्रकार के षण्डों को थोड़ी दाढ़ी एवं मोह भी होती है किसी को नहीं भी। इनको नपुंसक या तृतीय प्रकृति कहा जाता है और चरक शा० स्था० अ० २ में—इन दोनों को नर षण्ड एवं नारी षण्ड कहा गया है। इनका उत्पादक बीज ( शुक्र शोणित ) मन्द शक्ति एवं अल्प होता है फलतः ये भी बलहीन एवं हर्षहीन होते हैं। यदि गर्भाशय में ही गर्भ के शुक्रस्त्रोत को वायु नष्ट कर डालता है तो “पवनेन्द्रिय” यदि शुक्रस्त्रोत के मुख अवरुद्ध हो जाते हैं तो “संस्कारवाही” माता के व्यवय का प्रतिघात तथा पिता का शुक्र दुर्बल होने से “वक्रौ” वायु एवं पित्त की विकृति से—बुध्ण का नाश हो जाने से “वत्तिकषण्डक” नामक गर्भ विकृतियाँ हो जाती हैं। च० शा० अ० २ देखिये। इनके अतिरिक्त वन्या, पूतिप्रजा तथा सन्ता नामक तीन स्त्रीव्यापद् और वन्य, पूतिप्रजा तथा तृणपुत्रिक ( तृणपुत्तलिक या तृणपूलिक ) नामक तीन पुरुष व्यापद् होती हैं ये दोष भी माता-पिता के शोणित शुक्र के विकार से गर्भोत्पत्ति काल में ही उत्पन्न हो जाते हैं। विवरण देखिये च० शा० अ० ४ में। ये सब अपूर्ण स्त्री पुरुष हैं अर्थात् न पूर्ण स्त्री और न पूर्ण पुरुष होते हैं ॥४३॥

आसेक्यश्च सुगन्धी च कुम्भीकरचैष्यकस्तथा।

सरेतसस्त्वमी बोधा अशुक्रः षण्डसंज्ञितः ॥४४॥

इनमें आसेक्य, सुगन्धि, कुम्भीक और ईष्यक ये चार नपुंसक होते हुए भी शुक्रवाले ( प्रजोत्पादन में समर्थ ) हैं। षण्ड नपुंसक शुक्र रहित ( प्रजोत्पादन में असमर्थ ) हैं ॥४४॥

१ स्त्रीरूपापि पुंवत् स्त्रियमाहह तद्योनां स्वयोनिवर्षणं करोति ॥