भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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शारीरस्थानम्

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गर्भोत्पत्ति (गर्भाधान काल) में जलीय धातु प्रधान होता है, तब गर्भ को गौर वर्ण करता है। जब तेज धातु पृथिवी धातु बहुल होता है, तब कृष्णवर्ण होता है। और जब पृथिवी, आकाश धातु प्रधान रहता है, तब कृष्णवर्ण रहता है। जब लल और आकाश धातु की बहुलता रहती है, तब गौर श्याम-वर्ण रहता है। कई आचार्यों का मत है, कि गर्भिणी स्त्री जिस वर्ण के आहार का अधिक मात्रा में सेवन करती है, उसी वर्ण की संतान उत्पन्न होती है।

यदि चौथे मास में तेज दृष्टि भाग (चतुः इन्द्रिय के आश्रय स्थान) में नहीं पहुँचता, तो शिशु जन्म से ही अन्धा रहता है। तेज धातु रक्त के साथ मिल जाये तो लाल आँखोंवाला, पित्त से मिल जाय तो पीली आँखोंवाला, कफ से मिल जाय तो श्वेत आँखोंवाला और वायु से मिल जाय तो विकृत आँखों वाला शिशु उत्पन्न होता है। ॥३५॥

भवति चात्र—

घृतपिण्डो यथैवाग्निसाश्रितः प्रबिलीयते। विसर्पत्यार्तवं नार्यास्तथा पुसां समागमे ॥३६॥

कहा भी है—जिस प्रकार से जमा हुआ घृत अग्नि के पास रखने से पिघल जाता है, इसी प्रकार से पुरुषों के साथ सहवास करने पर इन्द्रियद्वयसंवर्षण द्वारा उत्पन्न उष्णमा द्वारा विलीन आर्तव-स्त्रियों में प्रवर्त्तित होता है। इस क्रिया से मार्ग के शुद्ध होने पर शुक्रकीट और डिम्ब सुगमता से मिल जाते हैं।

वि० मन्तव्य—पुमान् समागम के बिना भी आर्तव की प्रवृत्ति होती रहती है परन्तु शुक्र संयोग के बिना गर्भाधान नहीं होता। ॥३६॥

१ वर्ण की उत्पत्ति के विषय में चरक में लिखा है कि—जिस जिस वर्ण तथा पराक्रम को संतान गर्भवती स्त्री उत्पन्न करना चाहे, उन उन जनपदों का मन से ध्यान करे। इसी के लिये सुन्दर हरिश्चन्दन से अंकित श्वेत बैल को देखना बताया है। देखिये चरक शारीर आठवों अध्याय।

२ चरक में इस बात को बहुत ही खूबी से कहा है, यथा—'यस्य यस्यावयवस्य बीजे बीजभागे वा दोषा प्रकोपमापद्यन्ते, तस्य तस्यावयवस्य विकृतिर्जायते—नोपजायते चानुप्तापाद् तस्माद् उत्तमोत्पत्तिः ॥ चरक० शा० ४।

३ जिस प्रकार कि लोहे के साथ चुम्बक की प्रीति है, पारे को मसूड़ों के तन्तुओं से, संखिये को आमाशय से, इस प्रकार शुक्रकीट को डिम्ब से लगाव है। यही कारण है कि शुक्रकीट जहाँ भी होगा वहाँ से डिम्ब उसे खींच लेगा।

बोजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागतौ। यमावित्यभिधीयते धर्मतरपुरःसरी ॥३७॥

शुक्र और शोणित (शुक्रकीट और डिम्ब) के अन्तःवायु (ध्यान) द्वारा दो भाग होने पर दो जीव गर्भाशय में उत्पन्न होते हैं। इनको यम कहते हैं। ये अवर्ग के कारण उत्पन्न होते हैं। अथवा वायु के कारण दो शुक्रकीट और दो डिम्ब मिलकर यमसंतान को उत्पन्न करते हैं।

वि० मन्तव्य—दो से अधिक गर्भ भी उत्पन्न हो जाते हैं। यमगर्भ—परस्पर उदर अथवा पीठ पर से जुड़े भी रहते हैं। दो से अधिक गम प्रायः जन्मते ही मर जाते हैं अथवा उनमें से कोई १-२ जीवित भी रहते हैं, जुड़े हुए भी जीवित रहते हैं। और किसी २ गर्भ के अधिक अंग भी होते हैं यथा—दो से अधिक ३-४ बाहु या टाँगें तथा १ से अधिक २ शिर आदि, किसी का गुद मार्ग ही नहीं होता अथवा अन्य कोई अवयव ही नहीं रहता ये भी प्रायः जन्मते ही मर जाते हैं। यम को जोड़ले जोड़े, यमक (ल) कहते हैं। कभी २ एक बालक और एक बालिका भी जन्मते हैं। जन्म में एक क्षण से लेकर कई दिन का अन्तर रहता है, यमलों के जरायु—नाल ही पृथक् २ होते हैं, इनमें कोई जीवित तो कोई मृत भी जन्मता है ॥३७॥

पित्रोऽरत्यरूपबीजत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत्।

स शुक्रं प्रारय लभते ध्वजोच्छ्वायमसंशयम् ॥३८॥

माता-पिता के अत्यरूप बीज (शुक्र-शोणित) होने से 'आसेक्य' नामक नपुंसक संतान उत्पन्न होती है। इस आसेक्य पुरुष में शिरन की उत्तेजना शुक्र को खाकर उत्पन्न होती है। अर्थात् यह आसेक्य पुरुष अपने मुख में अन्य पुरुष से मधुन करवाकर क्षरित शुक्र को खाकर ही उत्तेजना प्राप्त करता है। इसका दूसरा नाम 'मुखयोनि' है।

वि० मन्तव्य—आसेक्यः—आसेचयितु—शुक्रजनकद्रव्यैः तर्पयितु योग्यः अर्थात् शुक्रजनक मकरध्वज (शिवशुक्र) तथा अश्वगन्धा आदि के सेवन द्वारा जो ध्वजोच्छ्वाय (लिंग हर्ष) को प्राप्त करता है वह आसेक्य है ॥३८॥

यः पृथियोनौ जायेत स सौगन्धिकसंज्ञितः।

स योनिशेफसौगन्धमाघ्राय लभते बलम् ॥३९॥

जो पुरुष दुर्गन्धित योनि में उत्पन्न होता है, उसका नाम 'सौगन्धिक' है। यह पुरुष योनि और शिरन की गन्ध को सँघकर बल प्राप्त करता है। इसका दूसरा नाम 'नासायोनि' है।

वि० मन्तव्य—सौं, कुत्ते आदि के समान ॥३९॥

स्वे गुदेऽन्नद्वाचर्यायः क्षीणु पुंवत् प्रवर्तते।

कुम्भीकः स तु विज्ञेयः ईष्यकं श्रूणु चापरम् ॥४०॥