भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

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च्यते, द्वितीयेऽप्येवं सूतिकागृहे वा, तृतीयेऽप्येवमसंपूर्णा- ङ्कोऽल्पायुर्वा भवति, चतुर्थं तु संपूर्णाङ्को दीर्घायुश्च भवति । न च प्रवर्तमाने रक्ते बीजं प्रविष्टं गुणकरं भवति, यथा नद्यां प्रतिस्त्रोतः प्लाविन्द्रव्यं प्रक्षिप्तं प्रतिनिवर्तते नोर्ध्वं गच्छति तद्वदेतद्वदृष्टव्यम् । तस्मान्निममवतीं त्रिरात्रं परिहरेत । अतः परं मासादुपेयात् ॥३१॥

ऋतुमती स्त्री के साथ प्रथम दिन सहवास करने से मनुष्य की आयु कम होती है और जो गर्भ रहता है वह प्रसवकाल में मर जाता है । ऋतुकाल के दूसरे दिन जो गर्भ रहता है, वह सूतिका घर में (दस दिन के भीतर ही) मर जाता है । ऋतु के तीसरे दिन जो गर्भ रहता है, वह असम्पूर्ण अंगों वाला और अल्पायु होता है । चौथे दिन जो गर्भ रहता है, वह सम्पूर्ण अंगों वाला और दीर्घायु होता है । बहते हुए रक्त में प्रविष्ट हुआ बीज गुणकारी नहीं होता । जिस प्रकार कि— बहती हुई नदी की धारा के विपरीत फेंकी हुई तेरनेवाली वस्तु वापस आ जाती है, उपर को नहीं जाती, उसी प्रकार से शुक्रकांट भी आर्त्तव के प्रवाह के साथ गर्भाशय से बाहर आ जाती है, गर्भाशय में नहीं पहुँचता । इसलिये ऋतु के तीन दिनों में नियम पालन करनेवाली स्त्री से पृथक् रहना चाहिये । इसके पश्चात् (गर्भ न रहने पर) एक मास के उपरान्त सहवास करना चाहिये । जल्दी जल्दी सहवास करने से गर्भ स्थिर हुआ भी गिर जाता है ।

वि० मन्तव्य—कभी २ या किसी २ स्त्री को बहुत थोड़ा या थोड़े समय के लिये आर्त्तवस्त्राव होता है इस दशा में प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय दिन में भी गर्भाधान हो जाता है । और बहते हुए आर्त्तवस्त्राव में तो सहवास करने पर आर्त्तव के साथ ही शुक्र मां वह जाता है इसलिये तीन दिन तो सहवास करना ही नहीं चाहिये । आयुर्वेद में गर्भाधान के लिये ही सहवास का विधान है वासनापूर्ति के लिये नहीं ॥३२॥

लब्धगर्भायाश्चैतेष्वहःसु लक्ष्मणावटशुक्रसहदेवा- विश्वदेवानामन्यतमां क्षारेणाभिपुत्य त्रीश्चतुरो वा बिन्दून् दद्यादक्षिणे नासापुटे पुत्रकामायै, न च ताभि- ष्टोवेत् ॥३२॥

गर्भस्थिति होने पर वैद्य को चाहिये कि (स्त्री पुरुष के विमेदक लक्षणों के प्रकट होने से पूर्व अर्थात् दो मास से पूर्व ही) लक्ष्मणा, वटशुक्र (वटप्रोह), सहदेवा, (वला मेद), अथवा विश्वदेवा (गारोस्को-गंगेरन) इनमें से किसी एक को दूध के

१ ऋतुमती का लक्षण—“गते पुराणे रजसि नवे चावस्थिते शुद्धस्नतां स्त्रियमव्यापन्न-शुक्र-शोणितगर्भाशयामृतुमती व्याचक्षते ॥ चरक० ॥

साथ पीसकर पुत्र की कामना करनेवाली स्त्री के दक्षिणनासा- पुट में, तीन चार बूँदें डाल दे । कन्या की कामना करनेवाली स्त्री के वाम नासापुट में तीन-चार बूँदें डाल देनी चाहिये । स्त्री को चाहिये कि इनको थुके नहीं ॥३२॥

ध्रुवं चतुर्णां साञ्चिध्याद्गर्भः स्याद्विधिपूर्वकम् । ऋतुभेदत्रामुबीजानां सामग्रचादङ्गुरो यथा ॥३३॥ जिस प्रकार ऋतुकाल, चेत (खेत), अम्बु (जल), और बीज के संयोग से अंकुर अवश्य उत्पन्न होता है, उसी प्रकार से विधिपूर्वक ऋतुकाल, चेत, (गर्भाशय), अम्बु (शोणित) और बीज (शुक्र) के परस्पर मिलने से निश्चित रूप में गर्भ रहता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ॥३३॥

एवं जाता रूपवन्तः सन्त्ववन्तश्चिरागुषः । भवन्त्युणस्य भोक्ताः सत्पुत्राः पुत्रिणे हिताः ॥३४॥ इस प्रकार से रूपवान्, तेजस्वी, महान् पराक्रमी, दीर्घायु पुत्र उत्पन्न होते हैं । ये सत्पुत्र ऋग से माता पिता को छुड़ाते हैं, तथा माता पिता के लिये हितकारी होते हैं ॥३४॥

तत्र तेजोधातुर्वर्णानां प्रभवः, स यदा गर्भोत्पत्ताव- न्धातुप्रायो भवति तदा गर्भं गौरं करोति, पृथिवीधातु- प्रायः कृष्णं, पृथिव्याकाशधातुप्रायः कृष्णश्यामं, तोया- काशधातुप्रायो गौरश्यामम् । ‘याहवर्णमाहारमुपसेवते गभिणी ताहवर्णप्रसन्ना भवति’ इत्येके भाषन्ते । तत्र द्विभागमप्रतिपन्नं तेजो जात्यन्धं करोति तदेव रक्ता- नृतं रक्ताक्षं, पित्तानुगतं पिङ्गाक्षं, श्लेष्मानुगतं शुक्लाक्षं, वातानुगतं विकृताक्षमिति ॥३५॥

इन पाँचों भूतों में तेज धातु, वह सब प्रकार के वर्णों की उत्पत्ति में कारण है । यह तेज धातु जब

१ (१) गर्भविस्था में स्त्री—पुरुष के लिंगों का निर्माण एक या १२ मास के पश्चात् होता है । इसलिये इस समय से पूर्व ही पुंसवन कर्म करना चाहिये । यथा चरक में कहा है—

“तस्मादापन्नगर्भायां स्त्रियमभिस्मभीक्ष्य प्राग्व्यक्तीमावात् गर्भस्य पुंसवनमस्यै दद्यात् ।”

(२) लक्ष्मणा आदि का नस्य गर्भस्थान के लिये भी दिया जाता है । गर्भ रहने पर पुंसवन कार्य के लिये तीन मास तक प्रतिदिन या समय समय पर देते रहना चाहिये । यथा—

“पूर्वमोषसहस्राभिहुतं कृत्वा मागव्यदेशे गोः क्षीरेण पेष- यित्वा तस्मात् त्रीन् बिन्दून् दक्षिणे नासापुटे दद्यात् । न निष्टोवे- त्तान् कण्डप्राप्तान् सा पञ्च दिनानि पयसोदनमन्नीयात् तद्ब्रह्म ग्राम्यधमसेवनम् ।

“पुत्रकाकाररक्ताल्पबिन्दुभिलोळिच्छता सदा । लक्ष्मणा पुत्रजननी वस्तगन्वाकुर्विर्भवेत् ॥”