भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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शारीरस्थानम्

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अ २]

आँखों में अञ्जन, रोना, स्नान, अनुलेपन (चन्दन आदि का बरार पर लगाना), अश्वंग, नखों का काटना, दौड़ना, ऊँचे हँसना, बहुत बोलना, ऊँचे शब्दों का सुनना, अवलेखन (कड़ी से सिर साफ करना), वायु का सीधा झोंका, परिश्रम करना छोड़ देवे, क्योंकि—दिन में सोने से शिशु निद्रालु होता है, अञ्जन करने से अन्धा, रोने से विकृत दृष्टिवाला, स्नान और अनुलेपन से दुःखशील, तैल की मालिहा से कुष्ठी, नखों के काटने से दूषित नखवाला, भागने से चञ्चल, हँसने से श्यावदन्तक, श्यामवर्ण ओठ, ताख, जिह्वावाला, बहुत बोलने से प्रलापी (बकवादी), ऊँचे शब्द सुनने से बहरा, सिर खुजाने से गंजा, वायु और परिश्रम के सेवन करने से उन्मत्त (पागल) होता है, इसलिये इन बातों का त्याग करना चाहिये।

कुशा को विछाकर उसके ऊपर सोनेवाली, हाथ—मिट्टी के पात्र अथवा पत्ते पर हविष्य-(घी मिश्रित शालि-धान्य या दूध में संस्कृत गेहूँ आदि का) अन्न का भोजन करनेवाली जो तीन दिन पति से अपनी रक्षा करे—अलग रहे। चौथे दिन स्नान करके शुद्ध हुई स्त्री उत्तम वस्त्र तथा सुन्दर आभूषण धारण करके, मङ्गल पाठ स्वस्तिवाचन करने के पश्चात् पति का दर्शन करे१ ॥२५॥

यह सब किस लिये ?

पूर्व पर्येष्टुस्नाता याहर्शं नरमङ्गना । ताहर्शं जनयेत् पुत्रं भतौरं दक्षयेदतः ॥२६॥ ततो विधानं पुत्रीयमुपाध्यायः समाचरेत् । कर्मन्ते च क्रमं ह्येतमारभेत विचक्षणः ॥२७॥

श्रुतुस्नात स्त्री जिस प्रकार के पुरुष का दर्शन सबसे प्रथम करती है, उसी प्रकार के पुत्र को उत्पन्न करती है। इसलिये सबसे प्रथम पति का दर्शन करना चाहिये। इसके पश्चात् वैदिक कर्म को जाननेवाला याचिक-पुत्रेष्टि विधि को (चरकोक्त-तन्त्राचार्यों द्वारा) आरम्भ करे। इस कर्म के उपरान्त बुद्धिमान् पति वद्यमाण कार्य को करे ॥२६, २७॥

ततोऽपराह्ने पुमान् मासं ब्रह्मचारी सर्पः स्निग्धः सर्पः क्षीराभ्यां शाल्योदनं मुक्त्वा मासं ब्रह्मचारिणीं तैलं स्निग्धां तैलमाषोत्तराहारं नारीमुपेयाद्रात्रीं सामभिरभि-विश्वान्, विकल्प्यैव चतुर्थ्यां षष्ठ्यां मष्टभ्यां दशभ्यां द्वादश्यां चोपेयादिति पुत्रकामः ॥२८॥

बिता श्रुतुदर्शनं हुए भी गर्भ रह जाता है।

१ कहा भी है—

“नवे तनी च संजाते विगते जीर्णं शोणिते । नारी भवति संबुद्धा पुंसा संसृज्यते तदा ॥”

जो पुरुष एक मास तक ब्रह्मचारी रह चुका हो, वह घृत द्वारा स्निग्ध होकर पुत्रीय कर्म के पश्चात् सार्यकाल की ओर दूध से शालि चावलों को खाये। इसी प्रकार से एक मास तक ब्रह्मचर्य धारण की हुई स्त्री तैल से स्निग्ध होकर सार्यकाल तैल, उड़द का भोजन करे। रात्रि में इस स्त्री को सामादि वचनों से शान्त करके पति स्त्री से सहवास करे। इस प्रकार से यदि पुत्र की कामना हो तो चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, दशमी और बारहवीं (आर्तवस्त्राव से) रात्रि में सहवास करना चाहिये१ ॥

एषुत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च । प्रजासौभाग्यमेश्वर्यं बलं च दिवसेषु वै ॥२९॥

अतः परं-पञ्चभ्यां सप्तभ्यां नवभ्यामेकादश्यां च स्त्री-कामः, त्रयोदशीप्रभृतयो निन्धाः ॥३०॥

इसमें भी उत्तरोत्तर तिथियों में आयु, आरोग्य, प्रजा, सौभाग्य, ऐश्वर्य, बल की वृद्धि होती है। इसके आगे पांचवीं, सप्तमी, नवमी और एकादशी रात्रि में पुत्री की कामनावाले पति पत्नी के सहवास के लिये उत्तम है। इनमें भी उत्तरोत्तर रात्रियाँ श्रेष्ठ हैं। शेष त्रयोदशी आदि रात्रियाँ निन्दित हैं२ ॥

तत्र प्रथमे दिवसे श्रुतुभ्यो सैशुतगमनमनायुष्यं पुंसां भवति, यश्च तत्राधीयते गर्भः स प्रसवमानो विसु-

१ गर्भाधान के विषय में बहुत से भेद एवं नियम हैं। सचार-णतः श्रुतुकाल के समाप्त होने पर गर्भधारण करने की जो शक्ति गर्भाशय में रहती है, वह पीछे उतनी नहीं रहती। इसी कारण से १०-१५ दिन बाद किया गर्भाधान इतना विश्वास का नहीं होता, जितना पहिला। दूसरी बात-प्रथम दिनों में गर्भाधान करने से शिशु उतना पृष्ठ नहीं होता, जितना कि पिछले दिनों में गर्भाधान करने से होता है। इसलिये पिछली उत्तरोत्तर तिथियों को आचार्य ने श्रेष्ठ बताया है।

(१) हमारे शास्त्र में गर्भाधान का समय रात्रि का माना है। उस समय भी दिये का मन्द प्रकाश रखना कहा है। जिससे कि आँख की कनीनिका ठीक रहती है। परन्तु डाक्टर कोवन आदि दिन का समय मानते हैं। यह हमारी दृष्टि में सहमत नहीं। साथ ही स्मृति का कथन है—‘प्राणा एव प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते।’

(२) सहवास से पूर्व स्त्री की अनुकूलता प्राप्त करनी आवश्यक है।

२ पुत्र और पुत्री के लिये यह साधारण नियम है। चूँकि युगम तिथियों में स्त्री का रक्त घटा होता है और पुरुष का वीर्य चन्द्रमा के कारण बढ़ा होता है। अयुगम तिथियों में इसके विपरीत होता है। इसका उदाहरण समुद्र का ज्वारभाटा है।

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