सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
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के लिये शालि साठी ( हेमन्त धान्य ), जो, मद्य, तथा पित्त-वर्धक मांस हितकारी है ॥ १३-१६ ॥
अगस्त्यप्रतिमं यत्तु यद्वा लाक्षणस्योपमम् ।
तदार्त्तवैः प्रअंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ॥ १७ ॥
शुद्ध आर्त्तव की परीक्षा—जो आर्त्तव खरगोश के रक्त के समान रङ्ग में तथा घनता में होता है, अथवा लाख के पानी के समान होता है, वस्त्र पर शुष्क हुआ आर्त्तव धोने से कपड़े पर चब्बा नहीं छोड़ता, वह रज गर्भ धारण करने के योग्य होता है ॥ १७ ॥
तदेवाति प्रसङ्गेन प्रवृत्तमनुतावपि ।
असृग्दरं विज्ञानीयादतोऽन्यद्रक्तलक्षणं ॥ १८ ॥
असृग्दरो भवेत् सर्वः साङ्गमर्दः सवेदनः ।
तस्यातिवृत्तौ दौर्बल्यं भ्रमो मूर्च्छा तमस्त्रुषा ॥ १९ ॥
दाहः प्रलापः पाण्डुरवैः तन्द्रा रोगाश्च वातजाः ।
यहाँ आर्त्तव जब ऋतुकाल में भी अधिक मात्रा में आता है, अथवा अधिक दिनों तक चालू रहता है, या ऋतुकाल के दिनों के अतिरिक्त अन्य समय में भी आता है, और इस रक्त का रङ्ग आर्त्तव से भिन्न हो तो इसको असृग्दर ( रक्तप्रदर ) जानना चाहिये ॥
सब प्रकार के असृग्दर में—अङ्गों में टूटने की पीड़ा, गर्भाशय के समीप के अङ्गों में पीड़ा होती है । और यदि रक्तप्रदर अधिक मात्रा में हो तो दुर्बलता, भ्रम ( चक्कर आना ), मूर्च्छा ( बेहोशी ), तम ( आँखों के सामने अन्धकार ), प्यास, दाह, प्रलाप पाण्डुता ( शरीर का वर्ण पीला पड़ना ), तन्द्रा एवं वातजन्य ( आन्त्रेपकादि ) रोग होते हैं ॥ १८, १९ ॥
१ चरक में—
“गुंजाफलसर्वणं च पद्यालवतकसन्निभम् ।
इन्द्रगोपकसंकाशमार्त्तवं शुद्धमेव तत् ॥
भाससिन्धिच्छदाहात्तिपञ्चरात्रानुबन्धे च ।
नैवातिबहुनात्यल्पं तदार्त्तवं शुद्धमादिशेत् ॥”
आर्त्तव का परिमाण साधारणतः ५ से १० औंस है, परन्तु अनिश्चित है ।
आर्त्तव की चारों स्थितियाँ, आर्त्तव के विषय में निम्न पुस्तकें देखिये—
घात्रीशिक्षा, मुश्रुत-शरीर जयदेव कृत पृष्ठ २५, Midwifery by Johnstone और हमारे शरीर की रचना ।
२ जीवरक्त और आर्त्तव्रक्त में परीक्षा—
तेनासं मिश्रितं दद्याद्यायसाय शुनःपि वा ।
भुक्ते तच्चेद्व वेदज्जीवं न भुक्ते पित्तामादिशेत् ॥
शुक्लं वा भावितं वस्त्रभावानां कोष्णवारिणा ।
प्रशालितं विवर्णं चेत् पित्तं, शुद्धं तु शोषितम् ॥
आजकल—मैनोंरेजिया और मेटोरेजिया कहते हैं ।
तहण्या हितसेविन्यास्तमल्पोपद्रवं भिषक् ॥ २० ॥
रक्तपित्तविधानेन यथावत् समुपाचरेत् ।
तहणी ( सोलह वर्षवाली ), पश्व सेवन करनेवाली, असु उपद्रवों से युक्त ( निरन्तर खाव का बहना-दुर्बलता आदि ) रोगिणी में रक्तपित्त ( तथा रक्तार्श एवं रक्तातिसार ) की विधि से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २० ॥
दोषैरावृतमार्गस्वादात्तवैः नश्यति स्त्रियाः ॥ २१ ॥
तत्र मत्स्यकुल्लथाम्लतिलमापसुरा हिताः ।
पाने मूत्रमुदधिच्छ च दधि शुक्लं च भोजने ॥ २२ ॥
क्षणं प्रागोरितं रक्तं सलक्षणचिकित्सितम् ।
तथाऽप्यत्र विधातन्यं विधानं नष्टरक्तवत् ॥ २३ ॥
वातादि दोषों के कारण आर्त्तव—वहाँ ( गर्भाशय ) को रक्तवाहिनियों के अवरोध हो जाने पर स्त्रियों में आर्त्तव को प्रवृत्ति नहीं होती । इसके लिये—मछलियाँ, कुल्लथी, अम्लस, तिल, माष, सुरा हितकारी हैं । पीने के लिये मूत्र ( गायों का मूत्र तीक्ष्ण होने से ), उदधि ( अर्द्धादक मिला तक ), दधि, और शुक्त देना चाहिये । क्षीणात्तव के लक्षण और चिकित्सा प्रथम दोषादिविज्ञानीय अस्थाय में कह दी है । इसके साथ र नष्टार्त्तव की भी चिकित्सा मिला लेनी चाहिये ॥ २१-२३ ॥
एवमदुष्टशक्तः शुद्धार्त्तवा च ॥ २४ ॥
इस प्रकार से दोष रहित वीर्यवान् पुरुष और शुद्ध आर्त्तव-वाली स्त्री ही उत्तम प्रजा उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं ॥ २४ ॥
ऋतौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवास्वप्नान्ध्वनाश्रपातस्नानानुलेपनाभ्यङ्गनखच्छेदनप्रधानवहसनकथनातिशब्दश्रवणावलेखनानिल्यायासान् परिहरेत् । कि कारणं ? दिवा स्वप्नत्याः स्वापगोलः, अञ्जनादन्धः, रोदनादिकृतटष्टिः, स्नानानुलेपनादुःखगोलः, तैलाभ्यङ्गानु कुष्ठौ, नखापकर्तनात् कुतखौ, प्रधानान्चञ्चलः, हसनाच्छ्वाशवदन्तोष्ठतालुजिह्वाः, प्रलापी चातिकथनात्, अतिशब्दश्रवणाद्घ्रिः, अवलेखनात् खलतिः, माहत्यायाससे वनाडुन्मत्तो गर्भो भवतीत्येवमेतान् परिहरेत् । दर्भसंस्त रगयिनीं करतलश्रावणान्यतमभोजिनीं हविष्यं ज्यहं च भर्तुः संरचेत् । ततः शुद्धस्नानात् चतुर्थेऽह्न्यहत्तवासं समलङ्कृतां कुतमङ्गलस्वस्तिवाचनां भर्तारं दशयेत् । तत् कस्य हेतोः ? ॥ २५ ॥
अर्थात् मैथुन से रहित ब्रह्मचारिणी स्त्री को चाहिये कि ऋतुकाल के प्रथम दिन से ही दिन में सीता
१ क्षीणात्तव के लक्षण—
“आर्त्तवस्यैव यथोचितकालादर्शनमल्पता वा योनिवेदना च । तत्र संशोधनानपेयानाच्छ च द्रव्याणां विधिवदुपयोगः ॥” सु० सू०
२ ऋतुकाल —“ऋतुस्तु दुष्टार्त्तवो द्वादशरात्रं भवति, षोडशरात्रमित्यन्ये । शुद्धयोनिगर्भाशय आर्त्तवायाःभासमपि केचित् । तदवद्व दृष्टार्त्तवाऽप्यस्तीत्यपरे ॥ अर्थात्संग्रह ॥