भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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शारीरस्थानम्

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शठी (कचूर) द्वारा सिद्ध अथवा पलाशभस्म (पलाश की राख या पलाशधारजल) में साधित घृत पिठाना चाहिये। पूर-नामक वीर्यदोष में पुरुषकादि या वटादिगण द्वारा साधित घृत रोगी को पिठावे। क्षीणवीर्य की अवस्था में दोषादिविज्ञानीय में कहे स्वयोनिवर्धक द्रव्यों का उपयोग तथा क्षीणवलीय नामक अथवा में कही विधि को बरतना चाहिये। मल मूत्र गंधि शुक्-दोष में चित्रक, खस और हींग से साधित घी का प्रयोग करना चाहिये। शुक्दोष से पीड़ित व्यक्ति को प्रथम स्नेहन, वमन, विरेचन, निरुहण, अनुवासन आदि कम करने के पश्चात् उत्तर-बस्ति का यथाविधि प्रयोग करना चाहिये। ॥ ७-१० ॥

स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च ॥११॥ शुक्रमिच्छन्ति, केचित्त तैलक्षोदनभिं तथा। विधिमुत्तरबस्त्यन्तं कुयोदातं वशुद्धये ॥१२॥

(१) वृत्तसाधन का नियम— वृत्तादिकरणनेकितर्गणे स्यात् स्नेहप्रविधौ। तथैव कल्कनिर्युहाविष्येते स्नेहवेदिना ॥ क्वाथ से आठगुणा जल, शेष चतुर्थांश, वृत्त क्वाथ से चतुर्थांश, कल्क घृत से चतुर्थांश है।

(२) चरक में— वातान्तिते हितः शुक्ले निरुहाः सानुवासनाः। अभयामलकीयञ्च पित्तं शस्तं विरेचनम् ॥ मागध्यमृतलोहानां त्रिफलाया रसायनम्। कफोद्भवं शुक्दोषं हृत्पाद भल्लातकस्य च ॥ वाजीकरणीययोगैस्तैरप्युक्तैः शुभैः हितम्। रक्तपित्तहरेः योगैः योनिव्यापदिकैस्तथा ॥ दुष्टं तावत् यदा शुक्लं तदा तत् समुपाचरेत्। घृतं यज्जावनायोक्तं च्यवनप्राश एव च ॥ गिरोजस्य प्रयोगश्च रेतोदोषान् व्यपोहति ॥ तंत्रातरोय प्रयोग—अमृतसारलोह, अमृतप्राशघृत, गोधूमा-विघृत देने चाहिये।

(३) घातकोघृत—आदि तीनों घी क्वाथ एवं कल्क में सिद्ध होंगे। मात्रा आधा तोला। (४) सालसारदि, वटादि और पुरुषकादिगण के लिये सूत्र-स्थान देखिये। (५) पलाशघृत—पलाशभस्म एक आदक, पानी छे आदक में सात बार छानकर एक आदक, पानी में एक प्रस्थ घी पकाता चाहिये। रक्तगुल्म में पलाशघृत की विधि—पलाशधारतोयिन सपि-सिद्ध पिबेच्च सा।

(६) उत्तरबस्ति के लिये चरकसिद्धिस्थान या छंभह देखिये।

शुद्ध शुक्र की परीक्षा—

शुद्ध वीर्य—स्फटिक मणि के समान श्वेत (जरा-सी नीली झाँके लिये), द्रव (तरल) स्निग्ध (चिकनाहट शुक्र), मधुर (रस में) और मधु के समान गन्धवाला होता है। कई आचार्यों की मान्यता है कि शुद्ध वीर्य तिल तैल और मधु के समान वर्ण में तथा षट होता है, ऐसा वीर्य प्रजा-उत्पादन में समर्थ है ॥ ११,१२ ॥

क्षीणां स्नेहादियुक्तानां चतसृष्वार्त्तावतिष्ठु। कुयोः कल्कान् पिच्छंश्चापि पथ्यान्याचमनानि च ॥ प्रन्थिभूते पिबेत् पाठां ज्यूषणं वृक्षकाणि च। दुर्गन्धिपूयसङ्घाशे मञ्जतुलये तथाऽऽतंवे ॥१४॥ पिबेद्द्रवश्रयः क्वाथं चन्दनक्वाथमेव च। शुक्रदोषहराणां च यथास्वमवचारणम् ॥१५॥ योगानां शुद्धिकरणं शेषास्वप्नार्त्तावतिष्ठु।

अन्नं शालियवं मद्यं हितं मांसं च पित्तलम् ॥१६॥ आर्त्तवशुद्धि के लिये उत्तरबस्ति पथ्यन्त शुक्रदोषों में कही चिकित्सा करनी चाहिये। वात, पित्त, कफ और रक्तजन्य आर्त्तव दोषों के लिये स्नेहन आदि कर्मों के साथ साथ योनि में कल्क, पित्रु, पथ्य आचमन (योनिप्रक्षालन—वातादिदोषहर, क्वाथ द्रव्यों से बने) का प्रयोग करना चाहिये। आर्त्तव के प्रन्थि-युक्त होने पर पाठा, ज्यूषण (चिकट) और वृक्षक (इन्द्रजो) इनका क्वाथ पीना चाहिये। यदि आर्त्तव दुर्गन्धित पूय के समान अथवा मञ्ज के तुल्य हो तो मद्रश्रय (हरि-चन्दन-व्यवहार में देवदारु) और चन्दन (श्वेत चन्दन) इनका क्वाथ पिठाना चाहिये। वातादि एकदोषजनित आर्त्तव की शुद्धि के लिये शुक्रदोषनाशक पूर्वोक्त स्नेह स्वेदादि कर्म तथा योगों (रसायन, वाजीकरण, मूत्रदोषनाशकप्रयोग) -दोषों के अनुसार—प्रयोग करना चाहिये। आर्त्तवपीडा में—भोजन

१ (१) चरक ने शुद्ध शुक्र के लक्षण निम्न कहे हैं—स्तिग्धं घनं पिच्छिलं च मधुरं चाविदाहि च।

(२) स्फटिक मणि के समान श्वेत वर्ण शुक्र श्वेतगौर वर्ण संतान को, तैल वर्ण शुक्र कृष्ण वर्ण और मधु वर्ण शुक्र व्यामवर्ण संतान को उत्पन्न करता है। दिवार पर फंका शुक्र नीचे नहीं बहता।

(३) वैद्य जयदेव ने 'मधुर' शब्द का अर्थ—Natural in Recation किया है। यथा—The seminal fluid is viscous, Natural or Alkaline in recation है। इसको गन्ध खास होती है, जो किसी से नहीं मिलती। शुद्ध वीर्य का दाग साधारणतः घोने पर साफ नहीं होता।

२ आचमन—उत्तरबस्ति तथा योनिप्रक्षालन के लिये त्रिप-लाक्वाथ बरतना चाहिये।