सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १४ ]
लिङ्गवृद्धिभिच्छतामकमप्रवृत्तानां शूकदोषनिमित्ता दश चाष्टौ च व्याधयो जायन्ते। तद्यथा—सर्पपिका; अष्टौलिका, प्रथितं, कुम्भिका, अलजी, मृदितं, संमूढ-पिडका, अवमन्य, पुष्करिका, स्पर्शहानिः, उत्तमा, शत-पोतकः, त्वक्पाकः, शोणितावृदं, मांसावृदं, मांसपाकः, विद्रधिः, तिलकालकश्चेति ॥ ३ ॥
लिङ्गवृद्धि (आयाम और परिणाह रूप में) की चाह करने-वाले एवं शालोक क्रम का अनुसरण न करनेवाले पुरुषों में अठारह प्रकार के शूकदोषजन्य रोग होते हैं। यथा—सर्पपिका अष्टौलिका, प्रथित, कुम्भीका, अलजी, मृदित, संमूढपिडका, अवमन्य, स्पर्शहानि, उत्तमा, शतपोनक, त्वक्पाक, शोणितावृद, मांसावृद, मांसपाक, विद्रधि और तिलकालक ये अठारह रोग हैं ॥ ३ ॥
गौरसर्पपुतुल्या तु शूकदुर्भग्नेहेतुका। पिडका कफरक्तभ्यां ज्ञेया सर्पपिका बुधैः ॥ ४ ॥ सर्पपिका—शूकदुर्भग्नेहेतुका (दुखचारित शूक हेतु के कारण) श्वेत सरसों के समान पिडका उत्पन्न होती है। यह पिडका कफ-रक्तजन्य है ॥ ४ ॥
कठिना विषमैरन्तैर्मांसुत्तस्य प्रकोपतः। शूकैस्तु विषसंभुनैः पिडकाऽष्टौलिका भवेत् ॥ ५ ॥ अष्टौलिका—(विषसंयुक्त भक्ष्यताकास्थि आदि) शूकों के कारण से वायु का प्रकोप होने पर कठिन एवं विषम अन्तों से युक्त (प्राप्त भागों पर निम्नोन्नत) पिडका उत्पन्न होती है, इसको 'अष्टौलिका' कहते हैं ॥ ५ ॥
शूकैर्यत् पुरितं शस्त्रदुप्रथितं तत् कफोत्थितम्। कुम्भीका रक्तपित्तोत्था जाम्बवास्थितिभाऽशुभा ॥ ६ ॥ कुम्भीका—शस्त्रत् (प्रतिदिन) शूक (आरमगुप्ता, कौंच आदि अथवा जलशूकों) के सेवन से (एक दिन के अन्तर से सेवन करना चाहिये), कफ से प्रथित जामुन के समान अशुभ (काली) पिडका उत्पन्न होती है। यह कुम्भीका पिडका रक्त-पित्तजन्य है। (कफ के कारण पिडका गाठ रूप होती है) ॥ ६ ॥ अलजीलक्षणैर्युक्तामलजीं च वितर्कयैत्।
इनसे उत्पन्न दोष (रोगों) की व्याख्या करते हैं। "दोषा ह्यपि रोगशब्दं लभन्ते।"
१ निन्दित कल्पों को छोड़कर जलशूक आदि से रहित प्रशस्त कल्पों के प्रयोग में हानि नहीं। प्रशस्तकल्प यथा—
"अश्वगन्धवारीकुष्ठमासीहिहोफलात्विषतम्।
चतुर्गुणन दुषेन तिलतैलं विपाचयेत्।
स्तनलिंगकर्णपालिवर्धनं प्रक्षणादिवम् ॥ १ ॥
२ किसी किसी स्थान पर—'शूकदुर्भग्नेहेतुका' यह पाठ है। वहाँ पर 'शूक और दूषित भेग के कारण' यह अर्थ है।
अलजी—पिडका प्रमेहपिडका में कही अलजी पिडका के समान लक्षणोवाली होती है।
मृदितं पीडितं यत् संरुध्य वायुकोपतः ॥ ७ ॥
पाणिभ्यां भूशसम्भूढे संमूढपिडका भवेत्।
संमूढपिडका—पीडित (शूक प्रयोग करने के कारण शोथ आदि के उत्पन्न होने से) मृदित (अभिभूत), तथा शूक-प्रयोगों को लगाने के पीछे हाथों से विशेष रूप में मलने के कारण (शिरन के सुप्त होने पर) वायु के कोप से (वात-रक्तजन्य) संमूढ-पिडका उत्पन्न होती है ॥ ७ ॥
दीर्घा बहुयशश्च पिडका दीर्घन्ते मध्यतन्तु याः ॥ ८ ॥ सोऽवमन्यः कफासूग्भ्यां वेदनारोमहर्षण्डत्।
अवमन्य—शूक कर्म के उपचार से दीर्घ (लम्बी) बहुत सी पिडकायें उत्पन्न हो जाती हैं, ये बीच में से फट जाती हैं। यह अवमन्य रोग कफ रक्त से उत्पन्न होता है। इसमें वेदना और शरीर में रोमांच होता है ॥ ८ ॥
पित्तशोणितसंभूता पिडका पिडकाचिता ॥ ९ ॥
पद्मपुष्करसंस्थाना ज्ञेया पुष्करिकेति सा।
पुष्करिका—पित्त रक्त के कारण से—पिडकाओं से व्याप्त, पद्मकर्णिका के आकार की पिडका उत्पन्न होती है, इसको पुष्करिका कहते हैं ॥ ९ ॥
जनयेत् स्पर्शहानिं तु शोणितं शूकदूषितम् ॥ १० ॥
स्पर्शहानि—शूक द्वारा दूषित रक्त स्पर्शहानि रोग को उत्पन्न करता है ॥ १० ॥
मुद्गमाषोपमा रक्ता पिडका रक्तपित्तजा।
उत्तमैषा तु विज्ञेया शूकाजीर्णनिमित्तजा ॥ ११ ॥
उत्तमा—शूकाजीर्णनिमित्तजा (बार-बार शूक के सेवन से निर्ज्वल एवं विकृति विशेष से उत्पन्न) मूँग, माष के समान आकार की, लाल पिडका को 'उत्तमा' कहते हैं, यह रक्त पित्त-जन्य है ॥ ११ ॥
छिद्रैरणुमुखवर्स्तु चितं यस्य समन्ततः।
वातशोणितजो व्याधिर्विज्ञेयः शतपोनकः ॥ १२ ॥
शतपोनक रोग में—मेढ-चारों ओर सूक्ष्म मुखवाले छिद्रों से भर जाता है, यह रोग वात-रक्त जन्य है ॥ १२ ॥
पित्तरक्तकृतो ज्ञेयस्त्वक्पाको ज्वरदाहवान्।
त्वक्पाक रोग—पित्त-रक्तजन्य है। इसमें रोगी को ज्वर और दाह होता है ॥
कृष्णः स्फोटैः सरक्तैश्च पिडकाभिश्च पीडितम्।
यस्य वास्तुरुजश्चोप्रा ज्ञेयं तच्छोणितावृदम् ॥ १३ ॥
शोणितावृद—जिसमें वास्तु (अधिष्ठान शिरन) काटे छालों एवं लालवर्ण की पिडकाओं से व्याप्त होता है, उसको 'शोणितावृद' कहते हैं। यह रोग शूकापवार द्वारा रक्त के दूषित होने से होता है ॥ १३ ॥
अ० १५ ] ३५
निदानस्थानम्
२७३
मांसदोषेण जानीयादुर्बुद्धं मांससंभवम् । मांसादुर्बुद्धं—मांस में उत्पन्न होनेवाला मांसादुर्बुद्ध मांसदोष से (मांस की बृद्धि से) उत्पन्न होता है ॥
शौर्यन्ते यस्य मांसानि यत्र सर्वश्रश्च वेदनाः ॥१४॥ विद्यान्तं मांसपाकं तु सर्वदोषकृतं भिषक् । मांसपाक—जिस रोगी के शिरन का मांस शीर्ण (गल जाता) हो जाता है, वातादि सब दोषों की (तोद-दाह-कण्डु आदि) वेदनायें होती हैं, उसको मांसपाक कहते हैं । यह रोग सन्निपातजन्य है ॥१४॥
विद्रवि सन्निपातेन यथोक्तमभिनिर्दिशेत् ॥१५॥ विद्रवि—सन्निपातजन्य विद्रवि के समान इसमें लक्षण होते हैं ॥१५॥
कृष्णानि चित्राण्यथवा शूकानि सविषाणि च । पातितानि पचन्त्यासु मेदं निरवशेषतः ॥१६॥ कालानि भूत्वा मांसानि शौर्यन्ते यस्य देहिनः । सन्निपातसमुत्थानं तं विद्यात्तिलकालकम् ॥१७॥
तिलकालक—कृष्णवर्ण अथवा चित्रवर्ण (श्वेत, पीले, नीले विचित्रवर्ण) वाले और विषयुक्त (मिलावा मिश्रित) जलशुकों के प्रयोग करने से शिरन सम्पूर्ण रूप में पक जाता है । शिरन का मांस पके हुए तिलों के समान काला पड़कर गलने (झड़ने) लगता है । इस रोग को तिलकालक कहते हैं, यह रोग सन्निपातजन्य है ॥१६, १७ ॥
तत्र मांसादुर्बुद्धं यच्च मांसपाकश्च यः स्मृतः । विद्रविश्च न सिध्यन्ति ये च स्थुस्तिलकालकाः ॥१८॥ असाध्य रोग—मांसादुर्बुद्ध, मांसपाक, विद्रवि और तिलकालक ये चार शूकापचारजन्य रोग असाध्य हैं ॥१८॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने शूकदोषनिदानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥
पञ्चदशोऽध्यायः
अथातो भग्नानां निदानं व्याख्यास्यामः ॥१९॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२०॥ शुक्रदोष के समान भग्न निदान के भी सूत्र होने से अब भग्न-निदान की व्याख्या करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१९, २०॥
पतनपीडनप्रहराश्लेषणव्यालमृगदंशनप्रभृतिभिरभिघातविशेषैरनेकविधमस्थनां भङ्गमुपदिशन्ति ॥२१॥
भग्नरोग के कारण—गिरने से, दबाने से, चोट लगने से, आक्षेपण (आकर्षण अथवा अतिशय झटके से), व्याल (विहादि), मृग (हरिण आदि) के दन्त-नख आदि से, (एवं बलवान् से लड़ाई करने आदि से) चोट विशेष लगने के कारण बहुत प्रकार से अस्थियों का भङ्ग होता है ॥२१॥
तत्र भङ्ग (म) जातमनेकविधमनुसार्थमाणं द्विविधमेवोपपद्यते सन्धिमुक्तं, काण्डभग्नं च । तत्र षड्विधं सन्धिमुक्तं द्वादशविधं काण्डभग्नं भवति ॥२४॥
सम्पूर्ण प्रकार के भग्नों का तत्त्व रूप में अनुसन्धान करने से (संक्षेप रूप से) दो प्रकार के भग्नों में ही अन्तर्भाव हो जाता है । यथा सन्धिमुक्त (dislocation) और काण्डभग्न (Fracture) ॥२४॥
तत्र सन्धिमुक्तम्—उत्पिष्टं, विस्फिष्टं, विवर्तितम्, अवक्षिप्तम्, अतिक्षिप्तं, तिर्यक्क्षिप्तमिति षड्विधम् ॥२५॥
इनमें सन्धिमुक्त भग्न छे प्रकार का है । यथा—उत्पिष्ट (चूर्णित), विस्फिष्ट (प्रथम हुआ), विवर्तित (दक्षिण या वाम-पार्श्व में घुमा), अवक्षिप्त (ऊपर या नीचे क्षिप्त), अतिक्षिप्त (मांस आदि का विदारण करके उत्पन्न), और तिर्यक्क्षिप्त (टेढ़ा होकर थोड़ा सा हिला हुआ) ॥२५॥
तत्र प्रसारणकुच्छनविवर्तनाक्षेपणाशक्तिरुग्रजत्वं स्पर्शासहत्वं चेति सामान्यं सन्धिमुक्तलक्षणमुक्तम् ॥२६॥
लक्षण—प्रसारण (फैलाने में) आकुंचन (संकोच) विवर्तन (विपरीत घुमाने), आक्षेपण (अतिशय चालन अथवा आकर्षण) में अशक्ति, तीव्रवेदना, स्पर्श की असहिष्णुता ये सन्धिमुक्त के सामान्य लक्षण हैं ॥२६॥
वैशेषिकं तूत्पिष्टे सन्धावुभयतः शोफो वेदनाप्रादुर्भाषो विशेषतश्च नानाप्रकारा वेदना राज्ञो प्रादुर्भवन्ति, विस्फिष्टेऽल्पः शोफो वेदनासातत्यं सन्धिविक्रिया च, विवर्तिते तु सन्धिपार्श्वोपगमनाद्विषमाङ्गता वेदना च; अवक्षिप्ते सन्धिविश्लेषतोत्तरोत्तरजत्वं च; अतिक्षिप्ते द्वयोः सन्ध्यस्थनोरतिक्रान्तता वेदना च; तिर्यक्क्षिप्ते त्वेकास्थिपार्श्वोपगमनमत्यर्थं वेदना चेति ॥२७॥
विशेष लक्षण—उत्पिष्ट सन्धिमुक्त में—सन्धि के दोनों पार्श्वों में शोफ, वेदना का होना, और विशेषतः नाना प्रकार की वेदनायें रात्रि में उत्पन्न होती हैं । विस्फिष्ट सन्धिमुक्त में—थोड़ी सूजन, निरन्तर वेदना, सन्धि में अक्रियता आ जाती है । विवर्तित सन्धिमुक्त में—सन्धि के एक पार्श्व से हटकर दूसरे में जाने से अङ्ग में विषमता तथा वेदना होती है । अवक्षिप्त सन्धिमुक्त में—सन्धि का प्रथम होना और तीव्र वेदना होती है । अतिक्षिप्त सन्धिमुक्त में—सन्धिवाली—दोनों अस्थियों परस्पर दूर हट जाती हैं और वेदना होती है । तिर्यक्क्षिप्त सन्धिमुक्त में—एक अस्थिपार्श्व में दूरी आ जाती है और तीव्र वेदना होती है ॥२७॥
काण्डभग्नमत उभवं वक्ष्यामः—कटकम्, अश्चकर्णं, चूर्णितं, पिच्छितम्, अस्थिच्छलितं, काण्डभग्नं, मञ्जानुगतम्, आंतपातितं, वक्रं, छिन्नं, पाटितं, स्फुटितमिति द्वादशविधम् ॥२८॥
इसके आगे काण्डभग्न की व्याख्या करते हैं ।
१७४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १५ ]
काण्डभग्न (नलकास्थि का भंग) बारह प्रकार का है। यथा— कर्कटक , अश्वकर्ण , पिच्छित , अस्थिछलित , काण्डभग्न , मज्जानुगत , अतिगणित , वक्र , छिन्न , पाटित और स्फुटित ॥८॥
इवयशुचाहुल्यं स्पन्दनविवर्तनस्पर्शासहिष्णुत्वमवपीड्यमाने ग्रहः स्रस्ताङ्गता विविधवेदनाप्रादुर्भावः सर्वान्व-वस्थासु न गर्भलाभ इति समासेन काण्डभग्नलक्षणमुक्तम् ॥
सामान्य लक्षण—सृजन की अधिकता, स्पन्दन और विवर्चन में स्पर्श की असहिष्णुता, दवाने पर या रगड़ने पर शब्दोत्पत्ति (Capitation) बालों को रगड़ने के समान), अङ्ग का गिरा रहना, नाना प्रकार की वेदनाओं की उत्पत्ति, किसी भी अवस्था में शान्ति लाभ न होना, ये काण्डभग्न के सामान्य लक्षण हैं ॥९॥
विशेषस्तु समूढमुभयतोऽस्थिमध्ये भ (ल) र्गन् ग्रन्थि-रिवोन्नतं कर्कटकम्, अश्वकर्णवदुद्गतमश्वकर्णकं स्पृश्यमानं शब्दवच्चूर्णितमवगच्छेत्, पिच्छितं पृथुगं गतमनल्पशोफं, पार्वेयोरस्थि होनोद्गतमस्थिच्छलितं वेल्लते प्रक्रममानं काण्डभग्नम्, अस्थ्यवयवोऽस्थिमध्यमनुप्रविश्य मज्जानमुल्लक्ष्यतीति मज्जानुगतम्, अस्थि निशेषतद्विच्छिन्नमतिपातितम्, आसुरनमविमुक्तास्थि वक्रम्, अन्यतरपार्ववांशिर्ग्रंथिर्छिन्नं, पाटितमणुबहुविदारितं वेदनावच्छ, शुकपूर्णमिवाधमात् विपुलं विस्फुटितं स्फुटितमिति ॥१०॥
विशेष लक्षण—कर्कटक में—अस्थि मध्य में से टूट जाने पर ऊर्ध्व और अधः दोनों प्रान्तों से समूढ (कार्य में अशक्य) बन जाती है, अस्थि के कड़े के समान ऊपर को उठी रहती है। घोड़े के कान के समान ऊपर को उठी अस्थि अश्वकर्ण है। चूर्णितभग्न में—अस्थि स्पर्श करने पर चर-चर शब्द करती हुई प्रतीत होती है। पिच्छितभग्न से—अस्थि फैल जाती है और सृजन थोड़ी होती है। अस्थिछलित में—अस्थिपाश्वों में कुछ ऊपर को उठ जाती है (अथवा इसमें अस्थि टूटकर छलका-सा बन जाता है)। काण्डभग्न में—अस्थि हिलाने पर चलती (हिलती) है। मज्जानुगत में—अस्थि का कोई भाग अस्थि के अन्दर घुसकर मज्जा को बाहर कर देता है। अतिपातित भग्न में—अस्थि सम्पूर्ण रूप में छिन्न हो जाती है। वक्र भग्न में—अस्थि मुड़ जाती है परन्तु पृथग् नहीं होती। छिन्न—एक पार्श्व में लगी रहती है और एक पार्श्व से छिन्न हो जाती है। पाटित—फटने से बहुत से छोटे छोटे टुकड़े हो जाते हैं और तीव्र वेदना हो जाती है। स्फुटित—शुक—(यवादि धान्यों का अग्रभाग)—पूर्ण के समान वेदना युक्त, आधमात् (सूजी हुई), विपुल विस्फुटित (विशेष रूप से विदलित—कणों के रूप में टूटी) अस्थि “स्फुटित” होती है ॥११॥
तेषु चूर्णितच्छिन्नातिपातितमज्जानुगतानि कृच्छ्रसाध्यानि, कृङ्गवृद्धबालानां क्षतक्षीणकुष्ठिरूबासिनां सन्ध्युपगतं चेति ॥११॥
इनमें—स्फुटित, चूर्णित, छिन्न, अतिपातित, मज्जानुगत, ये काण्डभग्न कष्टसाध्य हैं। कृश वृद्ध और बालक तथा क्षत (उरः-क्षत रोग), क्षीण, कुष्ठ एवं श्वास रोगी में सन्धिभग्न कष्टसाध्य है, (इनमें काण्डभग्न भी कष्टसाध्य समझना चाहिये) ॥११॥
भवन्ति चात्र—
भिन्नं कपालं कटया तु सन्धिमुक्तं तथा न्युतम् ।
जघनं प्रतिपिष्टं च वर्जयेत्तन्निच्छक्तिस्तकः ॥१२॥
कपाल (Flat) अस्थियों के भग्न होने पर, कटिसन्धि के मुक्त अथवा न्युत (स्वलिप्त) होने पर, जघनस्थान में पिष्ट (उत्पिष्ट) भग्न होने पर, असाध्य समझना चाहिये।
वि० मन्तव्य—कटि की सन्धि मुक्त होने पर कुञ्जता हो जाती है जो असाध्य होती है, जघनास्थि पिस जाने पर उसका सन्धान नहीं होता ॥१२॥
असद्विलष्टं कपालं तु ललाटे चूर्णितं च यत् ।
भग्नं स्तनान्तरे शङ्खे पृष्ठे मूर्ध्नि च वर्जयेत् ॥१३॥
कपालास्थियों की सन्धियों के पृथक् होने पर, ललाट में कपालभग्न होने पर, स्तनों के मध्यवर्ती शंख नामक मर्म के भग्न होने पर पीठ एवं शिर के दोनों प्रकार के भग्न को असाध्य समझना चाहिये ॥१३॥
आदितो यच्छ दुर्जातमस्थि सन्धिर्वापि वा ।
सम्यग्यमितमप्यस्थि दुर्न्यासाद्दुर्निबन्धन्तान् ॥१४॥
संक्षोभाद्वाऽपि यद्गन्धेद्विक्रियां तच्छ वर्जयेत् ।
आदि से (जन्मोत्पत्ति काल से ही), दुर्जात (दूषित सन्धान के कारण) उत्पन्न अस्थि अथवा सन्धि असाध्य है। सम्यक् प्रकार से संहत (मिलाई) भी अस्थि—दुर्न्यास (बुरी प्रकार से रखने के कारण) से अथवा अनुचित रूप में बाँधने पर या संक्षोभ (हिलाने-जुलाने) से जो विकृत हो जाती है, वह अस्थि असाध्य समझनी चाहिये ॥१४॥
मध्यस्य वयसोऽवस्थास्तिस्रो याः परिकीर्तिताः ॥१५॥
तत्र स्थिरो भवेज्जनुरुपकान्तो विजानता ।
प्रथम जो तीन (बुद्धि यौवन और सम्पूर्ण) अवस्थायें कही हैं, इनमें मध्यम आयु के अन्दर (चालीस वर्ष की आयु में) पुरुष के धातु स्थिर रहते हैं (१६ से ४० तक धातु स्थिर रहते हैं)। इस अवस्था में चिकित्सा करनी चाहिये। इसके आगे
१ कबिराज हाराणचन्द्रजी ने 'खलिल्लं प्रक्रममानं काण्डभग्नम्' यह पाठ दिया है। यहाँ पर खलिल्लं का अर्थ गत्युक्त किया है। यथा—खल्लो वस्त्र प्रसेदं स्मावृ गत्तं । भेदती ।
निदानस्थानम्
२७५
अ० १६] चालीस से सत्तर वर्ष की आयु में अतिशय कष्टसाध्य हो जाता है ॥१५॥
तरुणस्थिति नम्यन्ते भव्यन्ते नलकानि तु ॥१६॥ कपालानि विभिद्यन्ते स्फुटन्ति रुचकानि च । तरुणस्थियाँ (Cartilage-घ्राण, कान, आँख की) — टेढ़ी बन जाती हैं। नलक (Long-Bones शाखास्थियाँ) टूटती हैं। कपालस्थियाँ (Flat-सिर आदि की) फटती हैं। रुचक (दाँत आदि) एवं बलयास्थियाँ (Small Bones कलई की) में स्फुटन (दराड़) होता है। इस प्रकार से अस्थियाँ पाँच प्रकार की बताई हैं। यथा—तरुण, कपाल, बलया, रुचक और नलक ॥१६॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने भग्गनिदानं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
षोडशोऽध्यायः
अथातो मुखरोगाणां निदानं व्याख्यास्यामः ॥१७॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१८॥ इसके आगे मुखरोग निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१९,२०॥
मुखरोगाः पङ्कषष्ठिर्भवन्ति समश्वायतनेषु । तत्रा- यतनानि-ओठो, दन्तमूलाणि, दन्ताः, जिह्वा, तालु, कण्ठः, सर्वाणि चेति । तत्राद्योषोऽध्यायः, पञ्चदश दन्तमूलेषु, अधो दन्तेषु, पञ्च जिह्वायां, नव तालुनि, समदश कण्ठे, त्रयः सर्वश्वायतनेषु ॥१९॥
मुख रोग पैंसठ प्रकार के हैं। ये सब रोग सात स्थानों में उत्पन्न होते हैं। सात स्थान यह हैं—दोनों ओठ, दन्तमूल, दाँत, जीभ, तालु, कण्ठ और सम्पूर्ण मुख। इनमें ओठों में आठ, दन्तमूलों में पन्द्रह, दाँतों में आठ, जिह्वा में पाँच, तालु में नौ, कण्ठ में सत्रह और सब स्थानों में तीन, इस प्रकार से कुल ६५ मुखरोग हैं ॥२०॥
तत्राद्येष्वक्रोपा वातपित्तइलेषमसन्निपातरक्तमांसमेदो- मिघातानमिताः ॥२१॥
इनमें ओष्ठरोग—वात, पित्त, कफ, सन्निपात, रक्त, मांस, मेद और अभिघात के कारण उत्पन्न होते हैं ॥२२॥
कक्कशो पुरुषो स्तन्ध्वो कृष्णो तीव्रहृगन्वितो । दाल्येते परिपाट्यते ह्योष्टो साहतकोपतः ॥२३॥
वायु के कारण ओष्ठ—खुरदरे, कठोर, निश्चल, काले हो जाते हैं, इनमें तीव्र वेदना होती है, ओठ गम्भीर रूप में फट जाते हैं, और इनकी (स्वचा) उत्खण्ड फट जाती है ॥२४॥
आचितो पिडकाभिस्तु सर्वपाकृतिभिर्भृगम् । सदाहपाकसंज्ञावो नीलो पीतो च पित्ततः ॥२५॥
पित्त के कारण ओठ—सरसों के आकार वाली पिडकाओं से पूर्ण रूप में भर जाते हैं। इन ओठों में जलन, पाक और खाव होता है। ओठों का रङ्ग नीला या पीला पड़ जाता है ॥२६॥
सवर्णाभिस्तु च्येते पिडकाभिरेवेदो । कण्डुमन्तो कफाच्छूनौ पिच्छिद्यौ शीतलो गुरु ॥२७॥
कफ के कारण ओठ—स्वचा के समान वर्णवले पिडकाओं से भर जाते हैं, इनमें वेदना नहीं होती। आंठों में कण्डु होती है, ओठ सूजे हुए, पिच्छिद्य, शीतल और भारी हो जाते हैं ॥२७॥
सक्रुत्तु कृष्णो सक्रुत्तु पीतो सक्रुच्छ्वेते तथैव च । सन्निपातेन विज्ञेयावनेकपिडकाचितो ॥२८॥
सन्निपात के कारण ओठ—कभी काले, कभी पीले और कभी श्वेत हो जाते हैं। अनेक प्रकार की पिडकाओं से ओठ भरे रहते हैं ॥२८॥
खर्जूरफलवर्णाभिः पिडकाभिः समाचितौ । रक्तोपसृष्टो रुधिरं क्षत्रतः शोणितप्रभो ॥२९॥
रक्त के कारण ओठ—खर्जूर के फल के समान वर्ण की पिडकाओं से भरे रहते हैं। इनमें लाल रङ्ग का रक्त बहता है ॥३०॥
मांसदुष्टो गुरु स्थूलो मांसपिण्डवदुदगती । जन्तवश्चात्र मूच्छन्ति सूचकस्योभयतो मुखान् ॥३१॥
मांस के कारण ओष्ठ—गुरु (भारी), स्थूल (मोटे) एवं मांसपिण्ड के समान उत्तत हो जाते हैं। मुख के दोनों पाश्वों में स्थित ब्रणों में कृमि उत्पन्न हो जाते हैं ॥३२॥
मेदसा घृतमण्डाभो कण्डुमन्तो स्थिरी मृदू । अन्च्छस्फटिकसङ्काजमासावं क्षत्रो गुरु ॥३३॥
मेद के कारण ओठ—घृतमण्ड (श्री के ऊपर के स्वच्छ भाग) के समान, एवं कण्डुयुक्त स्थिर (निश्चल) और कोमल होते हैं। इनसे स्वच्छ-स्फटिक के समान खाव बहता है और ओठ भारी हो जाते हैं ॥३४॥
क्षतजाभो विदीर्यते पाठ्यते चाभिघाततः । प्रथितो च समाख्यातावोष्टो कण्डुसमन्वितो ॥३५॥
अभिघात के कारण ओठ—क्षतज (रक्त) की आभावाले होते हैं, गहरे रूप में फट जाते हैं, इनकी स्वचा फट जाती है। ओठों में गॉठ-सी पड़ जाती है, इनमें कण्डु होती है। (अभिघातजन्य ओष्ठरोगों में वायु, कफ रक्त के साथ मिलकर कारण बनती है) ॥३६॥
दन्तमूलगातास्तु—शीतादो, दन्तपुष्पटको, दन्तवेष्टकः, शोषिरो, महाशोषिरः, परिदर, उपकुशो, दन्तवैदभी, वर्धनः, अधिमांसो, नाड्यः पश्चति ॥३७॥
दन्तमूल में स्थित रोग—शीताद, दन्तपुष्पटक, दन्तवेष्टक, शोषिर, महाशोषिर, परिदर, उपकुश, दन्तवैदभी, वर्धन, अधिमांस और पाँच नाडीब्रण—इस प्रकार से पन्द्रह रोग हैं ॥३८॥
२.५६ सुशरुतसंहिता [ष | |
' शोणितं दन्तवेष्टभ्यो यस्याकस्मात् प्रवतेते । दिलाने दबाने से रक्त बहने लगता है, मंद ` वेदना होती है।
दुगेन्धीनि स्प्णानि प्रक्टेदीनि मृदूनि च ॥१४॥ || रक्त के निकलने पर मसूडे पुनः ए जाते है, मुखं ओ ष |
दन्तमांसानि ओयंन्ते पचन्ति च परषरम्। आती है । यह रोग पित्त रक्तजन्य हे ॥२१,२२
शीतादो नाम स व्याधिः कफञोणितसंभवः ॥९५॥ र्षु दन्तमूटेषु संरम्भो जायत महान् ॥२३॥ ¦ शीताद्--बिना किखी कारण के दन्तवेष्ट (मसो) मे से | भवन्ति च चला दन्ताः स वेदर्भोऽभिघातजः। रक्त बहने कगता है मसु का. मांस दुग॑न्ध युक्त, काला, क्टेद | वेदभ रोग मे मसू को धिखने पर तीन शोथ उस्न
(खाव बहक) ओर कोमछ दो जाता ह । मवु का मांख गल्ने | हो जाता हे । दात दिल्ने र्गते हं, यह रोग अमिधातजन्य ३॥ `
छगता है, मसु. पक जाते है (पूय उतन्न हो जाती दै) । यह मारुतनाधिको दन्तो जायते तीत्रवेदनः ॥२४। त 1 वधनः स मतो व्याधिजाते रुक् च प्रशाम्यति
द्न्तयोख्िषु वा यस्य ऋधयथुः सरुजो महान् । वधन् (£दध2-2०५)-वायु के कारण.से तीतर शूर दन्तपुप्पुटको ज्ञयः करक्तनिमित्तजः ॥१९॥- . युक्त अधिक दति उत्पन्न होता है । इख दांत के उस्ने + . दंतपुष्पुटक--दो या. तीनः दतो .के मू मे जब. बवडुत | पर दद (व्याधि प्रभाव से) स्वेयं शान्त दो जाती है ॥२५ ॥ अधिक शोथ एवं वेदना उत्पन्न हो जाती है, तव. इसको .दन्तः हानव्ये पश्चिमे दन्ते महःन्छोथो महारुजः ॥ ९९॥ पुप्युटक कहते हँ । यह रोग कफ-रक्तजन्य है ॥१६॥ खालाखावी कफडतो विज्ञेयः सोऽधिमांसक । खबन्ति पूयरुधिरं चला दन्ता भवन्ति च| अधिमांख--हनु.के अन्तिम दंतमूल मे तीतर वेदनायुक्ष ` दन्तवष्टः स विज्ञयो दुष्टञ्रोणितसंमवः॥१अ महान् शोथ उत्पन्नो जातादहै। इसरोगमे मुखसे ला दन्तवेष्ट- मषु मे से रक्त ओर पूय बहती है, दाति | बहती है, यह रोग कफजन्य है ॥२५॥ | हिटने लगते हे, यह रोग दूषित रक्त से उत्पन्न होता हे-॥१७।॥। द्न्तमूगता नाज्यः पच्च ज्ञया यथेरिताः ॥२६॥
श्वयथुदेन्तमूरेषु रुजावान् कशूरक्तजः। | पू्वज्ति नाड़ीव्रण की भांति पाँच नाड़ियां दन्तभूढ मे भी खाखाखाबी स विज्ञेयः कण्डमान् शौषिरो गद्; ॥१द] | होती ह । इनके लक्षण उसी प्रकार के देँ ॥२६॥ शोषिर रोग य मसु मे सूजन उदयन्न हो. जाती है दन्तगतास्तु-दाल्नः, कृमिदन्तको दन्तहषां इसमें वेदना होती दै, यह रोग कफ-रक्तजन्य. है । मुख से व ॥ उअ) स कपाठिका, . इ्यावद्न्तको, दयु
शकरा, कपालिका, श्यावदंतक ओर ` हनुमोक्ष-ये आड रोगं द्न्तमांसानि पच्यन्ते.सुख च.परिपीञ्यते ॥१९॥ | इनये ~ ,; ; : यस्मिन् स सजो व्याधिमहाओौषिरसंज्ञकः। दाव्यन्त.बहुधा दन्ता यस्मिस्तीव्ररुगन्विताः। : ; महार से म-दातःमषडो को छोड देते ह ताह | दारनः स इति जेयः सदागतिनिमिततजः ॥२ट॥ फट जाता ई, मघे पक जाते है, यल भी (अधिक गल्ने से) दालनुरोग मे--दंत अनेक स्थानों से फट जाते दै, इनमे आक्रान्त वन जाता ई | यहे रोग सम्निपातजन्य है ॥१६। तीव्र वेदना होती है, यह रोग सदागति (वायु) के कारण उदयत्न दन्व्माखानि शयन्ते यस्मिन् ीवति चप्यस्॥२०॥ होता हे, (अवाध्य दै) ॥२८॥ ५ पित्तासक्कफजो भ्याधिज्ञय्ः परिदरो हि सः कृष्णञ्छिद्र चः खावी-ससंरम्भो महारजः ।
आती
परिद्र रोग मे-मसृडे गल जाते है, रक्तः -मिभित थूकृ | अनिमित्तरुजो वाताद्विज्ञेयः कृमिदन्तकः ॥२९॥ हे, थह रोग पित्त-कफःरक्तजन्य है ॥२०॥ र: ङमिदत रोग म-दतः के अन्दर काटा रङ्ग आ जाता £ . वेष्टेषु दाहः पाकश्च तेभ्यो दन्ताश्चरन्ति, च ॥२९१॥ . | छेद बनं जाता ह, दात दिवता दै, दतं से खावः बहता ह आध्धिताः प्रसवन्ति ओणितं मन्दवेदनाः। शाय होती है, वेदना तीव्र होती दै, विना कारण के ही वेदना आध्मायन्ते छते रक्ते युखं पूति च जायते ॥२२] श होने लगती हे, यह रोग वायुजन्य दै ॥२६॥ . ~ -यस्मिन्पड्गः स स्यात् पितरक्तदतो गदः ह शोतसुष्णं च दशनाः सहन्ते स्पर्मनं न च । -: उपङ्श रोग मे- मसूद मे जलन होती है, मसड़े पक यस्य त द्न्तहष तु व्याधि विद्यात् समीरणात् ॥१०॥ श
क
ई, इनसे दाति निक जाते हे । दातिमूर्छो को पकड़कर द्तहष (1401009 ०{ ४€ ४०९४) रोग मे दति शीत
| ज उष्ण वस्तुके स्पश को सहन नदीं. कर सकते |. यद र , | वात्तजन्यं है ॥३०॥ 2 =
५ ~न ~~~
छ [य आष ,
१, दस्के लक्षण 251०6 पारईरोया से मिर्ते हुं |
ॐ ११७
निदानस्थानम्
१७७
वक्रं वक्रं भवेद्यसिम्न दन्तभङ्गश्च तीव्ररक्तम् । कफवातकृतो व्याधिः स भञ्जनकसंज्ञितः ॥ ३१ ॥ भञ्जनक—रोग में मुख टेढ़ा हो जाता है, दाँत टूट जाते हैं, तीव्र वेदना होती है, यह रोग कफवातजन्य है ॥३१॥ शर्करैव स्थिरीभूतो मलो दन्तेषु यस्य वै । सा दन्तानां गुणहरी विज्ञेया दन्त शर्करा ॥ ३२ ॥ दंतशर्करा—जिन दाँतों में शर्करा ( बालू के सूक्ष्म कण ) के समान मल जम जाता है, उसे दंतशर्करा कहते हैं। यह रोग दाँतों के शुक्लता आदि गुणों को नष्ट कर देता है ॥३२॥ दलन्ति दन्तवलकानि यदा शर्करया सह । ज्ञेया कपालिका सैव दशनानां चिन्ताशिनी ॥ ३३ ॥ कपालिका—रोग में दाँतों के बल्कल ( त्वचा उपरि-भाग बल्कल के समान ऊपर का श्वेत वर्ण प्लास्टर ) शर्करा के साथ विदीर्ण हो जाते हैं। यह रोग दाँतों को नष्ट करनेवाला ( असाध्य ) है ॥३३॥
योऽसृञ्जिग्रेण पिचने दग्धो दन्तस्वशेषतः । श्यावतां नीलतां वाऽपि गतः स श्यावदन्तकः ॥ ३४ ॥ श्यावदंतक—रोग में दाँत रक्त मिश्रित पित्त से पूर्ण रूप में जल जाता है, दाँत का रङ्ग काला या नीला हो जाता है, इसको श्याव-दंतक कहते हैं ॥३४॥
वातेन तैस्तैर्भावैस्तु हनुसन्धिर्विंसंहतः । हनुमोक्ष इति ज्ञेयो व्याधिर्दितलक्षणः ॥ ३५ ॥ हनुमोक्ष—ऊँचे बोलने से, कठिन पदार्थों के भक्षण से, जूम्भा आदि कारणों से वायु कुपित होकर हनु सन्धि को शिथिल कर देती है। इस रोग में अर्दित के समान लक्षण ( दाँतपीड़ा आदि ) होते हैं। इसका नाम हनुमोक्ष है ॥३५॥
जिह्वागतास्तु—कण्टकाखिबिधाखिभिर्दोषैः, अलास, उपजिह्विका चेति ॥ ३६ ॥
जिह्वागत—कण्टक तीन प्रकार के, वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य, तीनों दोषों से। अलास और उपजिह्विका—ये जिह्वा के काँटों में नहीं होते, जीभ में होते हैं ॥३६॥
जिह्वाऽनिलेन स्फुटिता प्रसुप्ता भवेच्च शाकच्छद्वनप्रकाशा । वायु के कारण जिह्वा—ईषद् विदीर्ण, प्रसुप्त ( रसशान में असमर्थ ) एवं शाकच्छद्व ( खरपत्र शैगुन के पत्ते ) के समान होती है ।
पिचने पीता परिदह्यते च चिता सरकतैरपि कण्टकैश्च ॥ पित्त के कारण जिह्वा—पीली और जलती प्रतीत होती है। जीभ लाल-लाल काँटों से भरी रहती है ।
कफेन गुर्वो बहुला चिता च मांसोदगमैः शालमलिकण्टकामैः ॥३७॥
कफ के कारण जिह्वा—भारी, स्थूल एवं सिम्बल के काँटों के समान मांसांकुरों से व्याप्त होती है ॥३७॥ जिह्वातले यः श्रयश्चः प्रगाढः सोऽलाससंज्ञः कफरक्तमूर्तिः । जिह्वां स तु स्तम्भयति प्रवृद्धो मूले तु जिह्वा भ्रशमेति पाकम् ॥ ३८ ॥ अलास—कफ-रक्त के समान मूर्ति रूप ( कफ-रक्तजन्य ) गम्भीर शोथ जीभ के नीचे उत्पन्न होकर जीभ को जड़ बना देती है ( वायु के कारण )। बढ़ने पर जड़ में विशेष रूप से पक जाती है ( पित्त के कारण )। इसलिये यह रोग सन्निपात-जन्य होने से असाध्य है ॥३८॥
जिह्वाग्ररूपः श्रयशुद्धिं जिह्वा-मुत्रम्य जातः कफरक्तयोनिः । प्रसेककण्डूपरिदाहयुक्ता प्रकथ्यतेऽसावुपजिह्विकेति ॥ ३९ ॥
उपजिह्विका ( Ranala )—कफ रक्त के कारण उत्पन्न जीभ के अग्रभाग के समान शोथ जिह्वा को ऊपर उठाकर उत्पन्न होती है। इसमें—लाला प्रसेक ( खाव ) कण्डू, जलन होती है, इसका नाम उपजिह्विका है ॥३९॥
तालुगतास्तु—गलशुण्डिका, तुण्डिकेरी, अभ्रुषः, कच्छपः, अर्बुदः, मांससङ्घातः, तालुपुष्पः, तालुशोषः, तालुपाक इति ॥ ४० ॥
तालुजन्य रोग—गलशुण्डिका, तुण्डिकेरी, अभ्रुष, मांस-कच्छप, अर्बुद, मांससंघात, तालुपुष्प, तालुशोष और तालुगक ये नौ रोग हैं ॥४०॥
इलेष्मासुग्म्यां तालुमूलात् प्रवृद्धो दौर्घः गोफो धमातबस्तिप्रकाशः ।
तृष्णाकासश्चासक्तु संप्रदिष्टो व्याधिर्वैद्यैः कण्ठगुण्डोति नाम्ना ॥ ४१ ॥
कण्ठशुण्डि ( गलशुण्डि )—कफ-रक्त के कारण से उत्पन्न शोथ तालुमूल से आगे की ओर बढ़कर गलशुण्डि ( Tonsils ) में पहुँच जाता है। यह शोथ वातपूर्ण बस्ति के समान एवं लम्बा हो जाता है। इस रोग में—तृष्णा, कास, स्वास उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं। वैद्य इसको 'कण्ठशुण्डि' के नाम से जानते हैं ॥४१॥
शोफः स्थूलस्तोददाहप्रपाकी प्रागुत्क्राम्यां तुण्डिकेरी मता तु ।
तुण्डिकेरी—पूर्वोक्त कफ-रक्त के कारण स्थूल, तोद ( चुम्बने की वेदना ) दाह एवं पकनेवाला शोथ उत्पन्न होता है। यह शोथ वनकार्पासों के समान होता है, इसको तुण्डिकेरी कहते हैं।
१ कहा भी है— प्रायस्तोयं तदा जिह्वा शोणितं चान्तरान्तरा । प्रचुरं सावयेत् सद्यः शिराच्छेदादलासके ॥
१७८
सुश्रुतसंहिता
[ ७० ]
शोकः स्तब्धो लोहितस्तालुदेशे
रक्ताञ्चोयः सोऽध्रुषो रुग्ध्वराह्यः ॥४१॥
अध्रुष—रक्त के कारण तालु प्रदेश में लालवर्ण एवं जड़ ( निश्चल ) शोथ उत्पन्न हो जाता है । इसको अध्रुष कहते हैं । इसमें वेदना तथा ज्वर रहता है ॥४१॥
कूर्मोत्सन्नोऽवेदतोऽश्रीघ्रजन्मा-
उरक्तो ज्ञेयः कच्छपः श्लेष्मणा स्यात् ।
मांसकच्छप—कफ के कारण कल्लुवे के समान मध्य में से उठा हुआ, वेदना रहित, पाण्डुरवर्ण का धीरे धीरे फैलनेवाला शोथ उत्पन्न होता है । इसको कच्छप कहते हैं ।
पद्माकारं तालुमध्ये तु शोफं
विद्याद्रक्तादुर्बुदं प्रोक्तलिङ्गम् ॥ ४३ ॥
अर्बुद—रक्त के कारण से तालु के मध्य में पद्माकर्णिका के समान आकार का शोथ उत्पन्न होता है । इसके लक्षण रक्तार्बुद के समान (पूर्वोक्त लक्षणों के समान) होते हैं ॥४३॥
दुष्टं मांसं श्लेष्मणा नीरुजं च
तालवन्तःस्थं मांससंघातमाहुः ।
मांससंघात—तालु के अन्दर का मांस कफ के कारण दूषित हो जाता है, इसमें वेदना नहीं होती, इसको मांससंघात कहते हैं ।
नीरुक् स्थायी कोलमात्रः कफात् स्थान-
मेदोयुक्तात् पुप्पुटस्तालुदेशे ॥ ४४ ॥
तालुपुप्पुटक—मेदोमिश्रित कफ के कारण से तालु प्रदेश में वेदना रहित, स्थायी ( स्थिर ) एवं कोलमात्र ( बेर के आकार का ) शोथ उत्पन्न होता है, उसको तालुपुप्पुट कहते हैं ॥४४॥
शोषोऽत्यर्थं दीर्घते चापि तालुः
श्वासो वातात्तालुशोषः सपिप्तात् ॥
तालुशोष—इस रोग में अत्यन्त शोष ( शुष्कता ) होता है, तालु विशेष रूप में फट जाता है । श्वास उत्पन्न होता है, यह रोग वात पित्तजन्य है ।
पित्तं कुर्यात् पाकमत्यर्थघोरं
तालुन्येन तालुपाकं वदन्ति ॥ ४५ ॥
तालुपाक—जिस समय पित्त तालु में अभियानक पाक उत्पन्न करता है, उसको 'तालुगक' कहते हैं ॥४५॥
कण्ठगतास्तु—रोहिण्यः पञ्च, कण्ठगालूकम्; अधि-जिह्वा, वलयो, वलास, एकवृन्दो, वृन्दः, शतन्नी, गिलायुः, गलविद्रधिः, गलोघः, स्वरन्नी, मांसतानो, विदारो चेति ॥
कण्ठगत रोग—पाँच रोहिणी ( वात, पित्त, कफ, सन्निपात और रक्तजन्य ), कण्ठगालूक, अधिजिह्वा, वलय, वलास, एकवृन्द, वृन्द, शतन्नी, गिलायु, गलविद्रधि, गलोघ, स्वरन्नी, मांसतान और विदारो ये सत्रह रोग हैं ॥४६॥
गलेऽनिलः पित्तकफौ च मूर्च्छितौ
पृथक् समस्ताश्च तथैव शोणितम् ।
प्रदूष्य मांसं गलरोधिनोऽङ्गुरान्
सूजन्ति यान् साऽसुहरा हि रोहिणी ॥४७॥
रोहिणी—वायु एवं मूर्च्छित ( प्रदूषित ) पित्त और कफ पृथक् २ अथवा सन्निपात रूप से एवं रक्त गले में मांस को दूषित करके, गले को रोकनेवाले अङ्गुरों को उत्पन्न करते हैं । इन अङ्गुरों को रोहिणी कहते हैं । यह रोग प्राणनाशक है ॥४७॥
जिह्वां समन्ताद्भुग्वेदना ये
मांसाङ्गुराः कण्ठनिरोधिनः स्युः ।
तां रोहिणीं वातकृतां वदन्ति
वातात्मकोपद्रवगाढयुक्ताम् ॥ ४८ ॥
वातजन्य रोहिणी—जो मांसाङ्गुर जिह्वा के चारों ओर उत्पन्न हो जायें तथा इनमें तीव्र वेदना होती हो, इनके कारण गला रुक जाये, इनको वातजन्य रोहिणी कहते हैं । इसमें वातजन्य मन्यास्तम्भ आदि उपद्रव विशेष रूप से रहते हैं ॥४८॥
क्षिप्रोद्गमा क्षिप्रविदाहपाका
तीव्रञ्चवरा पित्तनिमित्तजा स्यात् ।
पित्तजन्य रोहिणी में—अङ्गुर शीघ्र उत्पन्न होते हैं, शीघ्र ही विद्रघ्य होते हैं, शीघ्र ही पकते हैं । इनमें तीव्रञ्चवर उत्पन्न होता है, यह रोग पित्तजन्य है ।
स्रोतोनिरोधिन्यपि मन्दपाका
गुर्वो स्थिरा सा कफसंभवा वै ॥ ४९ ॥
कफजन्य रोहिणी में—अङ्गुर क्षोत ( कण्ठक्षोत ) को रोक लेते हैं, धीरे २ पकते हैं, गुर्वो ( भारी ) एवं स्थिर ( कठिन ) होते हैं ॥४९॥
गम्भीरपाकाऽप्रतिवारवीर्या
त्रिदोषलिङ्गा त्रयसंभवा स्यात् ।
सन्निपातजन्य रोहिणी—गम्भीर ( अनुत्तान ) पकती है, अप्रतिवारवीर्या ( दुनिवार शक्तिवाली ) होती है । इसमें तीनों दोषों के लक्षण रहते हैं ।
स्फोटचित्ता पित्तसमानलिङ्गा-
ऽसाध्या प्रदिष्टा रुधिरात्मिकेयम् ॥५०॥
रक्तजन्य रोहिणी—स्फोटो ( छालों ) से व्याप्त, पित्त के समान लक्षणों से युक्त एवं असाध्य होती है ॥५०॥
कोलास्थिमात्रः कफसंभवो यो
प्रनियर्गले कण्ठकशूकभूतः ।
खरः स्थिरः शब्दनिपातसाध्य-
स्तं कण्ठगालूकमिति ब्रुवन्ति ॥ ५१ ॥
१ असाध्य निर्णय—
“वातात् पित्तात् कफात् त्रिभ्यो रक्ताद् रोहिण्य ईरिताः ।
अन्या सद्यो भारयन्ति आसन्तिश्चः क्रियां विना ॥”
अ० ११ ]
निदानस्थानम्
१७९
कण्ठशाल्क—गले में कफ के कारण बैर के समान जो प्रथि उत्पन्न होकर कण्ठक की भाँति पीड़ाकारक होती है, स्पर्श में खर, स्थिर (निश्चल) होती है, यह रोग शस्त्र द्वारा साध्य है, इसको कण्ठशाल्क कहते हैं ॥५१॥
जिह्माग्रूपः श्वयथुः कफात् जिह्माग्रवन्धोपरि रक्तमिश्रात् ।
ब्रूयोऽधिजिह्मः खलु रोग एष विवर्जयेदगतपाकमेनम् ॥५२॥
अधिजिह्मा—रक्तमिश्रित कफ के कारण जिह्वा के अग्रभाग के समान शोथ—जिह्वा मूल के ऊपर उत्पन्न हो जाता है। इसको 'अधिजिह्मा' कहते हैं। यदि यह पक जावे तो असाध्य समझना चाहिये ॥५२॥
बलास एवायतमुन्नतं च शोफं करोत्यन्नगतिं निवार्यै ।
तं सर्वथैवाप्रतिवारवीय विवर्जनीयं वलयं वदन्ति ॥५३॥
वलय—कफ अन्न मार्ग को रोककर आयत (लम्बा) और उन्नत (उठा हुआ) शोथ उत्पन्न करता है। यह रोग सर्वदा ही असाध्य है। इस वलय रोग को चिकित्सा कर्म में छोड़ देना चाहिये ॥५३॥
गले तु शोफं कुशतः प्रवृद्धौ इलेऽमानिहो श्वासरुजोपपन्नम् ।
सर्मच्छिदं दुस्तरमेतदाहु- वैलाससंज्ञं निपुणा विकारम् ॥५४॥
बलास—प्रकृपित कफ और वायु—गले में शोफ उत्पन्न करते हैं, जिससे श्वास में कठिनाई होती है, यह रोग सर्मच्छिद (गाणनाशक) है, बुद्धिमानों का कहना है कि यह रोग अतिशय कष्टसाध्य है ॥५४॥
वृत्तोन्नतो यः श्वयथुः सदाहः कण्ठवृन्त्रितोऽपाक्यमृदुर्गुरुश्च ।
नाम्नैकवृन्दः परिकीर्तितोऽसौ व्याधिर्वैलासक्षतजप्रसूतः ॥५५॥
एकवृन्द—बलास (कफ) और क्षतज (रक्त) के कारण से रक्त (गोल), उन्नत (उठा हुआ), दाहयुक्त, कण्ठयुक्त, पाक रहित, कठोर एवं भारी जो शोथ उत्पन्न होता है, उसको 'एकवृन्द' कहते हैं ॥५५॥
समुन्नतं वृत्तममन्ददाहं तीव्रश्चवरं वृन्दमुदाहरन्ति ।
तं चापि पित्तक्षतजप्रकोपा- द्विघात् सतोदं पवनास्त्रजं तु ॥५६॥
१ "तं शीघ्रकारिणं रोगं रोहिणोति विनिर्दिश्येत् । पिरात्रं परमं तस्य जन्तोर्भवति जोबितम् ॥ कृष्येन त्वनुकान्तः क्षिप्रं संपद्यते सुखो ॥" वरक०
वृन्द—पित्त और रक्त के प्रकोप से ऊपर को उठा, गोल-कार, तीव्रदाह, तथा तीव्र ज्वर युक्त शोथ उत्पन्न होता है। यदि इसमें तोद (चुभने की वेदना) हो तो इसको वात-रक्तजन्य समझना चाहिये ॥५६॥
वर्तिर्घना कण्ठनिरोधिनी या चिताऽतिमात्रं पिशितप्ररोहैः ।
नानारुजोच्छ्रायकरी त्रिदोषाज्- ब्रूया गतघनीच गतघन्यसाध्या ॥५७॥
शतघनी—जो गॉठ कठार, गले को रोकनेवाली, मांसांकुरों से बहुत अधिक व्याप्त होती है एवं द्विदोषजन्य होने से तोद-दाह कण्ठ नाना प्रकार की वेदनाकारी, तथा शतघनी (कण्ठकों से व्याप्त—महान् शिला या लोहपिण्ड) के समान होती है, उसको शतघनी कहते हैं, यह असाध्य है ॥५७॥
प्रन्थिरगले त्वामलकास्थिमात्रः स्थिरोऽल्परुक्त स्यात् कफरक्तमूर्तिः ।
संलक्ष्यते सक्तमिवाशनं च स शस्त्रसाध्यस्तु गिलायुसंज्ञः ॥५८॥
गिलायु—कफ-रक्त के कारण गले में आँवले के समान बड़ी, स्थिर, मन्दवेदनायुक्त प्रन्थि उत्पन्न हो जाती है। रोगी को ऐसा प्रतीत होता है कि गले में मध्य वस्तु (भोजन) अटक रहा है। यह रोग शस्त्रसाध्य है ॥५८॥
सर्वं गलं व्याप्य समुस्थितो यः शोफो रजो यत्र च सन्ति सर्वाः ।
स सर्वदोषो गलविद्रधिस्तु तस्यैव तुल्यः खलु सर्वजस्य ॥५९॥
गलविद्रधि—जो शोफ सम्पूर्ण गले में व्याप्त हो, इस शोथ में वातादि सब दोषों की पीड़ायें (तोद-दाह-कण्ठ आदि) होती हैं। यह गलविद्रधि रोग सन्निपातजन्य है, इसमें सन्निपातजन्य विद्रधि के समान ही लक्षण होते हैं ॥५९॥
शोफो महानन्तजलावरोधी तीव्रश्चवरो वातगतेर्तिहन्ता ।
कफेन जातो रुधिरान्वितेन गले गलोघः परिकीर्त्यतेऽसौ ॥६०॥
गलोघ—कफ और रक्त के कारण से गले में महान् शोथ उत्पन्न हो जाता है। इस शोथ के कारण—अन्न जल का मार्ग रुक जाता है, वायु की गति (उद्गार जुभमा आदि) भी बन्द हो जाती है। रोगी को तीव्र ज्वर रहता है। इस रोग को 'गलोघ' कहते हैं ॥६०॥
योऽतिप्रताम्यन् श्सिसिति प्रसक्तं भिन्नस्वरः शुष्कविमुक्तकण्ठः ।
२८०
सुश्रुतसंहिता
[ ७० ११ ]
कफोपदिग्धेष्वनिलायनेषु
क्षेयः स रोगः श्वसनात् स्वरघ्नः ॥६१॥
स्वरघ्न—अनिलायन (वातस्थानों) में कफ भर जाने से रोगी अत्यन्त कठिनाई के साथ (अन्धकार आँखों के सामने आ जाता है) निरन्तर श्वास लेता है, स्वर भिन्न (टूट) हो जाता है, गला शुष्क और टूटता हुआ प्रतीत होता है। यह रोग वायु के कारण से उत्पन्न होता है ॥६१॥
प्रतानवान् यः श्वयथुः सुकष्टो
गलोपरोधं कुरुते क्रमेण।
स मांसतानः कथितोऽवष्टम्बो
प्राणप्रणुत् सर्वकृतो विकारः ॥६२॥
मांसतान—जो शोथ फैलानेवाला, कष्टदायक और धीरे धीरे बढ़कर क्रमशः गले को बन्द कर देता है, एवं नीचे की ओर लटकता है, इसको मांसतान कहते हैं, यह रोग सन्निपातजन्य है, एवं प्राणनाशक है ॥६२॥
सदाहृतोर्ब श्वयथुं सरक्त-
मन्तर्गले पूतिविशर्णमांसम्।
पित्तेन विद्याद्बदने विदारी
पार्श्वं विशेषात् स तु येन श्नेते ॥६३॥
विदारी—रोग में उत्पन्न शोथ—लाळवर्ण एवं दाह तथा तौद युक्त होता है। यह शोथ गले में दुर्गन्धित एवं श्रुत (गले) मांस के कारण होता है। यह रोग पित्तजन्य है। मनुष्य जिस पार्श्व (करवट) से प्रायः सोता है, उसी पार्श्व की ओर मुख में उत्पन्न होता है। (अन्यत्र भी इसका होना संभव है) ॥
सर्वसरास्तु वातपित्तकफगोणितनिमिताः ॥६४॥
सर्वसर रोग (सम्पूर्ण मुख में होनेवाले रोग)—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य ये चार हैं१ ॥६४॥
१ पीछे सर्वसर रोग तीन कहे हैं। इसलिये रक्तजन्य सर्वसर रोग को जो आचार्य मानते हैं उनके लिये यहाँ कहा है। जैसा कि
स्फोटैः सतोर्देवदंनं समन्ता-
अस्याचित्तं सर्वसरः स वातात्
वातजन्य सर्वसर में—सम्पूर्ण मुख चारों ओर से तौदयुक्त छालों से भरा रहता है।
रक्तैः सदाहैस्तनुभिः सपीतै-
यस्याचित्तं चापि स पित्तकोपात् ॥६५॥
पित्तजन्य सर्वसर में—मुख लाळवर्ण, दाहयुक्त, सूक्ष्म एवं पीले छालों से भरा रहता है।
कण्डूयुतैरल्परुचैः सवर्णै-
यस्याचित्तं चापि स वै कफेन।
कफजन्य सर्वसर में—मुख कण्डूयुक्त-मन्दवेदनावाले—त्वचा के समान वर्ण छालों से भरा रहता है।
रक्तेन पित्तोदित एक एव
कैश्चित् प्रदिष्टो मुखपाकसंज्ञः ॥६६॥
इति भगवता श्रीधन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्येण
महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां
द्वितीयं निदानस्थानम् ॥२॥
कई आचार्य जो रक्तजन्य सर्वसर को मानते हैं, वह पित्तजन्य सर्वसर ही है (पित्तजन्य मुखपाक ही है)। इस प्रकार से तीन ही सर्वसर हैं, और कुल पैंसठ मुख रोग हैं१ ॥६६॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने मुखरोगनिदानं
नाम-षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
आगे स्वयं स्पष्ट कर देंगे इसीलिये संख्या में भेद नहीं।
१ रक्तजन्य सर्वसर के लक्षण—
“मुखस्य पित्तजे पाके दाहोषो तित्तवव्रता।
क्षारोक्षितक्षतसमा व्रणा दुःखास्तु रक्तजे ॥”
१६
अथ शारीरस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथातः सर्वभूतचिन्ताशारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे सर्वभूतचिन्ता (नामक) शारीर का व्याख्यान करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।१
वक्तव्य—शारीरज्ञान में अंगप्रत्यंगविज्ञान (शरीरविचय) तपोवक्रान्ति, शरीर-कार्य विज्ञान आदि अनेक विषयों का समावेश होता है। इसी से चरक में कहा है—
“शरीरं चिन्त्यते सर्वं दैवमानुषसम्पदा।
सर्वभावेयतस्तस्मात् शारीरं स्थानमुच्यते ॥”
वि० मन्तव्य—शारीर—शरीर अधिकृत्य कृतं शारीरं—शरीर की रचना का वर्णन है जिसमें। इस स्थान में—सब प्राणियों की उत्पत्ति का चिन्तन-विचार किया गया है। शरीर के विज्ञान के लिये १० अध्यायों का वर्णन किया गया है (सू० अ० ३)। भूत शब्द का अर्थ-भूतिः अस्ति अस्थ—जिसमें ऐश्वर्य-सामर्थ्य हो, या भाव्यते स्म इति-या भवति प्राप्नोति-जो प्राप्त करता है, आहार आदि का ग्रहण करता है, जन्तु-प्राणीमान, परन्तु इस प्रकरण में मानव-प्राणी का ध्यान रखकर विचार किया गया है। प्राणियों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भिन्न २ दर्शनों, पुराणों, विचारकों के भिन्न २ प्रकार के विचार हैं परन्तु आयुर्वेद का विचार यहाँ लिखा गया है। यह आयुर्वेद का अपना “दर्शन” है। इसमें यदि किसी दर्शन से विरोध प्रतीत हो तो उस दर्शन के दृष्टिकोण को समझने का प्रयत्न करो।
सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्ट-रूपमखिलस्य जगतः संभवहेतुरव्यक्तं नाम। तदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामधिष्ठानं समुद्र इवौदकानां भावानाम् ॥३॥
सब प्राणियों का कारण व्यक्त (अगोचर-मूलप्रकृति) है। यह व्यक्त स्वयं अकारण (कारण रहित) है, सत्त्व-रज और तम इसका स्वरूप है, आठ रूपवाला है (व्यक्त, महान्, अहंकार और पंचतन्मात्रा, अथवा—मन, बुद्धि, अहंकार और महाभूत या धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनेश्वर्य)। इस सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति का कारण
है। जिस प्रकार एक समुद्र अनेक जल-जन्तु एवं पद्मादि-स्थावर जङ्गम रूप पदार्थों का आश्रय होता है, उसी प्रकार से यह अद्यक्त एक होते हुए भी अनेक क्षेत्रज्ञ (जीवात्माओं) का अधिष्ठान है।१
वि० मन्तव्य—अव्यक्त-न व्यज्यते स्म या न व्यज्यते कार्यं यस्मिन् अर्थात् जो व्यक्त-स्फुट विशिष्ट लक्षण युक्त नहीं है या जिसमें कार्य-व्यक्त नहीं रहता। यह सब भूतों का कारण है परन्तु इसका कोई कारण नहीं है यह स्वयंसिद्ध-अनादि है। सत्त्व-अस्तित्व, रजसु-राग-आकर्षण, तमसु-विकर्षण ही उसका लक्षण है। इसमें से समस्त जगत् उत्पन्न होता है। इसमें अनेक-असंख्य आत्माएँ विद्यमान हैं कहीं अन्यत्र से नहीं आतीं जैसे समुद्र-समुद्र के जल में सब शंख, शुक्ति, शैवाल, मगर, मत्स्य आदि विद्यमान रहते हैं उचित परिस्थिति-कार्य कारण की उचित स्थिति होने पर व्यक्त-उत्पन्न हो जाते हैं। स्मरणीय—कार्योत्पत्ति के पूर्व-कारण अव्यक्त होता है उसमें कार्य के आकार-प्रकार व्यक्त नहीं होते जैसे बीज (कारण) में वृक्ष (कार्य) के शुक्ल शोणित में प्राणों के और समुद्र जल में मत्स्य आदि के कारण जो अव्यक्त कहलाता है उसमें ही चेतन तत्त्व अर्थात् आत्मा का अधिष्ठान होता है, वही अव्यक्त को साय लेकर प्राणी रूप में परिणत हो जाता है। प्राणी का ही नाम “भूत” है, यही सब इस अध्याय में वर्णित विषय है ॥३॥
तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तल्लिङ्ग एव तल्लिङ्गाच्च महतस्तल्लक्षण एवाहङ्कार उत्पद्यते, स त्रिविधो वैकारिक-स्तैजसो भूतादिरिति। तत्र वैकारिकाहङ्कारात्तैजससहा-यातल्लक्षणान्यैवैकादशेन्द्रियाण्युत्पद्यन्ते, तद्यथा—श्रोत्र-त्वक्चक्षुजिह्वाघ्राणवाग्घस्तोपस्थपायुपादमनांसीति, तत्र पूर्वाणि पञ्च बुद्धेन्द्रियाणि, इतराणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, उभयान्तर्क मनः, भूतादेरपि तैजससहायातल्लक्षणान्येव पञ्चतन्मात्राण्युत्पद्यन्ते—शब्दतन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं,
१ क्षेत्रज्ञ का लक्षण—
(१) “इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतच्चो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥”
गीता० अ० १२।
(२) सांख्यकारिका में कहा भी है—“मूलप्रकृतिरविकृतिः।
१ क्योंकि कहा भी है— “भूतेन्यो हि परं यस्मात् नास्ति चिन्ता चिकित्सिते ॥”
२८२
मुञ्चतसंहिता
[ अ० ।
रूपतन्मात्रं रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रमिति, तेषां विशेषा शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तेष्यो भूतानि व्योमानिलानलजलोऽन्यैः, एवमेषा तत्त्वचतुर्विअतिव्याख्याता ॥४॥
इस अव्यक्त से अव्यक्त के लक्षणोंवाला (सत्त्व-रज तमरूप) महान् (महत् तत्त्व या बुद्धि तत्त्व) उत्पन्न होता है१ । इस सत्त्व-रज-तम लक्षणोंवाले महत् तत्त्व से सत्त्व-रज-तम लक्षणों से युक्त अहंकार उत्पन्न होता है । यह अहंकार (अभिमान) तीन प्रकार का है । यथा—वैकारिक सात्विक, तैजस राजस, भूतादि तामस । इनमें वैकारिक (सात्विक) अहंकार से, तैजस (राजस) अहंकार की सहायता द्वारा, इन्हीं लक्षणोंवाली (सात्विक एवं राजस) ग्यारह इन्द्रियाँ [पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन (सात्विक), पाँच कर्मेन्द्रिय, (राजस) ] उत्पन्न होती हैं । यथा—श्रोत्र (कान), त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण (नासिका), वाक् (वाणी), हस्त (हाथ), उपस्थ (शिश्न-भग), पायु (गुदा), पाद (पाँव) और मन, ये ग्यारह इन्द्रियाँ हैं । ये पहली पाँच इन्द्रियाँ बुद्धि (ज्ञान)-इन्द्रियाँ हैं, शेष पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । मन, ज्ञान और कर्म दोनों प्रकार का है, चूँकि दोनों के साथ प्रवृत्त होता है । भूतादि (तामसिक) अहंकार से भी तैजस (राजस) अहंकार की सहायता द्वारा, इन लक्षणोंवाली पंच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं । यथा—शब्द-तन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा और गन्ध-तन्मात्रा । इन तन्मात्राओं के विशेष (मेदक) गुण-क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं । इन विसेदक गुणों से क्रमशः व्योम (आकाश), अनिल (वायु), अनल (अग्नि), जल और पृथिवी—ये भूत उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार से चौबीस तत्त्वों की (अव्यक्त, महान्, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पंचतन्मात्रा और पंचमहाभूत) व्याख्या कर दी है२ ।
१ महान का रूप—
“यदेतत् विसृतं बीजं प्रधानपुरुषात्मकम् ।
महत्त्वमिति प्रोक्तं दृष्टितत्त्वं तदुच्यते ॥”
बुद्धितत्त्वं—सत्त्वसमुद्भेकात् निर्मलस्फटिकोपलक्षणं चिन्हाया-संक्रान्तिप्राप्तचैतन्यं पुरुषवस्त्रानात्मकाध्यवसेयविषयं निश्चितार्थ-करणमित्यर्थः ।
चरक में भी कहा है—
“शुद्धसत्त्वस्य या शुदा सत्या बुद्धिः प्रवर्तते ।
यया भिन्नस्यतिबलं महामोहमयं तमः ॥” इत्यादि ॥
२ कहा भी है—
“सात्विक एकादशकः प्रवर्तते वैकारिकादहङ्कारात् ।
भूतादेस्तन्मात्रः स तामसत्त्वजसामावात् ॥” स० का०
“तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रा तेन तन्मात्रता स्मृता ।
तन्मात्राण्यविशेषाणि अविशेषस्ततो द्विते ॥” वि० पु०
वि० मन्तव्य—यह भूत-प्राणी की उत्पत्ति का वर्णन है—जब उक्त अव्यक्त में विद्यमान आत्मा जीव-चेतयिता-पुरुष-चेतना धातु-शरीरी नामधेय-उचित परिस्थिति पाकर चेतना-गति-हर्कत उत्पन्न करता है—उत्पन्न होने लगता है तब—महान्-बोध-ज्ञान उत्पन्न होता है उससे या उसके पश्चात् अहंकार, अहंकार से या उसके पश्चात्—श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ या इन्द्रियों के अधिष्ठान-आदि २—उत्पन्न होने लगते हैं और काल परिणाम से शरीर एवं आत्मा का यौगिक प्राणी जन्तु उत्पन्न हो जाता है । दार्शनिक दृष्टि से—उत्पत्ति का प्रारम्भ होते ही समस्त शरीर का सूक्ष्म ढाँचा बन जाता है केवल उसका व्यक्ति भाव काल परिणाम से होता है । समय पाकर बीज ही वृक्ष, शुक्र शोणित ही प्राणी तथा समुद्र जल ही मत्स्य आदि का रूप = आकार धारण कर लेता है ॥४॥
तत्र बुद्धीन्द्रियाणां शब्दादयो विषयाः, कर्मेन्द्रियाणां यथासङ्ख्यं वचनादानानन्दविसर्गविहरणानि ॥५॥
इन चौबीस तत्त्वों में बुद्धि (ज्ञान) इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं । कर्मेन्द्रियों के विषय क्रमशः वचन (बोलना-वाणी का), आदान (ग्रहण करना हाथ का), आनन्द (उपस्थेन्द्रिय का), विसर्ग (पायु का) और विहरण (चलना पाँव का) कार्य हैं ॥५॥
अव्यक्त महानहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणि चेत्यष्टा प्रकृतयः, शेषाः षोडशविकाराः ॥६॥
अव्यक्त, महान् (बुद्धि), अहंकार और पञ्चतन्मात्र ये आठ प्रकृतियाँ हैं, शेष सोलह (ग्यारह इन्द्रियाँ और पञ्चभूत) विकार हैं—(किसी अन्य वस्तु को उत्पन्न नहीं करते१) ।
वि० मन्तव्य—अव्यक्त तो प्रकृति (कारण) है ही परन्तु महान् आदि भी प्रकृति हैं परन्तु—ये विकृति विकार-कार्य भी हैं क्योंकि ये उत्पत्ति काल में उत्पन्न होते हैं । और—सोलह तत्त्व—विकार-कार्य ही हैं इनसे
इनमें भूत परस्पर अनुप्रविष्ट हैं । यथा—“पूर्वः पूर्वां गुणस्वैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः ॥” इससे “शब्दतन्मात्रात्-शब्दगुणं व्योमः, शब्दतन्मात्रसहितात् स्पर्शतन्मात्रात्-वायुः, शब्दतन्मात्र स्पर्शतन्मात्रसहितात् रूपतन्मात्रात्-शब्द-स्पर्श-रूप-गुण-तेजः ॥”
इसी प्रकार से आगे-विस्तार के लिये इल्लूगाचार्य की टीका देखिये ।
१ “मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदायाः प्रकृतिविकृतयः सप्त । — शेषाः षोडश विकाराः.....॥”
प्रकृति से अभिप्राय—तत्त्वान्तर को उत्पन्न करने से हैं । इसलिये बुद्धि, अहंकार, विकृति—प्रकृति दोनों हैं ।
अ० १]
शरीरस्थानम्
२८३
नवीन वस्तु की—या विलक्षण वस्तु-तत्त्व की उत्पत्ति नहीं होती केवल इनका संयोग तथा वृद्धि ही होती है। दृश्यमान शरीर इन्हीं २४ तत्त्वों से निर्मित रहता है। इसमें पुरुष—अर्थात् चेतना धातु पञ्चीसवाँ तत्व है—चेतना धातु अपि एकः स्मृतः पुरुषसंज्ञकः—अर्थात् अकेली चेतना धातु (आत्मा) का नाम भी पुरुष है और “खाऽऽदयः चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः” ( च० शा० अ० १ ) अर्थात् आकाश आदि पञ्च तत्त्व तथा चेतना के संयोग (प्राणी मात्र) का नाम भी आयुर्वेद दर्शन में पुरुष है ॥६॥
स्वः स्वरूपैषां विषयोऽधिभूतं, स्वयमध्यात्मम्, अधिदैवतम्—अथ बुद्धेनैक्षा, अहंकारस्थेश्वरः मनसस्त्रदमाः, दिशः श्रोत्रस्य, त्वचो वायुः, सूर्यश्चलुषः, रसतस्यापः, पृथिवी प्राणस्य, वाचोऽग्निः, हस्तयोरिन्द्रः, पादयोर्विष्णुः, पायोर्मित्रः, प्रजापतिरुपस्थस्येति ॥७॥
इन चौबीस तत्वों के अपने अपने विषय आधिभौतिक हैं, (मूर्तों के अधीन हैं)। स्वयं आध्यात्मिक हैं। अधिदैवत यथा—(जो जो देवता, विष्णु के अंश से उत्पन्न हुआ, वह वह उस तत्व का अधिष्ठाता है) वृद्धि का ब्रह्मा, अहंकार का ईश्वर, मन का चन्द्रमा, श्रोत्र का दिशा, त्वचा का वायु, चक्षु का सूर्य, रसना का जल, घ्राण का पृथिवी, वाणी का अग्नि, हाथों का इन्द्र, पाँव का विष्णु, पायु का मित्र और उपस्थ का प्रजा पति अधिष्ठाता है ॥
वि० मन्तव्य—इनके विषयों—गुणों का अधिष्ठानभूत है प्राणी है और इन सब का अधिष्ठान—आत्मा है, और इनके अधिकारी या अधिष्ठानभूत दैवत—शक्तिदाता या प्रेरक हैं—ब्रह्मा आदि। यह विषय एक दार्शनिक विषय है इसे समझ लेना या मान लेना दार्शनिक दृष्टि से उचित है ॥७॥
तत्र सर्व एवाचेतन एष वर्गः पुरुषः पञ्चविंशतितमः कार्यकारणसंयुक्तश्चेतयिता भवति। सत्यप्यचेतन्ये प्रधानस्य पुरुषकैवल्यार्थं प्रवृत्तिमुपदिगन्ति, स्त्रीरादींश्चात्र हैतुमुदाहरन्ति ॥८॥
इन प्रस्तुत सम्पूर्ण चौबीस तत्वों का वर्ग अचेतन (जड़) है। पुरुष (चेतन जीवात्मा) पञ्चीसवाँ तत्व है। कार्य (शरीर) और कारण (इन्द्रियाँ) इनके साथ संयुक्त होकर पुरुष—चेतयिता (चेतन्य का आश्रय) हो जाता है। जिस
१ (१) उपनिषद् मे भो कहा है— ‘अग्निर्वागं भूत्वा मुखं प्राविशत्’ (२) “वागध्यात्ममिति प्राहुः ब्राह्मणस्तत्त्वदर्शनः। वक्तव्यमधिभूतं तु वल्लिस्तत्राधिदैवतम् ॥” इसी प्रकार से बुद्धिरध्यात्मं, बोद्धव्यम् अधिभूतं, ब्रह्मा अधिदैवतम्—इत्यादि।
प्रकार से जड़ शीर (दूध) वत्स (बछड़े) की वृद्धि के लिये स्वयं क्षरता है, उसी प्रकार से स्वयं अचेतन (जड़भूत) प्रधान (प्रकृति) भी पुरुष के मोक्ष के लिये प्रवृत्त होती है। इस प्रकार से पंगु तथा अन्धे पुरुष के समान इनका संयोग है ॥
वि० मन्तव्य—यह सम्पूर्ण शरीर वस्तुतः अचेतन—जड़ है परन्तु लोहादि निर्मित यन्त्र (इंजन) के समान (गतिशील होने पर भी) जड़ नहीं है। पुरुष के संयोग से—कार्य (१६ विकार) एवं कारण (अध्या प्रकृति) मय शरीर—समस्त शरीर चेतन रहता है यहाँ तक कि वत्स को देखकर गौ का, सन्तान को देखकर माता का दूध भी गतिशील चेतन के समान चलने-वाला हो जाता है और अङ्ग-प्रत्यङ्ग की क्रिया का कहना ही क्या। तालयं यह है प्राणी का शरीर जड़ होने पर भी चेतना के संयोग से क्रियाशील बना रहता है उसके हृदय आदि यन्त्र विधिवत् चलते रहते हैं और कुछ यन्त्र (यथा मेषुनो-पयोगी अवयव और माता के दुग्धनिर्माता अवयव) समय समय पर क्रियाशील हो जाते हैं ॥८॥
अत ऊर्ध्वं प्रकृतिपुरुषयोः साधर्म्यवैधर्म्यं व्याख्यास्यामः। तद्यथा—उभावप्यनादी, उभावप्यनन्तौ, उभावप्यलिङ्गौ, उभावपि नित्यौ, उभावप्यनपरो, उभौ च सर्वगताविति, एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा वाजधर्मिणी प्रसवधर्मिण्यमध्यस्थधर्मिणी चेति, बहुवस्तु पुरुषाश्चेतनावन्तोऽगुणा अबोजधर्माणोऽप्रसवधर्माणा मध्यस्थधर्मिणश्चेति ॥९॥
इसके आगे प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) दोनों के साधर्म्य एवं वैधर्म्य की व्याख्या करते हैं। यथा—(प्रथम साधर्म्य)—दोनों ही अनादि (आदि कारण से शून्य), दोनों ही अनन्त (अविनाशी), दोनों ही अलिङ्ग (आकार रहित), दोनों ही नित्य, दोनों ही अपर (परश्रेष्ठ—दोनों से कोई अधिक श्रेष्ठ नहीं, इसीलिये ऊपर है), और दोनों ही सर्वगत (व्यापक सम्पूर्ण मूर्त संयोगी) हैं। वैधर्म्य—इनमें प्रकृति अचेतन (जड़) एक है, त्रिगुण (सुख, दुःख, मोहात्मक या सत्त्व-रज-तमोगुण रूप), बीजधर्मिणी (बीज के धर्मवाली, उत्पादक शक्ति युक्त), प्रसवधर्मिणी (सगमांवरथा में—कार्यावरथा में परिणामिनी), अमध्यस्थधर्मिणी (सुख, दुःख, भोगवती) है। पुरुष (जीवात्मा) अनेक हैं, चेतन हैं, निगुण हैं, बीज धर्म रहित, प्रसवधर्म से शून्य, मध्यस्थधर्म (सुख दुःख से) रहित हैं ॥
१ कहा भी है— “वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरजस्य। पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्त्तते तद् अय्यवत्म् ॥” २ कहा भी है— (१) तस्मात् न वय्यतेऽध्या न मुच्यते।
२८४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
वि० मन्तव्य—साधर्म्य—समानधर्मता—समानता अर्थात् उक्त कुछ बातों में प्रकृति एवं पुरुष समान हैं। वैधर्म्य—विपरीत धर्मता—असमानधर्मता—असमानता अर्थात् उक्त कुछ बातों में प्रकृति एवं पुरुष समान नहीं हैं। बीजधर्मिणी—जैसे बीज में वृक्ष स्वरूप से विद्यमान होता है और आगे चलकर इतना बड़ा रूप (शरीर) धारण कर लेता है वैसे प्रकृति से ही सब मूर्तिमान्—रूप उत्पन्न होते हैं। प्रसवधर्मिणी—प्रकृति में से ही सब पदार्थों का प्रसवजन्य-प्रादुर्भाव होता है। अमध्यस्थ धर्मिणी—सुख दुःख आदि ज्ञान-गुण से रहित। जड़ होने से ज्ञान शून्य। और पुरुष—अबीजधर्माणः—प्रकृति के समान बीज के धर्मवाले नहीं, चेतना धातु में से कुछ विलक्षण वस्तु उत्पन्न नहीं होती। अप्रसवधर्माणः—प्रकृति के समान उसमें से किसी पदार्थ का प्रसव नहीं होता। मध्यस्थधर्माणः—सुख दुःख आदि के ज्ञान से युक्त—ज्ञानी-ज्ञानाधिकरण आत्मा-अनुभवो ॥६॥
तत्र कारणानुरूपं कार्यमिति कृत्वा सर्व एवैते विशेषाः सत्स्वरजस्तमांमया भवन्ति, तद्व्युत्तत्वात्तन्मयत्वाच्च तदुगुणा एव पुरुषा भवन्तीत्येके भाषन्ते ॥१०॥
कारण के अनुसार ही कार्य होता है, श्वेत तन्तुओं से श्वेत वस्त्र बनता है, इस न्याय से ये सब भूत मौलिक सम्पूर्ण कार्य, सत्त्व, रजः तमो रूप (सुख दुःख मोहात्मक) हैं। चूंकि उन्हीं के समान आकार होने से तथा बुद्धि में उसका प्रतिबिम्ब पड़ने के कारण तन्मय होने से पुरुष भी सत्त्व, रज तमोमय होते हैं, ऐसा कई आचार्य मानते हैं।
नापि संसरति कश्चित्।
संसरति-व्यत्ये मुच्यते च नानाभया प्रकृतिः ॥
तस्मात् च विषम्यासात् सिद्ध साक्षित्वमस्य पुरुषस्य ।
कैवल्यमाध्यस्थं दुष्ट-वमकत्वाभावरुच ॥”
(२) “तस्मात् तत्संयोगादवचेतनं चेतनावल्लिगम् ॥”
१ “तस्मात्तत्र विविशोवास्तेभ्यो भूतानि पञ्च पञ्चमस्यः ।
एते स्मृताः विशेषाः शान्ता धोराश्च मूढाश्च ॥”
जिस प्रकार से कि एक ही स्त्री रूप, यौवन, कुलशील से युक्त होने पर स्वामी को सुखी करती है, सुपलियों को दुःखी करती है, अन्य पुरुषों को मोहित करती है, इसी प्रकार से यह प्रकृति भी तीनों गुणवाली है। इसी प्रकार से स्फटिक मणि के पास रक्खा जासुदी का फूल स्फटिकमणि में चमकता है, बच्चा मणि में से फूल लेता चाहता है, इसी प्रकार से पुरुष के अव्यन्त समीप में आई प्रकृति में पुरुष के गुण चमकने लगते हैं—इसीलिये योगसूत्र में कहा है—“वृत्तिसारूप्यमितिरत्र ।” जिस प्रकार से मैले दर्पण में मनुष्य अपना मुख देखकर चिन्ता करने लग जाता है,
वि० मन्तव्य—कारण के अनुरूप—अनुकूल—समान रूप—मूर्तिवाला कार्य होता है यह कुछ विद्वानों का मत है सबका नहीं क्योंकि यह न्याय (सिद्धान्त)—अतिव्याप्ति रहित या निर्दोष नहीं है कारण के विरूप भी कार्य होते हैं यथा हरिद्रा-चूर्ण संयोग में लालिमा आदि आदि । इस सिद्धान्त को मानने-वाले निर्गुण पुरुष (आत्मा) को सगुण—सत्त्व, रजस् एवं तमस् गुणों से युक्त होते देखे जाते हैं और वैसे भी वह पुरुष-सत्त्वादि गुणमय बना रहता है ॥१०॥
वैद्यके तु—
स्वभावामीश्वरं कालं यदृच्छां नियतिं तथा ।
परिणामं च मन्यन्ते प्रकृतिं पृथुदर्शनः ॥११॥
वैद्यक शास्त्र में तो उदार बुद्धिवाले (दूरदर्शी, संकुचित विचार न रखनेवाले) लोकस्वभाव (अर्थात् तत्तद्वृद्ध से प्रतिबद्ध सहजधर्म या गुण), ईश्वर, काल, यदृच्छा (अनेक प्रकार की अचानक घटनाओं को उत्पन्न करनेवाली शक्ति) नियति (धर्माधर्म जनित फल) तथा परिणाम इनको ही प्रकृति (उपादान कारण) मानते हैं। परन्तु वास्तव में कुछ तो कारण नहीं बन सकते और कुछ निमित्त कारण हैं।
उसी प्रकार से सुख आदि का अन्तःकरण में प्रतिबिम्ब पड़ने पर अपने को सुखी अनुभव करता है। इसीलिये कहा है—
“तस्मिन्निचिद दर्पणस्फोटसमस्तवास्तुदृष्टयः ।
इमास्ताः प्रतिबिम्बन्ति सरसीव तटद्वमाः ॥”
१ कुछ आचार्य इसका अर्थ इस प्रकार से करते हैं—
वैद्यक शास्त्र में—विपुल बुद्धिवाले विद्वान् स्वभाव, ईश्वर, काल, यदृच्छा, नियति और परिणाम इन छे को कारण मानते हैं। यथा—
स्वभाव—कांटों में तीक्ष्णता, मृग-पक्षियों के विश्व विचित्र रङ्ग, मरिच में कटुता स्वभाव से ही है।
ईश्वर—मनुष्य जड़ है, आत्मा-सुख-दुःख का स्वामी नहीं है। ईश्वर को प्रेरणा से स्वर्ग-नरक में जाता है।
काल—काल ही सृष्टि को स्थिति प्रलय का कारण है—‘कालः कलयतामहम् ॥’
यदृच्छा—जो स्वयं उत्पन्न हो जाता है—यथा तूण और अरणि के संयोग से अग्नि उत्पन्न हो जाती है, इसी प्रकार संसर स्वयं बन जाता है।
नियति—धर्म-अधर्म ही सब की उत्पत्ति में कारण है।
परिणाम—प्रधान (प्रकृति) ही महद-अहंकार आदि रूप में बदलकर सब को उत्पन्न करता है। आयुर्वेद शास्त्र में इन छे के उदाहरण मिलते हैं। यथा—
अ० १]
शारीरस्थानम्
३८५
वि० मन्तव्य—पृथुदर्शी एकग्रही-एकान्त ग्रहण करनेवाले या आग्रही नहीं होते अतः वे कोई एक ही प्रकृति ( कारण ) नहीं मानते अपितु अनेक कार्यों के अनेक कारण मानते हैं और यह उचित भी है। यहन्ता—जो कार्य जिस कारण से उत्पन्न हो जाता है वही उसका कारण मान लिया जाता है, दूसरे शब्दों में—अलक्षित कारण से कार्य की उत्पत्ति “यहन्ता” कही जाती है। देखिये चि० अ० १८ श्लो० ४१—यद्यपि अर्बुद पक्ता नहीं है परन्तु कभी २ अष्टद्वय कारण से पक भी जाता है ॥११॥
तन्मयान्येव भूतानि तद्गुणान्येव चादिशेत् ।
तैश्च तत्त्वक्षणः कृत्स्नो भूतग्रामो न्यजन्व्यत ॥१२॥
तस्योपयोगोऽभिहितश्चिकित्सां प्रति सर्वदा ।
भूतेभ्यो हि परं यस्मान्नास्ति चिन्ता चिकित्सिते । १३
वास्तव में भूत (पञ्चमहाभूत) तन्मय (प्रकृतिमय) हैं।
कार्य और कारण में भेद न होने से एवं प्रकृति के सत्व, रज, तम गुणोंवाले हैं—चूँकि कारण के अनुरूप ही कार्य होते हैं। इन महाभूतों से तत्त्वक्षण (भूतों के लक्षणों से युक्त)। सम्पूर्ण भूतग्राम (स्थावरजङ्गमात्मक) उत्पन्न हुए। इस भूतग्राम का सदा से ही चिकित्सा के लिए उपयोग किया जा रहा है। क्योंकि चिकित्साशास्त्र में भूतों से पर (श्रेष्ठ, क्षेत्रज्ञ, अव्यक्त आदि)
स्वभाव—
(१) अङ्ग-प्रत्यङ्ग-निर्वृत्ति-स्वभाववादेव जायते ।
(२) धातुषु क्षीयमाणेषु वर्धते द्वाविमो सदा ।
स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशादिति स्थितिः ॥
(३) स्वभावाल्लघवो मृदुगाः तथा लावकपिञ्जलः ॥
ईश्वर—जाठरो भगवान्निरीस्वरोऽनस्य पाचकः । काल—‘महाभूतविशेषास्तु शीतोष्णद्रव्यभेदतः । काल इत्यध्यवस्थितिः’ ॥११॥
यदुच्छा—यदुच्छाचोपगतानि पाकं, पाकक्रमेणोपचरेद् विधिज्ञः ।
नियति (धर्माधर्म)—
(१) ‘ब्रह्मस्योऽज्जनवधपरस्वरहणादिभिः ।
कर्मभिः पापयोगस्य प्रादुः कुण्डस्य संभवम् ।
(२) कर्मजा व्याधयः केचित् ।
परिणाम—
(१) जाठरानेस्तु संयोगात् यदुदेति रसान्तरम् ।
रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥
(२) ता एवोपधयः कालपरिणामात् परिणतवीर्यं बलवत्यो हेमन्ते भवन्ति ।
(३) सम्यक्परिणतस्याहारस्य सारो रसः ।
(४) वालानां वयःपरिणामात् शुक्लप्रादुर्भावो भवति ।
ऊपर अर्थ कबिराज हाराणचन्द के अनुसार दिया है।
का (जीवात्मा का) चिकित्सोपकरण रूप में विचार ही नहीं किया जाता है ॥
वि० मन्तव्य—प्रकृति पुरुष (जड़ चेतन) मय भूत—प्राणी हैं अतः वे भी प्रकृति पुरुष के गुणों से युक्त हैं और उन भूतों से—तत्त्वक्षण-भूतों के लक्षणोंवाला (वस्तुतः प्रकृति पुरुष के लक्षणोंवाला) समस्त भूत समूह (प्राणि जगत्) प्रादुर्भूत हुआ था और होता है—होता रहेगा। और चिकित्सा शास्त्र में इसी भूत समूह का उपयोग होता है अर्थात् चिकित्सा के उपकरण भी और उपकार्य भी यही भूत हैं और भूतों (प्राणियों) से परे—आगे—ऊपर—चिकित्सा शास्त्र में चिन्ता-विचार ही नहीं किया जाता या किया गया है—रोगी भी भूत है और वनस्पति, वानस्पत्य वीरुध तथा ओषधी भी भूत है, और खनिज पदार्थ भी भूत परन्तु अन्य भूत से मिलकर क्रियाशील होते हैं अन्यथा नहीं। तत्र चतुर्विधो भूतग्रामः १—संस्वेदज, २—जरायुज, ३—अण्डज, ४—उद्भिज संज्ञः स० सू० अ० १। अर्थात् स्वेद—प्राणी का और मृमि आद का स्वेद, इससे प्रादुर्भूत—जूर्प, मच्छर आदि, जरायु—जेरेजेडी में प्रादुर्भूत-मानव, गौ, घोड़ा आदि, अण्ड से प्रादुर्भूत-पक्षी, सर्प आदि और उद्भिज-बीज, पौदा, घास आदि से प्रादुर्भूत वृक्ष, पौदा, घास आदि। बस यही जगत्, संसार या सृष्टि है—गच्छति इति जगत्, संसरति इति संसारः (गम्लु)—गती सृ—गती धातुः—जो गति करता है—ज्ञान, गति (चलना) तथा प्राप्ति करता है, प्राणि मात्र में यह तीनों गुण हैं, स्थावर प्राणी में गति—स्थानान्तर प्राप्ति मले ही न हो, पर वह भी—ज्ञान एवं प्राप्ति—आदान अवश्य करता है। इसी जगत् या संसार का विचार आयुर्वेद में किया गया है, आयुर्वेद दर्शन इसी को देखता है मानता है और समझता है ॥१३॥
यतोऽभिहितं—“तत्संभवद्रव्यसमूहो भूतादिरुक्तः” (सू० अ० १); भौतिकानि चैन्द्रियाण्यायुर्वेदे वर्ण्यन्ते, तथेन्द्रियाथोः ॥१४॥
क्योंकि पहले कहा है कि—‘पुरुष’ के ग्रहण से ही पुरुष से उत्पन्न होनेवाले शुक्ल शोणित आदि द्रव्यसमूहों (जिनका कारण पृथिवी आदि पञ्चमहाभूत हैं) का भी ग्रहण हो जाता है, ऐसा समझना चाहिये। आयुर्वेद शास्त्र में इन्द्रियों तथा इन्द्रियों के विषय शब्दादि भी भौतिक ही कहकर वर्णन किये जाते हैं ॥
१ यथा—लोको हि द्विविधः—स्थावरो जङ्गमश्च । तत्र पुरुषः प्रधानं तस्योपकरणमन्यत् ॥
२ कहा भी है— खं श्रोत्रे स्पशने वायुदर्शने तेज उत्कटम् । सलिलं रसने भूमिर्घ्राणे तज्जीर्णरूपितम् ॥
२८६
सुश्रुतसंहिता
[ ३०१ ]
आयुर्वेद शास्त्र का इन्द्रियों के विषय में सांख्यशास्त्र से जो भेद है—उसको स्पष्ट करते हैं—सांख्यशास्त्र में इन्द्रियों की उत्पत्ति अहंकार से, मूतादि (तामसिक) अहंकार से पञ्चतन्मात्र की उत्पत्ति मानकर इनसे पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति मानी है। परन्तु आयुर्वेद में—
वि० मन्तव्य—आयुर्वेद दर्शन में (यहाँ) श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ भौतिक मानी जाती हैं और उनके शब्द आदि विषय भौतिक माने जाते हैं क्योंकि—॥१४॥
भवति चात्र—
इन्द्रियेणेन्द्रियार्थं तु स्वं स्वं गृह्णाति मानवः।
नियतं तुल्ययोनिश्वात्रान्येनान्यमिति स्थितिः ॥१५॥
मनुष्य इन्द्रियों द्वारा निश्चित इन्द्रिय के अर्थ (विषय) का ही ग्रहण करता है। क्योंकि—इन्द्रिय तथा इन्द्रिय के विषय के कारण समान हैं। इसलिये अन्य विषय को इन्द्रिय ग्रहण नहीं करती है ॥१५॥
मनुष्य श्रोत्र द्वारा शब्द को ही सुनता है, गन्ध को नहीं ग्रहण कर सकता। चूँकि श्रोत्र तथा शब्द कारण समान हैं (आकाश ही दोनों की योनि है)। इसलिये आकाश गुण शब्द को ग्रहण करने के लिये आकाश इन्द्रिय चाहिये। इसलिये अनुमान द्वारा कह सकते हैं—
“घ्राणेन्द्रियं पार्थिवं रूपदिषु मध्ये गंधस्वेव व्यञ्जकत्वात्। कुंकुमगंधाऽभिन्व्यञ्जकभूतादिवत् ॥”
न चायुर्वेदशास्त्रेपूदिर्यन्ते सर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च, असर्वगतेषु च क्षेत्रज्ञेषु नित्यपुरुषव्यापकान् हेतुतुदाहरन्ति, आयुर्वेदशास्त्रेऽसर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च, तिर्यग्योनिमानुषदेवेषु संचरन्ति धर्माधर्मनिमित्तं, त एतेऽनुमानप्राह्याः परमसूदमाश्चेतनावन्तः शाश्वता लोहितरेतसोः सन्निपातंऽन्विष्यज्यन्ते, यतोऽभिहितं—“पञ्चमहाभूतशरीरसिमवायः पुरुषः” (सू० अ० १) इति, स एष कमपुरुषश्चिक्तासाधिष्ठतः ॥१६॥
आयुर्वेद शास्त्र में क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा पुरुष) को सर्वगत नहीं मानते अपितु नित्य कहते हैं और असर्वगत क्षेत्रज्ञों में नित्य कहते हैं। अणु आत्मा को प्रतिपादन करने के लिये पुरुष की नित्यता को बतानेवाले कारणों को कहते हैं।
शब्दो विहायसः सशो वायवीयः प्रकीर्तितः।
रूपमानेयमाप्योऽत्र रसो गन्धस्तु पार्थिवः ॥
१ आत्मा को विमु माननेवाले यथा—
“वालाप्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
सागो जीवः स विज्ञेयः स च नन्यथाय कल्पते।
विशुद्धे अन्तःकरणे आत्मानो विभुत्वं दर्शयति ॥” सत्कारण
रहित वस्तु नित्य है। भोज न भी कहा है—
“शुभाशुभाभ्यां कर्मभ्यां प्रेरणामनसो गतिः।
देहाहंहान्तरं याति कृमिवत् शाश्वतोऽव्ययः।
नित्य इत्युच्यते सद्भिः धनं कारणवान् यतः ॥”
आयुर्वेद शास्त्र के सिद्धान्त से धर्म और अधर्म के कारण ही असर्वगत (अणु) और नित्य क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा-आत्मा) तिर्यग्योनि-देवयोनि और मनुष्ययोनि में विहार करता फिरता है। इन आत्माओं को हम अनुमान द्वारा ही जान सकते हैं। ये आत्मायें अतिसूक्ष्म, चेतन, नित्य हैं। तथा शुक्र एवं शोणित के संयोग होने पर ही (जिस प्रकार कि सूर्यकांतमणि के लैन्स द्वारा घास के जलने पर ही सूर्य की किरणों को अनुमान द्वारा ही जानते हैं) स्पष्ट होती हैं। इसलिये कहा है कि पञ्चमहाभूत और आत्मा के संयोग का नाम ‘पुरुष’ है और यही कर्मफल भोगी पुरुष चिकित्सा का अधिकरण है ॥१६॥
तस्य सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नः प्राणापानानुमेप-निमेषौ बुद्धिर्मनःसङ्कल्पो विचारणा स्मृतिर्विज्ञानमध्य-वसायो विषयोपलब्धिश्च गुणाः ॥१७॥
इस कर्मफल भोगी शरीर—आत्मा एवं मन का संयोग होने पर जो गुण उत्पन्न होते हैं—वे कहते हैं, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, बुद्धि, मन का संकल्प, विचारणा, स्मृति, विज्ञान, अध्यवसाय (निश्चयात्मक बुद्धि) और विषय का ज्ञान (इन्द्रिय द्वारा) ये गुण हैं। ये सोलह गुण हैं, इन्हीं को ‘कला’ शब्द से उपनिषदों में कहा है। ये गुण आत्मा में रहते हैं—इसलिये गुणों को आत्मा कहते हैं ॥१७॥
सात्विकास्तु—आनुराश्यं संविभागरुचिता तितिखा सत्यं धर्मं आस्तिक्यं ज्ञानं बुद्धिर्मधा स्मृतिर्धृतिरनभि-षङ्गश्च; राजसास्तु-दुःखबहुलताऽटनशीलताऽधृतिरहङ्कार आनृतिकत्वमकारुण्यं दम्भो मानो हर्षः कामः क्रोधश्च; तामसास्तु—विषादित्वं नास्तिक्यमधर्मशीलता बुद्धेनिरा-धोऽज्ञानं दुर्मधस्त्वमकर्मशीलता निद्रालुत्वं चेति ॥१८॥
मन के सात्विक आदि गुणों को कहते हैं—
आनुराश्यं (कृर कर्म का न करना, दया), संविभागरुचिता (बाँटकर खाने की इच्छा), तितिखा (द्वन्द्व सहिष्णुता) सत्य, धर्म, आस्तिकता, ज्ञान, बुद्धि (तत्काल विषय सूझना), मेधा (ग्रन्थावधारण शक्ति), धृति (धैर्य), स्मृति, अनभिषंग (अनासक्ति-निष्कामता) ये सात्विक गुण हैं।
दुःख की अधिकता, अटनशीलता (धूमने-फिरने की प्रवृत्ति), अधीरता, अहङ्कार, आनृतिकत्व (मिथ्यावचनशीलता) अकारुण्य (निर्दयता), दम्भ (छल-कपट), मान, हर्ष, काम और क्रोध ये राजस गुण हैं।
१ चरकसंहिता में कहा है—
“सत्वमात्मा शरीरञ्च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्।
लोकस्तितृष्टि संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
स पुमाश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम्।
वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं सम्प्रकाशितः ॥”
४०२]
शारीरस्थानम्
२८९
विषादिव ( अप्रसन्नता ), नास्तिकता, अवमंशीलता, बुद्धि का कुन्द होना, अज्ञान, दुर्मेधा ( दुष्ट बुद्धि ), अकर्मशीलता ( काम न करना आलस्य ), निद्रालुत्व ( निद्राधिक्य ) ये तामसगुण हैं ॥ १८ ॥
आन्तरिक्षः—शब्दः शब्देन्द्रियं सर्वच्छिद्रसमूहो विविक्त्ता च; वायव्यास्तु-स्पर्शः स्पर्शेन्द्रियं सर्वचेष्टा-समूहः सर्वशरीरस्पर्शद्वयं लघुता च, तैजसास्तु—रूपं रूपेन्द्रियं वर्णः सन्तापो भ्राजिष्णुता पत्किरमषस्तेदण्यं शौर्यं च, आप्यास्तु—रसो रसनेन्द्रियं सर्वद्रवसमूहो गुरुता शौर्यं स्नेहो रेतश्च, पार्थिवस्तु—गन्धो गन्धेन्द्रियं सर्व-मूलेसमूहो गुरुता चेति ॥ १९ ॥
महामृतों के गुणों को कहते हैं—शब्द, शब्देन्द्रिय (श्रोत्र), सम्पूर्णछिद्रता ( अवकाश ) तथा शिरा-स्नायु आदि का परस्पर पृथक् होना आकाश का गुण है । स्पर्श, स्पर्शेन्द्रिय ( त्वचा ), नमन-उन्नमन आदि सम्पूर्ण चेष्टायें तथा सम्पूर्ण शरीर में स्नदन ( गति का होना ) एवं लघुता ( हल्कापन ) वायु का गुण है । रूप—रूपेन्द्रिय ( आँख ), वर्ण ( गौरादि ), संताप, भ्राजिष्णुता ( दीप्तता ) पत्कि ( आहार की परिणति ), अमर्ष ( क्रोध ), तीक्ष्णता ( आशुक्रिया ) और शौर्य ( शूरता ) अग्नि के गुण हैं । रस, रसनेन्द्रिय ( जिह्वा ), सम्पूर्ण दौष-धातु समूहों में द्रवत्व, भारीपन, शीतलता, स्नेह और रेतः ( वीर्य ) ये जल के धर्म हैं । गंध, गन्धेन्द्रिय ( नासिका ), सम्पूर्ण पदार्थों में काठिन्य, भारीपन पृथ्वी के धर्म हैं ॥ १९ ॥
तत्र सत्त्वबहुलमाकाशं, रजोबहुलो वायुः, सत्त्वरजो-बहुलोऽग्निः सत्त्वतमोबहुला आपः, तमोबहुला पृथिवीति । इनमें आकाश सत्त्व प्रधान, वायु रज प्रधान, अग्नि सत्त्व एवं रज प्रधान, जल-सत्त्व एवं तम प्रधान और पृथ्वी तम प्रधान है ॥ २० ॥
श्लोको चात्र भवतः— अन्योऽन्यानुप्रविष्टानि सर्वाण्येतानि निर्दिशेत् । स्वे स्वे द्रव्ये तु सर्वेषां व्यक्तं लक्षणमिष्यते ॥ २१ ॥ दो श्लोक कहे भी हैं—ये पञ्चभूत परस्पर एक दूसरे में अनुप्रविष्ट ( घुसे ) हुए हैं । अर्थात् एक के धर्म दूसरे में भी आ जाते हैं । यथा—आकाश का गुण शब्द वायु में, वायु
१ (१) अथवा सम्पूर्ण भूत परस्पर सब भूतों में प्रविष्ट हैं । अर्थात्-आकाश में—शब्द गुण के साथ पृथ्वी-जल-तेज और वायु के भी गुण प्रविष्ट हैं । परन्तु अणुमात्र में है, इसलिये स्पष्ट नहीं होते, जहाँ पर इनकी अधिकता रहती है, वहाँ पर स्पष्ट होते हैं । गौतम ऋषि ने भी कहा है—'विष्टं ह्युपरं परेण'—एक भूत दूसरे अगले भूत में प्रविष्ट हुआ है ।
का स्पर्श अग्नि में, अग्नि का रूप गुण अगले भूतों में पहुँच जाता है । परन्तु अपने-अपने द्रव्य में ही इनके अपने विशेष गुण का प्रकाशन होता है ॥ २१ ॥
अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्ता विकाराः षोडशैव तु । क्षेत्रज्ञश्च समासेन स्वतन्त्रपरतन्त्रतः ॥ २२ ॥
इस अध्याय में स्वतन्त्र ( अपने सिद्धान्त से ) और परतन्त्र ( सांख्य-सिद्धान्त से ) दृष्टि से आठ प्रकृतियाँ, और सोलह विकार तथा क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) का वर्णन संक्षेप में कर दिया है ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने सर्वभूतचिन्ता-शारीरं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
अथातः शुक्रशोणितशुद्धिशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
शुक्र और शोणित के संयोग से क्षेत्रज्ञ आत्मा की अभिव्यक्ति होती है, यह प्रथम कहा है, इसलिये शुक्र और शोणित के स्वरूप को बताने के लिये इस अध्याय का अवतरण करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ।
वि० मन्तव्य—इस शास्त्र में मानव प्राणी के शरीर की रचना तथा क्रिया का वर्णन है अतः उसीके शुक्र एवं शोणित का वर्णन इस अध्याय में किया गया है ॥ १, २ ॥
वात पित्त श्लेष्म-कुण्प-प्रन्थि-पूतिपूय-क्षीण-मूत्रपुरीष-रेतसः प्रजोत्पादने न समर्था भवन्ति ॥ ३ ॥
सब से प्रथम रोग की परीक्षा करनी चाहिये, इसके लिये दूषित शुक्र को कहते हैं—
वात, पित्त, कफ से दूषित, रक्त से दूषित ( रक्त मिश्रित या रक्तिया शुक्त ) कुण्प ( मुर्दे की गन्धवाला अथवा जिसमें शुक्रकीट मृत हो गये हों ), प्रथित ( गाँठवाला ), पूति ( दुर्गन्ध युक्त ), पूय ( मवाद-पस युक्त ), क्षीण ( जिनका वीर्य क्षीण हो गया है ), जिनके वीर्य में मल मूत्र की गन्ध आती है,
(२) वायु का स्पर्श—अनुष्णशीत है । अग्नि के साथ मिलकर उष्ण स्पर्श, जल के साथ मिलकर शीत स्पर्श देती है ।
जल में भी आकाश विद्यमान है, व्यापक होने से, जल में वायु भी विद्यमान है, बुलबुले उठने से, जल में अग्नि भी विद्यमान है, क्योंकि अग्नि वहाँ से उत्पन्न होती है ( अदृश्योऽग्निः ), भूमि भी अणुरूप से जल में व्याप्त है । इस प्रकार से सब भूत परस्पर प्रविष्ट हैं ।
२८८
सुश्रुतसंहिता
[ अ० २ ]
ऐसे पुरुष संतानोत्पत्ति में समर्थ नहीं होते। ॥ ३ ॥
तेषु वातवर्णवेदनं वातेन, पित्तवर्णवेदनं पित्तेन, श्लेष्मवर्णवेदनं श्लेष्मणा, कुणपगन्धन्यनरूपं च रक्तन, प्रन्थिभूतं श्लेष्मवाताभ्यां, पूतिपूयनिभं पित्तश्लेष्मभ्यां, क्षीणं प्रागुक्तं पित्तमास्ताभ्यां, मूत्रपुरीषगन्धि सन्निपातेनेति। तेषु कुणपप्रन्थिपूतिपूयक्षीणरेतसः कृच्छ्राध्याः, मूत्रपुरीषरेतसस्वसाध्या इति ॥ ४ ॥
वायु के कारण शुक्र के दूषित होने पर वीर्य में लाल-काला वर्ण तथा वातजन्य-तोद, भेद आदि वेदनायें होती हैं। पित्त के कारण शुक्र के दूषित होने पर, पीला नीला वर्ण तथा ओष-चोष आदि वेदनायें होती हैं। कफ के कारण शुक्र के दूषित होने पर श्वेत वर्ण तथा कण्डू आदि वेदनायें होती हैं। रक्त के कारण दूषित शुक्र में मुर्दे के समान गन्ध तथा मात्रा में अधिक एवं रक्तवर्ण और ओष-चोष आदि वेदनायें होती हैं। कफ और वायु से दूषित वीर्य प्रन्थि रूप ( बहुत गांठवाला ) हो जाता है। पित्त और कफ के कारण दूषित वीर्य दुर्गन्ध युक्त तथा मवाद मिश्रित होता है। पित्त और वायु के कारण से वीर्य क्षीण हो जाता है, क्षीण वीर्य के लक्षण प्रथम कह चुके हैं। सन्निपात के कारण वीर्य में मूत्र और मल की गन्ध आने लगती है।
१ मल और मूत्र के वीर्य में आने से भगन्दर रोग होते हैं। जैसे कहा भी है—
“वातमूत्रपुरोपाणि क्रमयः शुक्रभेव च ।
भगन्दराः स्वनत्स्तु नाशयन्ति तमातुरम् ॥”
२ चरकसंहिता में दोषों से दूषित वीर्य के लक्षण निम्न कहते हैं—
“फेनिलं तनु रुक्षञ्च कृच्छ्रेणाल्पञ्च मास्तात् ।
भवत्युपहतं शुक्रं न तद् गन्धाय कल्पते ॥
सन्मिलमथवा पीतमयुष्णं पूतिगन्धित्वा ।
दहर्लिङ्गं विनियति शुक्रं पित्तेन दूषितम् ॥
श्लेष्मणा रुद्वमार्गन्तु भवत्यल्पयथिपिच्छलम् ।
इति दोषाः समाख्याताः शुक्रस्य तु विशेषतः ॥” चरकः
शुक्रस्य के लक्षण— शुक्रस्य मेद्वृषणयोर्वेदनाशक्तिर्मथुने, विराद वा प्रसंकः प्रसंके चाल्यरक्तशुक्रदर्शनञ्च ॥ सु० सू० अ० १५ ।
शुक्राभाव ( Aspermia ), शुक्र का कम होना ( Oligospermia ), शुक्र का पतला होना ( Hydrospermia ), शुक्र में रक्त मिला होना ( Hoemospermia ), शुक्रकीट का निर्जीव होना ( Necrozoospermia ), शुक्रकीटों का कम होना ( Oligo zoospermia ), शुक्रकीटों का न होना ( Azoospermia ), शुक्र में पीलापन ( Pyo-spermia ) कहते हैं। विस्तार के लिये वैद्यजयदेव का सुश्रुत बारोर देखिये।
इनमें कुणप-प्रन्थि-पूति-पूय-क्षीण-वीर्यवाले व्यक्ति कष्टसाध्य हैं। मूत्र-मलमिश्रित वीर्यवाले व्यक्ति असाध्य हैं। शेष, वात, पित्त, कफ रक्त से दूषित वीर्यवाले व्यक्ति साध्य हैं।
वि० मन्तव्य—वात, पित्त तथा कफ से दूषित शुक्र के स्वल्पन के समय उक्त वेदनायें होती हैं ॥ ४ ॥
आर्तवमपि त्रिभिर्दोषैः शोणितचतुर्थैः पृथग्द्वन्द्वैः समस्तैश्चोपसृष्टमबीजं भवति; तदपि दोषवर्णवेदनादिभिर्विज्जयम्। तेषु कुणपप्रन्थिपूतिपूयक्षीणमूत्रपुरीषप्रकाशसमाध्यं, साध्यमन्यन्चचेति ॥ ५ ॥
आर्तव भी वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों से, रक्त से, दन्द्दों से (वात, पित्त, वातकफ, पित्तकफ) और सन्निपात रूप से दूषित होने पर प्रजोत्पादन में असमर्थ होता है। इस आर्तव में भी दोषों के अनुसार वर्ण और वेदनायें समझनी चाहिये।
इनमें भी कुणप, प्रन्थि, पूति, पूय, क्षीण मूत्र, मल सहसा आर्तव असाध्य हैं और शेष साध्य हैं।
वि० मन्तव्य—वातादि से दूषित आर्तव में मासिक स्नाय या प्रदर हो जाने पर उक्त वेदनायें होती हैं। इनमें भी कुणप, प्रन्थि, पूति, पूय तथा क्षीण आर्तव कष्टसाध्य होते हैं और मूत्र पुरीषगन्धी असाध्य होते हैं। इस प्रकार आर्तव ( शोणित ) भी प्रजोत्पादन में असमर्थ होता है ॥ ५ ॥
भवन्ति चात्र—
तेष्वद्यान् शुक्रदोषाखीन् स्नेहस्वेदादिभिर्जयेत् ।
क्रियाविशेषैर्मितास्तथा चोत्तरवस्तिभिः ॥ ६ ॥
कहा भी है—इनमें से आदि के ( वात, पित्त, कफ ) तीन शुक्रदोषों को स्नेहन-स्वेदन द्वारा ( वमन, विरेचन, निरुहण, अनुवासन, उत्तरवस्ति ) तथा विशेष चिकित्सा-द्वारा और रसायन औषधियों से तथा उत्तरवस्ति द्वारा ( दोषों के अनुसार ) चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६ ॥
पाययेत् तं नरं सर्पभिषक् कुणपरेतसि ।
धातकीपुष्पखदिरदाडिमाजुनसाधितम् ॥ ७ ॥
पाययेदथवा सर्पिः शालसारदिसाधितम् ।
प्रन्थिभूते शटीशिङ्गं पाठाशे वाडपि भस्मनि ॥ ८ ॥
पुरुषकवटादिभ्यां पूयप्रख्ये च साधितम् ।
प्रागुक्तं वद्यते यच्छ तत् कार्यं क्षीणरेतसि ॥ ९ ॥
वितप्रभे पाययेत् सिद्धं चित्रकोडीरहिजुभिः ।
स्तिग्धं वान्तं विरिक्तं च निरुद्वमनुवासितम् ॥ १० ॥
योजयेत्कुक्कुदोषात् सम्यग्गुत्तरवस्तिना ।
कुणपगन्धी शुक्रदोष में वैद्य को चाहिये कि रोगी को धाय के फूल खदिर (वैर की छाल) अनार (की छाल) तथा अर्जुन की छाल से साधित घृत अथवा शालसारदिगण के कल्क एवं क्वाय के साधिर घृत रोगी को पिळावें। प्रन्थिभूत (गांठदार) वीर्यदोष में
अ० २]
३७
शारीरस्थानम्
२८६
शठी (कचूर) द्वारा सिद्ध अथवा पलाशभस्म (पलाश की राख या पलाशधारजल) में साधित घृत पिठाना चाहिये। पूर-नामक वीर्यदोष में पुरुषकादि या वटादिगण द्वारा साधित घृत रोगी को पिठावे। क्षीणवीर्य की अवस्था में दोषादिविज्ञानीय में कहे स्वयोनिवर्धक द्रव्यों का उपयोग तथा क्षीणवलीय नामक अथवा में कही विधि को बरतना चाहिये। मल मूत्र गंधि शुक्-दोष में चित्रक, खस और हींग से साधित घी का प्रयोग करना चाहिये। शुक्दोष से पीड़ित व्यक्ति को प्रथम स्नेहन, वमन, विरेचन, निरुहण, अनुवासन आदि कम करने के पश्चात् उत्तर-बस्ति का यथाविधि प्रयोग करना चाहिये। ॥ ७-१० ॥
स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च ॥११॥ शुक्रमिच्छन्ति, केचित्त तैलक्षोदनभिं तथा। विधिमुत्तरबस्त्यन्तं कुयोदातं वशुद्धये ॥१२॥
(१) वृत्तसाधन का नियम— वृत्तादिकरणनेकितर्गणे स्यात् स्नेहप्रविधौ। तथैव कल्कनिर्युहाविष्येते स्नेहवेदिना ॥ क्वाथ से आठगुणा जल, शेष चतुर्थांश, वृत्त क्वाथ से चतुर्थांश, कल्क घृत से चतुर्थांश है।
(२) चरक में— वातान्तिते हितः शुक्ले निरुहाः सानुवासनाः। अभयामलकीयञ्च पित्तं शस्तं विरेचनम् ॥ मागध्यमृतलोहानां त्रिफलाया रसायनम्। कफोद्भवं शुक्दोषं हृत्पाद भल्लातकस्य च ॥ वाजीकरणीययोगैस्तैरप्युक्तैः शुभैः हितम्। रक्तपित्तहरेः योगैः योनिव्यापदिकैस्तथा ॥ दुष्टं तावत् यदा शुक्लं तदा तत् समुपाचरेत्। घृतं यज्जावनायोक्तं च्यवनप्राश एव च ॥ गिरोजस्य प्रयोगश्च रेतोदोषान् व्यपोहति ॥ तंत्रातरोय प्रयोग—अमृतसारलोह, अमृतप्राशघृत, गोधूमा-विघृत देने चाहिये।
(३) घातकोघृत—आदि तीनों घी क्वाथ एवं कल्क में सिद्ध होंगे। मात्रा आधा तोला। (४) सालसारदि, वटादि और पुरुषकादिगण के लिये सूत्र-स्थान देखिये। (५) पलाशघृत—पलाशभस्म एक आदक, पानी छे आदक में सात बार छानकर एक आदक, पानी में एक प्रस्थ घी पकाता चाहिये। रक्तगुल्म में पलाशघृत की विधि—पलाशधारतोयिन सपि-सिद्ध पिबेच्च सा।
(६) उत्तरबस्ति के लिये चरकसिद्धिस्थान या छंभह देखिये।
शुद्ध शुक्र की परीक्षा—
शुद्ध वीर्य—स्फटिक मणि के समान श्वेत (जरा-सी नीली झाँके लिये), द्रव (तरल) स्निग्ध (चिकनाहट शुक्र), मधुर (रस में) और मधु के समान गन्धवाला होता है। कई आचार्यों की मान्यता है कि शुद्ध वीर्य तिल तैल और मधु के समान वर्ण में तथा षट होता है, ऐसा वीर्य प्रजा-उत्पादन में समर्थ है ॥ ११,१२ ॥
क्षीणां स्नेहादियुक्तानां चतसृष्वार्त्तावतिष्ठु। कुयोः कल्कान् पिच्छंश्चापि पथ्यान्याचमनानि च ॥ प्रन्थिभूते पिबेत् पाठां ज्यूषणं वृक्षकाणि च। दुर्गन्धिपूयसङ्घाशे मञ्जतुलये तथाऽऽतंवे ॥१४॥ पिबेद्द्रवश्रयः क्वाथं चन्दनक्वाथमेव च। शुक्रदोषहराणां च यथास्वमवचारणम् ॥१५॥ योगानां शुद्धिकरणं शेषास्वप्नार्त्तावतिष्ठु।
अन्नं शालियवं मद्यं हितं मांसं च पित्तलम् ॥१६॥ आर्त्तवशुद्धि के लिये उत्तरबस्ति पथ्यन्त शुक्रदोषों में कही चिकित्सा करनी चाहिये। वात, पित्त, कफ और रक्तजन्य आर्त्तव दोषों के लिये स्नेहन आदि कर्मों के साथ साथ योनि में कल्क, पित्रु, पथ्य आचमन (योनिप्रक्षालन—वातादिदोषहर, क्वाथ द्रव्यों से बने) का प्रयोग करना चाहिये। आर्त्तव के प्रन्थि-युक्त होने पर पाठा, ज्यूषण (चिकट) और वृक्षक (इन्द्रजो) इनका क्वाथ पीना चाहिये। यदि आर्त्तव दुर्गन्धित पूय के समान अथवा मञ्ज के तुल्य हो तो मद्रश्रय (हरि-चन्दन-व्यवहार में देवदारु) और चन्दन (श्वेत चन्दन) इनका क्वाथ पिठाना चाहिये। वातादि एकदोषजनित आर्त्तव की शुद्धि के लिये शुक्रदोषनाशक पूर्वोक्त स्नेह स्वेदादि कर्म तथा योगों (रसायन, वाजीकरण, मूत्रदोषनाशकप्रयोग) -दोषों के अनुसार—प्रयोग करना चाहिये। आर्त्तवपीडा में—भोजन
१ (१) चरक ने शुद्ध शुक्र के लक्षण निम्न कहे हैं—स्तिग्धं घनं पिच्छिलं च मधुरं चाविदाहि च।
(२) स्फटिक मणि के समान श्वेत वर्ण शुक्र श्वेतगौर वर्ण संतान को, तैल वर्ण शुक्र कृष्ण वर्ण और मधु वर्ण शुक्र व्यामवर्ण संतान को उत्पन्न करता है। दिवार पर फंका शुक्र नीचे नहीं बहता।
(३) वैद्य जयदेव ने 'मधुर' शब्द का अर्थ—Natural in Recation किया है। यथा—The seminal fluid is viscous, Natural or Alkaline in recation है। इसको गन्ध खास होती है, जो किसी से नहीं मिलती। शुद्ध वीर्य का दाग साधारणतः घोने पर साफ नहीं होता।
२ आचमन—उत्तरबस्ति तथा योनिप्रक्षालन के लिये त्रिप-लाक्वाथ बरतना चाहिये।
२९०
मुश्रुतसंहिता
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के लिये शालि साठी ( हेमन्त धान्य ), जो, मद्य, तथा पित्त-वर्धक मांस हितकारी है ॥ १३-१६ ॥
अगस्त्यप्रतिमं यत्तु यद्वा लाक्षणस्योपमम् ।
तदार्त्तवैः प्रअंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ॥ १७ ॥
शुद्ध आर्त्तव की परीक्षा—जो आर्त्तव खरगोश के रक्त के समान रङ्ग में तथा घनता में होता है, अथवा लाख के पानी के समान होता है, वस्त्र पर शुष्क हुआ आर्त्तव धोने से कपड़े पर चब्बा नहीं छोड़ता, वह रज गर्भ धारण करने के योग्य होता है ॥ १७ ॥
तदेवाति प्रसङ्गेन प्रवृत्तमनुतावपि ।
असृग्दरं विज्ञानीयादतोऽन्यद्रक्तलक्षणं ॥ १८ ॥
असृग्दरो भवेत् सर्वः साङ्गमर्दः सवेदनः ।
तस्यातिवृत्तौ दौर्बल्यं भ्रमो मूर्च्छा तमस्त्रुषा ॥ १९ ॥
दाहः प्रलापः पाण्डुरवैः तन्द्रा रोगाश्च वातजाः ।
यहाँ आर्त्तव जब ऋतुकाल में भी अधिक मात्रा में आता है, अथवा अधिक दिनों तक चालू रहता है, या ऋतुकाल के दिनों के अतिरिक्त अन्य समय में भी आता है, और इस रक्त का रङ्ग आर्त्तव से भिन्न हो तो इसको असृग्दर ( रक्तप्रदर ) जानना चाहिये ॥
सब प्रकार के असृग्दर में—अङ्गों में टूटने की पीड़ा, गर्भाशय के समीप के अङ्गों में पीड़ा होती है । और यदि रक्तप्रदर अधिक मात्रा में हो तो दुर्बलता, भ्रम ( चक्कर आना ), मूर्च्छा ( बेहोशी ), तम ( आँखों के सामने अन्धकार ), प्यास, दाह, प्रलाप पाण्डुता ( शरीर का वर्ण पीला पड़ना ), तन्द्रा एवं वातजन्य ( आन्त्रेपकादि ) रोग होते हैं ॥ १८, १९ ॥
१ चरक में—
“गुंजाफलसर्वणं च पद्यालवतकसन्निभम् ।
इन्द्रगोपकसंकाशमार्त्तवं शुद्धमेव तत् ॥
भाससिन्धिच्छदाहात्तिपञ्चरात्रानुबन्धे च ।
नैवातिबहुनात्यल्पं तदार्त्तवं शुद्धमादिशेत् ॥”
आर्त्तव का परिमाण साधारणतः ५ से १० औंस है, परन्तु अनिश्चित है ।
आर्त्तव की चारों स्थितियाँ, आर्त्तव के विषय में निम्न पुस्तकें देखिये—
घात्रीशिक्षा, मुश्रुत-शरीर जयदेव कृत पृष्ठ २५, Midwifery by Johnstone और हमारे शरीर की रचना ।
२ जीवरक्त और आर्त्तव्रक्त में परीक्षा—
तेनासं मिश्रितं दद्याद्यायसाय शुनःपि वा ।
भुक्ते तच्चेद्व वेदज्जीवं न भुक्ते पित्तामादिशेत् ॥
शुक्लं वा भावितं वस्त्रभावानां कोष्णवारिणा ।
प्रशालितं विवर्णं चेत् पित्तं, शुद्धं तु शोषितम् ॥
आजकल—मैनोंरेजिया और मेटोरेजिया कहते हैं ।
तहण्या हितसेविन्यास्तमल्पोपद्रवं भिषक् ॥ २० ॥
रक्तपित्तविधानेन यथावत् समुपाचरेत् ।
तहणी ( सोलह वर्षवाली ), पश्व सेवन करनेवाली, असु उपद्रवों से युक्त ( निरन्तर खाव का बहना-दुर्बलता आदि ) रोगिणी में रक्तपित्त ( तथा रक्तार्श एवं रक्तातिसार ) की विधि से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २० ॥
दोषैरावृतमार्गस्वादात्तवैः नश्यति स्त्रियाः ॥ २१ ॥
तत्र मत्स्यकुल्लथाम्लतिलमापसुरा हिताः ।
पाने मूत्रमुदधिच्छ च दधि शुक्लं च भोजने ॥ २२ ॥
क्षणं प्रागोरितं रक्तं सलक्षणचिकित्सितम् ।
तथाऽप्यत्र विधातन्यं विधानं नष्टरक्तवत् ॥ २३ ॥
वातादि दोषों के कारण आर्त्तव—वहाँ ( गर्भाशय ) को रक्तवाहिनियों के अवरोध हो जाने पर स्त्रियों में आर्त्तव को प्रवृत्ति नहीं होती । इसके लिये—मछलियाँ, कुल्लथी, अम्लस, तिल, माष, सुरा हितकारी हैं । पीने के लिये मूत्र ( गायों का मूत्र तीक्ष्ण होने से ), उदधि ( अर्द्धादक मिला तक ), दधि, और शुक्त देना चाहिये । क्षीणात्तव के लक्षण और चिकित्सा प्रथम दोषादिविज्ञानीय अस्थाय में कह दी है । इसके साथ र नष्टार्त्तव की भी चिकित्सा मिला लेनी चाहिये ॥ २१-२३ ॥
एवमदुष्टशक्तः शुद्धार्त्तवा च ॥ २४ ॥
इस प्रकार से दोष रहित वीर्यवान् पुरुष और शुद्ध आर्त्तव-वाली स्त्री ही उत्तम प्रजा उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं ॥ २४ ॥
ऋतौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवास्वप्नान्ध्वनाश्रपातस्नानानुलेपनाभ्यङ्गनखच्छेदनप्रधानवहसनकथनातिशब्दश्रवणावलेखनानिल्यायासान् परिहरेत् । कि कारणं ? दिवा स्वप्नत्याः स्वापगोलः, अञ्जनादन्धः, रोदनादिकृतटष्टिः, स्नानानुलेपनादुःखगोलः, तैलाभ्यङ्गानु कुष्ठौ, नखापकर्तनात् कुतखौ, प्रधानान्चञ्चलः, हसनाच्छ्वाशवदन्तोष्ठतालुजिह्वाः, प्रलापी चातिकथनात्, अतिशब्दश्रवणाद्घ्रिः, अवलेखनात् खलतिः, माहत्यायाससे वनाडुन्मत्तो गर्भो भवतीत्येवमेतान् परिहरेत् । दर्भसंस्त रगयिनीं करतलश्रावणान्यतमभोजिनीं हविष्यं ज्यहं च भर्तुः संरचेत् । ततः शुद्धस्नानात् चतुर्थेऽह्न्यहत्तवासं समलङ्कृतां कुतमङ्गलस्वस्तिवाचनां भर्तारं दशयेत् । तत् कस्य हेतोः ? ॥ २५ ॥
अर्थात् मैथुन से रहित ब्रह्मचारिणी स्त्री को चाहिये कि ऋतुकाल के प्रथम दिन से ही दिन में सीता
१ क्षीणात्तव के लक्षण—
“आर्त्तवस्यैव यथोचितकालादर्शनमल्पता वा योनिवेदना च । तत्र संशोधनानपेयानाच्छ च द्रव्याणां विधिवदुपयोगः ॥” सु० सू०
२ ऋतुकाल —“ऋतुस्तु दुष्टार्त्तवो द्वादशरात्रं भवति, षोडशरात्रमित्यन्ये । शुद्धयोनिगर्भाशय आर्त्तवायाःभासमपि केचित् । तदवद्व दृष्टार्त्तवाऽप्यस्तीत्यपरे ॥ अर्थात्संग्रह ॥
शारीरस्थानम्
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अ २]
आँखों में अञ्जन, रोना, स्नान, अनुलेपन (चन्दन आदि का बरार पर लगाना), अश्वंग, नखों का काटना, दौड़ना, ऊँचे हँसना, बहुत बोलना, ऊँचे शब्दों का सुनना, अवलेखन (कड़ी से सिर साफ करना), वायु का सीधा झोंका, परिश्रम करना छोड़ देवे, क्योंकि—दिन में सोने से शिशु निद्रालु होता है, अञ्जन करने से अन्धा, रोने से विकृत दृष्टिवाला, स्नान और अनुलेपन से दुःखशील, तैल की मालिहा से कुष्ठी, नखों के काटने से दूषित नखवाला, भागने से चञ्चल, हँसने से श्यावदन्तक, श्यामवर्ण ओठ, ताख, जिह्वावाला, बहुत बोलने से प्रलापी (बकवादी), ऊँचे शब्द सुनने से बहरा, सिर खुजाने से गंजा, वायु और परिश्रम के सेवन करने से उन्मत्त (पागल) होता है, इसलिये इन बातों का त्याग करना चाहिये।
कुशा को विछाकर उसके ऊपर सोनेवाली, हाथ—मिट्टी के पात्र अथवा पत्ते पर हविष्य-(घी मिश्रित शालि-धान्य या दूध में संस्कृत गेहूँ आदि का) अन्न का भोजन करनेवाली जो तीन दिन पति से अपनी रक्षा करे—अलग रहे। चौथे दिन स्नान करके शुद्ध हुई स्त्री उत्तम वस्त्र तथा सुन्दर आभूषण धारण करके, मङ्गल पाठ स्वस्तिवाचन करने के पश्चात् पति का दर्शन करे१ ॥२५॥
यह सब किस लिये ?
पूर्व पर्येष्टुस्नाता याहर्शं नरमङ्गना । ताहर्शं जनयेत् पुत्रं भतौरं दक्षयेदतः ॥२६॥ ततो विधानं पुत्रीयमुपाध्यायः समाचरेत् । कर्मन्ते च क्रमं ह्येतमारभेत विचक्षणः ॥२७॥
श्रुतुस्नात स्त्री जिस प्रकार के पुरुष का दर्शन सबसे प्रथम करती है, उसी प्रकार के पुत्र को उत्पन्न करती है। इसलिये सबसे प्रथम पति का दर्शन करना चाहिये। इसके पश्चात् वैदिक कर्म को जाननेवाला याचिक-पुत्रेष्टि विधि को (चरकोक्त-तन्त्राचार्यों द्वारा) आरम्भ करे। इस कर्म के उपरान्त बुद्धिमान् पति वद्यमाण कार्य को करे ॥२६, २७॥
ततोऽपराह्ने पुमान् मासं ब्रह्मचारी सर्पः स्निग्धः सर्पः क्षीराभ्यां शाल्योदनं मुक्त्वा मासं ब्रह्मचारिणीं तैलं स्निग्धां तैलमाषोत्तराहारं नारीमुपेयाद्रात्रीं सामभिरभि-विश्वान्, विकल्प्यैव चतुर्थ्यां षष्ठ्यां मष्टभ्यां दशभ्यां द्वादश्यां चोपेयादिति पुत्रकामः ॥२८॥
बिता श्रुतुदर्शनं हुए भी गर्भ रह जाता है।
१ कहा भी है—
“नवे तनी च संजाते विगते जीर्णं शोणिते । नारी भवति संबुद्धा पुंसा संसृज्यते तदा ॥”
जो पुरुष एक मास तक ब्रह्मचारी रह चुका हो, वह घृत द्वारा स्निग्ध होकर पुत्रीय कर्म के पश्चात् सार्यकाल की ओर दूध से शालि चावलों को खाये। इसी प्रकार से एक मास तक ब्रह्मचर्य धारण की हुई स्त्री तैल से स्निग्ध होकर सार्यकाल तैल, उड़द का भोजन करे। रात्रि में इस स्त्री को सामादि वचनों से शान्त करके पति स्त्री से सहवास करे। इस प्रकार से यदि पुत्र की कामना हो तो चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, दशमी और बारहवीं (आर्तवस्त्राव से) रात्रि में सहवास करना चाहिये१ ॥
एषुत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च । प्रजासौभाग्यमेश्वर्यं बलं च दिवसेषु वै ॥२९॥
अतः परं-पञ्चभ्यां सप्तभ्यां नवभ्यामेकादश्यां च स्त्री-कामः, त्रयोदशीप्रभृतयो निन्धाः ॥३०॥
इसमें भी उत्तरोत्तर तिथियों में आयु, आरोग्य, प्रजा, सौभाग्य, ऐश्वर्य, बल की वृद्धि होती है। इसके आगे पांचवीं, सप्तमी, नवमी और एकादशी रात्रि में पुत्री की कामनावाले पति पत्नी के सहवास के लिये उत्तम है। इनमें भी उत्तरोत्तर रात्रियाँ श्रेष्ठ हैं। शेष त्रयोदशी आदि रात्रियाँ निन्दित हैं२ ॥
तत्र प्रथमे दिवसे श्रुतुभ्यो सैशुतगमनमनायुष्यं पुंसां भवति, यश्च तत्राधीयते गर्भः स प्रसवमानो विसु-
१ गर्भाधान के विषय में बहुत से भेद एवं नियम हैं। सचार-णतः श्रुतुकाल के समाप्त होने पर गर्भधारण करने की जो शक्ति गर्भाशय में रहती है, वह पीछे उतनी नहीं रहती। इसी कारण से १०-१५ दिन बाद किया गर्भाधान इतना विश्वास का नहीं होता, जितना पहिला। दूसरी बात-प्रथम दिनों में गर्भाधान करने से शिशु उतना पृष्ठ नहीं होता, जितना कि पिछले दिनों में गर्भाधान करने से होता है। इसलिये पिछली उत्तरोत्तर तिथियों को आचार्य ने श्रेष्ठ बताया है।
(१) हमारे शास्त्र में गर्भाधान का समय रात्रि का माना है। उस समय भी दिये का मन्द प्रकाश रखना कहा है। जिससे कि आँख की कनीनिका ठीक रहती है। परन्तु डाक्टर कोवन आदि दिन का समय मानते हैं। यह हमारी दृष्टि में सहमत नहीं। साथ ही स्मृति का कथन है—‘प्राणा एव प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते।’
(२) सहवास से पूर्व स्त्री की अनुकूलता प्राप्त करनी आवश्यक है।
२ पुत्र और पुत्री के लिये यह साधारण नियम है। चूँकि युगम तिथियों में स्त्री का रक्त घटा होता है और पुरुष का वीर्य चन्द्रमा के कारण बढ़ा होता है। अयुगम तिथियों में इसके विपरीत होता है। इसका उदाहरण समुद्र का ज्वारभाटा है।