सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
दशमोऽध्यायः
अथातो विसर्पनाडौस्तनरोगनिदानं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
त्वचा रक्त आदि दूष्य (आश्रित) वस्तुओं की समानता से विद्रधि के अनन्तर विसर्प नाड़ी स्तन रोग की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।
वि० मन्तव्य—यह विसर्प कुष्ठनिदानोक्त विसर्प कुष्ठ से भिन्न है इसमें कुष्ठ के पूर्वरूप नहीं होते और यह सद्वा उत्पन्न होता है और १०-२० दिन में शान्त भी हो जाता है। एक विलक्षण विसर्प का वर्णन चरक में आया है और कभी कभी दृष्टिगोचर भी होता है वह है—यज्ञोपवीतपतिमाः प्रभूता च० चि० अ० १२। ये स्फोट (फफोले) यज्ञोपवीतव्याप्य शरीर-वयव पर होते हैं। बाँएँ स्क्रन्ध से दाईं कृषि या पार्श्व तक—वस्त्र एवं पीठ पर निकलते हैं ॥१,२॥
त्वङ्मांसगोणितगताः कृपितास्तु दोषाः सर्वाङ्गसारिणमिहास्थितमात्मलिङ्गम् । कुर्वन्ति विस्मृतमनुन्तमाशु गोफं तं सर्वतो विसरणारुच विसर्पमाहुः ॥३॥
कृपित हुए वातादि दोष सम्मिलित होकर त्वचा (त्वचा-श्रित उसी का भी), मांस और रक्त का आश्रय करके—सर्वांग-विसर्पि (अन्तः एवं बाह्य तथा अवयव रूप से अंगों में फैलने-वालों), अस्थित (अनिश्चल-इधर उधर फिरनेवाली), आत्मलिग (व्यस्त समस्त रूप वातादि लक्षणों से युक्त), फैला हुआ ऊपर न उठा हुआ सूजन उत्पन्न करते हैं। इस सूजन को सब ओर फैलने से इसे वाच में 'विसर्प' कहते हैं ॥३॥
वातात्मकोऽसितमृदुः परुषोऽङ्गमदे- संभेदतोदपवनञ्चरलिङ्गयुक्तः । गण्डैर्यदा तु विषमेरतिदूषितः वा— द्युक्तः स एव कथितः खलु वर्जनीयः ॥४॥
यद्यपि विसर्प त्रिदोषजन्य है, तथापि चिकित्सासौकर्य के लिये घातादि दोष भेद से लक्षणों को कहते हैं— वातजन्य विसर्प—कृष्ण, कोमल, खुरदरा होता है, शरीर में पीड़ा, भेद तोद (बुभने के समान), एवं वायुजन्य ज्वर के लक्षणों से युक्त, वायु से अति दूषित होने के कारण विषम (निम्नोन्नत) गण्डों से (मांसजन्य गुडिका अथवा अग्नि से जलने पर उत्पन्न छालों जैसे) युक्त होता है। इस अवस्था में वह असाध्य है। (कोई २ आचार्य गण्डों की उत्पत्ति वातपित्त से मानते हैं) ॥४॥
पित्तात्मको दुतगतिञ्चरदाहपाक- स्फोटप्रभेदबहुलः क्षतजप्रकाशः । दोषप्रवृद्धिहतमांससिरो यदा स्यात् सोतोजकदंमनिभो न तदा स सिध्येत् ॥५॥ पित्तजन्य विसर्प—शीघ्र फैलनेवाला, तीव्र ज्वर, तीव्र दाह, पाक स्फोट (छालें) एवं काटने के समान वेदना से युक्त क्षतज (रक्त या वर्ण) के समान दीखता है। जिस समय दोष के अति बढ़ने से मांस और शिरायें नष्ट हो जायें, और रक्त स्रोत (सौवीरांजन) के समान या कदंम (क्रीचड़) की भाँति हो जाय, तब यह असाध्य है। (कोई आचार्य पित्त-रक्त के लक्षण मानते हैं) ॥५॥
श्लेष्मात्मकः सरति मन्दमशोघपाकः रिग्वधः सितश्चवयथुरल्परुगुप्रकण्डुः । कफजन्य विसर्प—धीरे धीरे फैलता है, देर में पकता है, रिग्वध, श्वेत वर्ण, थोड़ी सूजन युक्त और कण्डू-तीव्र होती है। सर्वात्मकच्छिबिधवर्णरुजोऽवगाहः पक्वो न सिध्येति च मांससिराप्रशतात् ॥६॥ सन्निपातजन्य विसर्प में—वातादि तीनों दोषों का काला-पीला श्वेत वर्ण, तीनों दोषों की तोद-दाह, कण्डू, वेदना होती है, आभ्यन्तर मूलवाला है। मांस और शिरा के नष्ट होने पर, पक्वावस्था में असाध्य है, प्रथम अवस्था में कष्टसाध्य है ॥६॥
सद्यः क्षतत्रणमुपेत्य नरस्य पित्तं रक्तं च दोषबहुलस्य करोति शोकम् । स्यावं सटोहितमतिञ्चरदाहपाकं स्फोटैः कुलथसट्जैरसितैश्च कौर्णम् ॥७॥ क्षतजन्य विसर्प—दोषबहुल (कुष्ठ-वातरक्तादि पूर्व-रक्त दोषदूषित धातु) पुरुष में पित्त और रक्त सद्यः क्षतजन्य त्रण में पहुँचकर शोक को उत्पन्न करते हैं। यह शोक—कृष्णवर्ण, रक्तवर्ण, अतिज्वर, अतिदाह, अतिपाक से युक्त, कुलथी के समान काले छालों से व्याप्त होता है ॥७॥ सिधयन्ति वातरुफपित्तकृता विसर्पाः सर्वात्मकः क्षतकृतश्च न सिद्धिमेति ।
१ विसर्प की उत्पत्ति में सात धातु कारण हैं, यथा— रक्तं लसीका त्वङ्मांसं दूष्यं दोषाः त्रयो मलाः । विसर्पाणां समुत्पत्ती विज्ञेयाः सप्त धातवः ॥ इसलिये चरक में कहा है— “स च सप्तविधो दोषैः विज्ञेयः सप्तधातुकः ॥” विसर्प के स्थान— (२) वहिःश्रितः श्रितश्चान्तस्तथा चोभयसंश्रिताः । विसर्पां बलमेषान्तु ज्ञेयं गुरु यथोत्तरम् ॥ (३) कविराज हाराणचन्द्र जी “कुर्वन्ति यं विस्तृतमुद्यतमाशु शोकम्” यह पाठ पढ़ते हैं। इसमें 'उन्नत' का अर्थ 'ऊँचा उठा' किया है।