सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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निदानस्थानम्
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क्षीणामपप्रजातानां प्रजातानां तथाऽहितैः । दाहज्वरकरो घोरो जायते रक्तविद्रधिः ॥२६॥
रक्तविद्रधि—गर्भ के पात या साव होने से अथवा ठीक समय प्रसव करने पर अहित (शीत-रुक्ष आहार-विहार के) सेवन से स्त्रियों में—दाह, ज्वर एवं कष्टदायक रक्तजन्य (आत्तवजन्म) विद्रधि उत्पन्न होती है ॥२६॥
अपि सम्यक् प्रजातानामसूक् कायादनिःसूतम् ।
रक्तजं विद्रधिं कुर्यात् कुक्षौ मक्कल्लसंज्ञितम् ॥२७॥
ठीक समय पर भली प्रकार से प्रसव होने पर भी यदि गर्भाशय से रक्त (दूषित रक्त) बाहर न निकले तो मक्कल्ल के कारण कुक्षि में रक्तजन्य विद्रधि (स्त्रियों में) उत्पन्न होती है ।
वि० मन्तव्य—प्रसूता के गर्भाशय के शूल का नाम भी "मक्कल" है ॥२७॥
समाहाशोपशान्तश्चेत्तोऽसौ संप्रपद्यते ।
यदि यह रक्तजन्य विद्रधि सात दिन में शान्त न हो तो पित्त की उष्णमा के कारण अन्दर पकती है, पकने पर असाध्य हो जाती है ।
विशेषमथ बध्यामि स्पष्टं विद्रधिगुल्मयोः ॥२८॥
गुल्मदोषसमुत्थानाद्द्विद्वैगुल्मकस्य च ।
कस्मान्न पच्यते गुल्मी विद्रधिः पाकमेति च ॥२९॥
न निबन्धोऽस्ति गुल्मानां विद्रधिः सनिबन्धनः ।
गुल्माकाराः स्वयं दोषा विद्रधिर्मांसशोणिते ॥३०॥
विवरासुचरो ग्रन्थिरप्सु बुद्धबुद्धको यथा ।
एवंप्रकारो गुल्मस्तु तस्मात् पाकं न गच्छति ॥३१॥
मांसशोणितबाहुल्यात् पाकं गच्छति विद्रधिः ।
मांसशोणितहीनःबाद्धगुल्मः पाकं न गच्छति ॥३२॥
गुल्मस्तिष्ठति दोषे स्वे विद्रधिर्मांसशोणिते ।
विद्रधिः पच्यते तस्माद्गुल्मश्चापि न पच्यते ॥३३॥
इसके आगे गुल्म और विद्रधि रोग में भेद को कहते हैं—
प्रश्न—गुल्म और विद्रधि के कारण दोष एक समान हैं । इस पर गुल्म किस कारण से नहीं पकता और विद्रधि किस लिये पकती है ? उत्तर—गुल्म का कोई निबन्ध (मूल) नहीं है, (रक्तादि द्रव्यों का अभाव रहता है), विद्रधि रोग का मूल (स्वासा रक्त-मांस आदि) है । गुल्म रोग में वातादि दोष स्वयं ही (दूष्य के आश्रय के बिना ही) गुल्माकार बन जाते हैं, विद्रधि में दोष मांस एवं रक्त का आश्रय लेकर गुल्म रूप होते हैं । जिस प्रकार से पानी में वायु से बुलबुले बन जाते हैं, इसी प्रकार से वायुजन्य गुल्म विवर (स्त्रियों में) का अनुसरण करके रक्त पित्त-रक्त में ग्रन्थि रूप से हो जाता है । इसलिये गुल्म पकता नहीं । विद्रधि में मांस और रक्त की अधिकता रहती है इसलिये विद्रधि पकती है । गुल्म में मांस और रक्त नहीं रहता
है, इसलिये गुल्म नहीं पकता । गुल्म अपने वातादि दोषों में ही रहता है, विद्रधि मांस-रक्त (दूष्य) में रहती है, इसलिये विद्रधि पकती है और गुल्म नहीं पकता ॥३३॥
हन्ताभिर्वस्तिजः पक्वो वज्यो यश्च त्रिरोपजः ।
हृदयं, नाभिं, वस्ति में उत्पन्न विद्रधि पकने पर तथा सन्निपातजन्य विद्रधि—जहाँ कहीं भी हो, वह असाध्य है ।
अथ मज्जपरीपाको घोरः समुपजायते ॥३४॥
सोऽस्थिमांसनिरोधेन द्वारं न लभते यदा ।
ततः स व्याधिना तेन ज्वलनेनेव दह्यते ॥३५॥
अस्थिमज्जोष्मणा तेन जीयते दह्यमानवत् ।
विकारः शल्यभूतोऽयं क्लेशयेदातुरं चिरम् ॥३६॥
अथास्य कर्मणा व्याधिद्वारं तु लभते यदा ।
ततो भेदः प्रभं स्निग्धं शुक्लं जीतमथो गुरुः ॥३७॥
भिन्नेऽस्थिन् निःस्ववेत् पृथमेतदस्थिगतं विदुः ।
विद्रधिं शास्त्रकुशलाः सर्वदोषरुजावहम् ॥३८॥
प्राक्तन कर्मों के कारण अथवा उपेक्षा से विद्रधि अस्थि में पहुँचकर पक जाती है—उसके लक्षण कहते हैं—उपेक्षा से या कर्मवश कष्टकारी मज्जा का परिपाक होने लगता है । यह मज्जा पाक अस्थि एवं मांस से रुक जाने पर मार्ग नहीं पा सकता । तब वह स्थान इस मज्जापाक रोग से अग्नि के समान जलने लगता है । अस्थि एवं मज्जा की उष्णमा से जलते हुए के समान शीर्ण (राख-भस्म) हो जाता है । यह शल्य रूप विकार रोगी को देर तक दुःख देता है । जब शास्त्रकर्म द्वारा रोग को मार्ग मिल जाता है, तब भेद के समान स्निग्ध, श्वेत, शीतल, गुरु (भारी) पृथ्—अस्थि के भिन्न होने पर बाहर खतित होती है । शास्त्रकुशल वैद्य इसको अस्थिगत विद्रधि कहते हैं । इसमें सन्निपातजन्य पीड़ा होती है ॥३४-३८॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने विद्रधिनिदानं नाम नवमोऽध्यायः ॥६॥
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१ सब गुल्मों में वायु मुख्य कारण है—इसी से कहा है—'गुल्मनामनिलशान्तिरुगयैः सर्वशो विधिवदचरितव्या । मासते ह्यवजितेऽन्यमुदोर्णदोषमल्पमपि कर्म निहय्यात् ॥
'चरक'
चरक में जहाँ गुल्मविकित्सा में पक्वगुल्म का वर्णन है, वह अन्तः विद्रधि का समझना चाहिये । चरक के त्रिशोथीय अध्याय में गुल्म का वर्णन किया है । विद्रधि के दो भेद बताते हुए—'विद्रधिं द्विविधामाहः बाह्यामाभ्यन्तरी तथा'—कहकर—अन्तः विद्रधि का समावेश गुल्म में किया है । सुश्रुत में गुल्म और विद्रधि दोनों पृथक् रखे हैं, इसलिये, अन्तः विद्रधि को—विद्रधि में रख दिया है—'कृतवास्तुप्रिग्रहं गुल्म पकता है, 'अकृतवास्तु-प्रिग्रहं गुल्म नहीं पकता—यह दूसरा भी अन्तर है ।