सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ बणादिभेदेन भेदो मेहेषु कल्पते ॥1*
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क र निदानस्थानम् (
ङो कहते है, जेखा किं भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के | का आपस मे उलश्चा रहना, ओर नखो का शीघ वदृना-ये कहा था ॥१,२॥ प्रमेह क पूवरूप ह ।॥५॥ दिबाल्वप्नाभ्यायामालस्यप्रसक्त जोतस्निरधमधुरदरवान्नपानसेविन पुरुष जानीयात् प्रमेदी भवि-
यतीति ॥३॥
प्रह के कर्ण
दिन मे खोने, व्यायाम (शारीरिक परिम) न करने.
वाहि, निरन्तर सदा आल्सी, सीत स्निग्ध (घृत बहुल), मधुर,
च (मेदवरधक) द्रव (तरल) खान-पान को सेवन करनेवाले
ष मे प्रमेह उद्यनन होता हे " ॥३॥
तस्य चैवंप्रवृत्तस्यापरिपक्रा एव वातपित्तश्छेषमाणो
यदा मेदसा सहैकत्वमुपेत्य मूत्रवाहिखार्तास्यनुमूस्याधो
गला वस्तेमंखमाश्रिव्य निर्भि्न्ते तद् प्रमेहाग्जनयन्ति |
हस प्रकार के आहार-विहार को सेवन करनेवाले पुखष के
अपयिक्व (आमावस्था के) अवस्थामें दी वात, पित्त ओर
कृफ मेद (एवं वखा) के साथ मिलकर मूत्रवाही खोतों के
आश्रय से नीचे की ओर आकर वस्ति मुख का आश्रय लेकर
जब बाहर निकलने लगते है, तव प्रमेहं की उत्ति होती दै ॥
तेषा तु पूंरूपाणि-हस्तपादतख्दाहः स्निग्धपिच्छि-
रगुरता गात्राणां मधघुरजक्छमूत्रता तन्द्रा सादः पिपासा दुगेन्धश्च शासस्ताटुगठजिह्वादन्तेषु मलोसपत्तिजेटिटीमावः
केशानां बृद्धि नखानाम् ।(५॥ |
प्रमेह के पूवरूप --
` हाथ ओर पांव के तल्ुओं मँ जलन, शरीर मँ रि्निग्धता
चेहरे पर बिना ते के “तेर की. क्षलक), चिकनापन ओर भारीपन होना, मूतर में मधुरता ओर सफेदपन, तन्द्रा (आरस्य),
णद (अज्ञ मे ग्लानि), प्यास, श्वास मे दुगंन्ध, श्वास-तालुः
ग
पके-जिहा ओर दांतों मे मल का बहुत उत्पन्न होना, बालो
र १ कई आचार्य्यो का कथन ह कि प्रमेहरोग स्वियों को नहीं हेता । इसके लिये वे कहते है कि--
रजः भ्रसेकान्नारीणां मासि मासि विशुध्यति
सवं शरीर दोषार्च न प्रमेहन्त्यतः स्तियः ॥ *
ट वचन ठीक नहीं है | वोंकि किसी तन्त्र ने इसको नहीं
त भरत्यक्ष के विरुद्ध ह । परन्तु यह भी सत्य है किं जिस
ऋतु धमं ठीक प्रकार से आता रहता है, इसको मूत्र दोष
पाकम होते है] शरोर जिस को प्रमेह होता है, उनको
रोष को शिकायत रहती है। विशेष चिक्तित्स्ास्थान मे देखे । ९्हा सी | |
रोषष्याविरोेऽपि तत्संयोगविशेषतः ॥
तत्राविटप्रभूतमूत्रलक्षणाः समे एव्र प्रमेहा भवन्ति ॥६॥ सव प्रमेहो मे मूत्र का गदलापन ओर मात्रा मूत्रका बहुत आना सामान्य लक्षण दै ।
वि० मन्तव्य--आहार का परिपाक हो जाने के पश्चात्- मछ द्रव का जलीयांश आचूषित होकर रख के समान दी रक्त म॑ मिल्ता दै ओर रतम आहार रस मय सव धातुओं क उपादान विद्यमान रहते हँ । रतम से इच्छं द्वारा मूत्रं
छनता दै, तव यदि धातुओं के उपादान भी मूत्रे छनने कगते ह ओर अप--धातु (जितने जर की शरीर को सव॑दा आवश्यकता होती है--रदती है उतना जल) मी अधिक छनने गता हे तो मूत्र-आविल (अखच्छ) तथा अपेक्षाकृत अधिक
आने छगता हं | फलतः धातुओं का उचित पोषण नदीं होता।
इसी रोग का नाम प्रमेह” या मेह है। शेष सव्र लक्षणों पर ध्यान दं । ओर-स्थूढः प्रमेदी वलवान् इह एकः कृशः
तथेकः परिदुवंक्श्च | (च० चि० अ० १) जिख रोगी के मेदस्
तथा ओजस् सुरश्चित रहते हँ बह स्थूरं ओर बलवान् बना रहता
है | जिखके नहीं वहं कुश एवं दुब हो जाता हे ॥६॥
सवे एव सवेदोषसमुर्थाः सह पिडकाभिः॥७॥ सब् प्रमेह एवं प्रमेह जन्य सव पिडकायेँ (कुष्ठ की भाति ) सवर दोषों से उत्पन्न होती है ॥७॥
तत्र, कफादुदकेश्चबालिकाघुरासिकताशनैखेवणपिष्टसान्द्रशुक्फेनमेहा द साध्याः, रकषदूष्याणां समक्रियप त्वात् , पित्तान्नीखह रिपद्राम्डक्षारमक्जिष्ठाशोणितसदहाः षड याप्याः, दोषदूष्याणां विषमक्रियस्वात्, वातात् सपिवसा- ‡
्षौद्रहस्तिमेहदाश्चस्ारोऽसाध्यतमाः, महाययिकस्वात्॥८॥
इनमें कफ के कारण से दस प्रकार के प्रमेह उन्न होते
है । यथा-उदकमेह, इक्तवालिकामेह, सुरामेह, सिकतामेह,
शनेमेह, ल्वणएमेह, सानदरमेह, पि्टमेह, शुक्रमेह ओर फेनमेह ।
ये दसो प्रमेह साध्य हैँ । क्कि इनम दोष (कफ) ओर दूष्य
(मेद-मञ्जा आदि) को चिकित्सा कायं एक समान हे । अथात्
कफ ओर मेद दोनों दी रक्ष एवं उष्ण तथा कटु तिक्त कषाय
से शान्त होते है, इसल्यि साध्य हे । पित्त के कारण से--नीलमेह, ह रद्रामेह, अम्बमेह, मड््ठामेह ओर शोणितमेह-ये छ
प्रमेह उत्पचच हेते ई । छे प्रमेह याप्य हँ । क्योकि इनमे दोष
(पित्त) ओर दूष्य (मेद-लघीका आदि) का चिकित्सां
विषम रूप है । अर्थात् पित्त मधुर एवं शीत, सिनिग्ध क्रिया से
शान्त होता है, जोर मेद लीका--उष्ण एवे कटु सुश्च क्रिया
से शान्त होती है, श्सव्यि याप्य हे । वायु के काणसे- 1
सपद, वसामेद, शोदरमह, ओर हस्तमिह चार ब ९०
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