सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
है। ये अतिशय असाध्य है। क्योंकि—महात्म्यिक होने से—अर्थात् अतिशय धातु क्षय करने के कारण शीघ्र विनाशकारी है एवं इनमें भी विषम क्रिया है। (मधुर रस वायु को शमन करता है, स्निग्ध गुण वायु का शामक है, परन्तु ये दोनों दूष्य-मेद को बढ़ाते हैं) ॥१॥
तत्र वातपित्तमेदोभिरन्वितः श्लेष्मा श्लेष्मप्रमेहाञ्च नयति, वातकफशोणितमेदोभिरन्वितं पित्तं पित्तप्रमेहान्, कफपित्तवसा मज्जमेदोभिरन्वितो वायुवातप्रमेहान् ॥१॥
इनमें वायु-पित्त और मेद (मांस आदि भी१) से युक्त कफ-कफजन्य प्रमेहों को उत्पन्न करता है। वायु-कफ और रक्त एवं नेद से मिश्रित पित्त-पित्तजन्य प्रमेहों को, कफ-पित्त वसा मज्जा और मेद से मिश्रित वायु-वातजन्य प्रमेहों को उत्पन्न करती है ॥१॥
तत्र, श्वेतमवेदनमुदकसहसा मुदकमेही मेहति, इलुरसतुल्यमिलुवालिकामेही, सुरातुल्यं सुरामेही; सरुजं सिकतानुविद्धं सिकतामेही; जनैः सकफं मृत्स्नं शनैर्मही; विगदं लवणतुल्यं लवणमेही; हृष्टरोमः पिष्टरसतुल्यं पिष्टमेही; आविलं सान्द्रं सान्द्रमेही; शुक्रतुल्यं शुक्रमेही; स्तोकं स्तोकं सफेनमच्छं फेनमेही मेहति ॥१०॥
इनमें उदकमेही रोगी—श्वेतवर्ण मूत्र-विना किसी पीड़ा के—पानी के समान स्वच्छ प्रवाहण करता है। इलुमेही रोगी—गन्ने के समान, सुरामेही—सुरा के समान, सिकतामेही—पीड़ा के साथ सिकता (द्रूषित कफ वालुका में परिवर्तित होता है—इसलिये वालुका) मिश्रित, शनैर्मही—धीरे धीरे—कफ मिश्रित मृत्स्न (पिच्छल-चिकासयुक्त), लवणमेही विशद (निमल), लवणरस युक्त, एवं लवणोदक के समान, पिष्टमेही—हृष्टरोमा (शरीर में रोमांच उत्पन्न होकर), पिष्टरस (पिड़ीमिले पानी) के समान, सान्द्रमेही—आविल (कलुषित), सान्द्र२ (घन), शुक्र-मेही—शुक्र के समान चिकना, फेनमेही—धीरे-धीरे फेन मिश्रित मूत्र प्रवाहित करता है ॥१०॥
अत ऊर्ध्वं पित्तनिमित्तान् वक्ष्यामः—सफेनमच्छं नीलं नीलमेही मेहति; सदाहं हरिद्राभं हरिद्रामेही; अम्ल-रसगन्धमम्लमेही; स्तुतक्षारप्रतिमं क्षारमेही; मज्जिष्ठोदकप्रकाशं मज्जिष्ठामेही; शोणितप्रकाशं शोणितमेही मेहति ॥११॥
इसके आगे पित्तजन्य प्रमेहों की व्याख्या करते हैं—नील-
१ चरक में कहा है कि—
“स विसपन् संधारीरे मेदसेवाहितः मिश्रीभावं गच्छति। मेदसो बहुवदधत्वात्”।
२ यदा पश्युपित्तं मूत्रं सान्दीभवंति भाजने ।
पुरुषं कफकोपेन तमाहूः सान्द्रमेहिनम् ॥
मेही रोगी—फेनयुक्त अच्छे (निर्मल), नीलवर्ण (द्रूषित पित्त के कारण से) मेहन करता है। हरिद्रामेही—दाह से युक्त एवं हरिद्रा मिश्रित जल के समान, अम्लमेही—अम्लरस एवं अम्ल-गन्ध युक्त, क्षारमेही—स्तुतक्षार (गलित क्षार द्रव) के तुल्य, मज्जिष्ठामेही—मज्जिष्ठामिश्रित पानी के समान लाल, शोणित-मेही—रक्त के समान मूत्र प्रवाहण करता है ॥११॥
अत ऊर्ध्वं वातनिमित्तान् वक्ष्यामः—सर्पिःप्रकाशं सर्पिर्मही मेहति; वसाप्रकाशं वसामेही; क्षौद्ररसवर्णं क्षौद्रमेही; सत्मातक्कवदनुप्रबन्धं हस्तिमेही मेहति ॥१२॥
इसके आगे वातजन्य प्रमेहों की व्याख्या करते हैं—सर्पिर्मही—सर्पि (घी) के समान, वातमेही वसा के समान, क्षौद्र-मेही—मधु के समान रस एवं वर्णयुक्त, हस्तिमेही—सत् हाथी के समान निरन्तर वेग पूर्वक और पीछे से बिना वेग के धीरे धीरे प्रवाहण करता है।
वि० मन्तव्य—हस्तिमेह में वस्ति का मुख खुल जाता है, फलतः सर्वदा मूत्र बहता रहता है, रोगी को उसके लिये—रक्ख की थैली मेहन के मुख पर लगानी पड़ती है। कफज मेह में—आहार रस में अधिक मधुरता उत्पन्न होने लगती है। यहाँ तक कि स्वेद और मूत्र भी मधुर होने लगते हैं। (स्वस्थ के स्वेद एवं मूत्र लावणिक होते हैं)। फलतः—शरीर एवं मूत्र पर मझिका बैठने लगती है। यह कफज मेह का उपद्रव है, मेद बढ़ने पर होता है। वातज मेह का उपद्रव—हृदय इससे हृदय की स्वाभाविक गति में रुकावट होने लगती है। फलतः वातप्रमेही को नाड़ी भी रुक-रुक कर चलती है। पाठक नाड़ी देखते समय ध्यान दें। स्तम्भ—गतिशील अवयवों का स्तम्भ हो जाना—देखा सुना जाता है। वात प्रमेह के रोगियों की मृत्यु हस्ततम्भ से (हार्ट फेल होने से) होती है। और उक्त वातज चारों मेह प्रायः सुखी सुकुमार एवं मस्तिष्क से काम लेनेवालों (वकील, जज, विद्वान् तथा धनिकों) को अधिक होते हैं ॥१२॥
मक्षिकोपसर्पणमालस्यं मांसोपचयः प्रतिश्यायः शैथिल्यारोचकाविपाकाः कफप्रसेकच्छर्दिनिद्राकासश्चासाश्चरि श्लेष्मजानासुपद्रवाः; वृषण्योरवदरणं वस्तिमेदो मेदुतोदो हृदि शूलमम्लीकाज्वरातीसारारोचका वमशुः परिघृषणं वाहो मूच्छी पिपासा निद्रानाजः पाण्डुरोगः पीतविष्णून्नेत्रत्वं चेति पैत्तिकानां, हृदप्रहो लोलयमनिद्रा स्तम्भः कम्पः शूलं बद्धपुरीषत्वं चेति वातजानाम्। एवमेते विशतिः प्रमेहाः सोपद्रवा व्याख्याताः ॥१३॥
मक्षिकोपसर्पण (शरीर की मधुरता में स्नान एवं अनुलेपन करने पर भी मक्खियों का आना), आलस्य, मांसोपचय (मांसबृद्धि), प्रतिश्याय, शैथिल्य, (अङ्गों में शिथिलता), अश्चरि, अविपाक, कफप्रसेक (मुख से छालाखाव), छर्दि, निद्रा-कास,