सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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स्वेदविन्म्लापनादीनां क्रियाणां प्राक् स उच्यते ।
पश्चात् कर्मसु चादिष्टः स च विस्वावणादिषु ॥२०॥
दोष को देखकर प्रयुक्त किया अभ्यंग दोष की शान्ति और मुहुता करता है । यह अभ्यंग स्वेदन विम्लापन आदि क्रियाओं से पहले बरता जाता है । विस्वावण आदि कार्यों में अभ्यंग पीछे से बरता जाता है । (विस्वावण से लेकर परिपेचन तक कार्यों में पीछे बरतते हैं) ।
वि० मन्तव्य—अभितः अज्यते अनेन इति अभ्यंगः—अभ्यञ्जनम् अर्थात् जिससे सब और आक्त किया—स्निग्ध किया जाता है । अभ्यञ्जन स्नेहों द्वारा किया जाता है—स्नेह के लेपन का नाम है अभ्यञ्ज । अर्थात् स्नेह को उस स्थान पर जुगुड़ देना—लगा भर देना ॥१६,२०॥
रुजावतां दारुणानां कठिनानां तथैव च ।
शोफानां स्वेदनं कार्यं ये चाप्येवविधा वृणाः ॥२१॥
वेदनावाले, कठोर, वायु से सख्त ( रूख ) शोफों में तथा इस प्रकार के वृणों में स्वेदन करना चाहिये ।
वि० मन्तव्य—स्वियते अनेन इति स्वेदनम्—जिसके द्वारा वृणशोथ तथा वृण का स्थान स्विन्न हो जाता है । स्वेदन के लिये देखिये वि० अ० ३२ ॥२१॥
स्थिराणां रुजतां मन्दं कार्यं विम्लापनं भवेत् ।
अभ्यञ्ज्य स्वेदयित्वा तु वेणुनाड्या ततः शनैः ॥२२॥
विमर्दयेद्विषक प्राज्ञस्तलेनाङ्गुष्ठकेन वा ।
स्थिर, वेदनावाले ( थोड़ी वेदनावाले—कफाधिक ) शोफों में विम्लापन करना चाहिये । इसके लिये अभ्यंग करके, स्वेदन देकर, वॉस की पौरी से, या हाथ की हथेली से अथवा अंगूठे से वैद्य धीरे धीरे मर्दन करे ।
वि० मन्तव्य—विम्लापन—अंगुली आदि से मर्दन करके शोथ का विलयन करना । जब वृणशोथ उत्पन्न होने लगता है तबही यह उपक्रम किया जाय ॥२२॥
शोफयोर्रुपनाहं तु कुर्यादामविदग्धयोः ॥२३॥
अविदग्धः शमं याति विदग्धः पाकमेति च ।
आम और विदग्ध दोनों ही अवस्थाओं में शोफ पर उपनाह ( पुलटिस ) बॉयनो चाहिये । इस उपनाह से न पका शोफ बैठ जाता है, और आधा पका शोथ पूरा पक जाता है ।
वि० मन्तव्य—उपनाह—उपनह्यते अनेन इति उपनाहः—अर्थात् वृणशोथ को बैठाने अथवा पकाने के लिये जो लेप किया जाता है । उपनाहोपयोगी द्रव्य—सू० अ० ३७ के श्लो० १ से ८ देखिये ॥२३॥
निवर्तते न यः शोफो विरेकान्तेरुपक्रमैः ॥२४॥
तस्य संपाचनं कुर्यात् समाहृत्यौषधानि तु ।
दधितक्रसुराशुक्रधान्याम्लैर्योजितानि तु ॥२५॥
स्निग्धानि लवणीकृत्य पचेदुत्कारिकां शुभाम् ।
ऐरण्डपत्रया शोफं नाहयेदुष्णया तथा ॥२६॥
हितं सम्भोजनं चापि पाकायामिमुक्षो यदि ।
विरेचन तक कहे हुए उपचारों के बरतने पर भी जो शोफ शान्त नहीं होता, उसके लिये औषधियाँ लाकर उसका पाचन करे । इसके लिये—मिश्रकोक्त अध्याय में कहीं शणमूल बीजक आदि औषधियों को दही, तक्र, सुरा, शुक्त, कांजी में मिलाकर, तैल आदि से स्निग्ध करके, इसमें अच्छी मात्रा में नमक मिलाकर उत्कारिका (लपसी सी) बनाये । इसको गरम करके एरण्ड पत्र के साथ शोफ पर बांध देवे । यदि शोफ पक रहा हो तो उसे भोजन भी यथेष्ट (पकानेवाला) देवे । (पथ्या-पथ्यमिहैकत्र सुक्तं संभोजनं मतम् । ऐसा भोजन दे अर्थात् पथ्य-अपथ्य मिलाकर भोजन देवे, ऐसा भी कई मानते हैं) ॥
वेदुनोपशमार्थाय तथा पाकशमाय च ॥२७॥
अचिरोत्पत्ति ते शोफे कुर्याच्छ्लोणितमोक्षणम् ।
सशोफे कठिने ध्यामे सरक्ते वेदनावति ॥२८॥
संरुद्धे विषमे चापि वृणे विस्वावणं हितम् ।
सविषे च विशेषेण जलौकभिः पदैस्तथा ॥२९॥
वेदनायाः प्रशान्त्यर्थं पाकस्याप्राप्ते तथा ।
तत्काल उत्पन्न शोफ में वेदना की शान्ति के लिये और पकने से बचाने के लिये जोँक से रक्तमोक्षण करे । शोफ-युक्त कठिन, फूले, सुखीवाले, वेदना युक्त, विशाल मलवाले, और विषम वृण में ( नीचे ऊँचे वृण में ), विस्वावण हितकारी है । विषवाले वृणों में तो मुख्यतः जोँकों से, अथवा पाछकर, रक्त मोक्षण करे । जिससे वेदना शान्त हो जाये और पकने से बच जाये ।
वि० मन्तव्य—रक्तमोक्षण—वृणस्थान पर जोँक लगाकर अथवा पन्थ लगाकर रक्त निकालना ॥२६॥
सोपद्रवणां रुक्षाणां कृशानां व्रणओषिणाम् ॥३०॥
यथास्वमौषधैः सिद्धं स्नेहपानं विधीयते ।
उपद्रववाले, रूख, कृश, वृणजन्य शोथ से पीड़ित व्यक्तियों में उनके अपने दोषों के अनुसार औषधियों से सिद्ध स्नेह का पान कराना चाहिये ॥३०॥
उत्सन्नमांसशोफे तु कफजुष्टे विशेषतः ॥३१॥
संक्तिष्टश्या (ध्या) मरुधिरं व्रणे प्रच्छदं हितम् ।
शोफ में मांस उभरा होने पर, विशेषकर कफयुक्त वृणों में, रक्त के दूषित एवं श्याम—काला होने पर वमन हितकारी है ।
चरक में कहा भी है—
वृणानामादितः कार्यं यथासन्नं विशोधनम् ।
ऊर्ध्वभागोरधोभागेः शस्त्रैर्वस्तिभिरेव च ॥
सद्यः शुद्धशरीरणां प्रशमं यान्ति हि वृणाः ॥३१॥
वातपित्तप्रदुष्टेषु दीर्घकालानुविधेषु ॥३२॥
विरेचनं प्रशंसन्ति व्रणेषु व्रणकोविदाः ।